समाचार है की क्रिकेट का जन्म बल्जियम मैं हुआ था ,इंग्लैंड मैं नहीं । वास्तव मैं तो क्रिकेट का जन्म , भारत के उत्तर- प्रदेश के जग प्रसिद्द गाँव गोकुल मैं 'श्री कृष्ण ' द्वारा किया गया था ,जब वे पगडी की गेंद से खेला करते थे ,तथा गेंद निकालने के लिए , सर्पों से भरे यमुना के जल के उच्छिष्ट जल से बने जलकुंड ,कालिया -दह मैं कूद पड़े थे।
है न क्रिकेट का पुराना उन्माद , और पूजा , भारत मैं ?
ब्लॉग आर्काइव
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डा श्याम गुप्त का ब्लोग...
- shyam gupta
- Lucknow, UP, India
- एक चिकित्सक, शल्य-चिकित्सक जो हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान व उसकी संस्कृति-सभ्यता के पुनुरुत्थान व समुत्थान को समर्पित है व हिन्दी एवम हिन्दी साहित्य की शुद्धता, सरलता, जन-सम्प्रेषणीयता के साथ कविता को जन-जन के निकट व जन को कविता के निकट लाने को ध्येयबद्ध है क्योंकि साहित्य ही व्यक्ति, समाज, देश राष्ट्र को तथा मानवता को सही राह दिखाने में समर्थ है, आज विश्व के समस्त द्वन्द्वों का मूल कारण मनुष्य का साहित्य से दूर होजाना ही है.... मेरी तेरह पुस्तकें प्रकाशित हैं... काव्य-दूत,काव्य-मुक्तामृत,;काव्य-निर्झरिणी, सृष्टि ( on creation of earth, life and god),प्रेम-महाकाव्य ,on various forms of love as whole. शूर्पणखा काव्य उपन्यास, इन्द्रधनुष उपन्यास एवं अगीत साहित्य दर्पण (-अगीत विधा का छंद-विधान ), ब्रज बांसुरी ( ब्रज भाषा काव्य संग्रह), कुछ शायरी की बात होजाए ( ग़ज़ल, नज़्म, कतए , रुबाई, शेर का संग्रह), अगीत त्रयी ( अगीत विधा के तीन महारथी ), तुम तुम और तुम ( श्रृगार व प्रेम गीत संग्रह ), ईशोपनिषद का काव्यभावानुवाद .. my blogs-- 1.the world of my thoughts श्याम स्मृति... 2.drsbg.wordpres.com, 3.साहित्य श्याम 4.विजानाति-विजानाति-विज्ञान ५ हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान ६ अगीतायन ७ छिद्रान्वेषी ---फेसबुक -डाश्याम गुप्त
मंगलवार, 3 मार्च 2009
गुरुवार, 26 फ़रवरी 2009
टूथ-ब्रश वनाम नीम की दातुन .
आज प्रात जब मैं टहलने निकला तो पहले एक घर से एक लडकी मुहं मैं टूथ-ब्रश दबाये दातुन करती हुई सामने आई । मैं यह सोचते हुए जा रहा था की हम क्यों व्यर्थ मैं अनायास ही एक रसायन एवं प्लास्टिक जैसी बस्तु को मुहँ मैं चवाते है ? आगे चलकर एक मजदूर बाप-बेटे के मुहं मैं नीम की दातुन चवाते हुए दर्शन हुए ,अचानक विचार आया की अगर सभी लोग नीम की दातुन करने लग जाएँ तो शायद अरबों रुपयों की व विदेशी मुद्रा की भी बचत होगी और दांतों की भी सुरक्षा की गारंटी । फ़िर सोचा की दातुन कहाँ से आयेगी , कौन पेड़ से तोडेगा ? विचार हुआ की यह भी एक धंधा हो सकता है मंदी मैं । जैसे तमाम बच्चे , औरतें ,आदमी -तेल, पेस्ट , व्यर्थ की अंगरेजी पुस्तके आदि- आदि घर -घर बेचते घूमते हैं , या दूध ,अखबार आदि डालते हैं , वैसे ही नीम की डालोंसे दातुन तोड़ कर घर -घर बेचीं जा सकतीं हैं। है न लोकल अर्थ व्यवस्था व लघु -उद्योग की बात । बताएं क्या बात मैं दम है?
