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डा श्याम गुप्त का ब्लोग...

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Lucknow, UP, India
एक चिकित्सक, शल्य-चिकित्सक जो हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान व उसकी संस्कृति-सभ्यता के पुनुरुत्थान व समुत्थान को समर्पित है व हिन्दी एवम हिन्दी साहित्य की शुद्धता, सरलता, जन-सम्प्रेषणीयता के साथ कविता को जन-जन के निकट व जन को कविता के निकट लाने को ध्येयबद्ध है क्योंकि साहित्य ही व्यक्ति, समाज, देश राष्ट्र को तथा मानवता को सही राह दिखाने में समर्थ है, आज विश्व के समस्त द्वन्द्वों का मूल कारण मनुष्य का साहित्य से दूर होजाना ही है.... मेरी तेरह पुस्तकें प्रकाशित हैं... काव्य-दूत,काव्य-मुक्तामृत,;काव्य-निर्झरिणी, सृष्टि ( on creation of earth, life and god),प्रेम-महाकाव्य ,on various forms of love as whole. शूर्पणखा काव्य उपन्यास, इन्द्रधनुष उपन्यास एवं अगीत साहित्य दर्पण (-अगीत विधा का छंद-विधान ), ब्रज बांसुरी ( ब्रज भाषा काव्य संग्रह), कुछ शायरी की बात होजाए ( ग़ज़ल, नज़्म, कतए , रुबाई, शेर का संग्रह), अगीत त्रयी ( अगीत विधा के तीन महारथी ), तुम तुम और तुम ( श्रृगार व प्रेम गीत संग्रह ), ईशोपनिषद का काव्यभावानुवाद .. my blogs-- 1.the world of my thoughts श्याम स्मृति... 2.drsbg.wordpres.com, 3.साहित्य श्याम 4.विजानाति-विजानाति-विज्ञान ५ हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान ६ अगीतायन ७ छिद्रान्वेषी ---फेसबुक -डाश्याम गुप्त

सोमवार, 7 अप्रैल 2014

श्रुतियों व पुराण-कथाओं वैज्ञानिक तथ्य--अंक-५....त्रिपुर , त्रिपुरारी शिव ...शून्य एवं ध्रुव ....डा श्याम गुप्त

                                     ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...

श्रुतियों व पुराण-कथाओं वैज्ञानिक तथ्य--अंक-५....त्रिपुर , त्रिपुरारी शिव ...शून्य एवं ध्रुव ....डा श्याम गुप्त



    श्रुतियों व पुराण-कथाओं में भक्ति-पक्ष के साथ व्यवहारिक-वैज्ञानिक तथ्य

       (  श्रुतियों व पुराणों एवं अन्य भारतीय शास्त्रों में जो कथाएं भक्ति भाव से परिपूर्ण व अतिरंजित लगती हैं उनके मूल में वस्तुतः वैज्ञानिक एवं व्यवहारिक पक्ष निहित है परन्तु वे भारतीय जीवन-दर्शन के मूल वैदिक सूत्र ...’ईशावास्यम इदं सर्वं.....’ के आधार पर सब कुछ ईश्वर को याद करते हुए, उसी को समर्पित करते हुए, उसी के आप न्यासी हैं यह समझते हुए ही करना चाहिए .....की भाव-भूमि पर सांकेतिक व उदाहरण रूप में काव्यात्मकता के साथ वर्णित हैं, ताकि विज्ञजन,सर्वजन व सामान्य जन सभी उन्हें जीवन–व्यवस्था का अंग मानकर उन्हें व्यवहार में लायें |...... स्पष्ट करने हेतु..... कुछ उदाहरण एवं उनका वैज्ञानिक पक्ष प्रस्तुत किया जा रहा है ------ )






               त्रिपुर : अन्तरिक्ष में तीन नगर... व त्रिपुरारी –शिव ....

