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डा श्याम गुप्त का ब्लोग...

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Lucknow, UP, India
एक चिकित्सक, शल्य-चिकित्सक जो हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान व उसकी संस्कृति-सभ्यता के पुनुरुत्थान व समुत्थान को समर्पित है व हिन्दी एवम हिन्दी साहित्य की शुद्धता, सरलता, जन-सम्प्रेषणीयता के साथ कविता को जन-जन के निकट व जन को कविता के निकट लाने को ध्येयबद्ध है क्योंकि साहित्य ही व्यक्ति, समाज, देश राष्ट्र को तथा मानवता को सही राह दिखाने में समर्थ है, आज विश्व के समस्त द्वन्द्वों का मूल कारण मनुष्य का साहित्य से दूर होजाना ही है.... मेरी तेरह पुस्तकें प्रकाशित हैं... काव्य-दूत,काव्य-मुक्तामृत,;काव्य-निर्झरिणी, सृष्टि ( on creation of earth, life and god),प्रेम-महाकाव्य ,on various forms of love as whole. शूर्पणखा काव्य उपन्यास, इन्द्रधनुष उपन्यास एवं अगीत साहित्य दर्पण (-अगीत विधा का छंद-विधान ), ब्रज बांसुरी ( ब्रज भाषा काव्य संग्रह), कुछ शायरी की बात होजाए ( ग़ज़ल, नज़्म, कतए , रुबाई, शेर का संग्रह), अगीत त्रयी ( अगीत विधा के तीन महारथी ), तुम तुम और तुम ( श्रृगार व प्रेम गीत संग्रह ), ईशोपनिषद का काव्यभावानुवाद .. my blogs-- 1.the world of my thoughts श्याम स्मृति... 2.drsbg.wordpres.com, 3.साहित्य श्याम 4.विजानाति-विजानाति-विज्ञान ५ हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान ६ अगीतायन ७ छिद्रान्वेषी ---फेसबुक -डाश्याम गुप्त
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गुरुवार, 8 मार्च 2018

भारतीय धर्म, दर्शन राष्ट्र -संस्कृति के विरुद्ध नवीन आवाजें व उनका यथातथ्य निराकरण --- एक क्रमिक आलेख--दो---डा श्याम गुप्त



अथर्व वेदसंहिता 




                                              ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...







आगे पोस्ट दो------समाधान ६ से १० तक---



कथन -६- अब हम इसी क्रम में भारत के सबसे प्रमुख धर्म हिन्दू धर्म को देखते हैं। यहाँ एक किताब एक पैगंबर और एक भगवान् का सिद्धांत काम नही करता। एक ही हिन्दू परिवार में कोई योगी हो सकता है कोई तांत्रिक हो सकता है और कोई नास्तिक भी हो सकता है। यहाँ तक कि परिवार के भीतर ही दो विपरीत विश्वासों वाले लोग भी हो सकते हैं। एक अर्थ में यह बहुत प्रगतिशील घटना नजर आती है कि भारतीय हिन्दू धर्म विश्वास और कर्मकांड के प्रति बहुत सेक्युलर या लिबरल हैं और इसी अर्थ में हिन्दू धर्म के प्रशंसक इसे सबसे अधिक सहिष्णु और समावेशी धर्म बतलाते आये हैं।
  लेकिन यह इतिहास के हज़ारों साल के विस्तार में निर्मित हुई विराट तस्वीर का एक छोटा सा पहलू भर है। इसके अन्य छुपे हुए पहलू भी हैं जो भारत में स्वयं को हिन्दू न मानने वाले लोगों की तरफ से उठ रहे तर्कों और तथ्यों के प्रकाश में अब हमें हिन्दू धर्म के पूरे इतिहास और इसके सम्प्रदायों सहित इसके विराट मिथक शास्त्र पर बहुत तर्कपूर्ण और वैज्ञानिक दृष्टि से पुनर्विचार करना होगा। 

