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डा श्याम गुप्त का ब्लोग...

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Lucknow, UP, India
एक चिकित्सक, शल्य-चिकित्सक जो हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान व उसकी संस्कृति-सभ्यता के पुनुरुत्थान व समुत्थान को समर्पित है व हिन्दी एवम हिन्दी साहित्य की शुद्धता, सरलता, जन-सम्प्रेषणीयता के साथ कविता को जन-जन के निकट व जन को कविता के निकट लाने को ध्येयबद्ध है क्योंकि साहित्य ही व्यक्ति, समाज, देश राष्ट्र को तथा मानवता को सही राह दिखाने में समर्थ है, आज विश्व के समस्त द्वन्द्वों का मूल कारण मनुष्य का साहित्य से दूर होजाना ही है.... मेरी तेरह पुस्तकें प्रकाशित हैं... काव्य-दूत,काव्य-मुक्तामृत,;काव्य-निर्झरिणी, सृष्टि ( on creation of earth, life and god),प्रेम-महाकाव्य ,on various forms of love as whole. शूर्पणखा काव्य उपन्यास, इन्द्रधनुष उपन्यास एवं अगीत साहित्य दर्पण (-अगीत विधा का छंद-विधान ), ब्रज बांसुरी ( ब्रज भाषा काव्य संग्रह), कुछ शायरी की बात होजाए ( ग़ज़ल, नज़्म, कतए , रुबाई, शेर का संग्रह), अगीत त्रयी ( अगीत विधा के तीन महारथी ), तुम तुम और तुम ( श्रृगार व प्रेम गीत संग्रह ), ईशोपनिषद का काव्यभावानुवाद .. my blogs-- 1.the world of my thoughts श्याम स्मृति... 2.drsbg.wordpres.com, 3.साहित्य श्याम 4.विजानाति-विजानाति-विज्ञान ५ हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान ६ अगीतायन ७ छिद्रान्वेषी ---फेसबुक -डाश्याम गुप्त

मंगलवार, 28 जनवरी 2014

भारतीय गणतंत्र – सफलताएं-असफलताएं ..पुनरावलोकन ...डा श्याम गुप्त...

                            ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...



                 भारतीय गणतंत्र – सफलताएं-असफलताएं ..पुनरावलोकन ...

