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डा श्याम गुप्त का ब्लोग...

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Lucknow, UP, India
एक चिकित्सक, शल्य-चिकित्सक जो हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान व उसकी संस्कृति-सभ्यता के पुनुरुत्थान व समुत्थान को समर्पित है व हिन्दी एवम हिन्दी साहित्य की शुद्धता, सरलता, जन-सम्प्रेषणीयता के साथ कविता को जन-जन के निकट व जन को कविता के निकट लाने को ध्येयबद्ध है क्योंकि साहित्य ही व्यक्ति, समाज, देश राष्ट्र को तथा मानवता को सही राह दिखाने में समर्थ है, आज विश्व के समस्त द्वन्द्वों का मूल कारण मनुष्य का साहित्य से दूर होजाना ही है.... मेरी तेरह पुस्तकें प्रकाशित हैं... काव्य-दूत,काव्य-मुक्तामृत,;काव्य-निर्झरिणी, सृष्टि ( on creation of earth, life and god),प्रेम-महाकाव्य ,on various forms of love as whole. शूर्पणखा काव्य उपन्यास, इन्द्रधनुष उपन्यास एवं अगीत साहित्य दर्पण (-अगीत विधा का छंद-विधान ), ब्रज बांसुरी ( ब्रज भाषा काव्य संग्रह), कुछ शायरी की बात होजाए ( ग़ज़ल, नज़्म, कतए , रुबाई, शेर का संग्रह), अगीत त्रयी ( अगीत विधा के तीन महारथी ), तुम तुम और तुम ( श्रृगार व प्रेम गीत संग्रह ), ईशोपनिषद का काव्यभावानुवाद .. my blogs-- 1.the world of my thoughts श्याम स्मृति... 2.drsbg.wordpres.com, 3.साहित्य श्याम 4.विजानाति-विजानाति-विज्ञान ५ हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान ६ अगीतायन ७ छिद्रान्वेषी ---फेसबुक -डाश्याम गुप्त
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मंगलवार, 14 अगस्त 2018

आर्यावर्त का प्रथम संघर्ष और यवन, मलेच्छ अनार्यों व दस्यु जातियों का उद्भव ---डा श्याम गुप्त

                           ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...



                          