समाधान -६ – वास्तव में सत्य तो यही है, जो कथन स्वयं बयान कर रहा है | हम पहले ही कह आये हैं की हिन्दू धर्म किसी किताब, व्यक्ति या एक विचार से बंधा नहीं है इसीलिये वह प्रगतिशील व खुले विचारों वाला सबसे अधिक सहिष्णु और समावेशी धर्म है| लेखक को हिन्दू धर्म की एतिहासिकता का ज्ञान नहीं है यह कुछ हज़ार सालों का नहीं अपितु करोड़ों वर्षों की तस्वीर है जिसके कारण यह मानवता का सर्वप्रथम धर्म है जो आजतक नित्य-नवीन है | | निश्चय ही हिन्दू धर्म को समझने के लिए एक समुचित वैज्ञानिक दृष्टि आवश्यक है |

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कथन ७- अब तक उपेक्षित और तिरस्कृत समाजों की जीवनधारा में बहता आया धर्म और उनकी अपनी संस्कृति के प्रवाह से बहुत कुछ ऐसा उपलब्ध हो रहा है जो एक नये ही नेरेटिव को उभार रहा है। यह भारत के मूल निवासियों और बहुजनों का मूल नेरेटिव है। नए तथ्यों के प्रकाश में प्राचीन मान्यताओं और मिथकों पर पुनर्विचार ने एक नया ही जगत खोल दिया है। 

 समाधान-७- उपेक्षित व तिरस्कृत समाजों ने अभी तक ये कदम क्यों नहीं उठाये, क्या उनमें विज्ञजन नही हुए;  क्योंकि उनकी जीवन धारा में भी वही हिन्दू धर्म बहता आया है जिसमें सभी समान भाव से रहते आये है अपने अपने कर्म-स्वभाव के अनुसार | यहाँ यह प्रश्न पहले सुलझा लेना चाहिए की मूल निवासी कौन हैं एवं क्या हम व एवं स्वयं को तथाकथित आदि-मूलनिवासी कहने वाले, युगों के मानव  विकास को उलटकर अपने उसी आदिवासी जगत में पुनः जाना चाहते हैं |

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कथन-८- भारत में इतिहास की बजाय मिथकीय पुराण क्यों लिखा गया :
        इतिहास बोध न केवल संस्कृति बोध है बल्कि उससे भी आगे बढ़कर यह किसी संस्कृति या समाज का नैतिकता बोध या स्वयं न्याय बोध भी है। इसीलिये हर संस्कृति ने चाहे वह कितनी भी विकसित रही हो उसने अपनी विशिष्ट नैतिकता को बहुत स्पष्ट अर्थों में परिभाषित किया है और उसी के आधार पर शुभ अशुभ की परिभाषा की है और उसी के आधार पर इतिहास लिखा है। इसीलिये उनका इतिहास बोध और न्याय बोध बहुत स्पष्ट है। उसमे घालमेल या मिथकीय धुंध नहीं है। लेकिन क्या भारत में ऐसा है? क्या भारत ने इतिहास लिखा है? या क्या भारत के मिथकीय इतिहास में उन्नत नैतिकता बोध और न्याय बोध जैसा कुछ है?

