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डा श्याम गुप्त का ब्लोग...

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Lucknow, UP, India
एक चिकित्सक, शल्य-चिकित्सक जो हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान व उसकी संस्कृति-सभ्यता के पुनुरुत्थान व समुत्थान को समर्पित है व हिन्दी एवम हिन्दी साहित्य की शुद्धता, सरलता, जन-सम्प्रेषणीयता के साथ कविता को जन-जन के निकट व जन को कविता के निकट लाने को ध्येयबद्ध है क्योंकि साहित्य ही व्यक्ति, समाज, देश राष्ट्र को तथा मानवता को सही राह दिखाने में समर्थ है, आज विश्व के समस्त द्वन्द्वों का मूल कारण मनुष्य का साहित्य से दूर होजाना ही है.... मेरी दस पुस्तकें प्रकाशित हैं... काव्य-दूत,काव्य-मुक्तामृत,;काव्य-निर्झरिणी, सृष्टि ( on creation of earth, life and god),प्रेम-महाकाव्य ,on various forms of love as whole. शूर्पणखा काव्य उपन्यास, इन्द्रधनुष उपन्यास एवं अगीत साहित्य दर्पण (-अगीत विधा का छंद-विधान ), ब्रज बांसुरी ( ब्रज भाषा काव्य संग्रह), कुछ शायरी की बात होजाए ( ग़ज़ल, नज़्म, कतए , रुबाई, शेर का संग्रह) my blogs-- 1.the world of my thoughts श्याम स्मृति... 2.drsbg.wordpres.com, 3.साहित्य श्याम 4.विजानाति-विजानाति-विज्ञान ५ हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान ६ अगीतायन ७ छिद्रान्वेषी

बुधवार, 29 जून 2011

बच्चे ...लघु कथा---डा श्याम गुप्त.....


                                             ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...


                      
      “ बच्चों के लिए मेजिक-शो रख लेते हैं, वे विजी रहेंगे, शैतानी नहीं करेंगे, माँ- बाप के साथ लटके नहीं रहेंगे, खूब एन्जॉय भी करेंगे |” निलेश ने पार्टी-प्रवंधन की चर्चा के 
दौरान कहा |

    
       ‘क्यों? बच्चों को भी माँ-बाप के साथ एन्जॉय करने दो न |’ रमेश जी ने कहा |

    
      ‘नहीं, पापा, बढ़ा डिस्टर्ब होता है |’ सुरभि ने कहा |

   
      ‘क्या डिस्टर्ब होता है ? पार्टी में क्या आप लोग आफीशियल मीटिंग करते हैं ?’ रमेश जी ने प्रश्न किया |

    
      ‘पर अच्छा रहता है, सभी अच्छी तरह एन्जॉय कर पाते हैं’ , निलेश बोला |

         
      
        रमेश जी सोचने लगे, ‘क्या यह वास्तव में एक अच्छा  ट्रेंड है ?’ उन्होंने स्वयं से ही प्रश्न किया | प्रारंभ से ही बच्चों को अलग रखने का भाव...लगता है माँ-बाप बच्चों को बोझ समझते हैं | अपने उठने बैठने की, खाने-पीने की, गप-शाप करने की स्वतन्त्रता में बाधा | क्या बच्चे यह महसूस नहीं करते होंगे ! क्या वे यह जानने को उत्सुक नहीं रहते होंगे कि उनके माता-पिता क्या कर रहे हैं, कैसे उठ-बैठ रहे हैं,..शायद अवश्य |   परन्तु उसी प्रक्रिया को बार बार घटित होते देखकर, वही बच्चा-कंपनी को अलग-थलग रखे जाने वाले ट्रेंड को  सभी को अपनाते देख, वही उनके लिए भी एक सामान्य भाव बन् जाता है और फिर बच्चे भी माता-पिता से स्वतन्त्रता चाहने लगते हैं, उनके साथ नहीं रहना-जाना चाहते |