            प्रायः हम लोग अपने भारतीय गणतंत्र को एक सिम्बोलिक अर्थात प्रतीकात्मक गणतंत्र की भांति लेते हैं, कहते हैं व उसी प्रकार व्यवहार भी करते हैं| परन्तु हमें इस अवसर पर अपने राष्ट्र व गणतंत्र को, उसके प्राच्य-एतिहासिक स्थितियों, ब्रिटिश कलोनिस्म से स्वतन्त्रता पूर्व स्थिति एवं स्वतन्त्रता पश्चात की कठिनाइयों व उन पर विजय प्राप्ति की सफलताओं-असफलताओं व वर्तमान स्थिति एवं भविष्य की सम्भावनाओं पर व्याख्यायित रूप से दृष्टिपात करना चाहिए| 
            हम यह याद रखें कि यह देश सदा से ही एक लोकतंत्रीय व्यवस्था का सर्वधर्म समभाव भावना प्रधान राष्ट्र रहा है, चाहे वह किसी भी राजा,राज्य,गणतंत्र या राज्यतंत्र का हिस्सा रहा हो| यहाँ युद्ध भी होते रहे, स्वदेशी, विदेशी, विधर्मी ..राजा-राज्यतंत्र बदलते रहे, राज्य, नगर, उन्नत सभ्यताएं विनष्ट होती बनती रहीं, तमाम सभ्यताएं यहाँ आयीं,रहीं .., सभी ने अपने प्रभाव यहाँ छोड़े यहाँ के ग्रहण किये | अधिकांध यहीं की होकर रह गयीं| सिकंदर जैसे गए तो लुट-पिट कर परन्तु कुछ न कुछ यहाँ छोड़ गए और साथ लेकर गए |   परन्तु इसकी आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक व लोक-शक्ति का क्षरण नहीं हुआ | इसीलिये यह सोने की चिड़िया बना रहा| क्योंकि वे सब मूलतः राजनातिक कारणों से आये..राजनैतिक व सांस्कृतिक शक्तियां थीं, विजित प्रदेश को अपना मान लेते थे | परन्तु ब्रिटिश कोलोनिस्म के काल में वह हुआ जो कभी नहीं हुआ, देश-राष्ट्र का सम्पूर्ण क्षरण व विनाश | ब्रिटिश व्यापारी थे राजनैतिक नहीं ... विश्व इतिहास में ऐसा उदाहरण शायद ही होगा जहां व्यापारियों द्वारा धन के बल पर देश जीता गया हो अतः उनका इस देश के विकास से कोइ नाता नहीं था वे सिर्फ लुटेरे थे..लूटते रहे...| आगे हम इस विषय को बिन्दुवार निम्न प्रकार से दृष्टिगत करेंगे....
१. ब्रिटिश शासन में कैसे सोने की चिड़िया को विनष्ट किया गया |
२.स्वतन्त्रता के समय किस दशा में भारत को छोड़ा गया | क्या क्या चुनौतियां व कठिनाइयाँ थीं हमारे   सम्मुख |
३.चुनौतियों का सामना कैसे किया गया ..
४.सफलताएं-असफलताएं ..व वर्तमान स्थित .
५. भविष्य के दायित्व व संभावनाएं |
                 यहाँ हम यह नहीं कहेंगे कि ब्रिटिश कैसे भारत में आये व शासन जमा पाए, यह आलेख का विषय नहीं है| वस्तुतः उस समय विश्व समाज कृषकीय-सभ्यता से इंडस्ट्रियल-सभ्यता की और अग्रसर होरहा था | यद्यपि भारत में कृषकीय एवं औद्योगिक संस्कृति सदा से ही साथ-साथ चलती रही है, जो सदा हे जीने का श्रेष्ठ, समन्वित व संतुलित ढंग है| प्राय: यह कहा जाता है कि औद्योगिक क्रान्ति के पश्चात विश्व का तेजी से उन्नति व विकास हुआ| परन्तु उन्नति संतुलित, शनैः शनैः समन्वित भाव में ही होनी चाहिए ..अत्यधिक तीब्र गति से उन्नति विसंगतियों को जन्म देती है एवं विकास, जो सदा भौतिक होता है.. उन्नति नहीं है | इतिहास गवाह है अति-तीब्र भौतिक विकास ने सदैव ही मानव अभिमान, दंभ, क्रूरता, अधिनायकवाद रूप  ..रावण, कंस व राक्षसों को जन्म दिया है |
            यह भी कहा जाता है कि इस योरोपीय विकास ने नव जागरण ...ज्ञान के प्रकाश समता-समानता भाव को दुनिया में फैलाया| जिसे भारत व विश्व में डेमोक्रेसी व आगे बढकर स्वयं ज्ञान प्राप्ति हेतु अभिज्ञान लेना, नवीनता व नवीन कार्यों के प्रति ललक उत्पन्न हुई| परन्तु वास्तव में बस यह हुआ कि ब्रिटिश कोलोनाइज़ेशन से राजनैतिक रूप से नयी सभ्यता वाले चंद योरोपीय छोटे –छोटे देशों के हाथ में प्राचीन देशों ..भारतीय प्रायद्वीप, चीनी भूभाग एवं इस्लामिक दुनिया की बागडोर आजाने से प्राच्य देशों की तथाकथित पारंपरिक असमानता आधुनिक असमानता में बदल गयी | जिसे पहले से ही भारतीय ज्ञान से प्रकाशित .भारतीय .ज्ञानियों, विद्वानों ..विवेकानंद, दयानंद आदि ने ब्रिटिश व योरोपीय कोलोनिज्म को मानव की स्वतन्त्रता हनन बताया| उद्योग की परिभाषा व राष्ट्र की अवधारणा के बारे में यहाँ पहले ही यह कहा जा चुका था ..
         “ उद्योगिनी पुरुषसिंहमुपैति लक्ष्मी, देवेन देयमिति कापुरुष: वदन्ति|’ उद्यमेन हि सिद्यंति कार्याणि न मनोरथै ..एवं वयं राष्ट्रे जाग्रयाम पंडिता:...ब्रह्मन स्वराष्ट्र में हों ..आदि वे हमें क्या सिखाते| कम्युनिज्म जैसी अवधारणा भी इसी औद्योगीकरण व असमानता की की देन थी|

