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डा श्याम गुप्त का ब्लोग...

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Lucknow, UP, India
एक चिकित्सक, शल्य-चिकित्सक जो हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान व उसकी संस्कृति-सभ्यता के पुनुरुत्थान व समुत्थान को समर्पित है व हिन्दी एवम हिन्दी साहित्य की शुद्धता, सरलता, जन-सम्प्रेषणीयता के साथ कविता को जन-जन के निकट व जन को कविता के निकट लाने को ध्येयबद्ध है क्योंकि साहित्य ही व्यक्ति, समाज, देश राष्ट्र को तथा मानवता को सही राह दिखाने में समर्थ है, आज विश्व के समस्त द्वन्द्वों का मूल कारण मनुष्य का साहित्य से दूर होजाना ही है.... मेरी दस पुस्तकें प्रकाशित हैं... काव्य-दूत,काव्य-मुक्तामृत,;काव्य-निर्झरिणी, सृष्टि ( on creation of earth, life and god),प्रेम-महाकाव्य ,on various forms of love as whole. शूर्पणखा काव्य उपन्यास, इन्द्रधनुष उपन्यास एवं अगीत साहित्य दर्पण (-अगीत विधा का छंद-विधान ), ब्रज बांसुरी ( ब्रज भाषा काव्य संग्रह), कुछ शायरी की बात होजाए ( ग़ज़ल, नज़्म, कतए , रुबाई, शेर का संग्रह) my blogs-- 1.the world of my thoughts श्याम स्मृति... 2.drsbg.wordpres.com, 3.साहित्य श्याम 4.विजानाति-विजानाति-विज्ञान ५ हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान ६ अगीतायन ७ छिद्रान्वेषी

रविवार, 4 मार्च 2012

आज का छिद्रान्वेषण----साहित्यकार -पत्रकार ..साहित्य..कविता ------

                       ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...

(" छिद्रान्वेषण " को प्रायः एक अवगुण की भांति देखा जाता है, इसे पर दोष खोजना भी कहा जाता है...(fault finding). परन्तु यदि सभी कुछ ,सभी गुणावगुण भी ईश्वर - प्रकृति द्वारा कृत/ प्रदत्त हैं तो अवगुणों का भी कोई तो महत्त्व होता होगा मानवीय जीवन को उचित रूप से परिभाषित करने में ? जैसे-- कहना भी एक कला है, हम उनसे अधिक सीखते हैं जो हमारी हाँ में हाँ नहीं मिलाते , 'निंदक नियरे राखिये....' नकारात्मक भावों से ..... आदि आदि ... मेरे विचार से यदि हम वस्तुओं/ विचारों/उद्घोषणाओं आदि का छिद्रान्वेषण के व्याख्यातत्व द्वारा उन के अन्दर निहित उत्तम हानिकारक मूल तत्वों का उदघाटन नहीं करते तो उत्तरोत्तर, उपरिगामी प्रगति के पथ प्रशस्त नहीं करते आलोचनाओं / समीक्षाओं के मूल में भी यही भाव होता है जो छिद्रान्वेषण से कुछ कम धार वाली शब्द शक्तियां  हैं।) प्रस्तुत है  आज का छिद्रान्वेषण---

 
 १-   देखिये सामने वाले समाचार में -- हिन्दी के साहित्यकार -पत्रकार भारत की सांस्कृतिक वैविध्य बचाने के लिए काम होरहा है ...अंग्रेज़ी भाषा में ...' द कंटेसटेड ग्राउंड ऑफ़ कल्चर" विषय पर ।

----वस्तुतः आजकल हर एरा-गेरा पत्रकार , पत्रिका -मैगजीन छापने वाला भी साहित्यकार बन गया है अतः साहित्य में  कूड़े को तो आना  ही है .... हम अपना साहित्य , भाषा व संस्कृति ..अंग्रेज़ी में बहस करके बचायेंगे ??????

2--अब  कविता --कवियों  को  लें .....देखिये साथ के समाचार को.....बिना तलवार कोई सिकंदर बोलता है क्या ....जिस्म को उतार दीजिए तब किसी से प्यार कीजिए ....कोइ शायर मुहब्बत में संभालकर बोलता है क्या ..नींद के मारे हम ठहरे बंजारे...अगर मतलब साढ़े कोइ गधे को बाप कहते हैं .....
-----आप ही बताएं यह कौन सी साहित्यक भाषा है व कौन सा साहित्य है, क्या अर्थ हैं इन पंक्तियों के ....???

३- अब एक और उदाहरण देखिये पत्रकार-साहित्यकारों -समाचार पत्रों के सामाजिक दायित्व का .....निम्न चित्र में   
--------------  आपका साइज़ क्या है ...यह कौन सी भाषा है....आप ही सोचिये.....अब आगे क्या रह गया है .... क्या पैसे के लिए अब न्यूड - मैथुन-रत चित्र ..विज्ञापन ..समाचार भी खुले आम प्रकाशित होंगे पत्रों में ...?????????..... कहाँ जारहे हैं हम...हमारा साहित्य...साहित्यकार -पत्रकार ..????????

1 टिप्पणी:

Rajesh Kumari ने कहा…

अंधकार ही अंधकार दिखाई दे रहा है काल गर्त में गिरता जा रहा है हिंदी साहित्य टीवी और तथा कथित गन्दी परवर्ती के लेखकों की क्या कहें ...ये ही तो डूबा रहे हैं और इनकी हठधर्मिता तो देखिये जो इनका छिद्रनुवेशन करे अथवा आलोचना करे उसको ये कैसे आड़े हाथों लेते हैं अपने हिंदी साहित्य को बचाए रखने के लिए सुधिजनो ,हिंदी के विद्वानों को ही मिलजुल कर बीड़ा उठाना होगा |शुभकामनायें बहुत अच्छे विषय पर आलेख लिखा है |