समाज में जब कभी भी विश्रंखलता उत्पन्न होती है ,तो उसका मूल कारण सदैव मानव मन में नैतिक-बल की कमी होता है। भौतिकता के अति प्रवाह में शौर्य ,नैतिकता ,सामाजिकता ,धर्म ,अध्यात्म ,व्यवहारगत शुचिता ,धैर्य ,समता ,संतोष ,अनुशासन आदि उदात्त भावौं की कमी होने से असंय्मतापनपती है ।अपने इतिहास शास्त्र ,पुराण ,गाथायें ,भाषा व ज्ञान को जाने बिना भागमभाग में नवीन अनजाने मार्ग पर ,बिना अपने देश ,कालधर्मिता व तर्क की शास्त्रीय कसौटी पर कसे ,चल देना अंधकूप की ओरचलना ही है । आज की विश्रंखलता का यही कारण है। हमें इतिहास में जाना ही होगा ।
शूर्पनखा काव्य उपन्यास से (डॉ श्याम गुप्त )
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- एक चिकित्सक, शल्य-चिकित्सक जो हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान व उसकी संस्कृति-सभ्यता के पुनुरुत्थान व समुत्थान को समर्पित है व हिन्दी एवम हिन्दी साहित्य की शुद्धता, सरलता, जन-सम्प्रेषणीयता के साथ कविता को जन-जन के निकट व जन को कविता के निकट लाने को ध्येयबद्ध है क्योंकि साहित्य ही व्यक्ति, समाज, देश राष्ट्र को तथा मानवता को सही राह दिखाने में समर्थ है, आज विश्व के समस्त द्वन्द्वों का मूल कारण मनुष्य का साहित्य से दूर होजाना ही है.... मेरी तेरह पुस्तकें प्रकाशित हैं... काव्य-दूत,काव्य-मुक्तामृत,;काव्य-निर्झरिणी, सृष्टि ( on creation of earth, life and god),प्रेम-महाकाव्य ,on various forms of love as whole. शूर्पणखा काव्य उपन्यास, इन्द्रधनुष उपन्यास एवं अगीत साहित्य दर्पण (-अगीत विधा का छंद-विधान ), ब्रज बांसुरी ( ब्रज भाषा काव्य संग्रह), कुछ शायरी की बात होजाए ( ग़ज़ल, नज़्म, कतए , रुबाई, शेर का संग्रह), अगीत त्रयी ( अगीत विधा के तीन महारथी ), तुम तुम और तुम ( श्रृगार व प्रेम गीत संग्रह ), ईशोपनिषद का काव्यभावानुवाद .. my blogs-- 1.the world of my thoughts श्याम स्मृति... 2.drsbg.wordpres.com, 3.साहित्य श्याम 4.विजानाति-विजानाति-विज्ञान ५ हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान ६ अगीतायन ७ छिद्रान्वेषी ---फेसबुक -डाश्याम गुप्त
बुधवार, 6 अगस्त 2008
मंगलवार, 5 अगस्त 2008
जंग घर के अन्दर और बाहर.
घर हो बाहर हो जंग हर जगह पर जारी है
कहीं संस्कृतिक हमला हे ,कहीं आतंकी तैयारी है ।
खुश नशीं हें श्याम जो देश की सरहद पे लड़े
अन्दर के दुश्मनों से लड़ेंअब हमारी बारी है ।
कहीं संस्कृतिक हमला हे ,कहीं आतंकी तैयारी है ।
खुश नशीं हें श्याम जो देश की सरहद पे लड़े
अन्दर के दुश्मनों से लड़ेंअब हमारी बारी है ।
साम ,दाम,दंड विभेद -आधुनिक तत्वार्थ
साम - शमा ,नारी का प्रयोग ; दाम ,-धन का लालच ,रिश्वत ; दंड ,-गोली मारना ,हत्या ,पिटाई आदि ; विभेद ,-धमकाना ,साथियों रिश्तेदारों परिवार के लोगों को लालच देना । आधुनिक युग में किसी भी तरह अपना काम निकालनेके उपाय हैं ।
सोमवार, 4 अगस्त 2008
TIME IS MONEY .?
Time is money. but we always cry for short of this money? why we want more time? just to do morework to earn more money in that saved pieceof time. it means to keep us buisyto earn more money. what a controversy? if we donot care for time but use it to enjoy life to make life easy,pleasant and devoted to good deeds for society,mankind and self,there will not be any shortage of time and time will not be only money but LIFE. so time is life and enjoy every moment of life, only than time can be called as money.
अन्धविश्वास को बढ़ावा देना
आजकल हर जगह समाचार पत्रों ,टीवी आदि में फंगश्वे पर तमाम आलेख आदि आरहे हें ,चीनी ड्रेगन ,मेंढक आदि के शुभ ,अशुभ कथन । चीनी वास्तु क्यों ?भारतीय वास्तु क्यों नही ? फ़िर यह अन्धविश्वास को बढ़ाना नही है ?पर उन्हें क्या ,धंधा चाहिए ,पैसा चाहिए । चाहे अपनी संस्कृति बचकर या भुलाकर या कैसे भी ।
आवश्यक उपभोक्ता बस्तुओं का अपव्यय .
सिर्फ़ गाना गाने के लिए इतना बढ़ा मंच ,सजावट विजली ,गैस बरबाद किया जाता है ,इन आयोजनों मैं । गाना तो सदा मंच व एक लाइटमें ही गया जा सकता है ,तभी असली गायक की पहचान होगी । दस साल तक यह सब बंद करदें तो कितना धन व विजली, गैस आदि आवश्यक वस्तुओं के अपव्यय से बचा जा सकता है ,पर किसे पढ़ी है ,बस पैसा आना चाहिए । धंधा होना चाहिए ।
शुक्रवार, 25 जुलाई 2008
विचारक्रांति एवं भोतिक उन्नति
भौतिक उन्नति ,नवीन आविष्कार, कला,संस्कृति व मानव जीवन को "सत्यम,शिवम्,सुन्दरम "भावः से समतल मार्गे पर चलाने के लिए होते है। यदि वहीउचित व श्रेष्ठ विचारों से संचालित न हों तो कुविचारों या विचारहीनता से पोषित खलनायक की भांति मानवता की अवनति के साधक बन जाते हैं । दूरदर्शन , सचल टेलेफोन ,रेडियो आदि का हर बच्चे के हाथ मैं ,युवाओं के हाथ में होना भ्रष्ट आचरण के कारन हो रहे हैं । अत्यधिक भौतिक साधनों का प्रयोग व उपलब्धता व्यक्ति को उच्च वैचारिक अकाल , कुविचारों व असत्य विचारों में रत करके उसे अनास्थावादी व रोटी, कपड़ा और मकानतक सीमित कर देता है । अतः आज विचारक्रांति की महती आवश्यकता है।
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