        ब्रिटिश कोलोनिज्म में आर्थिक, राजनैतिक व सांस्कृतिक ...तीनों प्रकार से हमें ..हमारे देश को विनष्ट किया....|  राजनीतिक रूप से उन्होंने कैसे –कैसे देश को कब्जे में किया व अत्याचार आदि किसी से छुपे हुए नहीं हैं| उन्होंने हमारे देश को आधुनिक बनाया..बिना किसी विकास के | पहले यहाँ सब कुछ निर्यात होता था ..परन्तु अंग्रेजों ने यहाँ की सभी प्राचीन मिलों, घरेलू उद्योगों, कारीगरों को समाप्त करके कच्चा माल लूट कर बिना मूल्य चुकाए अपने देश भेज कर, बना हुआ माल देश में खपाना प्रारम्भ किया | विकास के नाम पर विशेष करों व लूट द्वारा इसकी आर्थिक-शक्ति को विनष्ट किया गया | भारत ( अन्य गुलाम देश भी) उत्तरोत्तर अविकसित होता गया|
        अँगरेज़, मुस्लिम आक्रमणकारियों से अधिक क्रूर व चालाक थे|  मुस्लिम प्रायः शासकों का तलवार के बल पर धर्मांतरण करते थे जो विरोध व प्रतिक्रया उत्पन्न करता था लेकिन प्रायः जन सामान्य के कार्य ,मदरसे व विद्यालय साथ-साथ चलते रहे |..परन्तु अंग्रेजों ने मैकाले की नीति अपनाई ...संस्कृति के मूल के विनाश की जिसके बिना, मैकाले के अनुसार इस देश को गुलाम नहीं बनाया जा सकता था | उन्होंने भारतीय विद्यापद्दतियाँ, पाठशालाएं बंद कीं व नष्ट कीं, राज्य व क़ानून की भाषा अंग्रेज़ी बनायी... तथाकथित आधुनिक अंग्रेज़ी स्कूल-कालेज खोले बाबूगीरी की शिक्षा हेतु..ताकि पढ़े-लिखे भारतीय की भाषा अंग्रेज़ी हो| सामान्य जन भी उनकी नक़ल करे, भारतीय कृषि तंत्र को नष्ट किया गया..राजाओं-जमीदारों व जमींदारी प्रथा को बढ़ावा देकर, उनके वारिसों को इंग्लेंड में शिक्षा देने के बहाने उन्हें अय्यास बनाकर..  तथा करों का बोझा लादकर| हिन्दू व मुस्लिम जनता में भिन्न भिन्न सुविधाओं व इतिहास के नाम पर फूट डाली गयी  भारतीय संस्कृति के तत्वों को अपने ही अनुसार तोड़-मरोड़ कर पेश किया ताकि समस्त मौलिकता व देशी तंत्र नष्ट-भ्रष्ट होजाए एवंभारत का युवा व शिक्षित जन अपने ही पुरा ज्ञान के बारे में भ्रमित रहे और इस सब के लिए विविध भ्रष्ट तरीके भी प्रयोग किये गये | पढ़े-लिखे भारतीय की बहुत कुछ यही स्थित आज भी है | 

           १९४७ में स्वाधीनता के समय अंग्रेजों ने जो भारत छोड़ा वह रक्त-विहीन, जीर्ण-शीर्ण, गरीब, अशिक्षित, भुखमरी, अकाल पीड़ित, स्वास्थ्य, ज्ञान व विद्या व आर्थिक दृष्टि से दीन-हीन  भारत था| जहां औसत जीवन दर 3० वर्ष एवं साक्षरता दर १६% थी|  अंग्रेज़ी ज्ञान व साहित्य व विचार रूपी कूड़ा-करकट सर्वत्र देश में फैला हुआ था | समस्त देश टुकड़ों में राज्यों-शासकों में बंटा हुआ था जो अंग्रेजों द्वारा फूट डालो और राज्य करो की नीति से गठित किये गए थे| इन बहुत सारी चुनौतियों पर हमें विजय प्राप्त करनी थी.....हमने सफलता पूर्वक सामना किया भी और विजय भी प्राप्त की...देश को ब्रिटिश कोलोनिज्म शासन से  से भारतीय गणतंत्र की स्थापना की ओर सफलता पूर्वक ले जाया गया ... और सबसे बड़ी बात यह कि यह परिवर्तन, यह क्रान्ति बिना किसी आतंरिक या बाह्य संघर्ष...खून खराबा व युद्ध के.... शांतिपूर्ण ढंग से हुआ जो विश्व-इतिहास  में एक अतुलनीय उदाहरण है | इन चुनौतियों को मूलतः निम्न प्रयासों द्वारा विजित किया गया...

        राजनैतिक स्वाधीनता ....महात्मा गांधी के नेतृत्व में हमने बिना शस्त्र सफल अहिंसक-आन्दोलन द्वारा विश्व के संबसे बड़े साम्राज्य व कोलोनिज्म के विरुद्ध विजय पायी, जो मानव इतिहास में प्रथमबार हुआ|

       बिखरे हुए राज्यों को का पुनर्गठन अंग्रेजों ने दोहरा शासन प्रबंध अपनाया हुआ था लगभग आधा  भारत सीधे-सीधे ब्रिटिश राज्य के अंतर्गत था तथा शेष को वे छोटे-छोटे नबावों, राजाओं, शासकों, राज्यों , स्टेट्स आदि के द्वारा शासित करते थे एवं भारी कर बसूलते थे, ताकि अराजकता व बद-इन्तजामी देशी शासकों के नाम आये ..विकास व सफलताएँ अंग्रेजों के नाम| शासकों को हिन्दू व मुस्लिम शासकों में विशेष दर्ज़ा देकर बांटा हुआ था ताकि १९५७ की भाँति वे एक न हो पायें | यह एक दुष्कर कार्य था परन्तु सरदार पटेल की नीतियों द्वारा, विविध नवाबों ..राजाओं द्वारा भारतीय गणतंत्र से अपना स्वतंत्र राज्य बनाए रखने की जद्दो-जहद करने पर भी अंतत: सभी बिखरे राज्यों को भारतीय गणतंत्र में मिला कर एक भारत का लक्ष्य पूरा किया गया|

