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डा श्याम गुप्त का ब्लोग...

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Lucknow, UP, India
एक चिकित्सक, शल्य-चिकित्सक जो हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान व उसकी संस्कृति-सभ्यता के पुनुरुत्थान व समुत्थान को समर्पित है व हिन्दी एवम हिन्दी साहित्य की शुद्धता, सरलता, जन-सम्प्रेषणीयता के साथ कविता को जन-जन के निकट व जन को कविता के निकट लाने को ध्येयबद्ध है क्योंकि साहित्य ही व्यक्ति, समाज, देश राष्ट्र को तथा मानवता को सही राह दिखाने में समर्थ है, आज विश्व के समस्त द्वन्द्वों का मूल कारण मनुष्य का साहित्य से दूर होजाना ही है.... मेरी तेरह पुस्तकें प्रकाशित हैं... काव्य-दूत,काव्य-मुक्तामृत,;काव्य-निर्झरिणी, सृष्टि ( on creation of earth, life and god),प्रेम-महाकाव्य ,on various forms of love as whole. शूर्पणखा काव्य उपन्यास, इन्द्रधनुष उपन्यास एवं अगीत साहित्य दर्पण (-अगीत विधा का छंद-विधान ), ब्रज बांसुरी ( ब्रज भाषा काव्य संग्रह), कुछ शायरी की बात होजाए ( ग़ज़ल, नज़्म, कतए , रुबाई, शेर का संग्रह), अगीत त्रयी ( अगीत विधा के तीन महारथी ), तुम तुम और तुम ( श्रृगार व प्रेम गीत संग्रह ), ईशोपनिषद का काव्यभावानुवाद .. my blogs-- 1.the world of my thoughts श्याम स्मृति... 2.drsbg.wordpres.com, 3.साहित्य श्याम 4.विजानाति-विजानाति-विज्ञान ५ हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान ६ अगीतायन ७ छिद्रान्वेषी ---फेसबुक -डाश्याम गुप्त

बुधवार, 3 अक्टूबर 2012

श्राद्ध और पितृ तर्पण के निहितार्थ .....डा श्याम गुप्त


                                       ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...                                  

                      आजकल  पितृ-पक्ष अर्थात पितृ तर्पण दिवस, श्राद्ध-दिवस चल रहे हैं | श्राद्ध अर्थात श्रद्धा व्यक्त करना-पितृव्यों  के प्रति|   वस्तुतः पितृ कौन हैं ? यद्यपि संस्कृत में पितृ पिता को कहा जाता है और श्राद्ध भी हम सब अपने अपने मृत पिता का ही करते हैं ..परन्तु विशद सन्दर्भ में  पिछली तीन पीढ़ियों तक एवं वास्तविक भाव में अपने सभी पिछली पीढ़ियों को पितृ या पितर कहा जाता है जो पितृ-लोक में अवस्थित रहते हैं | मान्यता है कि मृत्यु के पश्चात आत्मा दिव्य शरीर प्राप्त कर पितृलोक  को चली जाती है | अतः यदि वास्तव में देखा जाय तो प्रत्येक मनुष्य के मूल पितृ एक ही होंगे जहां से यह मानव- जाति  प्रारम्भ हुई | अतः वास्तव में यह पर्व समस्त मानव जाति के पूर्वजों के तर्पण अर्थात संतुष्टि हेतु प्रत्येक व्यक्ति द्वारा किया जाने वाला कृतित्व है जो अपना व्यक्तिगत होते हुए भी समाजगत  अपितु विश्व कल्याण हेतु कर्म है | और अधित तात्विकता से देखें तो यह अपने ही मूल आदि- आत्म-तत्व --जब वह ब्रह्म से विलग होती है --के तर्पण या संतुष्टि हेतु कर्म है  अतः वह स्वयं के शुद्धीकरण की प्रक्रिया भी है | अतः यह समस्त संसार की चराचर की , कण कण की तृप्ति की क्रियाविधि है ...स्वयं की भी |
                        पितृ लोक पृथ्वी से ऊपर अंतरिक्ष के पार कहा जाता है ( तैत्तरीय ब्राह्मण ) | अर्थात वस्तुतः पितृ पर्व पर दान आदि की परम्परा में दान की गयी वस्तुओं,  श्राद्ध कर्ता के श्रृद्धा-आदर आदि शुद्ध मनोभावों, विचारों  का प्रभाव पृथ्वी से लेकर अंतरिक्ष के पार द्यूलोक द्युलोक (समस्त ब्रह्माण्ड )  तक विस्तार का भाव निहित है , उसीप्रकार जैसे यज्ञ से समस्त वायुमंडल व ब्रह्माण्ड के पवित्रीकरण व विशुद्धीकरण का भाव निहित होता है  | इसे हम वैचारिक, मानसिक व भाविक यज्ञ की संज्ञा भी दे सकते हैं |
                        सृष्टि के प्रारम्भ में ही  देव, पितृ, मानवों व रुद्रों की दिशाएँ व स्थिति निश्चित कर दी गयीं थीं | पूर्व  दिशा देवों के लिये( शायद आदि-मूल देवता सूर्य --सूर्योदय के कारण ),  दक्षिण पितरों के लिए ( मृत्यु से सम्बंधित यम आदि लोक भी दक्षिण में स्थित माने गए हैं ), पश्चिम मनुष्यों (आदि- मानव भारत में अवतरित होकर पश्चिम में फैलता गया ) व उत्तर रुद्रों ( मानव व देवों के मध्य प्राकृतिक शक्तियां ) के लिए निश्चित की गयीं | 
                         क्रिया विधान -- लोक कथाओं आदि के अनुसार सिर्फ घास के एक तिनके को पितरों के नाम से गाय या किसी भी प्राणी को खिला देने पर भी पितृ तर्पण विधान पूर्ण होता है ...अर्थात मंतव्य व  भावना ही प्रधान है --अपनी अपनी सक्षमता- सामर्थ्यानुसार |
                         श्राद्ध -- कौवे व पीपल आदि .... वस्तुतः श्राद्ध कर्म प्रकृति के प्रति श्रृद्धा-प्रकट का विधान भी है| ब्राह्मणों के बाद गाय, कौवा, चींटी , व कुत्ते को ग्रास डालने का एवं पीपल को जल देने का विधान है |
                मृत्यु के बाद जीव किसी भी योनि में जन्म ले सकता है। कौवे को पितृ पक्ष में आमंत्रित करने के पीछे एक और मान्यता है। यह पक्षी कागभुसुंड समाज से है। कागभुसुंड भगवान शिव का परम भक्त था, धर्म ग्रंथों में इसका उल्लेख है। इसलिए कौवे को आमंत्रित कर परिवार के लोग भगवान शिव से अपने कल्याण और अनिष्ट से बचने की कामना करते हैं। कौवे व पीपल को पितरों का प्रतीक माना जाता है। 

