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डा श्याम गुप्त का ब्लोग...

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Lucknow, UP, India
एक चिकित्सक, शल्य-चिकित्सक जो हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान व उसकी संस्कृति-सभ्यता के पुनुरुत्थान व समुत्थान को समर्पित है व हिन्दी एवम हिन्दी साहित्य की शुद्धता, सरलता, जन-सम्प्रेषणीयता के साथ कविता को जन-जन के निकट व जन को कविता के निकट लाने को ध्येयबद्ध है क्योंकि साहित्य ही व्यक्ति, समाज, देश राष्ट्र को तथा मानवता को सही राह दिखाने में समर्थ है, आज विश्व के समस्त द्वन्द्वों का मूल कारण मनुष्य का साहित्य से दूर होजाना ही है.... मेरी दस पुस्तकें प्रकाशित हैं... काव्य-दूत,काव्य-मुक्तामृत,;काव्य-निर्झरिणी, सृष्टि ( on creation of earth, life and god),प्रेम-महाकाव्य ,on various forms of love as whole. शूर्पणखा काव्य उपन्यास, इन्द्रधनुष उपन्यास एवं अगीत साहित्य दर्पण (-अगीत विधा का छंद-विधान ), ब्रज बांसुरी ( ब्रज भाषा काव्य संग्रह), कुछ शायरी की बात होजाए ( ग़ज़ल, नज़्म, कतए , रुबाई, शेर का संग्रह) my blogs-- 1.the world of my thoughts श्याम स्मृति... 2.drsbg.wordpres.com, 3.साहित्य श्याम 4.विजानाति-विजानाति-विज्ञान ५ हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान ६ अगीतायन ७ छिद्रान्वेषी

सोमवार, 23 नवंबर 2009

समर्पित जीवन --डा श्याम गुप्त की -कविता

समर्पित जीवन

कलकल मलमल बहती नदिया,
अविरल गति से बहती है ।
करते रहो निरंतर श्रम, तप ,
बहते -बहते कहती है ।

जब हो यौवन औरलड़कपन ,
चट्टानों से टकरा जाओ |
अनथक करो परिश्रम , चिंतन,
पाषाणों में राह बनाओ |

प्रौढ़ और ज्ञानी-ध्यानी बन ,
मंद- मंद बहना सीखो |
मंथर मंथर बहते जग के,
सुख दुःख में रहना सीखो |

मंथर मंथर बहती नदिया ,
जब समतल में बहती है |
सब कुछ अपने अन्तर में भर,
सुख दुःख सहती रहती है |

सागर तीरे जब आती है,
जीवन जग का भार लिए |
सब कुछ उसे सौंप देती है,
परम समर्पण भाव किए |

श्रम तप ज्ञान सत्य से जग में ,
निधियां जो अर्पित कर पाओं |
जग के हित में प्रभु चरणों में ,
अर्पित सब करते जाओ |

जीवन सारा बहती नदिया ,
सागर में मिल खो जाए |
जैसे कोई परम- आत्मा,
स्वयं ब्रह्म ही हो जाए ||

2 टिप्‍पणियां:

Mithilesh dubey ने कहा…

प्रौढ़ और ज्ञानी-ध्यानी बन ,
मंद- मंद बहना सीखो |
मंथर मंथर बहते जग के,
सुख दुःख में रहना सीखो |

आपकी ये लाईंने अत्यन्त प्रभावशाली लंगी ।। सुन्दर रचना

Udan Tashtari ने कहा…

सुन्दर!