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डा श्याम गुप्त का ब्लोग...

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Lucknow, UP, India
एक चिकित्सक, शल्य-चिकित्सक जो हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान व उसकी संस्कृति-सभ्यता के पुनुरुत्थान व समुत्थान को समर्पित है व हिन्दी एवम हिन्दी साहित्य की शुद्धता, सरलता, जन-सम्प्रेषणीयता के साथ कविता को जन-जन के निकट व जन को कविता के निकट लाने को ध्येयबद्ध है क्योंकि साहित्य ही व्यक्ति, समाज, देश राष्ट्र को तथा मानवता को सही राह दिखाने में समर्थ है, आज विश्व के समस्त द्वन्द्वों का मूल कारण मनुष्य का साहित्य से दूर होजाना ही है.... मेरी दस पुस्तकें प्रकाशित हैं... काव्य-दूत,काव्य-मुक्तामृत,;काव्य-निर्झरिणी, सृष्टि ( on creation of earth, life and god),प्रेम-महाकाव्य ,on various forms of love as whole. शूर्पणखा काव्य उपन्यास, इन्द्रधनुष उपन्यास एवं अगीत साहित्य दर्पण (-अगीत विधा का छंद-विधान ), ब्रज बांसुरी ( ब्रज भाषा काव्य संग्रह), कुछ शायरी की बात होजाए ( ग़ज़ल, नज़्म, कतए , रुबाई, शेर का संग्रह) my blogs-- 1.the world of my thoughts श्याम स्मृति... 2.drsbg.wordpres.com, 3.साहित्य श्याम 4.विजानाति-विजानाति-विज्ञान ५ हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान ६ अगीतायन ७ छिद्रान्वेषी

मंगलवार, 30 सितंबर 2008

कितना ज़रूरी है धर्म - देवराज भारती

पूरवसंसार को माया कहता है, ---पूरब अपनी अधूरी व अधार्मिकं धारणा के कारण भौतिक रूप से दीं हीन होगया है। ---अधूरा ज्ञान व धारणा है, भारतीय वास्तविक धारणा के अनुसार , संसार अज्ञान- व माया तो है, परन्तु त्याज्य नही , हमें पहले इसको प्राप्त करके ,तैर कर इसे पार करना है पर रुकना नही है,फ़िर आगे बढ़कर ,परमार्थ भाव सहित मोक्ष प्राप्ति की ओरचलना है। यही धर्म है। तभी तो ईशावाश्योप्निषद कहता हैं।
विद्याम (ईश्वरीय ज्ञान) चाविध्याम (सांसारिक ज्ञान) यस् तद वेदोभायम सह (का साथ साथ ज्ञान होना चाहिए ) । अविद्यया (सांसारिक ज्ञान से) मृत्युम तीर्त्वा (संसार को जीतकर )विद्यया अम्रित्मश्नुते ।

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