समाधान ८----लिखा हुआ इतिहास कभी सत्य नहीं होता अपितु सामयिक शासन, सत्ता के हाथों की कठपुतली होता है | इसीलिये तो समय समय पर आधुनिक लिखे हुए इतिहास की असत्यता परिलक्षित व उद्घाटित होती रहती है | नए शासन,-सत्ता आते ही उसी के अनुसार इतिहास लिख दिया जाता है  और इसका सामान्य-जनता के हाथ में कुछ नहीं होता | इसका न्यायबोध या नैतिकता सामयिक सत्ता के अनुसार होता है जो अधिकाँश सत्य नहीं होता |
      साथ ही अन्य धर्म बहुत नवीन धर्म हैं , वस्तुतः वे धर्म हैं ही नहीं अपितु संगठन हैं और अपने अपने संगठन के नियमों पर चलते हैं, वास्तविक मानवीय नियमों पर नहीं, जो धर्म का अर्थ है | इसीलिये वे स्पष्ट शुभ-अशुभ व विशिष्ट नैतिकता एवं उसका इतिहास लिखते हैं ताकि मनुष्य को कुछ सामान्य मनुष्यों के ही बनाए गए कठोर नियमों, कानूनों पर बलपूर्वक उसी लीक पर चलाया जा सके|
                  हिन्दू धर्म सनातन धर्म है सबसे प्राचीन, कालातीत, इस लिखित इतिहास से परे, मानवीय आदर्श जीवन पद्धति | जब मानव लिखना भी नहीं जानता था, इतिहास का अर्थ भी नहीं | पुराणों आदि को ध्यान से समझने पर ज्ञात होगा कि वाचिक, श्रुति परम्परा से ही उनमें घटनाएँ, कथ्य, कथाएं इस प्रकार बाराम्बारिता व संदर्भिता भाव से पिरोई जाती हैं उनमें व्यजनार्थों से ही एवं संदर्भित कथ्यों से ही मूल अर्थ निकल पाए, ताकि कोइ उनका दुरुपयोग,  अर्थ-अनर्थ, असत्य-मिलावट न कर पाए, उन्हें बदला न जा सके |
              इसीलिये ये पौराणिक कथ्य व तथ्य आज युगों बाद भी वही हैं | उस समय ग्रहों व नक्षत्रों की स्थितियों से काल-स्थापना की जाती थी, तारीख या दिनांक से नहीं, ताकि उन्हें बदला न जा सके | हम इन्हें पौराणिक कहते हैं मिथकीय नहीं | यह मिथक शब्द अंग्रेज़ी का शब्द है हमारा नहीं, जिसका अर्थ है सत्य है भी या नहीं अर्थात अज्ञानता, अविश्वास और असत्य ; क्योंकि उन्हें पुराण शब्द का ज्ञान ही नहीं | ईसा से उनकी तारीख प्रारम्भ होती है |    
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कथन ९-  यह देखकर आश्चर्य और दुःख होता है कि इस देश में इतिहास कभी नही लिखा गया है, बल्कि उसकी जगह मिथकों और कल्पनाओं से भरे पुराण लिखे गए हैं। भारत के इतिहास लेखन के संबंध में अक्सर यह कहा जाता है कि भारत के पास अतीत तो है लेकिन इतिहास नहीं है। इसी कारण, चूँकि यहाँ इतिहास नहीं है तो भारत की बहुसंख्य जनसंख्या अपने इस  वर्तमान को भी समझ नहीं पाती कि यह किस प्रवाह में यहाँ तक पहुंचा है। और यही कारण है कि इतनी सदियों बाद भी इस विराट और दिशाहीन जनसंख्या में एक साझे भविष्य का स्पष्ट नक्शा या दर्शन भी आकार नहीं ले पा रहा है। यही इसकी ऐतिहासिक रूप से लंबी और शर्मनाक गुलामी का भी कारण है।

समाधान ९---अक्सर कौन ऐसा कहता है, किसने कहा यह स्पष्ट नहीं है अर्थात केवल एक मिथ्या प्रस्तुतीकरण है | भारत का सभी जन जन, अनपढ़ से विद्वान तक जानता है कि कैसे सृष्टि हुई और मानवीय प्रवाह की दशा व दिशा रूप में मानव की उत्पत्ति व विकास कैसे-कैसे हुआ, मानव का उद्भव , समाज का विकास, संस्थाओं का विकास कैसे हुआ | उसके वेद, उपनिषद् पुराण,  व अन्य शास्त्रों, ग्रंथों, आख्यानों, बोध कथाओं आदि में सब बिना भ्रम के स्पष्ट है | इसके लिए पुनः पाश्चात्य ढंग पर इतिहास लिखने की आवश्यकता नहीं | बहुसंख्य जनता यह भी जानती है उसके भविष्य की दिशा उसकी समुन्नत सांस्कृतिक व सार्वभौम वैदिक ज्ञान-विज्ञान ही है, जो सदैव रही है और जिसका लोहा आज विश्व पुनः मान रहा है |
      भारत की एतिहासिक गुलामी का मूल कारण ऐसे ही अल्पसंख्यक व्यक्ति, विचार व संस्थाएं व मज़हबी–आतंकबाद हैं जो आज यह प्रश्न उठा रहे हैं जैसे समय समय पर उठाते रहे हैं, जिसने देश-संस्कृति-सभ्यता की एकता-अखण्डता को सदा चोट पहुंचाई है, भितरघात के द्वारा | 
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कथन १०-भारत में हज़ारों धर्मग्रन्थ और एक बहुत बड़ा दार्शनिक साहित्य है। सैकड़ों ज्ञात राजवंशों और कबीलों सहित अज्ञात परम्पराओं के संकेत व प्रमाण मिलते हैं। साथ ही अन्य देशों के यात्रियों ने यहाँ एक बड़ी ही विस्तृत और प्राचीन सभ्यता की बात कही है। ये सब बातें बतलाती हैं कि इस देश में इतिहास जरुर घटित हुआ है, लेकिन उसका लेखन नहीं हुआ है। अब ये लेखन क्यों नहीं हुआ है इसके पीछे बहुत गहरे कारण रहे हैं जिन्हें बहुत ही चालाकी से छुपाकर रखा गया है। यह नहीं माना जा सकता कि इस देश में लेखन कला या इतिहास बोध ही नहीं जन्म सका था। असल में यहाँ इतिहास बोध को नष्ट करने वाला मिथक बोध बहुत प्रभावी रहा है। ये मिथक क्यों और कैसे जन्मते हैं इसमें गहराई से देखना होगा।