       दक्षिण-अमेरिका स्थित मैक्सिको नामक राज्य में आदिवासी मय-जाति (माया सभ्यता) के चिन्ह आज भी हैं जो एक उन्नत सभ्यता थी | कुशलतम शिल्पकार मय दानव जिसकी चर्चा पुराणों में बारंबार आती है उसी सभ्यता के प्रतिनिधि थे|  माया-सभ्यता की भारतीय सभ्यता से आपस में सहयोगी व्यवस्था थी | आधुनिक उत्खनन में प्राप्त विविध मूतियां गणेश, कनफटे योगियों, शिव की प्रतिमाएं इसी तथ्य की ओर संकेत करती हैं |
 
        मय दानव के शिल्प लाघव को प्रतिबिंबित करती अधोवर्णित एक कथा भविष्य में विकसित होने वाली अन्तरिक्ष बस्तियों, आवासों, होटलों आदि का पूर्वानुमान भी देती है |
 
        एक बार  देवासुर संग्राम में, दानवराज मय के माया-युद्ध का प्रयोग के बावजूद दानव हार गए। मय व उसके सहयोगी विद्युन्माली व तारक हिमालय पर कठोर तपस्या करने लगे। ब्रह्मा जी से वरदान प्राप्त किया किहम पृथ्वी पर नहीं रहना चाहते। आप हमें आज्ञा दें कि हम पृथ्वी से दूर अन्तरिक्ष में नगर बसा लें।"
 
      ब्रह्मा जी ने यह सोचकर कि यदि दानवगण दूर रहें तो सब तरफ सुख-संपन्न्ता रहेगी। लड़ाई भी नहीं होगीउन्हें वरदान दिया कि अंतरिक्ष में अपने नगर बसा लो, उनका नाश एक ही बाण से एक वार में तीनों नगरों को वेधने वाला ही कर सकेगा कोई और नहीं "
 
      मय दानव अतिकुशल शिल्पी एवं  वैज्ञानिक था। उसने सोचा तीनों पुरों को एक बाण से बींधना पूर्णत: असम्भव होगा। अतः उसने अंतरिक्ष में तीन नगरों का निर्माण किया।  लौहपुर, रजतपुर व सुवर्णपुर | उनमें वे सभी सुविधाएं थीं जो पृथ्वी के नगर में सुनी और सोची जा सकती थीं।  उन नगरों में छोटे-छोटे विमान भी थे और वेनगर पूर्णरूपेण अभेद्य थे।
 
       लौह-पुर मित्र तारक को, रजतपुर, जो चांदी की भांति चमकता था सहयोगी विद्युन्माली को देकर उन्हें अन्तरिक्ष में स्थापित कर दिया। सुवर्ण की भांति पीत आभा बिखेरता तथा अन्तरिक्ष में गतिमान-नगर में मय दानव स्वयं अपने सगे-सम्बंधियों के साथ  बस गया|  

       पृथ्वी से तारे की भांति दिखते ये तीनों नगर अन्तरिक्ष में सौ योजन की दूरी पर घूमते थे|  दैत्यगण उन नगरों में समस्त सुख-सुविधाओं के साथ रहते थे। अपने स्वभाववश वे कभी आपस में युद्ध करने लगते, तो कभी पृथ्वी के मनुष्यों तथा स्वर्ग के देवताओं को कष्ट देते, प्रताड़ित करते। शान्ति से साधना करते ऋषियों आदि को भीबार-बार पीड़ित करने लगे । दैत्यों के कुकृत्यों से सभी त्रस्त थे। देवों के अनुरोध पर  शंकर जी बोले, " मैं इस समस्या का समाधान निकालूँगा" कुछ समय बाद स्वर्ग में देवताओं और धरती पर मनुष्यों ने देखा कि मय दानव द्वारा निर्मित तीनों नगर अन्तरिक्ष से गिरकर धरती पर भस्मीभूत हो चुके थे। 
 