आर्यावर्त का प्रथम संघर्ष और यवन, मलेच्छ अनार्यों व दस्यु जातियों का उद्भव ---
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देवासुर संग्रामों की समाप्ति पर, बलि-बामन संधि द्वारा असुरों के पाताल गमन पर भरतखंड में उत्तर व दक्षिण के उन्नत मानवों के महासमन्वय ( शिव--इंद्र -विष्णु ) के उपरांत स्थापित वैदिक संस्कृति-सभ्यता का उदय हुआ, जो अपने मानवीयता जन आचरण, शौर्य, ज्ञान-विज्ञान, सामाजिकता, व्यवहारिकता, धर्म, अध्यात्म, दर्शन के उच्चतम स्वरुप के कारण मानव सभ्यता की सर्वश्रेष्ठ संस्कृति हुई |
------- यही लोग स्वयं को आर्य अर्थात श्रेष्ठजन कहने लगे एवं ‘कृण्वन्तो विश्वं आर्यम..’ के घोष के साथ विश्व भर में फैलते गए | जम्बू द्वीप, भरतखंड, भारतवर्ष, ब्रह्मावर्त, आर्यावर्त इन्ही लोगों ने बसाए |
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बुराई सदैव ही रूप-भाव बदल बदल कर समाज को विश्रन्खलित करने का प्रयत्न करती रहती है | राम से समय से ही वैदिक –संस्कृति के विरोध की धाराएं प्रतिबिम्वित होने लगी थीं, यथा जाबालि का नास्तिकवाद | इसी क्रम में अनैतिक कृतित्वों का समर्थन एवं वैदिक संस्कृति का विरोध करने वाले लोग अनार्य या दस्यु कहलाये जाने लगे |
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इस प्रकार वैदिक काल में भारतीय सभ्यता का विस्तार दुनिया के सभी देशों में था जिसे जम्बूद्वीप कहा जाता है | लोग विभिन्न जातियों, जनजातियों व कबीलों में बंटे थे। उनके प्रमुख राजा कहलाते थे, बीतते समय के साथ-साथ उनमें अपनी सभ्यता व राज्य विस्तार की भावना बढ़ी और उन्होंने युद्ध और मित्रता के माध्यम से खुद का चतुर्दिक विस्तार का प्रयास किया।
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और इस क्रम में कई जातियां, जनजातियां और कबीलों का लोप सा हो गया। एक नई सभ्यताओं और संस्कृतिओं का उदय हुआ। भरतखंड, भारतवर्ष, ब्रह्मावर्त, आर्यावर्त आदि बसते गए | सूर्यवंश , चन्द्रवंश, महाराजा पृथु, भारत, इक्ष्वाकु, ययाति आदि के वंशज जम्बू द्वीप, भरतखंड भारतवर्ष , आर्यावर्त आदि नाम से विभिन्न क्षेत्रों में राज्य करते रहे |
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राम-वशिष्ठ काल वर्णन के अनुसार उस काल में भारतवर्ष में रामवंशी लव, कुश, बृहद्वल, निमिवंशी शुनक और ययाति वंशी यदु, अनु, पुरु, दुह्यु, तुर्वसु का भारतवर्ष के विभिन्न क्षेत्रों में राज्य था|
------यही काल मूलतः आर्य काल कहलाता है, इसी काल में भारतवर्ष को आर्यावर्त नाम दिया गया |
-------आर्यों के काल में जिन वंश का सबसे ज्यादा विकास हुआ, वे हैं- यदु, तुर्वसु, द्रुहु, पुरु और अनु।
-------उक्त पांचों से विभिन्न राजवंशों --यदु से यादव, तुर्वसु से यवन, द्रुहु से भोज, अनु से मलेच्छ और पुरु से पौरव का निर्माण हुआ। जो पुनः पृथ्वी के विभिन्न भागों में फ़ैले | इनके काल को ही आर्यों का काल कहा जाता है। l
प्रथम आर्य संघर्ष --
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ऋग्वेद से पता चलता है कि हरियूपिया नामक स्थान पर याब्यावती नदी ( हरहवती, हव्यवती, सरस्वती ) के तट पर तुर्वश और बीचवृन्त तथा श्रृजंयो के बीच संघर्ष हुआ। हरियूपिया की पहचान हड़प्पा से की जाती है। इस युद्ध में श्रृंजयों की विजय हुई यही संघर्ष आगे बढ़कर दसराज्ञ युद्ध में बदल गया।
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इस क्रम में भारतीय उपमहाद्वीप का पहला दूरगामी असर डालने वाला युद्ध बना दसराज्ञयुद्ध इस युद्ध ने न सिर्फ आर्यावर्त को बड़ी शक्ति के रूप में स्थापित कर दिया बल्कि राजतंत्र के पोषक महर्षि वशिष्ट की लोकतंत्र के पोषक महर्षि विश्वामित्र पर श्रेष्ठता भी साबित कर दी।
