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डा श्याम गुप्त का ब्लोग...

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Lucknow, UP, India
एक चिकित्सक, शल्य-चिकित्सक जो हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान व उसकी संस्कृति-सभ्यता के पुनुरुत्थान व समुत्थान को समर्पित है व हिन्दी एवम हिन्दी साहित्य की शुद्धता, सरलता, जन-सम्प्रेषणीयता के साथ कविता को जन-जन के निकट व जन को कविता के निकट लाने को ध्येयबद्ध है क्योंकि साहित्य ही व्यक्ति, समाज, देश राष्ट्र को तथा मानवता को सही राह दिखाने में समर्थ है, आज विश्व के समस्त द्वन्द्वों का मूल कारण मनुष्य का साहित्य से दूर होजाना ही है.... मेरी दस पुस्तकें प्रकाशित हैं... काव्य-दूत,काव्य-मुक्तामृत,;काव्य-निर्झरिणी, सृष्टि ( on creation of earth, life and god),प्रेम-महाकाव्य ,on various forms of love as whole. शूर्पणखा काव्य उपन्यास, इन्द्रधनुष उपन्यास एवं अगीत साहित्य दर्पण (-अगीत विधा का छंद-विधान ), ब्रज बांसुरी ( ब्रज भाषा काव्य संग्रह), कुछ शायरी की बात होजाए ( ग़ज़ल, नज़्म, कतए , रुबाई, शेर का संग्रह) my blogs-- 1.the world of my thoughts श्याम स्मृति... 2.drsbg.wordpres.com, 3.साहित्य श्याम 4.विजानाति-विजानाति-विज्ञान ५ हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान ६ अगीतायन ७ छिद्रान्वेषी

शुक्रवार, 20 नवंबर 2009

शर्म आती है पर नहीं आती ----हमारी मानसिक गुलामी |

चित्र १.---वर्णन ---(बी)-पर देखें --
(ऐ)बेंगलूर में एक बड़े माल में एक रेस्तरां है--साहिब, सिंध, सुलता --एक रेल के कोच एवं रेल के ही विभिन्न फीचर्स --बेरे ,टी टी ई , गार्ड, आदि का रूप लिए हुए , सीटें -अंग्रेजों के ज़माने की साहिबों ( अँगरेज़ साहिबों ) के सलून की भांति , भोजन मेन्यू --लार्ड साहिब का मुर्ग जोश, नाना साहब की पसंद रायता, लक्ष्मी बाई की कढ़ी, आदि-आदि ,उस रेल कार में सीटी भी बजाती है , अनाउंस भी होता है | १९५३ में भारत की प्रथम ट्रेन की नक़ल -स्वरुप पर यह दस्तर खान बनाया गया है , अंग्रेज़ी हर प्रकार की शराब आदि भी उपलब्ध है , अर्थात सभी प्रकार से अंग्रेज़ी राज की यादें ताज़ा करें | साथ ही हमारी सबसे बड़ी शर्म का वाक्य भी भोजन मेन्यू में लिखा है ,जो अँगरेज़ व यूरोपियन बड़े फख्र से कहते थे--"दे केम दे शौ दे कोंकर्ड" (वे आए उनहोंने देखा , उन्होंने जीत लिया )| खाना बहुत महँगा है , हाँ क्वालिटी साधारण - लोग बड़े फख्र से बहुत देर इंतज़ार करके , बहाँखाने में बड़ा गर्व महसूस करते हैं | क्या ये हमारी हीन भावना की ग्रंथि नही है, कि चलोहमने भी साहबी मज़ा लिया -थे साहबों की नकल कर ली, साहबी नक़ल की पुरानी दमित इच्छा की पूर्ति | कब तक हम सिर्फ़ धंधे की खातिर अपनी शर्म, ईमान को बेचते रहेंगे ---सोचें --सरकार, धंधे बाज़, जनता, बेंगलूर के नव-धनाड्य अंग्रेज़ी दां इन्फो-टेकी और हम सब | कब तक मानसिक गुलाम रहेंगे आख़िर ??????????

(बी)--उधर हमारे समाचार पत्र- बड़े दो-टूक आदि की बड़ी -बड़ी बातें बघारते रहते हैं, पर उपदेश कुशल बहुतेरे , स्वयं क्या कर रहे हैं , अन्धाविश्वाशों को बढ़ावा , देखें आज का हैडर---चित्र १। ऊपर । सभी समस्याओं का समाधान , विना काम-धाम किए , सिर्फ़ पैसे खर्च करके | वाह !!!!!!!!!!!!!!!! क्या बात है , हम आधुनिक युगी होरहे हैं ।
---हमतो बस यही कहेंगे ---"शर्म आती है पर नहीं आती "

2 टिप्‍पणियां:

जी.के. अवधिया ने कहा…

आज हम जो हम लोग क्रिकेट के दीवाने हैं वह क्या है? अंग्रेजों के बनाये गये इस खेल पर लट्टू रहना भी तो मानसिक गुलामी ही है।

Dr. shyam gupta ने कहा…

बिल्कुल सही कहा.