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डा श्याम गुप्त का ब्लोग...

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Lucknow, UP, India
एक चिकित्सक, शल्य-चिकित्सक जो हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान व उसकी संस्कृति-सभ्यता के पुनुरुत्थान व समुत्थान को समर्पित है व हिन्दी एवम हिन्दी साहित्य की शुद्धता, सरलता, जन-सम्प्रेषणीयता के साथ कविता को जन-जन के निकट व जन को कविता के निकट लाने को ध्येयबद्ध है क्योंकि साहित्य ही व्यक्ति, समाज, देश राष्ट्र को तथा मानवता को सही राह दिखाने में समर्थ है, आज विश्व के समस्त द्वन्द्वों का मूल कारण मनुष्य का साहित्य से दूर होजाना ही है.... मेरी दस पुस्तकें प्रकाशित हैं... काव्य-दूत,काव्य-मुक्तामृत,;काव्य-निर्झरिणी, सृष्टि ( on creation of earth, life and god),प्रेम-महाकाव्य ,on various forms of love as whole. शूर्पणखा काव्य उपन्यास, इन्द्रधनुष उपन्यास एवं अगीत साहित्य दर्पण (-अगीत विधा का छंद-विधान ), ब्रज बांसुरी ( ब्रज भाषा काव्य संग्रह), कुछ शायरी की बात होजाए ( ग़ज़ल, नज़्म, कतए , रुबाई, शेर का संग्रह) my blogs-- 1.the world of my thoughts श्याम स्मृति... 2.drsbg.wordpres.com, 3.साहित्य श्याम 4.विजानाति-विजानाति-विज्ञान ५ हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान ६ अगीतायन ७ छिद्रान्वेषी

बुधवार, 8 फ़रवरी 2017

श्याम स्मृति-१.यह भारत देश है मेरा -------..डा श्याम गुप्त ...

                         ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...


                           श्याम स्मृति-१.यह भारत देश है मेरा -------..

--- मेरी शीघ्र प्रकाश्य --कृति---श्याम स्मृति से ------

                { इस कृति की रचना के मूल में प्रथमबार ब्लॉग बनाते हुए मेरे पुत्र निर्विकार पंकज श्याम द्वारा सुझाए गए ब्लॉग शीर्षक...The world of my thoughts...---- My myriad thoughts, personal interpretations and their relevance....के शब्द व वाक्य ही हैं, जो आज हिन्दी ब्लोग्स जगत में..... श्याम स्मृति The world of my thoughts...श्याम गुप्त का चिट्ठा ----मेरे विचारों की दुनियां -मेरे अपने विचार एवं उन पर मेरा स्वयं का व्याख्या-तत्व तथा उनका समयानुसार महत्व....के नाम से जाना जाता है|

---------हाँ इसकी पृष्ठभूमि में भाई-बहन, सखा-सखी, पत्नी, स्कूल-कालिज के साथी-सहपाठी, चिकित्सा-महाविद्यालय के साथी-सहपाठी, चिकित्सकीय सेवा में वरिष्ठ-जन, कनिष्ठ सहयोगी, वरिष्ठ चिकित्सक गण, सहयोगी कवि-साहित्यकार एवं प्रशंसकगण आदि द्वारा समय-समय पर की गयीं टीका-टिप्पणियाँ ....”...जाने कहाँ कहाँ तक सोचते रहते हो... कब तक यूंही सोचते रहोगे दूसरों के लिए.... यूं तो मुझे भी भूल जाओगे इसी तरह......बड़े विचित्र ख्यालों वाला व्यक्ति है ....जाने क्या-क्या उल-जुलूल सोचते रहते हो यार?....ये बड़े-बड़े विचित्र से विचार कहाँ से आते हैं तुम्हारे खुराफाती दिमाग में......ही इज द मैन ऑफ़ प्रिंसिपल्स....ये तो हमारा काम करेगा ही नहीं.....जाने किन ख्यालों में खोये रहते हो हरदम, समय पर कुछ याद ही नहीं रहता, जरूरी काम भूल जाते हो .... ये तो खाना खाने के बाद यह भी नहीं बता पाता कि नमक था भी या नहीं....तुम सर्जरी मत लेना, तुम भूलते बहुत हो.... आपके लिए तो ‘आउट आफ साईट आउट आफ माइंड’ ही होता है सबकुछ....” जैसे आप कभी किसी का पक्ष नहीं लेते और लोग एसे नहीं होते.... आपके पास कहाँ से ख्याल आते हैं कविता-कहानी-उपन्यास लिखने के लिए...आपकी प्रेरणा कौन है....कौन किसकी प्रेरणा है? ...आदि आदि ...”... भी हैं |