     यह ग्रह-नक्षत्रों की सापेक्ष गति के ज्ञान का उदाहरण है  अंतरिक्ष में ग्रहों नक्षत्रों की घूमने की गति के अनुसार प्रत्येक वर्ष सिर्फ एक क्षण के लिए वे तीनों नगर एक सीध में आते थे, भगवान शिव ने ठीक उसी समय त्रिशूल से उन पर आघात करके उन्हें नष्ट कर दिया | इसी कारण उनका नाम त्रिपुरारी हुआ| 




         शून्य, दशमलव गणना-पद्धति   ज्यामिति का विकसित स्वरूप ---


            शून्य का आविष्कार किसने और कब किया यह आज तक अंधकार के गर्त में छुपा हुआ है परंतु यह तथ्य स्थापित हो चुका है कि शून्य का आविष्कार भारत में ही हुआ यद्यपि ऐसी भी कथाएँ प्रचलित हैं कि पहली बार शून्य का आविष्कार माया सभ्यता के लोगों ने किया |


           हिंदुओं ने शून्य के विषय में कैसे  जाना यह आज भी अनुत्तरित प्रश्न है। परन्तु मान्यता के अनुसार ऋग्वेद के द्वितीय मंडल के ऋषि, महर्षि गृहत्समद शून्य के आविष्कारक थे जिसके उपरांत ही गणित का ज्ञान आगे बढ़ पाया और आज के आधुनिक रूप में आया|  वैदिक गणित आज भी अति-कठिन गणितीय व ज्यामिती प्रश्नों के हल हेतु प्रयोग किया जाता है |


      दिगम्बर जैन मुनियों  द्वारा प्राकृत में रचित ग्रंथ में शून्य का उल्लेख सबसे पहले मिलता है। इस ग्रंथ मेंदशमलव संख्या पद्धति का भी उल्लेख है।


       भारतीय गणितज्ञ एवं खगोलशास्त्री आर्यभट्ट ने कहा 'स्थानं स्थानं दसा गुणम्' अर्थात् दस गुना करने के लिये (उसके) आगे (शून्य) रखो। शायद यही संख्या के दशमलव सिद्धांत का उद्गम रहा होगा। उनके गणितीय खगोलशास्त्र के ग्रंथ आर्यभट्टीय में शून्य तथा उसके लिये विशिष्ट संकेत सम्मिलित था|

       बक्षाली पाण्डुलिपि या बख्शाली पाण्डुलिपि  प्राचीन भारत की गणित से सम्बन्धित पांडुलिपि है। यह सन् १८८१ में तक्षशिला से ७० कि मी दूर बख्शाली गाँव (अब पाकिस्तान में) में मिली थी। यह शारदा लिपि में है ( संस्कृत व प्राकृत का मिलाजुला रूप) मेंभोजपत्र पर लिखी पाण्डुलिपि थी। यह ईशा से २०० वर्ष पूर्व भारतीय भूभाग में प्रचलित थी| पाण्डुलिपि में शून्य का प्रयोग किया गया है और उसके लिये उसमें संकेत भी निश्चित है इसमें उच्चस्तरीय गणित के सूत्र है जिसमें क्वाड्रटिक समीकरण, किसी नम्बर जो पूर्ण वर्ग न हो का वर्गमूल ज्ञात करना, गणितीय व  ज्यामितीय श्रेणियाँ शामिल है अतः यह प्राचीन भारत में उच्च अंकगणितीय तथा बीजगणितीय ज्ञान का प्रमाण प्रस्तुत करती है। यद्यपि इस पांडुलिपि का सही काल अब तक निश्चित नहीं हो पाया है परंतु निश्चित रूप से यह आर्यभट्ट के काल से प्राचीन है|