        
         रमेश जी बोले,’ परन्तु क्या यह आदर्श स्थिति है ...शायद नहीं |’ वे कहने लगे – हमारे बचपन में तो माता-पिता हम सब भाई-बहनों को हर जगह, मेले, शादी-विवाह, पारिवारिक या मित्रों की पार्टी –सभी जगह अपने साथ ही रखते थे | सारे मित्र, परिजन, पडौसी मिलते ही कुशल-क्षेम के साथ बच्चों के बारे में भी पूछते व उनसे वार्तालाप करते थे | शिक्षा व अन्य कलापों के बारे में जानकारी लेते व मंगल कामनाएं एवं आशीर्वाद देते थे |

          
      वे कहते गए ..इस प्रकार बच्चों का अपने परिवार, समाज, संस्कृति के अनुसार उठना-बैठना, अनुशासन, रीति-रिवाज़ आदि के बारे में प्रारंभिक ज्ञान प्राप्त होता रहता था | बड़ों से, छोटों से, साथ वालों से आदरणीयों व अभिभावकों से व सभी से उचित व्यवहार, यथा-योग्य संवाद करने का उचित तरीका व भाव सिखाने की प्राथमिक शालाएं होती थीं ये सब बातें व क्रिया-कलाप | साथ ही साथ परिजनों, प्रियजनों व स्वयं माता-पिता के  प्रति आदरभाव की उत्पत्ति भी होती थी और श्रृद्धा की भी | यद्यपि किशोर होते होते बच्चे स्वयं ही अपनी दुनिया बनाने लगते थे, स्वाभाविक तौर पर, परन्तु तब तक उनमें पारिवारिक, सामाजिक व राष्ट्रीय भाव बन् चुके होते थे जो संस्कार रूप में जीवन भर मार्ग दर्शन करते थे |  एक बात यह भी है कि इसी कारण बच्चों के साथ होने से प्रौढ़ व युवा माता-पिता भी अनर्गल बातें व व्यवहार से बचे रहते थे, और समाज में द्वेष-द्वंद्व कम होने की परम्परा बनती थी |

       ‘परन्तु आजकल तो यही ट्रेंड है’, निलेश ने कहा | ‘बच्चे आजकल अधिक होशियार होते हैं, उनमें   स्व-निर्भरता,  आत्म-विश्वास, शार्पनेस, दुनियादारी तेजी से विकसित होती है | फिर आज इतना समय भी किस के पास है | क्या अपना काम-धंधा छोडकर पहले के लोगों की भांति बस बच्चे खिलाएं तो आज की तेजी से बढती हुई दुनिया में हम पीछे नहीं रह जायेंगे |  लोगों से मिलेंगे-जलेंगे नहीं तो प्रगति कैसे करेंगे | इसके लिए हमें भी तो अपना समय चाहिए | विज्ञान के युग में हर वस्तु उपलब्ध है, हर बात का आल्टरनेटिव है | बच्चों को आत्मनिर्भरता सिखाने के लिए उन्हें स्वतन्त्रता देना भी जरूरी है |’

     हो सकता है, परन्तु आज पाश्चात्य प्रभाव वश, प्रारम्भ से ही बच्चों को पृथक बिस्तर पर सुलाना, अलग कमरा, सब कुछ उनका निजी, अलग.. |  पार्टी, शादी, क्लब, जलसों में भी बच्चा पार्टी अलग |  यह अलगाव निश्चय ही एक उन्मुक्तता, स्वच्छंद-भाव बच्चों में उत्पन्न करता है | प्रारम्भ से ही निजता, परिजनों से अलगाव, और परिणामी अहमन्यता व पारिवारिक-सामाजिक मोह –लगाव की समाप्ति | प्रेम डोर बन् ही नहीं पाती | आज विभिन्न बाल -किशोर- युवा द्वंद्वों , उच्छ्रन्खलता, अनुशासन हीनता का यही कारण है |  अलगाव के भाव-रूप द्वारा पारिवारिक सान्निध्यता, आत्मीयता, मोह का भाव पनप ही नहीं पाता | बच्चा माता-पिता के शरीर व सान्निध्य के स्नेहताप, उनके सान्निध्य की बौद्धिक क्षमता, अनुभव व ज्ञान की तेजस्विता के स्नेहिल भाव को प्राप्त ही नहीं कर पाता | परिणाम स्वरुप बच्चे माता-पिता को सिर्फ आवश्यकता पूर्ति का साधन मात्र समझने लगते  हैं | वे माता-पिता, अभिभावकों की बातें सुनने-मानने की अपेक्षा अपने मित्रों व अन्य लोगों से, टीवी, कमर्सिअल्स, सिनेमा, हीरो-हीरोइनों से, विदेशी संस्कृतिपरक मारधाड –खून खराबा वाले वीडियो गेम्स से सीखता है
जो प्राय: मूलतः अप-संस्कृति के वाहक होते हैं | वे तमाम जानने –न जानने योग्य विषयों, तथ्यों की जानकारी तो देते हैं परन्तु उनकी तार्किक उपयुक्तता व अच्छाई-बुराई के तथ्यों की प्रामाणिकता नहीं  जो बच्चों के मानस में अनिश्चितता व भ्रम की स्थिति उत्पन्न करती है एवं आगे के जीवन में द्वंद्वों का कारण बनती है |