------- उस काल में राजनीतिक व्यवस्था गणतांत्रिक समुदाय से परिवर्तित होकर राजाओं पर केंद्रित होती जारही थी। दाशराज्ञ युद्ध में भरत कबीला राजा प्रथा आधारित था जबकि उनके विरोध में खड़े कबीले लगभग सभी लोकतांत्रिक थे|
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दसराज्ञ युद्ध -
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अधिकाँश हम राम–रावण एवं महाभारत के युद्धों की विभीषिका से ही परिचित हैं, परन्तु इस बात से अनभिज्ञ हैं कि राम-रावण युद्ध से भी पूर्व संभवतः 7200 ईसा पूर्व त्रेतायुग के अंत में एक महायुद्ध हुआ था जिसे दशराज युद्ध (दाशराज्ञ युद्ध ) के नाम से जाना जाता है।
---- ( यद्यपि राम के काल में यवनों, म्लेक्षों, यादवों, भोज आदि का वर्णन नहीं है, महाभारत काल में है अतः निश्चय ही यह युद्ध राम-रावण युद्ध के पश्चात हुआ होगा )
-------यह आर्यावर्त का सर्वप्रथम भीषण युद्ध था जो आर्यावर्त क्षेत्र में आर्यों के बीच ही हुआ था। प्रकारांतर से इस युद्ध का वर्णन दुनिया के हर देश और वहां की संस्कृति में आज भी विद्यमान हैं। इस युद्ध के परिणाम स्वरुप ही मानव के विभिन्न कबीले भारत एवं भारतेतर दूरस्थ क्षेत्रों में फैले व फैलते गए |
----- एक मत के अनुसार माना जाता है कि यह युद्ध त्रेता के अंत में राम-रावण युद्ध के 150 वर्ष बाद हुआ था। क्योंकि हिन्दू काल वर्णन में चौथा काल : राम-वशिष्ठ काल वर्णन के अनुसार रामवंशी लव, कुश, बृहद्वल, निमिवंशी शुनक और ययाति वंशी यदु, अनु, पुरु, दुह्यु, तुर्वसु का राज्य महाभारतकाल तक चला और फिर हुई महाभारत।
------दासराज युद्ध को एक दुर्भाग्यशाली घटना कहा गया है। इस युद्ध में इंद्र और वशिष्ट की संयुक्त सेना के हाथों विश्‍वामित्र की सेना को पराजय का मुंह देखना पड़ा। दसराज युद्ध में इंद्र और उसके समर्थक विश्‍वामित्र का अंत करना चाहते थे। विश्‍वामित्र को भूमिगत होना पड़ा। दोनों ऋषियों का देवों और ऋषियों में सम्मान था, दोनों में धर्म और वर्चस्व की लड़ाई थी।
------ इस लड़ाई में वशिष्ठ के 100 पुत्रों का वध हुआ। फिर डर से विश्वामित्र के 50 पुत्र तालजंघों (हैहयों) की शरण में जाकर उनमें मिलकर म्लेच्छ हो गए। तब हार मानकर विश्वामित्र वशिष्ठ के शरणागत हुए और वशिष्ठ ने उन्हें क्षमादान दिया। वशिष्ठ ने श्राद्धदेव मनु (वैवस्वत) 6379 वि.पू. को परामर्श देकर उनका राज्य उनके पुत्रों को बंटवाकर दिलाया।
---- दासराज्ञ युद्ध ---- परुष्णी (रावी) नदी के किनारे हुआ जिसका उल्लेख ऋग्वेद के सातवें मण्डल में है | भरत वंश (त्रित्सु वंश) के राजा सुदास के पुरोहित विश्वामित्र थे सुदास ने विश्वामित्र की जगह वशिष्ठ को अपना पुरोहित बना लिया, फलस्वरूप विश्वामित्र ने दस जनों को इकठ्ठा कर सुदास के विरूद्ध युद्ध कर दिया परन्तु विजय सुदास को ही मिली इस दस-जनों में पंच जन का नाम विशेष रूप से उल्लेख है-पुरु, यदु, अनु द्रुहा तुर्वश तथा अन्य में अलिन, पक्थ भलानस, विषाणी, शिव। दस राज्ञ युद्ध में दोनों तरफ से आर्य एवं अनार्यों ने भाग लिया था।
------ इस युद्ध में सुदास के भरतों की विजय हुई और उत्तर भारतीय उपमहाद्वीप के आर्यावर्त पर उनका अधिकार स्थापित हो गया।
------इस देश का नाम भरतखंड एवं इस क्षेत्र को आर्यावर्त कहा जाता था |
परन्तु
*********इस युद्ध के कारण आगे चलकर पूरे देश का नाम ही आर्यावर्त की जगह 'भारत' पड़ गया तथा === यवन, ==मलेच्छ ===अनार्यों व दस्यु जातियों का उद्भव ===हुआ जो विभिन्न कारणों से अधिकाँशतः भारत के बाहर जाकर बसते गए |******