       राजस्थान के आचार्य ब्रह्मगुप्त ने प्राचीन ब्रह्म-पितामह सिद्धांत के आधार पर ब्रह्मस्फुटसिद्धांत ग्रंथ लिखा| इसके के कुछ गणितीय परिणामों का विश्वगणित में अपूर्व स्थान है। जिसमें शून्य का एक अलग  अंक के रूप में उल्लेख किया गया है । इस ग्रन्थ में वृत्त आदि से सम्बंधित ज्योमितीय प्रमेयों व ऋणात्मक (negative) अंकों और शून्य पर गणित करने के सभी नियमों का वर्णन भी किया गया है । ये नियम आज की गणितीय प्रणाली के बहुत करीब हैं। ब्रह्मगुप्त ने ही इस विज्ञान का नाम सन् ६२८ ई. में कुट्टक गणित रखा। बीजगणित  के जिस प्रकरण में अनिर्धार्य समीकरणों का अध्ययन किया जाता है, उसका पुराना नाम कुट्टक है। उसने द्विघातीय अनिर्णयास्पद समीकरणों ( Nx2 + 1 = y2 ) के हल की विधि भी खोज निकाली। इनकी विधि का नाम चक्रवाल विधि है।

      शून्य से सम्बंधित भारतीय विचार कम्बोडिया .. कम्बोडिया से चीन और बाद में भारत से ही समस्त मध्य-पूर्व ,अरब व मुस्लिम संसार में फैले, अंततः का यह शून्य, दशमलव ज्ञान आदि  लैटिन,  इटैलियन,  फ्रेंच आदि से होते हुए पश्चिम में योरोप तक पहुँचा। अरब जगत में यह सिफर एवं योरोप में जीरो के नाम से प्रचलित हुआ|


     शुल्व सूत्र एवं बोधायन प्रमेय ( तथाकथित पायथागोरस प्रमेय ) - विख्यात वैदिक गणितज्ञ महर्षि बोधायन के शुल्व सूत्र में वर्णित  बोधायन-प्रमेय वही है जिसे आज हम पायथागोरस-प्रमेय का नाम से जानते हैं|
 ---शुल्ब सूत्र  संस्कृत के ज्यामितीय सूत्रग्रन्थ हैं जो स्रौत कर्मों से सम्बन्धित हैं। इनमें यज्ञ-वेदी की रचना से सम्बन्धित ज्यामितीय ज्ञानदिया हुआ है। संस्कृत में  शुल्ब शब्द का अर्थ नापने की रस्सी या डोरी  होता है। अपने नाम के अनुसार शुल्ब सूत्रों में यज्ञ-वेदियों को नापना,उनके लिए स्थान का चुनना तथा उनके निर्माण आदि विषयों का विस्तृत वर्णन है। ये भारतीय ज्यामिति के प्राचीनतम ग्रन्थ हैं।

       इनमें बौधायन का शुल्बसूत्र ( बोधायन प्रमेय )सबसे प्राचीन माना जाता है। इन शुल्बसूत्रों का रचना समय १२०० से ८०० ईसा पूर्व माना गया है। बोधायन प्रमेय  वही है जिसे आज हम पायथागोरस-प्रमेय का नाम से जानते हैं|
    
अपने एक सूत्र में बोधायन ने विकर्ण के वर्ग का नियम दिया है-

दीर्घचातुरास्रास्याक्ष्नाया रज्जुः पार्च्च्वमानी तिर्यङ्मानीच

यत्पद्ययग्भूते कुरुतस्तदुभयं करोति ।

अर्थात ..एक आयत का विकर्ण उतना ही क्षेत्र इकट्ठा बनाता है जितने कि उसकी लम्बाई और चौड़ाई अलग-अलग बनाती हैं।----- यहीं तो यही पायथागोरस प्रमेय है। स्पष्ट है कि इस प्रमेय की जानकारी भारतीय गणितज्ञों को पाइथागोरस के पहले से थी।