      किसानों को भूमि का स्वामित्व...पुराने भारत में किसान अपनी भूमि का स्वामी होता था परन्तु कोलोनियल व्यवस्था द्वारा ब्रिटिश शासन ने जमींदारी व्यवस्था को प्रश्रय दिया ताकि वे यहाँ के अँगरेज़ परस्त प्रभावशाली लोगों के माध्यम से अधिकाधिक लगान बसूलते रहें| इस प्रकार किसान अपनी ही भूमि का स्वामी की अपेक्षा मज़दूर, कर्मचारी होगया | उसके श्रम का लाभ सरकार व उसके बिचौलिए जमींदार आदि लुटे रहते थे...देश कंगाल होता गया| स्वतंत्र भारत की सरकार ने किसानों को पुनः भूमि का स्वामित्व दिलाया|

      भारतीय संविधान की रचना . अपनी स्वयं की नीति-नियम निर्धारण एवं प्रगति के लिए देश का संविधान एक मूल दस्तावेज़ होता है अतः..१९५० में ब्रिटिश शासन के स्थान पर भारतीय संविधान तैयार किया गया जो जन प्रतिनिधियों एवं संविधान के विशेषज्ञों द्वारा मिलकर तैयार किया गया लिखित दस्तावे है और २६ जनवरी १९५० को भारत विश्व का सबसे बड़ा गणतंत्र बना|

     चुनावीय संशोधन व प्रथम चुनाव... स्वतन्त्रता के समय विश्व भर के राजनैतिज्ञों, विशेषज्ञों, पढ़े-लिखे लोगों, विद्वानों आदि  का मानना था कि भारत में लोकतंत्र नहीं चल सकता, भारतीय जनता लोकतंत्र के लायक परिपक्व नहीं है| परन्तु १९५२ के प्रथम चुनाव में ही भारत-सरकार एवं भारतीय जनता ने पूरे मनोयोग, शक्ति, जोर-शोर से दुनिया के सबसे बड़े चुनाव-प्रक्रिया को शांतिपूर्ण मतदान द्वारा पूर्ण करके दुनिया को दिखा दिया वे कितने समर्थ, समझदार व परिपक्व हैं और दुनिया के सबसे बडे लोकतंत्र का खिताब प्राप्त किया| परन्तु सफलताओं के साथ कुछ असफलताएं भी होती है हमें उन पर भी दृष्टि डालनी चाहिए ताकि वर्तमान के परिदृश्य को स्पष्ट देखा जा सके एवं भविष्य की संभावनाओं व योजनाओं पर उचित विचार किया जा सके |

       सर्व प्रथम सर्वाधिक तो हम शिक्षा के बिंदु पर चूक गए | साक्षरता शिक्षा नहीं होती | यूंतो आजादी के समय भी, पहले भी, आज भी भारत का प्रत्येक व्यक्ति शिक्षित है अपने अपने कार्य में यदि व्यक्ति कुशल है तो वह साक्षर हो या न हो उसे अपना नाम लिखना आता हो या न आता हो क्या अंतर पड़ता है | हाँ सरकार व शासन को ईमानदार अवश्य होना चाहिए एवं कागजी कार्यवाही कम से कम होनी चाहिए | अतः साक्षरता दर १६% एक भ्रामक स्थिति थी जिसे हमने अंग्रेज़ी ज्ञान-बद्धता के कारण मान लिया और अंग्रेज़ी ज्ञान को शिक्षा समझने की भ्रान्ति ने अंग्रेज़ी स्कूलों, शिक्षासंस्थानों को बंद करने की अपेक्षा प्रश्रय दिया अंग्रेज़ी व पाश्चात्य माडल के प्राइमरी नर्सरी आदि स्कूलों एवं बच्चे को स्कूल भेजने की उम्र भी योरोपीय ज्ञान पर आधारित रही | अंग्रेज़ी का ज्ञान प्रथम कक्षा से ही होने के कारण शिशु अवस्था से ही बच्चे अपनी मातृभाषा, अपनी संस्कृति, सभ्यता, देश से अनभिज्ञ होता गया|  इसी के हेतु व्यवसायिक व तकनीकी शिक्षा को अत्यधिक बढ़ावा एवं अपनी संस्कृति, साहित्य, धर्म, दर्शन, पुरा-ज्ञान आदि को अधिक महत्त्व नहीं दिया | अंग्रेज़ी भाषा एवं ब्रिटिश सरकार द्वारा स्थापित लिखित-कागजी-तंत्र को सरकारी कार्य व न्यायालयों के कार्य से न हटाकर राष्ट्र-भाषा हिन्दी एवं स्थानीय –प्रांतीय भाषाओं एवं सामान्य जनता के विकास का मार्ग अवरुद्ध किया गया जिससे समस्त जानकारी, साक्षरता, शिक्षा व राजनैतिक शक्ति चंद अन्ग्रेजी पढ़े लिखे लोगों के हाथों में केन्द्रित होती गयी और भारतीय बचे, किशोर व युवा अपनी ही भाषा, ज्ञान-विज्ञान, सभ्यता, संस्कृति व देश से दूर होते गए एवं योरोपीय मुखापेक्षी तदनंतर अमरीकी मुखापेक्षी होते गए ..जो आज की स्थिति है|