महाभारत युद्ध --
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रामचंद्र के युग के बाद – राक्षस एवं असुरों की संगठित राजनैतिक शक्ति का पूर्ण पराभव होगया | केवल छुट-पुट स्थानों आदि पर ही उनका वर्चस्व रह गया | यवन व म्लेक्ष अधिकाँश भारत से बाहर जाकर बस गए |
-----अतः यादवों और पौरवों ने पुन: एक बार फिर अपने पुराने गौरव के अनुरूप आगे बढ़ना शुरू कर दिया। मथुरा से द्वारिका तक यदुकुल फैल गए और अंधक, वृष्णि, कुकुर और भोज उनमें मुख्य हुए। कृष्ण उनके सर्वप्रमुख प्रतिनिधि थे।
------ संवरण के कुल के कुरु ने पांचाल पर अधिकार कर लिया | कुरु के नाम से कुरु वंश प्रसिद्ध हुआ, राजा कुरु के नाम पर ही सरस्वती नदी के निकट का राज्य कुरुक्षेत्र कहा गया। उस के वंशज कौरव कहलाए और आगे चलकर दिल्ली के पास इन्द्रप्रस्थ और हस्तिनापुर उनके दो प्रसिद्ध नगर हुए। ------भाई भाइयों, कौरवों और पांडवों का विख्यात महाभारत युद्ध पुनः एक बार भारतीय इतिहास की विनाशकारी घटना सिद्ध हुआ।