शिक्षा व राजनीति
क्या राजनीति शिक्षा को ख़राब कर रही है ? एक यक्ष प्रश्न है ? वस्तुतः यह एक दुश्चक्र होता है । भारत के स्वतंत्र होते ही प्रारंभ होगया था , चाहे अज्ञान- वश या सकारण अभिप्रायः वश --आप ध्यान दें किप्रारंभ से ही भारत का शिक्षा -मंत्री एक विशिष्ट जाति या सम्प्रदाय का रहा है , जो भारतीय भाव भूमि, उसकी बारीकियों , उसके इतिहास व मानव धर्म व्यवहारिता , नैतिकता आदि से अनजान थे । अतः तेजी से आगे बढ़ने ,अनुपयोगी सेकुलर वाद की अवधारणा के कारण शिक्षा में भारतीयता , आत्मवाद , उद्देश्यपूर्ण ज्ञान , मानववाद , विश्वबंधुत्व की उचित व्याख्या , अध्यात्म आदि को शिक्षा मैं कोई स्थान नहीं दिया गया । बस टेक्नीकल , बाजारबाद , शासन करने वाली राजनीति , जल्दी -जल्दी अमीर होने की होड़ वाली ,अभारतीय शिक्षा को तरजीह दी गयी । परिणाम स्वरुप राजनीति भ्रष्ट हुई और वह राजनीति अब शिक्षा को भ्रष्ट करके समस्त पीढी को भ्रष्ट कर रहीहै। यही दुश्चक्र तोड़ना होगा ।
अमीरी , गरीबी बेचना .
लोग उदाहरण देते हैं किगरीबी कोई ऐसी चीज़ नहीं है कि जिसे सहेज कर रखाजाये, अगर बेच कर कुछ कमाई होजाए तो क्या बुरा है ?, हर चीज़ को बाज़ार मैं लाने का ही तो मामला है सब।
गरीबी दिखाने के लिए , करोड़पति बनने की क्या आवश्यकता है? लाटरी , जुआ आदि के ग़लत चलन को बढावा देने की क्या आवश्यकता है? किसी को गरीबों व गरीवी हटाने की चिंता नहीं है। बस अपनी गरीबी हटाने की चिंता है।
गरीबी दिखाने के लिए , करोड़पति बनने की क्या आवश्यकता है? लाटरी , जुआ आदि के ग़लत चलन को बढावा देने की क्या आवश्यकता है? किसी को गरीबों व गरीवी हटाने की चिंता नहीं है। बस अपनी गरीबी हटाने की चिंता है।
मंगलवार, 24 फ़रवरी 2009
स्लम डाग मिलोनेअर --को ८ आस्कर .
आख़िर कार उनहोंने यह सिद्ध कर ही दिया किहिन्दी मैं नहीं , अंगरेजी मैं ही उपन्यास लिखें ,अंगरेजी मैं ही फ़िल्म बनाएं , अंगरेजी डायरेक्टर ही बनाए ,चाहे हिन्दुस्तानी कहानी /फ़िल्म मसाला हो , तभी कोई पुरस्कार मिलेगा ? हिन्दी या भारत बालों को फ़िल्म बनाना आता ही नहीं।
भारतीय संगीत तो सदा से सर्वोपरि है ही ,उसे प्रमाण की कब आवश्यकता थी।
भारतीय संगीत तो सदा से सर्वोपरि है ही ,उसे प्रमाण की कब आवश्यकता थी।
सोमवार, 23 फ़रवरी 2009
महा शिवरात्रि पर विशेष .