                  विज्ञान के अनुसार -- ब्राहमण= मानव, गाय = स्तनपायी प्राणी, चींटी = कीट 

योनी का प्राणी, कौवा = पक्षी योनी का प्राणी, पीपल = वनस्पति ...अर्थात सभी प्राणी-जगत के संतुष्टि 

का भाव |

                  पर्यावरण भावानुसार --- गाय, चींटियाँ व कुत्ता हमारी घरेलू खान-पान उच्छिष्ट 

की सफाई करते हैं,  कौवा- सफाई कर्मी की भांति कार्य करता है,  पीपल - भारी मात्रा  में वायु का 

शुद्धीकरण करता है अतः पूज्य हैं |                                  

        आजकल हमने पर्यावरण इतना प्रदूषित कर दिया है तथा प्रकृति से इतने दूर होगये हैं कि कौवे, कम ही दिखाई देते हैं चींटियों को अब कोई दाना डालता ही नहीं है | पीपल भी बहुमंजिली इमारतों के झुण्ड में कम ही दिखाई देते हैं |.... प्रस्तुत है एक अगीत ....

         " वह कौवा अब,
           बच्चे के हाथ से रोटी छीनने ;
           शहर से दो मील दूर 
           ठूंठ से खड़े 
           नीम के वृक्ष से 
           आता है | "     

नग्नता और वैराइटी .... डा श्याम गुप्त.....

                                        ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...




           
          अब इससे आगे और अधिक वेराइटी क्या छापेंगे या छाप सकते हैं ये अखबार वाले ?????
----- क्या यही  है मीडिया का सामाजिक सरोकार ....????????

मंगलवार, 2 अक्टूबर 2012

बापू -शास्त्री को श्रृद्धा नमन ...डा श्याम गुप्त...

                                    ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...

                                                             श्रृद्धा नमन 

     "  अमीरी  और उपभोग की सीमा नहीं है |कारखानों आदि के लिए जिस तरह उपजाऊ भूमि व जल आदि संसाधनों को निपटाया जा रहा है , वह विकास नहीं है | "    --- महात्मा गांधी 



मोहन दास करम चंद 'गांधी'


                                 

श्री लाल बहादुर शास्त्री
                                       'हमने पूरी ताकत से लड़ाई लड़ी,  हमें शांति के लिए भी पूरी ताकत लगानी है।'---लाल बहादुर शास्त्री


सोमवार, 1 अक्टूबर 2012

बेंगलूर में अखिल भारतीय साहित्य साधक मंच की काव्य गोष्ठी व मुशायरा संपन्न ..

                                        ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...
                 

              दिनांक ३०-९-१२ रविवार को अखिल भारतीय साहित्य साधक मंच की मासिक काव्य गोष्ठी  व मुशायरा लायंस क्लब, सरक्की, जेपी नगर  के सभागार में  वरिष्ठ गीतकार  डा श्याम गुप्त की अध्यक्षता में संपन्न हुई | गोष्ठी के अतिथि शायर मुश्ताक अहमद शाह एवं कवि भागीरथ अग्रवाल थे |  मंच संचालन समिति के अध्यक्ष श्री ज्ञान चंद मर्मज्ञ ने किया |
               गोष्ठी के प्रथम  सत्र में कश्मीरी साहित्य के विद्वान श्री त्रिलोकी नाथ धर ने 'कश्मीरी साहित्य व उसका लालित्य ' विषय पर व्याख्यान देते हुए कश्मीरी भाषा, साहित्य व कवियों के बारे में  विस्तार से बताया|
कश्मीरी साहित्य पर  कविवर श्री धर का अभिभाषण
उपस्थित कवि, शायर व श्रोतागण
                द्वितीय सत्र में उपस्थित युवा व वरिष्ठ कवियों, गीतकारों व शायरों ने श्रेष्ठ ग़ज़लों, कविताओं व  गीतों से श्रोताओं को भाव विभोर किया |  युवा कवि श्री दिवस गुप्ता ने  आधुनिक सभ्यता, अति-विकास  व अनियंत्रित विकास के दुष्परिणामों पर ध्यान खींचते हुए   कहा...