 

शनिवार, 10 मार्च 2018

भारतीय धर्म, दर्शन राष्ट्र -संस्कृति के विरुद्ध उठती नवीन आवाजें व उनका यथातथ्य निराकरण ---पोस्ट तीन --डा श्याम गुप्त ....

                           ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ... 



 भारतीय धर्म, दर्शन राष्ट्र -संस्कृति के विरुद्ध उठती हुई नवीन आवाजें व उनका यथातथ्य निराकरण --- डा श्याम गुप्त  ---
-----   एक धारावाहिक क्रमिक आलेख--पोस्ट तीन ------

 आजकल हमारे देश में गोंड आदिवासी दर्शन और बहुजन संस्कृति व महिषासुर के नाम पर एक नवीन विरोधी विचारधारा प्रश्रय पा रही है जिसे महिषासुर विमर्श का नाम दिया जारहा है |
-------- जिसमें जहां सारे भारत में समन्वित समाज की स्थापना के साथ धर्मों व प्राचीन जातियों आदि का अस्तित्व नहीं के बरावर रह गया था, अब असुर, नाग, गोंड आदि विभिन्न जातियों वर्णों को उठाया जा रहा है |
--------- भ्रामक विदेशी ग्रंथों आलेखों में आर्यों को भारत से बाहर से आने वाला विदेशी बताये जाने के भारत में फूट डालने वाले षडयन्त्र से भावित-प्रभावित वर्ग द्वारा इंद्र, आदि देवों को आर्य एवं शिव व अन्य तथाकथित असुर व नाग, गोंड आदि जातियों भारत की मूल आदिवासी बताया जा रहा है | वे स्वयं को हिन्दू धर्म में मानने से भी इनकार करने लगे हैं
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---------यहाँ विभन्न आलेखों, कथनों, प्रकाशित पुस्तकों में उठाये गए भ्रामक प्रश्नों व विचारों, कथनों का हम एक एक करके उचित समाधान प्रस्तुत करेंगे जो ***** ४० कथनों-समाधानों एवं उपसंहार के रूप में *****प्रस्तुत किया जाएगा, विभिन्न क्रमिक ११ आलेख-पोस्टों द्वारा ----

