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डा श्याम गुप्त का ब्लोग...

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Lucknow, UP, India
एक चिकित्सक, शल्य-चिकित्सक जो हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान व उसकी संस्कृति-सभ्यता के पुनुरुत्थान व समुत्थान को समर्पित है व हिन्दी एवम हिन्दी साहित्य की शुद्धता, सरलता, जन-सम्प्रेषणीयता के साथ कविता को जन-जन के निकट व जन को कविता के निकट लाने को ध्येयबद्ध है क्योंकि साहित्य ही व्यक्ति, समाज, देश राष्ट्र को तथा मानवता को सही राह दिखाने में समर्थ है, आज विश्व के समस्त द्वन्द्वों का मूल कारण मनुष्य का साहित्य से दूर होजाना ही है.... मेरी दस पुस्तकें प्रकाशित हैं... काव्य-दूत,काव्य-मुक्तामृत,;काव्य-निर्झरिणी, सृष्टि ( on creation of earth, life and god),प्रेम-महाकाव्य ,on various forms of love as whole. शूर्पणखा काव्य उपन्यास, इन्द्रधनुष उपन्यास एवं अगीत साहित्य दर्पण (-अगीत विधा का छंद-विधान ), ब्रज बांसुरी ( ब्रज भाषा काव्य संग्रह), कुछ शायरी की बात होजाए ( ग़ज़ल, नज़्म, कतए , रुबाई, शेर का संग्रह) my blogs-- 1.the world of my thoughts श्याम स्मृति... 2.drsbg.wordpres.com, 3.साहित्य श्याम 4.विजानाति-विजानाति-विज्ञान ५ हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान ६ अगीतायन ७ छिद्रान्वेषी

बुधवार, 31 मार्च 2010

्साहित्य में आलोचना--वि श्वमान्य सत्य--डा श्याम गुप्त...

साहित्य व आलोचना
---आज कल साहित्य जगत में आलोचना विधा का पूर्ण रूप से अभाव है , समीक्षाएं भी निरपेक्ष ढंग की बजाय सभी सापेक्ष भाव से कि लेखक को बुरा लगेगा की जाती हैं , बिना आलोचना के; इससे हिन्दी कविता व साहित्य की अपार क्षति होरही है | | इस ब्लॉग में हम आलोचना को पुनर्जीवित करके क्रमश साहित्य के विभिन्न बिन्दुओं पर आलोचना लिखने का प्रयत्न करेंगे |
आज आपा-धापी भरे जीवन ( जीवन कब आपा-धापी से मुक्त था ??) में , विशुद्ध मूल्यों के क्षरण,ग्यान की कमी, साहित्य -ग्यान की कमी , गुण्वत्ता की अपेक्षा आर्थिकता व सन्ख्या के महत्व के कारण -साहित्य व कविता में भाव ,कथ्य व तथ्यात्मक अशुद्धियों का प्रचलन हो चला है जो आलोचना के अभाव में प्रश्रय पाकर कविता को जन सामान्य की द्रष्टि में अप्रमाणिक बनाकर उसे कविता से दूर कर रहा है । इस पोस्ट में हम एक मूल बिन्दु----विश्व मान्य सत्यों की अनदेखी पर कुछ उदाहरण प्रस्तुत कर रहे हैं------
१। -- चित्र में प्रस्तुत -उपरोक्त अतुकान्त कविता, वरेण्य व प्रसिद्ध कवि की है, अच्छे भाव हैं, परन्तु एक विश्व मान्य सत्य है कि "नाग" शब्द सदैव अनैतिकता, अनय, आदि रिणात्मक व्रत्तियों के लिए प्रयोग होता है,जबकि यहां मूल कथ्य , एक ईमानदार , मेहनत कश जन के बारे में है ; फ़िर नाग के "पन्जे" भी नहीं होते। शब्दावली भी कोमलकांत पदावली नहीं है|
२।-- एक अच्छे कवि की अच्छी गेय कविता है, जिसमें कहागया है----"ढूंढ रहे शैवाल वनों में हम मोती के दाने"
शैवालों के वन नहीं होते , वे जल में या जलीय स्थानों में उत्पन्न होते हैं ।
३।--तथाकथित नव-गीत में तो नये-नये दूरस्थ-कूटस्थ भाव लाने के लिये सभी तरह के सत्यों को त्यागा जारहा है। एक उदाहरण देखें---
"गन्धी ने
गन्धों के बदले
उपवन बेच दिये
उगे कटीले शब्दों में
सौ-सौ खुरपेंच नये।"----- गन्धी सिर्फ़ इत्र बेचता है उपवन पर उसका अधिकार, अधिकार क्षेत्र कहां होता है, वह माली नहीं है । जब शब्द ही कंटीले हैं, वे स्वयम ही सबसे बडे खुरपेंच हैं; तो और नये क्या खुरपेंच होंगे।
शब्दावली , स्वयं खुरपेंच वाली व खुरदरी है , कविता की कोमल कान्त नहीं |

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