             ध्रुव – पृथ्वी की गति एवं ज्योतिष व गणितीय ज्ञान ----

      पौराणिक कथानुसार ध्रुव, मनुपुत्र उत्तानपाद के पुत्र थे जिसकी माता से उत्तानपाद को अधिक लगाव नहीं था अतः एक घटनाक्रम में वे रूठ कर गहन वनमें कठोर तपस्या में लीन हुए कि मैं, पिता के राजसिंहासन से भी महान सिंहासन एवं पद प्राप्त करना चाहता हूं। मैं अमर होना चाहता हूं।
       बालक ध्रुव ने यमुना जी के तट पर मधुवन में जाकर 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' मन्त्र के जाप के साथ भगवान नारायण की कठोर तपस्या की। विष्णु भगवान् ने प्रसन्न होकर उसे त्रिलोक में सबसे उत्कृष्ट स्थान  ग्रह और तारामण्डल का आश्रय होने का ध्रुव-अटल-निश्चल स्थान प्रदान किया जो सूर्य सहित सभी ग्रहों-ऩक्षत्रों, सप्तऋषियों और समस्त विमानचारी देवगणों से ऊपर है। जो एक कल्प तक बना रहेगा |जिसके चारों ओर ज्योतिश्चक्र घूमता रहता है तथा जिसके आधार पर यह सारे ग्रह नक्षत्र घूमते हैं। प्रलयकाल में भी जिसका नाश नहीं होता।सप्तर्षि भी नक्षत्रों के साथ जिसकी प्रदक्षिणा करते रहते हैं। जो लोक ध्रुवलोक कहलायेगा तथा इस लोक में ध्रुव छत्तीस सहस्त्र वर्ष तक पृथ्वी का शासन करेगा। तत्पश्चात ध्रुव राजा बने उनकी पत्नी का नाम भूमि जिससे राजा ध्रुव के दो पुत्र उत्पन्न हुए -वत्सर और कल्प। ३६००० वर्षों तक राज्य भोग के उपरांत वे नक्षत्र मंडल में ध्रुव-तारा बनकर स्थित हुए|
     गणित  ज्योतिष के अनुसार ..वस्तुतः पृथ्वी का अक्ष (axis)एक धीमी लेकिन निर्धारित गति से डगमगाता है, जिस वजह से कोई भी तारा स्थिर रूप से उसके ध्रुव के ऊपर स्थित नहीं रहता। पृथ्वी के इस अक्ष के रुझान में बदलाव ऐसा है कि हर ३६,००० साल में उसका एक पूरा चक्र पूरा हो जाता है। 

    ध्रुव तारा, सप्तर्षि मण्डल से सुदूर उत्तर में स्थित है और  एक राशि पर तीन हजार वर्षॊ तक रहता है। इस प्रकार 12 राशियों के चक्र के अनुसार व एक कल्प अर्थात ३६००० वर्षॊ का एक चक्र होता है | 
     यह गणितीय तथ्यों का मानवीकरण है -- राजा ध्रुव की पत्नी भूमि हैं | भूमि के दो पुत्र हैं-वत्सर और कल्प। पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा 365 दिनों में पूरी कर लेती है। भूमि की इस गति को वत्सर कहा जाता है। यही अवधि संवत् से होकर संवत्सर बन गई। सूर्य का अपने अक्ष पर धूमकर पुन: उसी स्थान पर आना एक कल्प कहा जाता है, यही दूसरा पुत्र है। गणितीय ज्ञान का संचार करते ये अप्रतिम वैज्ञानिक तथ्य कथा में निहित किये गए है। 

     

शनिवार, 5 अप्रैल 2014

श्रुतियों व पुराण-कथाओं वैज्ञानिक तथ्य--अंक-4....कृष्ण और गोपिकाएं तथासीरध्वज जनक का हल जोतना और जमीन से सीता की उत्पत्ति...डा श्याम गुप्त...

                                    ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...