"छतें ही छतें है दूर तक
जहां नज़र भी हांफने लगे |"
युवाकवि दिवस गुप्त का काव्य-पाठ
           

            अध्यक्षीय अभिभाषण में डा श्याम गुप्त ने अगीत विधा के छंद-विधान पर अपनी नवीन काव्य-कृति " अगीत साहित्य दर्पण"   रचनाकारों व श्रोताओं के सम्मुख रखते हुए काव्य की अगीत विधा  से अवगत कराया  तथा लंबी कविता व संक्षिप्त कविता की अपनी-अपनी विशेषताओं का उल्लेख किया |
कवयित्री मंजू व्यंकट द्वारा काव्य-पाठ साथ में मंच संचालक श्री मर्मज्ञ
              

रविवार, 30 सितंबर 2012

अगीत साहित्य दर्पण (क्रमश:) अध्याय तीन-वर्तमान परिदृश्य एवं भविष्य की संभावना--......डा श्याम गुप्त...

                                   ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...

 पिछली पोस्ट से आगे ..... 

            लखनऊ नगर से बाहर  नगरों  के निवासी अगीतकारों में ---श्री धन सिंह मेहता (अल्मोडा), सुरेन्द्र कुमार वर्मा (रायवरेली ), स्नेह प्रभा (दिल्ली), डा मिथिलेश दीक्षित (शिकोहाबाद ), डा इंदिरा अग्रवाल ( अलीगढ़ ), कृष्ण नारायण पांडे ( दिल्ली), जवाहर लाल मधुकर (चेन्नई ), मिथिलेश कुमारी ( पटना ), बाल सोम गौतम (बस्ती ), विनय शंकर दीक्षित (उन्नाव ), ज्वेल थीफ (अलीगढ़), चन्द्रभान चन्द्र (उन्नाव) तथा डा देशबंधु शाहजहाँपुरी ...आदि..|

         देश की सीमापार विदेशों में बसे अगीत रचनाकारों में --श्रीमती डा उषा गुप्ता (अमेरिका), सुरेश चन्द्र शुक्ल ( नार्वे), आर्यभूषण, सुरेश वर्मा, वक्शीस कौर संधू, शकुंतला बहादुर, कैलाश नाथ तिवारी व देवेन्द्र नारायण शुक्ल (  अमेरिका) आदि प्रमुख हैं | 

प्रमुख  अगीत रचनाएँ ....

महाकाव्य  ---१-सौमित्र गुणाकर--वीरवर लक्ष्मण के चरित्र पर --श्री जगत नारायण पाण्डेय |

                 ---२ -सृष्टि ( ईषत इच्छा या बिगबैंग--एक अनुत्तरित उत्तर ) --डा श्याम गुप्त |

खंडकाव्य  --१-मोह और पश्चाताप ( राम कथा आधारित )--श्री जगत नारायण पाण्डेय ..|

                --२- शूर्पणखा ( नारी विमर्श ) --डा श्याम गुप्त ..|

काव्य-कृतियाँ .... 

      अगीतिका (प्. जगत नारायण पाण्डेय ),  अगीत श्री (सोहन लाल सुबुद्ध ), अगीत काव्य के चौदह रत्न (डा रंगनाथ मिश्र सत्य), काव्यमुक्तामृत ( डा श्याम गुप्त), अगीतोत्सव ( डा सत्य ), मेरे सौ अगीत ( अनिल किशोर निडर ), महकते फूल अगीत के (मंजू सक्सेना विनोद), अगीत महल ( सुदर्शन कमलेश ), आँचल के अगीत (काशी नरेश श्रीवास्तव), झांकते अगीत (श्रीकृष्ण तिवारी ), मेरे अगीत छंद(सुरेन्द्र कुमार वर्मा), अगीत काव्य के इक्कीस स्तंभ , अष्टादश पथी,व सोलह महारथी ( सभी डा  सत्य ), कवि सोहन लाल सुबुद्ध का परिचय ( डा सत्य), चाँद को चूमते अगीत (वीरेंद्र निझावन ), गूंजते अगीत (अमर नाथ बाजपई ), अगीतान्कुर व अगीत सौरभ (गिरिजा शंकर पांडे ), विश्वास की ह्त्या (राम कृष्ण दीक्षित फक्कड ), अनकहे अगीत (वीरेंद्र निझावन, अगीत सुमन (प्रेम चंद गुप्त विशाल ), अगीत प्रसून ( राजीव सरन ), मेरे प्रिय अगीत ( गिरिजा देवी निर्लिप्त ), उन्मुख अगीत (नित्यानंद तिवारी ), अगीत आँजुरी (नारायण प्रकाश नज़र ), औरत एक नहीं ( वाहिद अली वाहिद ), दिव्य-अगीत ( धुरेन्द्र प्रसाद बिसारिया ) आदि....|

पत्र-पत्रिकाएं --अगीत त्रैमासिक , अगीतायन ( साप्ताहिक) ---संपादक -श्री अनुराग मिश्र मी.३८८५, अगीतायन, राजाजी पुरम, लखनऊ -१७.