शिव का अर्थ है 'कल्याण ', शिव कल्याण के देवता हैं। विष्णु -पालक हैं , ब्रह्मा -सृष्टि के । वास्तव मैं यह तीन -सृष्टि, समाज, व संसार की नियामक शक्तियां हैं। तथा ये सदा ही समाज मैं रहते हैं। शिव -भावः --अर्थात वे शक्तियां जो सहज एवं सबका कल्याण ही चाहतीं हैं, चाहे वह जैसा भी हो , उनके स्वयं के कर्मों का वे स्वयं ही फैसला करें। ये लोग या भाव या शक्तियां, विचार शिव की भांति भोले -भंडारी की तरह सब का ही समन्वय व भला सोचते व करने की कोसिस करते हैअधिक आगे के सोच विचार के सब को वरदान दे देते हैं। समताबादी सब चलता है, ये भी तो मानव हैं ,आदि सोचवाले संगठन ,व्यक्ति शिव ही हैं।
परन्तु विष्णु -भावः अर्थात -शासन ,धर्म आदि नियामक सत्ताएं, संस्थायें, व लोग व विचार -जिन्हें समाज चलाना है, जो आज या भविष्य मैं मानव या संसार के व्यवहार आदि के उत्तरदायी ठहराया जायेगा , वे हर तरह के साम, दाम, दंड, विभेद द्वारा ,व्यक्ति व समाज को नियमित करने के लिए कठोर ,सुद्रढ़ नियमों पर चलाने का प्रयत्न करते हैं ।
ब्रह्मा --अर्थात -शाश्वत नियम-नीति , क़ानून बनाने वालीं संस्थायें या लोग व सत्ताएं या विचार -समाज को
कायदे मैं रखने वाले तथ्य देते हैं।
शक्ति - अर्थात विशेसग्य ,प्रोफेशनल लोग ,संस्थायें, व विचारशीलता भाव -जो उपरोक्त तीनों को कल्याण कारी मार्ग पर चलने को प्रेरित व राहें बतातीं हैं । तभी सभी देवताओं की शक्ति रूप पत्नियां लक्ष्मी ,पार्वती व ब्रह्माणी हैं । शक्ति -अर्थात विशेसग्य -पॉवर ,इनर्जी के विना कोई कार्य नहीं कर सकता ।
शिव -देवाधिदेव हैं क्योंकि प्रत्येक कार्य मैं जब तक कल्याण -भाव नहीं सम्मिलित होगा ,वह कार्य -अकर्म ही माना जायेगा । प्रत्येक कार्य को -ब्रह्मा, विष्णु ,महेश की भांति -सत्यम, शिवम्, सुन्दरम होना चाहिए , तभी वह 'कृतित्व ' होता है। अतः समाज के तीनों विभागों को आपस मैं तालमेल से कार्य करना चाहिए। प्रत्येक व्यक्ति को भी इन सभी की आराधना करनी मम चाहिए । तभी तो राम चरित मानस मैं राम कहते हैं-- ।
मम -द्रोही ,शिव दास , शिव - द्रोही , मम दास ,
ते नर करहिं कल्प भर ,घोर नरक मंह वास।
यही शिवत्व -तत्व है। भारतीय व हिंदुत्व की सामाजिकता -भाव , समन्वयता -भाव ,विश्वत्व भाव ।
परन्तु विष्णु -भावः अर्थात -शासन ,धर्म आदि नियामक सत्ताएं, संस्थायें, व लोग व विचार -जिन्हें समाज चलाना है, जो आज या भविष्य मैं मानव या संसार के व्यवहार आदि के उत्तरदायी ठहराया जायेगा , वे हर तरह के साम, दाम, दंड, विभेद द्वारा ,व्यक्ति व समाज को नियमित करने के लिए कठोर ,सुद्रढ़ नियमों पर चलाने का प्रयत्न करते हैं ।
ब्रह्मा --अर्थात -शाश्वत नियम-नीति , क़ानून बनाने वालीं संस्थायें या लोग व सत्ताएं या विचार -समाज को
कायदे मैं रखने वाले तथ्य देते हैं।
शक्ति - अर्थात विशेसग्य ,प्रोफेशनल लोग ,संस्थायें, व विचारशीलता भाव -जो उपरोक्त तीनों को कल्याण कारी मार्ग पर चलने को प्रेरित व राहें बतातीं हैं । तभी सभी देवताओं की शक्ति रूप पत्नियां लक्ष्मी ,पार्वती व ब्रह्माणी हैं । शक्ति -अर्थात विशेसग्य -पॉवर ,इनर्जी के विना कोई कार्य नहीं कर सकता ।
शिव -देवाधिदेव हैं क्योंकि प्रत्येक कार्य मैं जब तक कल्याण -भाव नहीं सम्मिलित होगा ,वह कार्य -अकर्म ही माना जायेगा । प्रत्येक कार्य को -ब्रह्मा, विष्णु ,महेश की भांति -सत्यम, शिवम्, सुन्दरम होना चाहिए , तभी वह 'कृतित्व ' होता है। अतः समाज के तीनों विभागों को आपस मैं तालमेल से कार्य करना चाहिए। प्रत्येक व्यक्ति को भी इन सभी की आराधना करनी मम चाहिए । तभी तो राम चरित मानस मैं राम कहते हैं-- ।
