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डा श्याम गुप्त का ब्लोग...

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Lucknow, UP, India
एक चिकित्सक, शल्य-चिकित्सक जो हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान व उसकी संस्कृति-सभ्यता के पुनुरुत्थान व समुत्थान को समर्पित है व हिन्दी एवम हिन्दी साहित्य की शुद्धता, सरलता, जन-सम्प्रेषणीयता के साथ कविता को जन-जन के निकट व जन को कविता के निकट लाने को ध्येयबद्ध है क्योंकि साहित्य ही व्यक्ति, समाज, देश राष्ट्र को तथा मानवता को सही राह दिखाने में समर्थ है, आज विश्व के समस्त द्वन्द्वों का मूल कारण मनुष्य का साहित्य से दूर होजाना ही है.... मेरी दस पुस्तकें प्रकाशित हैं... काव्य-दूत,काव्य-मुक्तामृत,;काव्य-निर्झरिणी, सृष्टि ( on creation of earth, life and god),प्रेम-महाकाव्य ,on various forms of love as whole. शूर्पणखा काव्य उपन्यास, इन्द्रधनुष उपन्यास एवं अगीत साहित्य दर्पण (-अगीत विधा का छंद-विधान ), ब्रज बांसुरी ( ब्रज भाषा काव्य संग्रह), कुछ शायरी की बात होजाए ( ग़ज़ल, नज़्म, कतए , रुबाई, शेर का संग्रह) my blogs-- 1.the world of my thoughts श्याम स्मृति... 2.drsbg.wordpres.com, 3.साहित्य श्याम 4.विजानाति-विजानाति-विज्ञान ५ हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान ६ अगीतायन ७ छिद्रान्वेषी

रविवार, 20 मार्च 2011

INTERMISSION......उन्हें अब हिन्दू धर्म की महिमा मान लेनी चाहिये....डा श्याम गुप्त...

                                                            ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...
           --खुदा हाफिज़ , ॐ शांति , INTERMISSION......
                  अनवर जमाल साहब को अब हिन्दू धर्म की महिमा को मान लेना चाहिये । वे नेट से इसलिये छुट्टी ले रहे हैं की बच्चे मेथ्स में कम नंबर लाने लगे | वे पांच वक्त के नमाजी हैं, खुदा के इतने पास हैं कि लोगों को खुदा से बात कराने का दावा करते हैं व दावत देते रहते हैं | पर यदि खुदा अपने इतने सच्चे बन्दे के बच्चों को भी गणित में अच्छे नंबर नहीं दिला पाया  या पहले से ही व्यक्ति को चेताया  नहीं तो क्या फ़ायदा | इससे तो अच्छा हिन्दू  वैदिक धर्म है जो सभी को सिर्फ मानव को कर्म करने की आज्ञा देता है चाहे कोइ पूजा अर्चना करे या न करे, ईश्वर को माने या न माने, मन्दिर जाये या नजाये | न किसी का कोइ काम स्वयं करने का वादा/दावा करता है | कर्मण्येवाधिकारास्ते ..... ईशोपनिषद (यजुर्वेद ) का मूल मन्त्र इन  श्लोकों में  देखिये ...
    " अन्धतम प्रविशन्ति ये  अविध्यामुपासते | ततो भूय इव ते तमो य उ विद्याया रताः ||...इषो -९ 
अर्थात वे जो अविद्या ( भौतिकता, व्यवसायिक, व्यवहारिक, सांसारिक ज्ञान )में ही लगे रहते हैं महान अन्धकार में ( मुश्किलों , कठिनाइयों में ) पड़ते हैं ; परन्तु जो सिर्फ विद्या में ( अध्यात्म, धर्म, ज्ञान, ईश्वर , पूजा पाठ, परमार्थ आदि  ) में लगे रहते हैं; सांसारिक कर्म की चिंता नहीं करते, कमाते धमाते नहीं, घर गृहस्थी, बच्चों  की फ़िक्र नहीं करते;  वे और भी अधिक अन्धकार में गिरते हैं, मुश्किलों में पड़ते हैं  | अतः --- 
   "विध्यान्चाविध्यां च यस्तद वेदोभय सह | अविद्यया मृत्युं तीर्त्वा विध्ययामृतम्नुश्ते ||"...इषो -११ 
अर्थात मनुष्य को कर्म( अपना व्यवहारिक, सांसारिक,व्यवसायिक कर्म भाव ) व ज्ञान (ईश्वरीय भाव, दर्शन, अध्यात्म,धर्म, सदाचरण, परमार्थ  आदि ) को साथ साथ जानना, करना  व उपासना चाहिए | ताकि वह कर्म से मृत्यु को ( संसारी -सुख,संमृद्धि -शान्ति-सम्पन्नता,सफलता,   सहित ) पार करके ज्ञान से अमृत (शान्ति, आनंद, परमानंद , मोक्ष ) प्राप्त कर सके |

3 टिप्‍पणियां:

kshama ने कहा…

Agyani hun...aalekhpe comment nahee karungee!
Holi bahut mubarak ho!

Babli ने कहा…

बहुत बढ़िया पोस्ट! उम्दा प्रस्तुती!
आपको एवं आपके परिवार को होली की हार्दिक शुभकामनायें!

shyam gupta ने कहा…

धन्यवाद क्षमाजी व बबली जी...