श्रुतियों व पुराण-कथाओं वैज्ञानिक तथ्य--अंक-4....कृष्ण और गोपिकाएं तथासीरध्वज जनक का हल जोतना और जमीन से सीता की उत्पत्ति-


    श्रुतियों व पुराण-कथाओं में भक्ति-पक्ष के साथ व्यवहारिक-वैज्ञानिक तथ्य
       श्रुतियों व पुराणों एवं अन्य भारतीय शास्त्रों में जो कथाएं भक्ति भाव से परिपूर्ण व अतिरंजित लगती हैं उनके मूल में वस्तुतः वैज्ञानिक एवं व्यवहारिक पक्ष निहित है परन्तु वे भारतीय जीवन-दर्शन के मूल वैदिक सूत्र ...’ईशावास्यम इदं सर्वं.....’ के आधार पर सब कुछ ईश्वर को याद करते हुए, उसी को समर्पित करते हुए, उसी के आप न्यासी हैं यह समझते हुए ही करना चाहिए .....की भाव-भूमि पर सांकेतिक व उदाहरण रूप में काव्यात्मकता के साथ वर्णित हैं, ताकि विज्ञजन,सर्वजन व सामान्य जन सभी उन्हें जीवन–व्यवस्था का अंग मानकर उन्हें व्यवहार में लायें |...... स्पष्ट करने हेतु..... कुछ उदाहरण एवं उनका वैज्ञानिक पक्ष प्रस्तुत किया जा रहा है ------ )


 कृष्ण और गोपिकाएं-- वैदिक अलंकारिक भाषा  में सविता (महा-सूर्य) व उनकी की किरणों  व अन्य अंतरिक्ष-पिंडों के... अन्तरिक्षीय ( कोस्मिक ) गतिक-सम्बन्ध के नृत्य का मूर्त व सांसारिक रूपक हैं | जो समकालीन तांत्रिक प्रभावों की नकारात्मकता के अप्रभावीकरण हेतु इस पौराणिक मानवीकृत कथा रूप में स्वीकृत की गयी |  वैदिक ज्ञान को भक्तिमय रूप में देखें.....

          इदं ह्यन्वोजसा सुतं राधानां पते पिवा त्वस्य गिर्वण :(ऋग्वेद ३. ५ १. १ ० )
        ---अर्थात यह ओज प्रदायक सोम विभिन्न आराधनाओं अर्थात विधियों से प्राप्त किया गया है  हे महान ! आप इसका पान करें , हम आपका आवाहन/ भजन करते हैं |

......जिसका भक्ति भाव पूर्ण अर्थ कर दिया गया...------ओ राधापति श्रीकृष्ण ! जैसे गोपियाँ तुम्हें भजती हैं वेद मन्त्र भी तुम्हें जपते हैं। उनके द्वारा सोमरस पान करो।

           विभक्तारं हवामहे वसोश्चित्रस्य  राधस : सवितारं नृचक्षसं (ऋग्वेद १ .  २ २.  ७).
 
          ------अर्थात वह परमात्मा सब के हृदय में विराजमान सर्वज्ञाता दृष्टा, किसी से भी विभेद\भेदभाव न करने वाला है जो विविध प्रकार व उपायों से पृथ्वी को संपन्न करता है एवं सविता-तारामंडल आदि उसके नेत्र आदि हैं |

-----जिसका भक्ति भाव में अर्थ किया गया है.-------ओ सब के हृदय में विराजमान सर्वज्ञाता दृष्टा जो राधा को गोपियों में से ले गए हमारी रक्षा करो।

          त्वं नृचक्सम वृषभानुपूर्वी : कृष्नास्वग्ने अरुषोविभाही (ऋग्वेद )
 
      ----अर्थात आप ही आकाशी नक्षत्र मंडल हैं जो बलवान सूर्य, वृषभानु, के अवतरित होने से पूर्व रात्रिमें कृष्ण-अग्नि के रूप में प्रकाशित (विद्यमान) रहते हैं...
 