 आगे ---पोस्ट तीन --- कथन/समाधान  ११ से १४ तक--


कथन ११---इस विषय में आचार्य रजनीश नामक एक विवादास्पद भारतीय धर्मगुरु ने कहा है कि---भारतीय कालगणना रेखीय नहीं बल्कि चक्रीय है इसलिए समय भी अनंत है और जीवन सहित समाज मे घटित होने वाली घटनाएँ भी अनंत हैं इसीलिये इनका लेखन व्यर्थ है। उनके अनुसार मिथक असल में इतिहास का नहीं बल्कि समाज मनोवैज्ञानिक अर्थ में महत्वपूर्ण शिक्षाओं और प्रवृत्तियों का संकलन है। --- उनका यह कहना बहुत सूचक है। भारत का हर परलोकवादी धर्मगुरु इसी भाषा में बात करता है। यह वक्तव्य देते हुए वे बिलकुल परम्परागत धर्मगुरुओं की तरह बात कर रहे हैं और असल में इस एक वक्तव्य से समाज में बदलाव की संभावना का सूत्र बन सकने वाले इतिहास बोध की ह्त्या भी कर रहे हैं। यही काम उनकी श्रेणी के हर धर्मगुरु ने बार बार किया है। इसीलिये  रजनीश जैसे इतने बड़े दार्शनिक और रहस्यवादी इस समाज में पैदा होते रहने के बावजूद इस देश के मौलिक विभाजक और भेद भाव मूलक चरित्र में कभी  बुनियादी बदलाव या क्रान्ति नहीं हुई।– बल्कि इसके विपरीत रहस्यवाद और परलोक की प्रशंसा में छुपाकर समाज की जमीनी मांगों को छुपाया गया है। इस प्रकार न सिर्फ इतिहास बोध से वृहत्तर न्यायबोध की ह्त्या होती है बल्कि इसी के सहारे सभी क्रांतियों की संभावना भी नष्ट हो जाती है।

समाधान११--- और यही तो आवश्यक तत्व है किसी धर्म, समाज या देश, संस्कृति के इतिहास, उसकी सत्यता एवं इतिहास बोध का,  बुनियादी बदलाव व क्रांतियाँ ----अवैज्ञानिक,  अनुभवहीन,  संवेदना-सत्यता हीन अस्थिर. कच्ची नींव वाले समाज व देशों में हुआ करती हैं, स्थिर व सुसंस्कृत समाज-राष्ट्रों में नहीं | इसीलिये तो इस समाज-देश में इतने बड़े दार्शनिक धर्म गुरु पैदा होते रहे हैं जो अन्य देशों-समाज में न के बराबर हैं| 
        यहाँ समाज की जमीनी मांगें सदैव ही राज्य द्वारा पूरी होती रहीं, पौराणिक व आधुनिक इतिहास गवाह है कि जन जन संतुष्टि की भावना सहित न्यायपूर्ण खुशहाली जीवन जीते थे अतः किसी न्यायबोध व क्रान्ति की आवश्यकता ही नहीं पड़ी |
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कथन १२-सामान्य रहस्यवादी परम्पराओं या हवा हवाई बातें करने वाले धर्मगुरु और धर्म भीरुओं की तरफ से आने वाली ऐसी प्रशंसाओं के प्रभाव में हम अगर मिथक को देखेंगे तो कुछ भी स्पष्ट नहीं होगा। ब्राह्मणी धर्म से प्रभावित विद्वान् और उनके विमर्श की दिशा को सम्मान देने वाले लोगों की मानकर चलेंगे तो हम मिथक और इतिहास के इस द्वंद्व में से कोई भी सार्थक बात नहीं निकाल सकेंगे। लेकिन अगर हम आर्य आक्रमण थ्योरी और जन्मना वर्ण व्यवस्था सहित जन्मना जाति व्यवस्था को स्वीकार करते हैं, तभी हम इस रहस्य को सुलझा सकते हैं अन्यथा हम इसे नहीं सुलझा सकते। --
समाधान १२-  स्वदेशी विद्वानों व तथ्यों की अपेक्षा विदेशी तथ्यों पर आधारित बातों को मानने पर क्या हमें राष्ट्र-संस्कृति द्रोह की गंध नहीं आती | 
--------आज आर्य आक्रमण थ्योरी मान्य नहीं रही है अपितु आर्यों का मूल देश भारत थ्योरी मान्य होचली है | आपके द्वारा ही विवादास्पद व महान कहे जाने वाले धर्म गुरुओं की बाते हवा हवाई क्यों होंगीं और नए नए ज्ञान प्राप्त विदेशियों की बात सत्य क्यों होगी , क्या यह मानसिक दिवालियापन नहीं है |
------ वर्ण व्यवस्था भी जन्मना कहाँ है इस समाज में आप केवल कुछ सौ वर्षों की बात क्यों करते हैं जब विदेशियों के षडयंत्रों से आप सब प्रभावित थे व हैं|  
-------मूल भारतीय धर्म में जातिप्रथा जन्मना कहाँ है चातुर्वर्ण्य मया सृष्टा गुणकर्म विभागश;...को आप नहीं समझ पाते हैं क्या |
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कथन १३- डॉ. अंबेडकर (1970)की रिसर्च भी जिस तरफ इशारा करती है वह यही बतलाती है कि इस देश की मूल परम्परा और मूल शासकों को धीरे धीरे शिक्षा और व्यापार से वंचित करके समाज के सबसे निचले स्तर पर धकेला गया है। सामान्य सा तर्क है कि अगर इतिहास में एक संस्कृति और एक ही दर्शन का सातत्य है तो फिर इतिहास लिखना न केवल आसान होगा बल्कि जरुरी भी होगा। लेकिन अगर ये इतिहास किसी एक संस्कृति का नहीं बल्कि आप में लड़ रही अनेकों संस्कृतियों का बिखरा इतिहास है तो इस इतिहास का लेखन बहुत सेलेक्टिव ढंग से होगा। अगर इमानदारी से और सैनिक बल से विजय प्राप्त करके पराजित संस्कृति को नष्ट किया गया है तो उस विजय को अपनी गाथाओं में ज़िंदा रखा जाएगा।  लेकिन अगर प्रतियोगी या मूलनिवासी संस्कृति को छल से और कपटपूर्वक मनोवैज्ञानिक उपायों से नष्ट किया गया है तो उसका इमानदार इतिहास लिखना बहुत मुश्किल होगा। ये इतिहास लेखन असल में विजेताओं ही को दुष्ट और धूर्त साबित करेगा। इसलिए ऐसे विजेताओं ने भारत में कभी इतिहास लिखा ही नही और जो मूलनिवासी जनों का इतिहास किसी अर्थ में उपलब्ध था उसे भी मिथकीय आख्यानों की बाढ़ में बहाकर गायब कर दिया।