           रही सही कसर एक भयानक भूल .. मीडिया, बाज़ार व कला के  उदारीकरण व वैश्वीकरण ने पूरी करदी | विदेशों का सारा कूड़ा-कचरा सभ्यता ..जुआ व वेश्यालयों. न्यूड-क्लबों की संस्कृति व धन ...सांस्कृतिकता व कला के नाम पर देश को प्रदूषित करने लगी| बहुउद्देशीय कंपनियों का प्रदूषित धन भारतीय युवा को नव-युग की क्लर्की ..आईटी कम्पनियों का कार्य हेतु .. मोटी-मोटी पे व पर्क्स के रूप में देकर पुनः अपनी ही विदेशी कंपनियों के तथाकथित ब्रांडेड माल को ऊंची कीमतों में खरीद्वाकर..पिज़्ज़ा-बर्गर खिलाकर वापस लेलेने का दुश्चक्र भारतीय पीढी के मानस व सन्स्कृति को प्रदूषित कर रहा है|  विदेशी संस्कारहीन मीडिया भारतीय प्राच्य संस्कृति को मॉडर्न तत्व के सम्मिश्रण से बने सीरियलों...बाल-मनोरंजन सीरियलों आदि से भारतीय सांस्कृतिक तथ्यों को विनष्ट कर रहा है | यही भारतीय गणतंत्र  का वर्तमान परिदृश्य है |

भविष्य की सम्भावना--- हमारी इन भयानक त्रुटियों से के कारण आज का युवा तेजी से होती हुई ललचाती हुई योरोप व अमेरिकी भौतिक-प्रगति से अचंभित, प्रभावित, आनंदित हैं व बौखलाए हुए हैं | पाश्चात्य रंग में रँगे हुए अमरीका परस्त, अमरीका रिटर्न, देश को धीमी गति से प्रगति के कारण गाली देते हुए युवा क्या वास्तविकता ऐतिहासिक, भौगोलिक, आर्थिक व सभ्यता -सांस्कृतिक वस्तुस्थिति पहचानकर अपने देश के प्रति अपना दायित्व पहचानेंगे एवं अपनी सभ्यता व पुरातनतम संस्कृति से तादाम्य करते हुए देश को आगे प्रगति के पथ पर लेजाने का दायित्व संभालेंगे | आज गणतंत्र दिवस के अवसर पर हमारा विचार है कि एसा होगा एवं आशा व विश्वास भी है.....
             ‘दुनिया फिर चलेगी तेरे नक़्शे कदम पे श्याम
             तुझे देश की मिट्टी पे मिटने की बुरी आदत है|

 

सोमवार, 27 जनवरी 2014

कृष्ण व राधा...कृ...कृष..कृषि...रा ...रयि ..राधा ...राम...सीता .....व्युत्पत्ति व निष्पत्ति ....डा श्याम गुप्त..

                                 ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...



    