अन्य  रचनाएँ जिनमें अगीत का प्रयोग हुआ ---- मैं भी गांधी हूँ (सूर्य नारायण मिश्र -१९८५), अवंतिका(रामचंद्र शुक्ल-१९८५), अगीत प्रवाह ( तेज नारायण राही ), नैतिकता पूछती है (सोहन लाल सुबुध ), मन दर्पण (मंजू लता तिवारी -१९९४), मैं भी शिव हूँ (कौशलेन्द्र पांडे-२०००), विद्रोही गीत (भगवान स्वरुप कटियार -२०००), काव्य-प्रभा (त्रिभुवन सिंह चौहान -२०००), काव्य-वाटिका ( तेज नारायण राही-२०००), तुम्हारी याद में (जय प्रकाश शर्मा-२०००), कोरिया है सपनों का देश ( डा नीरज कुमार -२०००), गुनहगार हूँ मैं (जावेद अली), प्रवासी अमेरिकी भारतीय -खंड १ व २ (डा उषा गुप्ता-अमेरिका ) एवं वर्तिका ( डा योगेश गुप्त)...|

अगीत  विधा के सम्बन्ध में ग्रंथों, शोध ग्रंथों में उल्लेख व आलेख.....

१-समकालीन कविता और अगीत - जंग बहादुर सक्सेना |

२- अगीत--उद्भव, विकास व संभावनाएं ---गिरिजा शंकर पांडे 'अंकुर' |

३-हिन्दी साहित्य का इतिहास व द्वितीय महायुद्धोत्तर हिन्दी साहित्य का चित्रण --डा लक्ष्मी शंकर वार्ष्णेय |

४-नया साहित्य नए रूप---डा सूर्य प्रसाद दीक्षित |

५-साहित्य की विभिन्न प्रवृत्तियां ---डा जय किशन दीक्षित |

६-छायावादोत्तर प्रगीत काव्य ---डा विनोद गोधरे |

७-हिन्दी साहित्य का विवेचनात्मक इतिहास --डा राजनाथ शर्मा, आगरा |

८-समकालीन कविता-विविध परिदृश्य--डा हर दयाल |

९-अकविता और कला सौंदर्य----डा श्याम परमार --भोपाल | 

१०-अमेरिकी प्रवासी  भारतीय :हिन्दी प्रतिभाएं ---डा उषा गुप्ता |

११-टूटी-फूटी कड़ियाँ ---डा हरिबंश्  राय 'बच्चन' |

१२-हिन्दी साहित्य का सुबोध इतिहास ---बाबू गुलाब राय ....( परिवर्धित संस्करण सन २००० ई.)

१३-डा वेरस्की, वारसा विश्व विद्यालय, पोलेंड ---के आलेख में अगीत का उल्लेख |

१४- डा वोलीशेव-- रूसी-हिन्दी विद्वान, मास्को द्वारा 'प्रावदा ' में प्रकाशित आलेख- "भारत की किस्म किस्म की कविता " में अगीत का उल्लेख --जिसका हिन्दी दिनमान में अनुवाद  हेम चंद पांडे ने किया |

अगीत पर शोध प्रबंध ....

"हिन्दी साहित्य सेवी संस्था : अगीत परिषद का अनुशीलन" ---लाल बहादुर वर्मा 

साहित्यकारों व अन्य विद्वानों द्वारा अगीत पर सम्म्मतियाँ  व टिप्पणियाँ ---

१- अधिकतर विदेशों में कहीं कविता गाकर नहीं पढ़ी जाती है, अतः अगीत का भविष्य उज्जवल है |                                                                                                --उपन्यासकार यशपाल....     

२-यदि अगीत फैशन के लिए नहीं है तो तो उसका भविष्य उज्जवल है -श्री अमृतलाल नागर उपन्यासकार|

३-अगीत विधा का आंदोलन भारतीय पृष्ठभूमि पर आधारित है |---समीक्षक उमेशचन्द्र शुक्ल  |

४-अगीत के रचनाकार कर्तव्यनिष्ठ हैं ---चौधरी नबाव सिंह यादव पूर्व मंत्री उ.प्र. |

५-अगीत वस्तुतः गीति-काव्य का ही नया अभिकल्प है |--प्रोफ. सूर्यप्रसाद दीक्षित ,लखनऊ वि.वि   |

६-"अगीतवाद की अतीव आवश्यकता है " ---डा वेरस्की , वारसा, पोलेंड |

७-अगीतकार अनास्था से नाता तोडकर आस्था का हाथ पकडना चाहता है |--डा शम्भूनाथ चतर्वेदी  |

८-  अगीत एक निषेधात्मक आन्दोलन नहीं है |--डा जगदीश गुप्त, साहित्यकार |

९-अगीत पत्रिका हिन्दी काव्य की उर्वरा शक्ति की परिचायका है |-पद्मश्री लक्ष्मी नारायण दुबे ..|