--------जिसको राधा के पिता वृषभानु से जोड़ दिया गया है (-----यह कह कर ...इस मन्त्र में श्री राधा के पिता वृषभानु का उल्लेख किया गया है जो अन्य किसी भी प्रकार के संदेह को मिटा देता है ,क्योंकि वही तो राधा के पिता हैं। )
 राधा---
 सर्व प्रथम ऋग्वेद के --भाग /मंडल१- में----राधस शब्द का प्रयोग हुआ है,जिसको बैभवके अर्थ में प्रयोग कियागया है।
ऋग्वेद-/--में-’  सुराधा’ शब्द श्रेष्ठ धनों से युक्त के अर्थ में प्रयुक्त होता रहा है। सभी देवों से उनकीसंरक्षक शक्ति काउपयोग कर धनों की प्रार्थना , प्राक्रतिक सानों का उचित  उपयोग की प्रार्थना की गई है।
 ऋग्वेद -/५२/४०९४ में ’--- राधो’ आराधना’ शब्द शोधकार्यों के लिये भी प्रयोग किये गये हैं,    वस्तुतः रिग्वेदिक  यजुर्वेद  अथर्व वेदिक साहित्य में ’ राधा शब्द की व्युत्पत्ति =रयि(संसारऐश्वर्य,श्री,वैभव) +धा(धारक,धारण करने वालीशक्ति) ,से हुई हैअतः जब उपनिषद व संहिताओं के ग्यान मार्गीकाल में सृष्टि के कर्ता का ब्रह्म वपुरुष,परमात्मा,(कृष्ण) रूप वर्णन हुआ तो समस्त संसार की धारक चित-शक्ति,ह्लादिनी शक्ति,परमेश्वरी(राधाका आविर्भाव हुआ;

सोलह हज़ार रानियाँ----
 
-------संगीत विशेषज्ञ मानते हैं कि ब्रज में सोलह हज़ार राग रागनिंयों का निर्माण हुआ था। जिन्हें कृष्णकी रानियाँ भी कहा जाता है|
त्रिगुणात्मक प्रकृति से प्रकट होती चेतना सत्ता!
            श्रीकृष्ण आत्मतत्व के मूर्तिमान रूप हैं। मनुष्य में इस चेतन तत्व का पूर्ण विकास ही आत्म तत्व की जागृति है। जीवन प्रकृति से उद्भुत और विकसित होता है अतः त्रिगुणात्मक प्रकृति के रूप में श्रीकृष्ण की भी तीन माताएँ हैं। 1- रजोगुणी प्रकृतिरूप देवकी जन्मदात्री माँ हैं, जो सांसारिक माया गृह में कैद हैं। 2- सतगुणी प्रकृति रूपा माँ यशोदा हैं, जिनके वात्सल्य प्रेम रस को पीकर श्रीकृष्ण बड़े होते हैं। 3- इनके विपरीत एक घोर तमस रूपा प्रकृति भी शिशु-भक्षक सर्पिणी के समान पूतना माँ है, जिसे आत्म तत्व का प्रस्फुटित अंकुरण नहीं सुहाता और वह वात्सल्य का अमृत पिलाने के स्थान पर विषपान कराती है। यहाँ यह संदेश प्रेषित किया गया है कि-------- प्रकृति का तमस-तत्व चेतन-तत्व के विकास को रोकने में असमर्थ है।
गोवर्धन धारण कथा --इस कथा का आध्यात्मिक संकेत यह है कि गो अर्थात इंद्रियों का वर्धन (पालन-पोषण) ) अर्थात इंद्रियों में क्रियाशील प्राण-शक्ति के स्रोत परमेश्वर पर हमारी दृष्टि होना चाहिए।  
     "यमुनामयादि श्रुतमुद्राधो गव्यं म्रजे निराधो अश्व्यं म्रजे॥" --------अर्थात यमुना के किनारे गाय,घोडों आदि धनों कावर्धन(व्रद्धि वउत्पादनआराधना सहित करें।
    गवामप व्रजं वृधि कृणुष्व राधो अद्रिवः
    नहि त्वा रोदसी उभे ऋघायमाणमिन्वतः
------कृष्ण= = क्र =कार्य=कर्म
-----राधो = = अराधना, राधन , शोध , नियमितता , साधना .....
---अर्थात ब्रज में ज्ञान व कर्म की साधना पूर्ण शोधों से गौ आदि कृषि कर्म की उन्नति हुई .....   