 कृष्ण---    
          कर्म शब्द कृष धातु से निकला है कृष धातु का अर्थ है करना।  इस शब्द का पारिभाषिक अर्थ कर्मफल भी होता है।
        शिव–नारद संवाद में शिव का कथन ---‘कृष्ण शब्द में कृष शब्द का अर्थ समस्त और 'न' का अर्थ मैं...आत्मा है .इसीलिये वह सर्वआत्मा परमब्रह्म कृष्ण नाम से कहे जाते हैं| कृष का अर्थ आड़े’.. और न.. का अर्थ आत्मा होने से  वे सबके आदि पुरुष हैं |"....अर्थात   कृष का अर्थ आड़े-तिरछा और न (न:=मैं, हम...नाम  ) का अर्थ आत्मा ( आत्म ) होने से  वे सबके आदि पुरुष हैं...कृष्ण हैं| क्रिष्ट..क्लिष्ट ...टेड़े..त्रिभंगी...कृष्ण की त्रिभंगी मुद्रा का यही तत्व-अर्थ है...
            कृष धातु का अर्थ है विलेखण......आचार्यगण कहते हैं.....     ‘संसिद्धि: फल संपत्ति:’ अर्थात फल के रूप में परिणत होना ही संसिद्धि है और ‘विलेखनं हलोत्कीरणं ”
       अर्थात विलेखन शब्द का अर्थ है हल-जोतना |..जो तत्पश्चात  अन्नोत्पत्ति के कारण ..मानव जीवन के सुख-आनंद का कारण ...अतः कृष्ण का अर्थ.. कृष्णन, कर्षण, आकर्षक, आकर्षण  व आनंद स्वरूप हुआ... |
            'संस्कृति'  शब्द भी ….'कृष्टि' शब्द से बना है, जिसकी व्युत्पत्ति संस्कृत की  'कृष' धातु से मानी जाती है, जिसका अर्थ है- 'खेती करना', संवर्धन करना, बोना आदि होता है। सांकेतिक अथवा लाक्षणिक अर्थ होगा- जीवन की मिट्टी को जोतना और बोना। …..‘संस्कृति’ शब्द का अंग्रेजी पर्याय "कल्चर" शब्द ( ( कृष्टि -àकल्ट à कल्चर ) भी वही अर्थ देता है। कृषि के लिए जिस प्रकार भूमि शोधन और निर्माण की प्रक्रिया आवश्यक है, उसी प्रकार संस्कृति के लिए भी मन के संस्कार–परिष्कार की अपेक्षा होती है। अत: जो कर्म द्वारा मन के, समाज के परिष्करण का मार्ग प्रशस्त करता है वह कृष्ण है... |   'कृष' धातु में 'ण' प्रत्यय जोड़ कर 'कृष्ण' बना है जिसका अर्थ आकर्षक व आनंद स्वरूप कृष्ण है/
गवामप ब्रजं वृधि कृणुश्व राधो अद्रिव:
नहि त्वा रोदसी उभे ऋघायमाणमिन्वतः |
      कृष्ण = क्र या कृ = करना, कार्य=कर्म …..राधो  = आराधना,  राधन, रांधना, गूंथना, शोध, नियमितता , साधना....राधा....
---ब्रज में गौ – ज्ञान, सभ्यता उन्नति की वृद्धि ...कृष्ण-राधा द्वारा हुई = कर्म व साधना द्वारा की गयी शोधों से हुई ....
राधा ......     
   राधा का चरित्र-वर्णन श्रीमद भागवत में स्पष्ट नहीं मिलता ....वेद-उपनिषद में भी राधा का उल्लेख नहीं है.... राधा-कृष्ण का सांगोपांग वर्णन ‘गीत-गोविन्द’ से मिलता है|
        
         व्याकरण की प्रक्रिया के अनुसार राध धातु से राधा और कृष धातु से कृष्ण नाम व्युत्पन्न
हुये|  राध धातु का अर्थ है संसिद्धि ( वैदिक रयि= संसार..धन, समृद्धि एवं धा = धारक )
--- सर्व प्रथम ऋग्वेद के मंडल १ में .राधस शब्द का प्रयोग हुआ है  ....जिसे वैभव के अर्थ में प्रयोग किया गया है......
--ऋग्वेद के २ में .३-४-५ म सुराधा ...शब्द का प्रयोग श्रेष्ठ धनों से युक्त के अर्थ में प्रयुक्त होता रहा है...सभी देवों से उनकी अपनी संरक्षक शक्ति का उपयोग करके धनों की प्राप्ति व प्राकृतिक साधनों के उचित प्रयोग की प्रार्थना की गयी है|
----ऋग्वेद-५/५२/४०९४--    में  राधो व आराधना शब्द ..शोधकार्यों के लिए प्रयुक्त किये गए हैं...यथा..
“ यमुनामयादि श्रुतमुद्राधो गव्यं म्रजे निराधो अश्वं म्रजे |”....अर्थात यमुना के किनारे गाय ..घोड़ों आदि धनों का वर्धन, वृद्धि, संशोधन  व उत्पादन आराधना सहित करें या किया जाता है |

            पूर्व वैदिक काल में समस्त संसिद्धियों का स्वामी, देवता इंद्र था जिसका तत्पश्चात..परवर्ती काल में उपेन्द्र फिर  विष्णु एवं कृष्ण के रूप में आविर्भाव हुआ ..
               इदं ह्यन्वोजसा सुतं राधानां पते पिवा त्वस्य गिर्वण :(ऋग्वेद ३. ५ १. १ ० )
  ---- यह सोमरस तुम्हारे ओज के लिए अभिसुत किया गया है ...हे राधानं पते ( समस्त संसिद्धि, समृद्धि, धनों, आराधना, विविध शोधों के देवता स्वामी ) पर्वतों को नष्ट करने वाले   (इंद्र) देव..आप इसे ग्रहण करें |
                विभक्तारं हवामहे वसोश्चित्रस्य  राधस : सवितारं नृचक्षसं (ऋग्वेद १ .  २ २.  ७). 
   ---जो समस्त विभक्तियों ...सारे जग मे ह्रदय में स्थित, सर्वज्ञाता, दृष्टा सभी प्रकार के धनों व विविध शोधों ..संसिद्धियों के स्वामी हैं एवं सूर्य की भाँति समस्त सृष्टि के रक्षक हैं उनका हम आवाहन करते हैं|
             