१०-आज नहीं किन्तु कुछ समय उपरान्त इन अगीत पत्रिकाओं का बहुत बड़ा साहित्यिक मूल्यांकन होगा |

                                                                                               ---- डा त्रिलोकी नारायण दीक्षित |      

११-अगीत को नई उषा मिले |--डा उषा गुप्ता, रीडर, हिन्दी विभाग , लखनऊ वि.वि. |

१२-मुझे विश्वास है अगीत स्थायित्व ग्रहण करेगा |--कमलापति मिश्र |

१३-अगीत बुद्धि से निकलकर ह्रदय को छूना चाहता है |--रामचंद्र शुक्ल , न्यायाधीश |

१४-कविता के क्षेत्र में गीत-अगीत की निर्झरिणी बह रही है |--शंभू नाथ आईएएस व साहित्यकार |

१५-अगीत मौन रहते हुए भी मुखर रहता है, यह मन व बुद्धि के सम्यक अनुशीलन से उत्पन्न एक विधा है धारा है |

१६-अगीत में भी अपार संभावनाएं हैं |   ---डा श्याम गुप्त ..शल्य-चिकित्सक व साहित्यकार |

१७-आज छोटी कविताओं का, अगीत का युग है |--डा लक्ष्मी नारायण दुबे, साहित्यकार  |

१८-अगीत के रचनाकारों में नए तथ्य मिलते हैं |--- डा लोथार लुत्से,  जर्मनी |

१९-भारत में किसिम किसिम की कविता में अगीत काव्य का महत्वपूर्ण स्थान है -डा चेलिशेव, मास्को |

                                                  ---- इति अध्याय तीन ---

  अगीत साहित्य दर्पण  (क्रमश:),  अध्याय चार --अगीत छंद एवं उनका रचना विधान ....अगली पोस्ट में 


 

शनिवार, 29 सितंबर 2012

अगीत साहित्य दर्पण (क्रमश:) अध्याय तीन-वर्तमान परिदृश्य एवं भविष्य की संभावना.......डा श्याम गुप्त...

                                  ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...


          अगीत साहित्य दर्पण -तृतीय अध्याय ---वर्तमान परिदृश्य एवं  भविष्य की संभावना


          यदि हिन्दी भाषा व साहित्य के वर्तमान परिदृश्य पर एक गहन दृष्टि डाली जाय तो अगीत का एक विस्तृत फलक दृश्यमान होता है | आज अगीत के अगणित कवि, साहित्यकार, रचनाकार व प्रशंसक समस्त लखनऊ नगर में ही नहीं अपितु समस्त प्रदेश, राष्ट्र व विश्वभर में फैले दिखाई देते हैं|  अगीत आज देश की सीमाओं को पार करके अंतर्राष्ट्रीय क्षितिज पर भी अपनी छटा व सौरभ बिखेरता दिखाई देता है | साहित्यिक जगत के अतिरिक्त देश के विश्वविद्यालयों व संस्थाओं में अगीत की चर्चा होती है एवं पढ़ाया जाता है | स्नातकोत्तर स्तर तक परीक्षाओं में प्रश्न पूछे जाते हैं | एक साक्षात्कार में अगीत के प्रणेता डा रंगनाथ मिश्र 'सत्य' का कथन है कि.." अगीत, हिन्दी भाषा व हिन्दी साहित्य को गति व दिशा देने में सहायक, सक्षम व सफल है ; इसीलिये यह आज विश्वभर में फ़ैल रहा है  और मैं भविष्य के प्रति आशान्वित हूँ |"... निश्चय ही अगीत एक दिन हिन्दी साहित्य के साथ साथ अन्य विश्व साहित्य में भी अपना स्थान बनाने में सफल होगा |
             अंतर्राष्ट्रीय सन्दर्भ में अगीत रचनाओं के कुछ उदहारण अगीत के विस्तृत फलक को दृष्टि देते हैं.....
" ख्याल  मेरे तो,
रूह की चुनरी पर काढते रहते हैं फूल;
तू एक भूली-बिसरी याद जैसे एक तस्वीर;
और मैं , इस तस्वीर का खाली फ्रेम,
लकड़ी का चौखटा तथा आंसुओं की किश्ती ,
सोच  की सुई, चुप का पानी,
निराशा का गरल |"                                    ---- वक्शीश कौर सन्धू ( प्रवासी भारतीय -अमेरिका )


" गीत गज़ल लिखने से अच्छा है ,
रोते बच्चे को बाहों में उठा लेना ;
काम करती थकती पत्नी का,
सहायक बन, घर संवार देना ;
खर-पतवार निरा देना,
प्यासे पेड़ों को पानी पिलाना |"                 ---- कैलाश नाथ तिवारी, अमेरिका  ( प्रवासी के स्वर से )

" हम मरते हैं,
कटते हैं,
सामस्यायें  मौन खड़ी हैं,
बे परिणाम |"                                          ----सुरेश चन्द्र शुक्ल, नार्वे