------ और अंत में मनुस्मृति पर अध्ययन-मनन करते हुए एवं ‘आधुनिक-मनुस्मृति’ शीर्षक से कुछ अगीत काव्य-रचनाये ब्लॉग पर प्रकाशित करते हुए, ब्लॉग के उपरोक्त शीर्षक पर ध्यान गया और एक दिन अचानक ही यह विचित्र विचार मन में उद्भूत हुआ कि क्यों न अपने ये विभिन्न विचित्र विचारों के संकलन द्वारा मनुस्मृति की भांति...’आधुनिक-मनुस्मृति’ की रचना की जाय | जो परिवर्ती विचार द्वारा आज ‘श्यामस्मृति’ नाम से आपके सम्मुख प्रस्तुत है |

----- प्रस्तुत कृति ‘श्याम-स्मृति’ ..मेरी स्मृति में आये हुए विविध विषयक विचार, उपरोक्त टिप्पणियों, टीकाओं, समीक्षाओं, आपसी-वार्ताओं, मंचीय-वार्ताओं, कथनों, गोष्ठियों, सभाओं, वक्तव्यों, संभाषणों, साक्षात्कारों आदि में व्यक्त हुए मेरे स्वतंत्र विचारों के साथ ही विभिन्न आलेखों, कथाओं, रचनाओं, कविताओं, ब्लॉग-पोस्टों, स्वयं द्वारा की गयी टिप्पणियों, वाद-विवाद, बहस आदि में व्यक्त किये गए स्वतंत्र विचार, नवीन चिंतनयुक्त स्थापनाओं का संग्रह है | }


श्याम स्मृति-१.यह भारत देश है मेरा .

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-----यह भारतीय धरती व वातावरण का ही प्रभाव है कि मुग़ल जो एक अनगढ़, अर्ध-सभ्य, बर्बर घुडसवार आक्रमणकारियों की भांति यहाँ आये थे वे सभ्य, शालीन, विलासप्रिय, खिलंदड़े, सुसंस्कृत लखनवी -नजाकत वाले लखनऊआ नवाब बन गए | अक्खड-असभ्य जहाजी, सदा खड़े-खड़े, भागने को तैयार, तम्बुओं में खाने-रहने वाले अँगरेज़, महलों, सोफों, कुर्सियों को पहचानने लगे |

------यह वह देश है जहां प्रेम, सौंदर्य, नजाकत, शालीनता, इसकी संस्कृति, में रचा-बसा है, इसके जल में घुला है, वायु में मिला है और खेतों में दानों के साथ बोया हुआ रहता है | प्रेम-प्रीति यहाँ की श्वांस है और यहाँ की हर श्वांस प्रेम है |

                  यह पुरुरवा-उर्वशी  का, कृष्ण का, रांझे का, शाहजहां का और ताजमहल का देश है | जहां विश्व में मानव-सृष्टि के सर्वप्रथम काव्य ऋग्वेद में संदेशित है ---

"मा विदिष्वावहै"...किसी से भी विद्वेष न करें ........एवं

"समानी अकूती समानि हृदयानि वा
समामस्तु वो मनो यथा वै सुसहामती|"

.....हम सबके मन, ह्रदय व कृतित्व सहमति व समानता से परिपूर्ण हों|







  

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