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डा श्याम गुप्त का ब्लोग...

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Lucknow, UP, India
एक चिकित्सक, शल्य-चिकित्सक जो हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान व उसकी संस्कृति-सभ्यता के पुनुरुत्थान व समुत्थान को समर्पित है व हिन्दी एवम हिन्दी साहित्य की शुद्धता, सरलता, जन-सम्प्रेषणीयता के साथ कविता को जन-जन के निकट व जन को कविता के निकट लाने को ध्येयबद्ध है क्योंकि साहित्य ही व्यक्ति, समाज, देश राष्ट्र को तथा मानवता को सही राह दिखाने में समर्थ है, आज विश्व के समस्त द्वन्द्वों का मूल कारण मनुष्य का साहित्य से दूर होजाना ही है.... मेरी दस पुस्तकें प्रकाशित हैं... काव्य-दूत,काव्य-मुक्तामृत,;काव्य-निर्झरिणी, सृष्टि ( on creation of earth, life and god),प्रेम-महाकाव्य ,on various forms of love as whole. शूर्पणखा काव्य उपन्यास, इन्द्रधनुष उपन्यास एवं अगीत साहित्य दर्पण (-अगीत विधा का छंद-विधान ), ब्रज बांसुरी ( ब्रज भाषा काव्य संग्रह), कुछ शायरी की बात होजाए ( ग़ज़ल, नज़्म, कतए , रुबाई, शेर का संग्रह) my blogs-- 1.the world of my thoughts श्याम स्मृति... 2.drsbg.wordpres.com, 3.साहित्य श्याम 4.विजानाति-विजानाति-विज्ञान ५ हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान ६ अगीतायन ७ छिद्रान्वेषी

रविवार, 19 जून 2011

कितने जीवन मिल जाते हैं......पितृ दिवस पर.... डा श्याम गुप्त की कविता....

                                                                        ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ ....
( पितृ दिवस पर------पिता की सुहानी छत्र छाया जीवन भर उम्र के, जीवन के  प्रत्येक मोड़ पर,  हमारा मार्ग दर्शन करती है....प्रेरणा देती है और जीवन को रस-सिक्त व गतिमय रखती है.....प्रस्तुत है ...एक रचना...जो गीत के एक नवीन -रचना -कृति में ...जिसे मैं .....'कारण कार्य व प्रभाव गीत'  कहता हूँ ....इसमें कथ्य विशेष का विभिन्न भावों से... कारण ,उस पर कार्य व उसका प्रभाव वर्णित किया जाता है ....)

पिता की छत्र-छाया वो ,
हमारे  सिर  पै होती है  |

         उंगली पकड़ हाथ में चलना ,
             खेलना-खाना, सुनी कहानी |
                 बचपन के सपनों की गलियाँ ,
                       कितने जीवन मिल जाते हैं ||


वो  अनुशासन की जंजीरें ,
सुहाने  खट्टे-मीठे दिन |

             ऊबकर तानाशाही से,
                रूठजाना औ हठ करना |
                      लाड प्यार श्रृद्धा के पल छिन,
                             कितने जीवन मिल जाते हैं ||


सिर पर वरद-हस्त होता है ,
नव- जीवन की राह सुझाने |

            मग की कंटकीर्ण उलझन में,
                अनुभव ज्ञान का संबल मिलता|
                        गौरव आदर भक्ति-भाव युत,
                               कितने जीवन मिल जाते हैं ||


स्मृतियाँ बीते पल-छिन की,
मानस में बिम्वित होती हैं |

                  कथा उदाहरण कथ्यों -तथ्यों ,
                          और जीवन के आदर्शों की |
                               चलचित्रों की मणिमाला में ,
                                     कितने जीवन मिल जाते हैं ||

13 टिप्‍पणियां:

मदन शर्मा ने कहा…

बिलकुल सही कहा आपने......बहुत सुन्दर सहज रचना बधाई आपको

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

एक छत सा होता उनका रहना।

Patali-The-Village ने कहा…

बहुत सुन्दर सहज रचना|

Surendra shukla" Bhramar"5 ने कहा…

डॉ श्याम जी अभिवादन पिता के साथ बीते पलों की याद दिलाती सुन्दर रचना निम्न प्यारे बोल -
ऊबकर तानाशाही से,
रूठजाना औ हठ करना |
लाड प्यार श्रृद्धा के पल छिन,
कितने जीवन मिल जाते हैं ||

कृपया श्रद्धा लिखें और नीचे की तीन पंक्तियों का रंग बदल दें पढने में मुश्किल है -
शुक्ल भ्रमर ५

गिरीश"मुकुल" ने कहा…

पितृ दिवस पर हमारी भी बधाईयां

संगीता पुरी ने कहा…

पितृ दिवस पर आपके द्वारा की गयी इस सुंदर प्रस्‍तुति की चर्चा ब्‍लॉग4वार्ता में की गयी है !!

Dr. shyam gupta ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
Dr. shyam gupta ने कहा…

मुझे लगता है दोनों ही प्रयोग होते हैं ..परन्तु शायद श्रद्धा ही अधिक सही हो.....धन्यवाद ....

देवेन्द्र पाण्डेय ने कहा…

..सुंदर शब्दांजलि।

पिता
जब रहते हैं
समझ में नही आते
जब नहीं रहते
महान होते हैं।

Dr. shyam gupta ने कहा…

धन्यावाद शर्मा जी व पांडे जी...व पाताली जी....
---धन्यवाद गिरीश जी व संगीता जी...और देवेन्द्र जी..
महान होते हैं।...

Surendra shukla" Bhramar"5 ने कहा…

मुझे लगता है दोनों ही प्रयोग होते हैं ..परन्तु शायद श्रद्धा ही अधिक सही हो.....धन्यवाद


धन्यवाद आप का भी श्याम जी -अति सुन्दर

शुक्ल भ्रमर ५

Rakesh Kumar ने कहा…

सुन्दर प्रस्तुति.
आभार.

Dr. shyam gupta ने कहा…

धन्यवाद राकेश जी....आभार..