             यस्या रेणुं   पादयोर्विश्वभर्ता धरते मूर्धिन प्रेमयुक्त :   --- -(अथर्ववेदीय राधिकोपनिषद ) राधा...जिसके कमलवत  चरणों की रज श्रीकृष्ण अपने माथे पे लगाते हैं। 

पुराणों में श्री राधे :
यथा राधा प्रिया विष्णो : (पद्मपुराण ) 
राधा वामांश संभूता महालक्ष्मीर्प्रकीर्तिता (नारद पुराण )
तत्रापि राधिका शश्वत (आदि पुराण )
रुक्मणी द्वारवत्याम तु राधा वृन्दावन वने (मतस्य पुराण १३. ३७ )
राध्नोति सकलान कामान तेन राधा प्रकीर्तित :(देवी भागवत पुराण )
अन्याअ अराधितो (अन्याययराधितो )नूनं भगवान् हरिरीश्वर :           -(श्रीमद भागवतम )
       ---------इस गोपी ने कृष्ण  की अनन्य भक्ति( आराधना) की है। इसीलिए कृष्ण उन्हें अपने (संग रखे हैं )संग ले गए. (इसीलिये वह आराधिका ...राधिका है)

हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे// ----महामंत्र का अर्थ
नारद पंचरात्र में राधा का एक नाम हरा या हारा भी वर्णित है...वर्णित है |जो गौडीय वैष्णव सम्प्रदाय में प्रचलित है|
         सामवेद की छान्दोग्य उपनिषद् में कथन है...
                ”स्यामक केवलं प्रपध्यये, स्वालक च्यमं प्रपध्यये स्यामक”....
  
----श्यामक अर्थात काले की सहायता से श्वेत का ज्ञान होता है (सेवा प्राप्त होती है).. तथा श्वेत की सहायता से हमें स्याम का ज्ञान होता है ( सेवा का अवसर मिलता है)....यहाँ श्याम ..कृष्ण का एवं श्वेत राधा का प्रतीक है|
                 कृष्णस्य अर्धांगा संभूता न तस्य सादर्सि सती,
                 गोलोक वासिना श्रेयं अत्र कृष्णाज्ञाना-
                 अधुना अयोनि संभवा देवी मूल प्रकृति ईश्वरी ---आदि पुराण
        गोलोक वासी श्री कृष्ण की आज्ञा से भूलोक में अवतरित हुए| राधाजी किसी भी 
मानव-मातृ शरीर से उत्पन्न नहीं हुईं अपितु वे, स्वयं मूल प्रकृति( मातृ शक्ति) देवी हैं अतः अपने 
अर्धांग श्री कृष्ण से उद्भूत हुईं और उनकी काया में समा गयीं | गर्ग संहिता में कहा है....आप 
गोलोक के लीलामय प्रभु-ब्रह्म हैं और राधा आपकी लीला-शक्ति हैं| जब आप बैकुंठ के नाथ होते हैं 
तो राधा, लक्ष्मी का रूप होती हैं....जब संसार में आप रामचंद्र होते हैं तो वे जनक नंदिनी सीता का 
रूप होती हैं|