                    रूसी भाषाविद साहित्यकार श्री संगमलाल मालवीय , नई दिल्ली ---अपने एक लेख में लिखते हैं ---"आधुनिक हिन्दी साहित्य में अगीत साठोत्तरी देन  है इसलिए 'अगीत' के नाम से स्कूली बच्चों तक को मोह होगया है | क्या आश्चर्य पाठ्य-पुस्तकों में रचयिता कभी 'अ' अनार की जगह 'अ' माने अगीत लिखना ही पसंद करें |"
                       अगीत विधा के प्रसार व प्रचार व काव्य रचना में लिप्त कवियों, कथाकारों, समीक्षकों व अन्य साहित्यकारों का एक बड़ा वर्ग एवंडा सत्य के शिष्य-शियाओं का, श्रोताओं का, प्रशंसकों व सद्भावी लोगों का एक बहुत बड़ा वर्ग देश भर  में एवं अंतर्राष्ट्रीय क्षितिज पर फैला है जिससे प्रेरित होकर कविवर सोहन लाल 'सुबुद्ध ' को कहना पड़ा----
                     " चलाई कविवर सत्य ने कविता विधा अगीत,
                      जिससे जुड चर्चित हुए बहुतेरे कवि मीत |"

              आज अगीत -विधा के विभिन्न रचनाकारों व  कवियों को काव्य- गोष्ठियों, सम्मेलनों, रेडियो-दूरदर्शन व विचार मंचों पर अगीत के प्रतिनिधि के रूप में बुलाया जाता है | राष्ट्रीय स्तर के समारोहों में देश भर की विभिन्न साहित्यिक संस्थाओं द्वारा सम्मान दिया जाता है |
              अगीत रचनाओं में संलग्न कवियों, कृतिकारों,साहित्यकारों द्वारा विभिन्न काव्यगोष्ठियों , कवि सम्मेलनों व विचार मंचों का आयोजन किया जा रहा है | वर्तमान में माह के प्रत्येक प्रथम रविवार को डा सत्य के आवास 'अगीतायन' राजाजी पुरम में काव्य-गोष्ठी का बृहद आयोजन होता है तथा नगर के विभिन्न आयोजनों व साहित्यिक विचार मंचों का आयोजन, संचालन अगीत परिषद के संयुक्त तत्वावधान में किया जाता है |
                प्रत्येक वर्ष एक मार्च को अगीत व अगीत परिषद के संस्थापक डा रंगनाथ मिश्र 'सत्य' के जन्म दिवस पर अगीत विधा रचनाकारों द्वारा 'साहित्यकार दिवस' मनाया जाता है  इस वृहद आयोजन में रचनाकारों व कवियों को विभिन्न सम्मानों से सम्मानित किया जाता है | प्रत्येक वर्ष बाबा रविकांत खरे, संस्थापक, व अंतर्राष्ट्रीय अध्यक्ष ,'अखिल भारत वैचारिक क्रान्ति  मंच '  एवं 'अखिल भारतीय अगीत परिषद' के संयुक्त तत्वावधान में कवि संगम, कवि मेला, कवि कुम्भ आदि का आयोजन राष्ट्रीय स्तर पर देश के विभिन्न भागों में किया जाता है ; जिसमें देश-विदेश के  कवि, साहित्यकार, विचारक, चिन्तक विद्वान साहित्य, समाज व राष्ट्रीय महत्त्व के सम-सामयिक विषयों पर विचार-विमर्श व विचार-मंथन करते हैं  एवं रचनाएँ व कृतियाँ प्रस्तुत की जाती हैं |
                       अगीत आंदोलन को वर्तमान में गति देने में डा सत्य द्वारा स्थापित साप्ताहिक समाचार पात्र "अगीतायन" का विशेष महत्वपूर्ण स्थान रहता है |  इसके संपादक श्री अनुराग मिश्र  वर्षों से अगीत को गति देने के पुनीत कार्य में संलग्न हैं| यह अगीत का मुखपत्र अगीत के प्रचार-प्रसार के अतिरिक्त काव्य की हर विधा गीत,गज़ल छंद-विधा, समीक्षा, लेख, कथा, विचार, साक्षात्कार आदि सभी साहित्यिक गतिविधियों के प्रचार प्रसार में संलग्न है | प्रथम अगीत महाकाव्य प्रणेता पं. जगत नारायण पांडे ' अगीतिका' में कहते हैं --
   " अनेक रचनाकारों ने अगीत की रचना करके उसे एक स्थान दिया है |"
                          हिन्दी के अंतर्राष्ट्रीय विद्वान डा वेरस्की ( वारसा--पोलेंड) का कथन है---" अगीत की अतीव आवश्यकता है "...इसी क्रम में पद्मश्री डा लक्ष्मी नारायण लाल का कहना है --"आज छोटी कविताओं व अगीत का युग है |"...लखनऊ विश्व-विद्यालय के पूर्व कुलपति डा हरेकृष्ण अवस्थी का कथन था कि.."मुझे यह जानकर प्रसन्नता हुई कि अगीत की गति आगे बढ़ रही है |"   डा शम्भूनाथ का कथन है कि.."कविता के क्षेत्र में गीत-अगीत की निर्झरिणी  बह रही है |"  ... इस तरह अगीत काव्य-धारा का प्रभाव आज समाज के सभी क्षेत्रों --सांस्कृतिक, सामाजिक, साहित्यिक, राजनैतिक क्षेत्रों पर पड़ा है | यह अगीत रचनाओं को पढ़ कर जाना जा सकता है |
                          कविवर श्री सुरेन्द्र कुमार वर्मा , बछरावां , रायवरेली की हाल में ही प्रकाशित रचना " मेरे अगीत छंद" की भूमिका में डा राम नरेश प्राचार्य दयानंद पोस्ट ग्रेजुएट कालिज बछरावां का कथन है  कि --" ...अब यह विधा हिन्दी साहित्य के इतिहास में अपनी उपस्थिति दर्ज करा चुकी है | विधागत सीमाओं और सम्भावनाओं की चर्चा-परिचर्चा में हिन्दी के वरेण्य समीक्षक अगीत से अनभिज्ञ नहीं रहे हैं , यथानुसार अगीत का उल्लेख होता रहा है |"...कवि सुरेन्द्र कुमार वर्मा का स्वयं का भाव है .." अन्यथा मुझ जैसा अज्ञ और कहाँ अगीत का महासागर ...|"
                    