      ‘पर पापा आप यह भी तो सोचिये कि आज धीरे धीरे आराम से काम करने का समय नहीं है अपितु वैज्ञानिक उन्नंति  के युग में तेजी से प्रगति के पथ पर चलने के लिए कुछ समझौते तो करने ही पड़ते हैं|   दुनिया से इंटरेक्शन करने व कार्य-कुशलता विकसित करने के लिए हमें भी तो अपना समय चाहिए , अपनी स्वयं की दुनिया चाहिए| ...सुरभि ने कहा |

      सही है, समझौते तो करने ही पड़ते हैं; रमेश जी बोले, “पर किस का पलडा भारी है यह देखना भी आवश्यक  है | अपनी उन्नति, भौतिक प्रगति का या अपने मनोरंजन या फिर संतति को उचित दिशा निर्देशन द्वारा समाज, संस्कृति, देश ,राष्ट्र व मानवता के सर्वांगीण उत्थान का |”







          

      

        
      

          

                                                                               



 






         




















       

8 टिप्‍पणियां:

Rakesh Kumar ने कहा…

सुन्दर चिंतन प्रस्तुत किया है आपने अपनी इस पोस्ट के माध्यम से.बच्चों और मां-बापों के बीच आज के समय में दूरियाँ बढती जा रहीं हैं.डाइनिंग टेबिल पर एक साथ बैठ कर खाने की परंपरा शायद आपसी तालमेल बढ़ाने के लिए ही विकसित हुई.ब्याह,शादी,तीज त्यौहारों आदि में साथ साथ रहना
भी अच्छी बातें हैं जिनसे बच्चों में समाज और रिश्तों
को समझने की रूचि पैदा हो सकती है.बच्चों में इन सब के लिए रूचि पैदा करने की सतत कोशिश की जानी चाहिये.
आज ही नई पोस्ट जारी की है.आपका स्वागत है.

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

सामयिक आलेख, जहाँ सारे लोग सामूहिक रूप से आनन्द उठा सकें, वही उत्सव है।

Patali-The-Village ने कहा…

बच्चों को अलग रखने से उनमें अलगाव की भावना तो पैदा होगी| बहुत ही सुन्दर भावपूर्ण अभिव्यक्ति| धन्यवाद|

Dr. shyam gupta ने कहा…

धन्यवाद राकेश जी....सही कहा ...अपने यहाँ तो एक कदम और आगे बढकर...एक ही थाली में खा लेने की परम्परा भी थी...

---धन्यवाद पांडे जी....सही व्याख्या उत्सव की

Dr. shyam gupta ने कहा…

धन्यवाद पाताली जी...

आशुतोष की कलम ने कहा…

ये हमारे पाश्चात्य जीवनशैली के अनुकरण का नतीजा है..
इसी फसल का परिणाम है ओल्ड एज होम्स
सुन्दर विषय केलिए बधाइयाँ

अरुण कुमार निगम (mitanigoth2.blogspot.com) ने कहा…

दिन को सबका टाईम-टेबल अलग-अलग होता है.कम से कम रात का खाना तो एक साथ खाया जा सकता है.

Dr. shyam gupta ने कहा…

धनयवाद आशुतोष व निगम जी....