गोपियों के साथ रासलीला के वर्णन में मन की वृत्तियां ही गोपिकाओं के रूप में मूर्तिमान हुई हैं और प्रत्येक वृत्ति के आत्म-रस से सराबोर होने को रासलीला या रसनृत्य के रूप में चित्रित किया गया है। इससे भी उच्च अवस्था का- प्रेम और विरह के बाह्य द्वैत का एक आंतरिक आनंद में समाहित हो जाने की अवस्था का वर्णन 'महारास' में हुआ है।
--------नंद के घर में कृष्ण को खिलाने के लिए, उनकी सेवा करने के लिए, जिस प्रकार ग्राम भर की गोपियाँ जमघट लगाए बैठी रहती हैं, वह कृष्ण के प्रति उनका वात्सल्य है। गोपी से तात्पर्य केवल युवती बाला ही नहीं है, जो किसी युवा से प्रेम करती है। 
     वृन्दावन के गोपाल इतने धनी नहीं हैं कि इतनी सी बात से उन्हें कोई अंतर न पड़ता हो। गोपियों को नगर में जा कर दूध, दही,मक्खन बेच कर अपनी आजीविका भी अर्जित करनी है। कंस का शासकीय कर भी चुकाना है। अत: वे दूध दही बहाने में उदार नहीं हो सकते।... दूसरी ओर कंस की रानियाँ दुग्ध सरोवर में स्नान करती हैं। वृन्दावन के गोपाल अपने बच्चों के मुख से दूध बचा कर कंस की रानियों के स्नान के लिए भेजने को बाध्य हैं। ... कृष्ण इस अत्याचार को कैसे स्वीकार कर लें। शासन के अत्याचार के प्रति उनका प्रतिरोध मटकियाँ फोड़ कर दूध बहा देने में है। दूध गोपालों का है। उनके बच्चे दूध को तरसें और कंस की रानियाँ दुग्ध सरोवर में स्नान करें, यह असहनीय है।इसीलिए कृष्ण को मक्खन चुराने, मटकियाँ फोड़ने और दूध बहाने की लीला भी करनी पड़ती है। 
          ऋग्वेद में विष्णु के लिए प्रयुक्त 'गोप','गोपति', और 'गोपा' शब्द -----गोप-गोपी-परम्परा के प्राचीनतम लिखित प्रमाण हें। इन त्रिपाद-क्षेपी विष्णु के तृतीय पाद-क्षेप परमपद में मधु के उत्स और भूरिश्रृंगा-अनेक सींगोंवाली गउएँ हैं ।कदाचित इन गउओं के नाते ही विष्णु को गोप कहा गया है। इस आलंकारिक वर्णन में अनेक विद्वानों ने विष्णु को सूर्य माना है, जो पूर्व दिशा से उठकर अन्तरिक्ष को नापते हुए तीसरे पाद-क्षेप में आकाश में फैल जाता है। कुछ लोगों ने ग्रह-नक्षत्रों को ही गोपी कहा है, जो सूर्य मण्डल के चारों ओर घूमते हैं|


.सीरध्वज जनक का हल जोतना और जमीन से सीता की उत्पत्ति---  जनक जो एक कृषिप्रधान देश का सिरमौर राजा था एवं स्वयं भी हल चलाता था, सीरध्वज..अर्थात हल जोतने में ध्वज रूप... अन्न, धन-धान्य प्रधान, कृषि प्रधान देशों में सिरमौर  | राजा के स्वयम श्रम में भाग लेने से, श्रम के महत्त्व का उदाहरण बनने से  ....खेत जोतने से... लक्ष्मी अर्थात धन, संपत्ति  सम्पन्नता की प्राप्ति हुई... जो तत्पश्चात ..कन्या प्राप्ति के रूपक द्वारा राम की पत्नी सीता ( सीता अर्थात हल के फाल से उत्पन्न, पालक -विष्णु पत्नी लक्ष्मी के अवतार ) के रूप में लोक में प्रतिष्ठित हुई |