                    अगीत की यह अल्हड निर्झरिणी आज विभिन्न धाराओं -उपधाराओं  से समाहित कालिंदी का रूप धारण करके कल-कल निनाद के साथ प्रवाहमान है तथा आगे और आगे बढती जा रही है, काव्य-महासागर बनने  |  यह न केवल हिन्दी कविता व साहित्य की परम्पराओं में एक प्रमुख धारा की भांति प्रवाहित है अपितु उत्तरोत्तर नवीन उपधाराओं से आप्लावित हो रही है | अगीत विधा के कवि-पुष्प  अगीत की काव्य-वाटिका में अपना सौरभ बिखेरते जा रहे हैं एवं कवियों साहित्यकारों, समीक्षकों व जन मानस को अपने नए विषय-भावों, रूपों व विविध छंदों से हर्षित व आंदोलित कर रहे हैं | अगीत विधा के इस प्रसार के साथ ही साहित्य में अर्वाचीन साहित्यिक गुलामी की प्रथा की पुष्टि करने वाले एवं यथार्थ व अकविता के नाम पर घिसे-पिटे विषयों को चिल्ला चिल्ला कर कहने वाले एवं बुद्धि-विलास प्रदर्शन वाले स्वनाम-धन्य महान कविगणों , साहित्याचार्यों, संस्थाओं व मठाधीशों का आवर्त टूटता जा रहा है | अगीत जन जन में , जन सामान्य में अपनी व साहित्य की पैठ बनाने में समर्थ सिद्ध हो रहा है | काव्य-उपन्यास -'शूर्पणखा' की भूमिका में प्रतिष्ठा साहित्यिक संस्था के अध्यक्ष साहित्यभूषण डा रामाश्रय सविता कहते हैं--" यह काव्य कृति अगीत विधा में लिखी गयी है | मेरा दृड मत है कि श्री जगत नारायण पाण्डेय एवं डा श्याम गुप्त के काव्यात्मक योगदान से अगीत-विधा को शक्ति, सामर्थ व ठोस आधार प्राप्त हुआ है |"
                    इस प्रकार कहा जा सकता है कि अगीत विधा का भविष्य उज्जवल है | जिस प्रकार इस विधा में कवि व साहित्यकार सतत रचनाओं व अन्य साहित्यिक गतिविधियों में संलग्न हैं तथा अगीत में महाकाव्य, खंडकाव्य आदि तीब्रता से लिखे जा रहे हैं, यह विधा के स्थायित्व व उत्तरोत्तर प्रगति का परिचायक है | महाकाव्य 'सृष्टि' की भूमिका में डा रामाश्रय सविता ने कहा था --" सृष्टि के गूढतम रहस्य को सरल और सहज अगीत काव्य में ढालकर एक स्तुत्य कार्य किया है | इस महाकाव्य का एक अनन्यतम महत्त्व यह भी है कि इससे अगीत विधा को एक गहन -गंभीर व ठोस आधार मिलेगा जो उसकी स्थापना में महत्वपूर्णकारक का कार्य करेगा |
                  लखनऊ विश्व विद्यालय की विभागाध्यक्ष ( हिन्दी) डा सरला शुक्ला का ' मोह व पश्चाताप' खंड-काव्य की भूमिका में यह कथन--"भविष्य में अन्य रचनाकार भी अगीत विधा में काव्य-रचना करके साहित्य का भंडार भरेंगे |"...सत्य सिद्ध हो रहा है |  उन्होंने यह ही कहा " अगीत का भविष्य उज्जवल है |" प्रोफ. यशपाल का कथन--"अधिकतर देशों में कहीं भी कविता गाकर नहीं पढ़ी जाती , अतः अगीत का भविष्य उज्जवल है |" श्री अमृत लाल नागर का कथनहै- "अगीत का भविष्य उज्जवल है  एवं " स्वतन्त्रता सेनानी श्री कमलापति मिश्र का कथन--" मुझे विश्वास है कि अगीत स्थायित्व ग्रहण करेगा |'..अवश्य ही सत्य सिद्ध होरहे हैं |
               शूर्पणखा अगीत खंडकाव्य की भाव भूमि में रचयिता का कथन है कि ---" प्रवाह व लय काव्य की विशेषताएं हैं जो काव्य के विशय०भाव व भाव सम्प्रेषण क्षमता की आवश्यकतानुसार छंदीय काव्य में भी होसकती हैं मुक्त-छंद काव्य में भी | अतः गीत-अगीत कोई विवाद का विषय नहीं हैं गेयता दोनों में ही होती है | वस्तुतः स्वयं संगीत व काव्य-गीत से अन्यथा कोई रचना पूर्ण गे नहीं होती अतः अगीत में भी अपार संभावनाएं हैं |" 
                  अंत में अगीत के वर्तमान परिदृश्य व भविष्य पर विहंगम दृष्टिपात हेतु मुख्य अगीत कवि, रचनाएं, अगीत पर हुए शोध प्रबंध एवं विभिन्न विद्वानों, साहित्यकारों की सम्मतियों पर दृष्टि डालना समीचीन होगा |