समाधान १३--- भारतीय संस्कृति एक उत्तरोत्तर विकासमान संस्कृति है कोई एक ही दर्शन (या पुस्तक या मनुष्य, देवदूत आदि ) से सातत्य कठपुतली संस्कृति नहीं है | 
       यह विभिन्न संस्कृतियों के समन्वय से उत्तरोत्तर प्रगतिमान संस्कृति है, जिसमें युद्ध भी हुए हैं एवं शांतिपूर्ण समायोजन भी | पुरा ( = या पराजित ) संस्कृति की अपेक्षा नवीन ( =या विजेता ) संस्कृति यदि अधिक वैज्ञानिक,  नवोन्मेष युत,  विक्सित होगी तो संस्कृतियों का अवश्य ही विलय ( समायोजन दोनों संस्कृतियों की अच्छी बातें का विलय ) होगा एवं तलवार के बल या छल-बल के आवश्यकता नहीं होगी | यदि दोनों संस्कृतियाँ विक्सित होती हैं तो अवश्य ही समन्वय होगा जैसा भारतीय विभिन्न संस्कृतियों में हुआ |
      लिखा हुआ इतिहास कभी सत्य नहीं होता अपितु सामयिक शासन, सत्ता के हाथों की कठपुतली होता है |  गाथाएँ सामान्य जन जन द्वारा रचित व घटना आधारित इतिहास होती हैं, क्योंकि सामान्य जन राजनीति में भाग नहीं लेते अतः वे ईमानदार होती हैं और भविष्य को प्रेरित करती हैं। 
       इसीलिये भारतीय पौराणिक इतिहास-गाथाओं में इंद्र, राम, कृष्ण आदि की विजय गाथाएँ समस्त विश्व व भारत के कोने कोने में सदैव ज़िंदा हैं और भविष्य की प्रेरणाएं हैं | क्योंकि वहां समन्वय था छल की कोई संभावना ही नही थी | तभी तो आज भी भारत के कोने कोने में विभिन्नता होते हुए भी व्यवहारिक सभ्यता व संस्कृति एक ही है, एक ही रीति रिवाज़, त्यौहार, धर्म-कर्म, एक ही ईश्वर, देवी-देवता, रहन सहन के तरीके | 
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  कथन -१४- भारत में जिन आततायी लोगों और संस्कृति ने मूलनिवासी संस्कृति को छलपूर्वक नष्ट किया है वह उन्होंने मनोवैज्ञानिक और धार्मिक षड्यंत्रों द्वारा नष्ट किया है (Keer, Malase and Phadake (eds.), 2006) |  और अपने मिथकों में इस बात के संकेत जरुर छोड़े हैं कि वे कितने अन्यायी, धूर्त और कपटी थे। मूलनिवासी शूरवीरों के खिलाफ अपनी सुन्दर कन्याओं और स्त्रियों का कपटपूर्वक इस्तेमाल किया । इस तरह उन्होंने न केवल मूलनिवासियों के प्रति घृणित व कायरतापूर्ण षड्यंत्र रचे हैं बल्कि अपनी स्त्रियों सहित अन्य स्त्रियों की उनकी दृष्टि में क्या उपयोगिता रही है इसे भी बार-बार स्पष्ट किया है।
     विष्णु द्वारा मोहिनी रूप धारण करके देवों और असुरों की साझी मेहनत से उपजे अमृत को किस तरह असुरों से छीनकर देवों को पिला दिया गया था यह आर्यों के मिथक साहित्य में बहुत सामान्य बात है (Williams, 2003)
     इसी तरह इंद्र हर बार किसी तेजस्वी तपस्वी से भयभीत होकर उसके तप को भंग करने के लिए अप्सराओं को भेजता है। इंद्र पहले अन्य सब तरह के उपाय करके थक जाने पर अप्सराओं या स्त्रियों को इस्तेमाल करता है। इस तरह देखें तो स्त्रियाँ ही इंद्र का या आर्यों का ब्रह्मास्त्र रही हैं। देवताओं के राजा इंद्र द्वारा अहिल्या के छलपूर्वक शीलभंग की भी कथा है|
समाधान १४------यही तो पुराणों द्वारा भारतीय इतिहास को सत्यता से लिखे जाने का तथ्य उजागर करता है कि भारतीयों ने अपने किसी भी नेता, देवता या विशिष्ट व्यक्ति की नैतिक कमियों को कभी नहीं छुपाया, उसके सत्परिणाम या दुष्परिणामों को भी स्पष्ट किया ताकि आगे वाली पीढियां सबक लें व सामाजिक परिवर्धन, विकास व गतिशीलता का सातत्य बना रहे | इंद्र को दंड मिला, सभी जानते हैं इसी न्याय के लिए जानी जाती है यह संस्कृति |
      झूठ प्रस्तोता ये विदेशी ज्ञान रत, अज्ञानी लोग यह भूल जाते हैं कि ये सभी देवता थे आर्य नहीं थे , स्वर्ग आदि में आर्य नहीं अपितु देवता रहते थे जो आर्य, अनार्य असुर सभी के देवता थे, इंद्र आर्यों का राजा नहीं अपितु देवराज था तथा देवता व असुर भाई भाई थे तो फिर केवल असुर मूल निवासी कैसे हुए और यह इतिहास आज के भारत या आर्यावर्त या हिन्दुस्थान व हिन्दू का नहीं है अपितु उस समय का है जब यह वृहद् भारत या जम्बू द्वीप था, जिसमें  पूर्वी गोलार्ध समस्त पुरानी दुनिया के समस्त क्षेत्र / देश/ प्रदेश हिमालय, हिमालय पार यूरेशिया के देश सम्मिलित थे |
     शठे शाठ्यं समाचरेत----नीति गत तथ्य है, दुष्टता का निराकरण किसी भी प्रकार करना चाहिए खासकर यदि दुष्ट शत्रु आतातायी व बलशाली हो, शत्रु को बलशाली न बनने देना महत्वपूर्ण नीति है| सती, पार्वती , सरमा, सीता, द्रोपदी आदि की वीरता, परामर्श व युद्द्ध कौशल आदि के आख्यान ये दर्शाते हैं की उस काल में स्त्रियाँ बल व बुद्धि में पुरुषों के बराबर कंधे से कंधा मिलाकर कार्य करती थीं | स्त्री-पुरुष में कोइ अंतर नहीं था |

--------------क्रमश:  पोस्ट चार----