            पुराण मैं कहा गया है कि ...‘वैदग्धिसार-सर्वस्व मूर्ति लीलाधिदेवता’... जो श्रीमती राधिका के साथ नित्य रमण करते हैं, वे ही.... 'राम' शब्द वाच्य कृष्ण है/
वस्तुतः ऋग्वेद , यजुर्वेद व  अथर्व  वेदिक साहित्य में ’ राधा’ शब्द की व्युत्पत्ति =रयि (संसार, ऐश्वर्य,श्री,वैभव)  
 +धा ( धारक,धारण करने वालीशक्ति) से हुई है; अतः जब उपनिषद व संहिताओं के ज्ञान-मार्गीकाल में ....सृष्टि 
के कर्ता का ब्रह्म व पुरुष, परमात्मा, रूप वर्णन हुआ तो समस्त संसार की धारक चित-शक्ति, ह्लादिनी शक्ति, परमेश्वरी (राधा)  का आविर्भाव हुआ ....
भविष्य पुराण में--जब वेद को स्वयं साक्षात नारायण कहा तो उनकी  मूल कृतित्व----काल, कर्म, धर्म व काम के 
अधिष्ठाता हुए--काल रूप कृष्ण  व उनकी सहोदरी (भगिनी-साथ-साथउदभूत)  राधा परमेश्वरी.... कर्म रूप  
 ब्रह्मा व नियति (सहोदरी).... धर्म रूप-महादेव व श्रद्धा (सहोदरी) ...एवम कामरूप-अनिरुद्ध  व  उषा ।----इस  
प्रकार राधा परमात्व तत्व कृष्ण  की चिर सहचरी , चिच्छित-शक्ति (ब्रह्म संहिता)  है।
वही परवर्ती साहित्य में श्री कृष्ण  का लीला-रमण व  लोकिक  रूप के  आविर्भाव  के  साथ  उनकी साथी,  
प्रेमिका, पत्नी हुई  व ब्रज बासिनी रूप में  जन-नेत्री।
भागवत पुराण में-----एक अराधिता नाम की गोपी का उल्लेख है, किसी एक प्रिय गोपी को भगवान श्री कृष्ण  
महारास के मध्य में लोप होते समय साथ ले गये थे ,जिसे ’मान ’ होने पर छोडकर अन्तर्ध्यान हुए थे; संभवतः  
यह  वही गोपी रही होगी  जिसे गीत-गोविन्द के रचयिता, विद्यापति व सूरदास आदि परवर्ती कवियों, भक्तों ने
श्रंगार भूति श्री कृष्ण  (पुरुष)  की  रसेश्वरी (प्रक्रति)  रूप में कल्पित व प्रतिष्ठित  किया राधा..राधिका नाम से।                              
                              वस्तुतः गीत गोविन्द व भक्ति काल के समय स्त्रियों के सामाज़िक (१ से १० वीं शताब्दी)  
अधिकारों में कटौती होचुकी थी,  उनकी स्वतंत्रता , स्वेच्छा,  कामेच्छा अदि पर अंकुश था। अत:  राधा का  
चरित्र महिला उत्थान व उन्मुक्ति के लिये रचित हुआ।  पुरुष-प्रधान समाज में कृष्ण  उनके अपने हैं,जो उनकी  
उंगली पर नाचते है, स्त्रियों के प्रति जवाब देह हैं,  नारी-उन्मुक्ति, उत्थान के देवता हैं। इस प्रकार बृन्दावन- 
अधीक्षिका, रसेश्वरी श्री राधाजी का ब्रज में , जन-जन में, घर-घर में ,मन-मन में, विश्व में, जगत में प्राधान्य हुआ
वे मातृ-शक्ति हैं, भगवान श्रीकृष्ण  के साथ सदा-सर्वदा संलग्न, उपस्थित, अभिन्न--परमात्म-अद्यात्म-शक्ति; 
अतः वे लौकिक-पत्नी नहीं होसकतीं, उन्हें बिछुडना ही होता है, गोलोक के नियमन के लिये । 

हरे - 
      ब्रह्मसंहिता के अनुसार, जो अपने रूप, माधुरी, एवम प्रेम वात्सल्य आदि से श्रीहरि के मन को भी हरण कर लेती हैं, उनश्री वृषभानु नंदिनी श्रीमती राधिका जी का नाम ही 'हरा' है/ श्रीमती राधिका के इस 'हरा' नाम के संबोधन में 'हरे' शब्दका प्रयोग हुआ है/..(.हरा= हारा = विश्व की मूल आत्मा .....यथा हाराकीरी ( आत्म ह्त्या) अथवा परमात्मा =हारा के मन की हरण कर्ता ..हरा ..)

राम - 
      आगम के अनुसार 'रा' शब्द के उच्चारण से सारे पाप समूह मुख से निकल जाते हैं तथा पुनः प्रवेश न कर पाने से 'म'  कार रूप कपाट से युक्त 'राम' नाम है/

सीता....
        सीता का अर्थ है ... खेत में जुताई द्वारा हल से खींची हुई लकीर या रेखा या मेंड़ (विलेखित..कृषित...कृष्नित..गोलोक में परमात्मा रूप श्रीकृष्ण द्वारा अभिनंदित...आनंदित  ).... गोलोक की राधा ही सीता थी...सीता ही ब्रज में राधा थी.. तभी सीताजी ने यमुना पार करते समय उन्हें प्रणाम किया |
      वाल्मीकि रामायण में एक प्रसंग है कि जब सीता जी वनवास के समय यमुना जी को पार कर रही थीं, तो जब यमुना जी को पार करते समय सीता जी ने यमुना जी की वंदना की | उन्होंने देख लिया कि ये यमुना ब्रज से आ रही हैं | वहाँ श्लोक है ...
“कालिन्दीमध्यमायाता सीता त्वेनामवंदत |
स्वस्ति देवि तरामि त्वां पारयेन्मे पतिव्रतं ||
यक्ष्ये त्वां गो सहस्रेण सुराघट शते न च |
स्वस्ति प्रत्यागते रामे पुरीमिक्ष्वाकुपालितां || “५५|१९||
      सीता जी ने कहा कि हे माँ मैं तेरी हजारों गायों से सेवा करुँगी|  सीता जी भी ब्रजभक्त थीं, गोलोक में राधा रूप में स्वयं ब्रजेश्वरी जो हैं |