            अगीत विधा में रचनारत प्रमुख कवि, साहित्यकार व समीक्षक .....    
१- डा उषा गुप्ता-- पूर्व रीडर, हिन्दी विभाग, लखनऊ विश्व-विद्यालय  व संत साहित्य की सुधी, संरक्षक, अखिल भारतीय अगीत परिषद एवं अगीत विधा की प्रेरक |
२- कविवर डा रंगनाथ मिश्र 'सत्य' --- अगीत विधा के प्रवर्तक , संस्थापक व राष्ट्रीय अध्यक्ष , अखिल भारतीय अगीत परिषद |
३- श्री ( स्व.) जगत नारायण पाण्डेय -- अधिवक्ता ,लखनऊ ---प्रथम अगीत खंडकाव्य व महाकाव्य ( सौमित्र गुणाकर व मोह और  पश्चाताप ) के रचयिता एवं श्रेष्ठ गज़लकार, छंदकार |
४- डा श्याम गुप्त -- वरिष्ठ शल्य चिकित्सक, उत्तर रेलवे लखनऊ  एवं अगीत विधा महाकाव्य "सृष्टि"  व काव्य-उपन्यास "शूर्पणखा" के रचयिता एवं प्रस्तुत कृति के  रचनाकार |
५- श्री  सोहनलाल सुबुद्ध -प्रमुख अगीतवादी कवि, अगीत पर  शास्त्रीय व साहित्यिक आलेखों के लेखक |
६-श्री पार्थोसेन --'अगीतायन' साप्ताहिक पत्र के, कृतियों के संघीय पद्धति से समीक्षक व अगीत कवि |
७- श्री अनिल किशोर 'निडर'
८-डा मंजू सक्सेना विनोद, कवियत्री व प्रमुख कथाकार |
९- श्री सुभाष श्रीवास्तव 'हुडदंगी '---हास्य-व्यंग्य कवि |
१०- श्री तेज नारायण राही इन्दुबाला गहलौत, रामगुलाम रावत, वीरेंद्र निझावन, सुषमा गुप्ता, मंजू लता तिवारी, डा योगेश गुप्ता, डा मंजू शुक्ला, श्रृद्धा विजय लक्ष्मी , क्षमा पूर्णा  पाठक,  विजय कुमारी मौर्या, रवीन्द्र राजेश, देवेश द्विवेदी 'देवेश ', चंद्रपाल सिंह, वाहिद अली वाहिद,  बुद्धि राम विमल ,श्री कृष्ण द्विवेदी , नन्द कुमार मनोचा, गिरीश चन्द्र वर्मा'दोषी', गीता आकांक्षा, अमरनाथ, डा कृष्णा शर्मा, कवि प्रकाश वुड्ड, विनय सक्सेना, अवधेश मिश्रा ,डा नीरज कुमार, यतीश चतुर्वेदी, रचना शुक्ला, वासुदेव मिश्र, भगत राम पोखरियाल, धुरेन्द्र स्वरुप बिसारिया 'प्रभंजन' आदि तथा नगर भर में फैले अन्य कविगण.......|
  
                                        ----- अगीत साहित्य दर्पण,  अध्याय तीन ( क्रमश )....शेष अगली पोस्ट में .....
              






                    

गुरुवार, 27 सितंबर 2012

श्याम स्मृति....आज का युवा व युग परिवर्तन ......डा श्याम गुप्त ..

                                   ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...

 श्याम स्मृति....आज का युवा व युग परिवर्तन....

               मैं यह स्पष्ट देख रहा हूँ कि युग परिवर्तन होने वाला है, परिवर्तन होकर रहेगा | आज का सामान्य युवक  प्रायः बुराई से , अन्याय से, असत्य से, भ्रष्टाचार से लडने की असफल कोशिश कर रहा है, परन्तु कल का युवक , जो आज किशोर है , टीनेजर है....निश्चय ही बुराई से घृणा करता है | आज की नारी ...स्त्री स्वतंत्रता की पक्षपाती तो है परन्तु उसके अंतर में अभी स्वयं प्रश्न वाचक चिन्ह है | पर कल की नारी को निश्चय ही घर से बाहर सेवा, सर्विस व नग्नता से एवं नारी की पुरुष से श्रेष्ठता के गान से घृणा होगी | यह होने वाला है ...यदि  कल नहीं तो परसों ....कालचक्र की नियति तो वही जानता है |