मम -द्रोही ,शिव दास , शिव - द्रोही , मम दास ,
ते नर करहिं कल्प भर ,घोर नरक मंह वास।
यही शिवत्व -तत्व है। भारतीय व हिंदुत्व की सामाजिकता -भाव , समन्वयता -भाव ,विश्वत्व भाव ।
रविवार, 22 फ़रवरी 2009
हिन्दी भाती नहीं या मिलती नहीं ? हिन्दुस्तान २०-०२-०९
सत्य यही है की युवाओं को बताया ही नहीं गया की अच्छा साहित्य या साहित्य होता ही क्या है ,कार्पोरेट सेक्टर पर लिखी 'ब्रेक के बाद ' या चेतन भगत व शिव खेडा की कितावें साहित्य नहीं अपितु युवाओं को उड़ान व सपने बेच कर अपना धंधा कर उल्लू सीधा करने का बाजारवाद है , अंग्रेजियत का हिन्दीकरण है । साहित्य --असाहित्य ,साहित्य ,व सत्साहित्य होता है। प्रोफेशनल , विषय पर या बाज़ार मैबेचने के लिए ही लिखागया तथा फ़िल्म हिट होनेपर देवदास आदि का बिकना सब -असाहित्य बढावा है । शोभा डे ,खुसबंत सिंह आदि वास्तव मैं कनेक्ट फेक्टर ही हैं ,साहित्यकार नहीं । युवा वन सिटिंग बुक चाहते हैं हिन्दी मै । क्यों हों ?साहित्य समाज को कुछ देने वाला , सुधार की बात ,आप क्या ग़लत कर रहे हैं ,बताने वाला होता है । टाइम पास करने को नहीं । सत्साहित्य -आपको क्या करना चाहिए -क्या नहीं ,यह कहता है ,वन सिटिंग तमासा नहीं ,जो असाहित्य होता है।
क्या ही खूब कहा है आलोचक वीरन्द्र यादव ने साहित्य और पल्प मैं अन्तर रहना ही चाहिए । साहित्य तेजी से नहीं बदल सकता और क्यों बदले वह कोई फेशन या अंग प्रदर्शन या कपडा नहीं है जो आपको अच्छा लगने के लिए बदलता रहे । वह समाज को स्थायित्व देने वाला अंग है । सही है लेखक का काम मार्केटिंग व प्रचार करना नहीं है , पब्लिशरों का है ,पर वे तो धंधे मैं लगे हैं ,चाहे अपना देश, अपनी भाषा ,अपनी संस्कृति को ही क्यों न बेचना पड़े ।
सब धंधे का , बाज़ार का, पैसे का खेल है , क्योंकि हमारी पीढी ने तेज़ी से दौड़ , के चक्कर मैं अगली
पीढी को ,साहित्य, संस्कृति , देश, राष्ट्र , सही -ग़लत का चुनाव करने की द्रष्टि प्रदान नहीं की। हमारी पीढी को जो अच्छा लगता है वह करती जाती है और जब ग़लत होता है तो हम चिल्लाने के सिवा और कुछ नहीं कर पाते । इसे कहते हैं अपने पेरों पर कुल्हाडी मारना । अब तो चेतें । हिन्दी साहित्य पढ़ें और युवा अपनी पहली पीढी को
क्षमा करके स्वयं को सुधारें ,अपनी अगली पीढी के लिए।
क्या ही खूब कहा है आलोचक वीरन्द्र यादव ने साहित्य और पल्प मैं अन्तर रहना ही चाहिए । साहित्य तेजी से नहीं बदल सकता और क्यों बदले वह कोई फेशन या अंग प्रदर्शन या कपडा नहीं है जो आपको अच्छा लगने के लिए बदलता रहे । वह समाज को स्थायित्व देने वाला अंग है । सही है लेखक का काम मार्केटिंग व प्रचार करना नहीं है , पब्लिशरों का है ,पर वे तो धंधे मैं लगे हैं ,चाहे अपना देश, अपनी भाषा ,अपनी संस्कृति को ही क्यों न बेचना पड़े ।
सब धंधे का , बाज़ार का, पैसे का खेल है , क्योंकि हमारी पीढी ने तेज़ी से दौड़ , के चक्कर मैं अगली
पीढी को ,साहित्य, संस्कृति , देश, राष्ट्र , सही -ग़लत का चुनाव करने की द्रष्टि प्रदान नहीं की। हमारी पीढी को जो अच्छा लगता है वह करती जाती है और जब ग़लत होता है तो हम चिल्लाने के सिवा और कुछ नहीं कर पाते । इसे कहते हैं अपने पेरों पर कुल्हाडी मारना । अब तो चेतें । हिन्दी साहित्य पढ़ें और युवा अपनी पहली पीढी को
क्षमा करके स्वयं को सुधारें ,अपनी अगली पीढी के लिए।
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