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डा श्याम गुप्त का ब्लोग...

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Lucknow, UP, India
एक चिकित्सक, शल्य-चिकित्सक जो हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान व उसकी संस्कृति-सभ्यता के पुनुरुत्थान व समुत्थान को समर्पित है व हिन्दी एवम हिन्दी साहित्य की शुद्धता, सरलता, जन-सम्प्रेषणीयता के साथ कविता को जन-जन के निकट व जन को कविता के निकट लाने को ध्येयबद्ध है क्योंकि साहित्य ही व्यक्ति, समाज, देश राष्ट्र को तथा मानवता को सही राह दिखाने में समर्थ है, आज विश्व के समस्त द्वन्द्वों का मूल कारण मनुष्य का साहित्य से दूर होजाना ही है.... मेरी दस पुस्तकें प्रकाशित हैं... काव्य-दूत,काव्य-मुक्तामृत,;काव्य-निर्झरिणी, सृष्टि ( on creation of earth, life and god),प्रेम-महाकाव्य ,on various forms of love as whole. शूर्पणखा काव्य उपन्यास, इन्द्रधनुष उपन्यास एवं अगीत साहित्य दर्पण (-अगीत विधा का छंद-विधान ), ब्रज बांसुरी ( ब्रज भाषा काव्य संग्रह), कुछ शायरी की बात होजाए ( ग़ज़ल, नज़्म, कतए , रुबाई, शेर का संग्रह) my blogs-- 1.the world of my thoughts श्याम स्मृति... 2.drsbg.wordpres.com, 3.साहित्य श्याम 4.विजानाति-विजानाति-विज्ञान ५ हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान ६ अगीतायन ७ छिद्रान्वेषी

मंगलवार, 6 मार्च 2012

आज होली है ---ग़ज़ल..डा श्याम गुप्त ...


                               ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...

बहारों की लहर डोली कि आज होली है ।         
रंग उडाती घूमे टोली कि आज होली है ।

रंग बिखराए थे सब और ही फिजाओं ने,
फगुनाई पवन बोली कि आज होली है ।

ढोलक की थाप पर थिरकते थे सभी लोग,
भीगे तन-मन लगी रोली कि आज होली है ।

उड़ता था हवाओं में अबीर-गुलाल का नशा ,
सकुचाये कसी चोली कि आज होली है ।

बौराई सी घूमे वो नयी नवेली दुल्हन, 
घर भर को चढी ठिठोली कि आज होली है ।,


ख्यालों में उनके हम तो खोये थे इस कदर,
कानों खबर न डोली  कि आज होली है ।


चुपके से  बोले, आज तो रंग लीजिये हुज़ूर,
मिसरी सी कानों घोली कि आज होली है ।

इतरा मल दिया जब मुख पर गुलाल श्याम,
तन मन खिली रंगोली कि आज होली है ।।  
                                                                                       -----   चित्र-गूगल साभार                                                             --
 



6 टिप्‍पणियां:

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

होली की ढेरों शुभकामनायें..

veerubhai ने कहा…

रंग बिखराए थे सब और ही फिजाओं ने,
फगुनाई पवन बोली कि आज होली है ।
डॉ .साहब यहाँ 'और 'के स्थान पर 'ओर'की गुंजाइश नहीं है ?कृपया गौर करें -

बुरा न माने होली है ,रंगों की बरजोरी है ,

सखियन बीच ठिठोली है ,

मतवालों की टोली है ,

नीयत किसी की डोली है ....बुरा न मानो होली है .

होली पर्व की शुभकामनाएँ .

veerubhai ने कहा…

इस रचना का हरेक बंद अपना कसाव ओर आकर्षण लिए है .
रंग बिखराए थे सब और ही फिजाओं ने,
फगुनाई पवन बोली कि आज होली है ।
ढोलक की थाप पर थिरकते थे सभी लोग,
भीगे तन-मन लगी रोली कि आज होली है ।
उड़ता था हवाओं में अबीर-गुलाल का नशा ,
सकुचाये कसी चोली कि आज होली है ।
भिगो दिया आपने होली के रंग में तन मन ...
होली शुभ हो !मगल्मय आनंद मय हो .

Dr. shyam gupta ने कहा…

धन्यवाद पान्डे जी.. शुभ होली.....

----धन्यवाद वीरूभाई...मनोयोग से पढने के लिये...वास्तव में ही यहां ’ओर ’ होना चाहिये...
होली की शुभ कामनायें....

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
रंगों की बहार!
छींटे और बौछार!!
फुहार ही फुहार!!!
होली का नमस्कार!
रंगों के पर्व होलिकोत्सव की हार्दिक शुभकामनाएँ!!!!

Dr. shyam gupta ने कहा…

धन्यवाद शास्त्री जी...
रंगों के पर्व हार्दिक शुभकामनाएँ!!!!