समाधान १०- भारत के ग्रन्थ, दार्शनिक साहित्य, राजवंशों की श्रुत परम्पराओं व विस्तृत संस्कृति सदा रही है इसमें कोइ दो राय हो ही नहीं सकतीं, जैसा स्वयं इस कथन में स्पष्ट है | इतिहास बोध तो सदा से ही था जो जाने कितनी कथाएं, शिष्य-गुरुवार्ताएं आदि से परिलक्षित है | परन्तु लेखन नहीं हुआ, यह मूर्खता की बात है, आदि दृश्य व श्रुति परंपरा के बाद भोजपत्रों, ताड़ के पत्रों, पाषाण शिलाओं कपड़ों आदि पर लेखन मौजूद है, यही तो इतिहास लेखन है |  कागज़ पर यह कला तो काफी बाद की बात है | जिसके समय भारत पराधीनता की बेड़ियों में था |

 चित्र---गूगल----सरस्वती घाटी सभ्यता साहित्य , संस्कृत साहित्य--महाभारत, वैदिक साहित्य
नंदीनागरी मैन्यू स्क्रिप्ट
 ------क्रमश ----आगे पोस्ट तीन----


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बुधवार, 7 मई 2014

श्रुतियों व पुराण-कथाओं वैज्ञानिक तथ्य--अंक-८.. कावेरी की कथा ...डा श्याम गुप्त ...

                                  

                                 ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...


 श्रुतियों व पुराण-कथाओं में भक्ति-पक्ष के साथ व्यवहारिक-वैज्ञानिक तथ्य-अंक-८..

कावेरी की कथा......


       श्रुतियों व पुराणों एवं अन्य भारतीय शास्त्रों में जो कथाएं भक्ति भाव से परिपूर्ण व अतिरंजित लगती हैं उनके मूल में वस्तुतः वैज्ञानिक एवं व्यवहारिक पक्ष निहित है परन्तु वे भारतीय जीवन-दर्शन के मूल वैदिक सूत्र ...’ईशावास्यम इदं सर्वं.....’ के आधार पर सब कुछ ईश्वर को याद करते हुए, उसी को समर्पित करते हुए, उसी के आप न्यासी हैं यह समझते हुए ही करना चाहिए .....की भाव-भूमि पर सांकेतिक व उदाहरण रूप में काव्यात्मकता के साथ वर्णित हैं, ताकि विज्ञजन,सर्वजन व सामान्य जन सभी उन्हें जीवन–व्यवस्था का अंग मानकर उन्हें व्यवहार में लायें |...... स्पष्ट करने हेतु..... कुछ उदाहरण एवं उनका वैज्ञानिक पक्ष प्रस्तुत किया जा रहा है ------ )

कावेरी उद्गम -तलाकावेरी -कुर्ग
कावेरी

कावेरी -मंथर-मंथर




 

 

 

 

 

कावेरी-होनेगोक्कल फाल्स

 

 

 

 

 

 

 कावेरी की कथा .....

     धर्म के तीन स्तर होते हैं----१- तात्विक ज्ञान---(मेटाफिजिक्स )...२-नैतिक ज्ञान--(एथिक्स )...
३-कर्मकांड  (राइचुअल्स)....मूलतः कर्मकांडों का जो जन-व्यवहार के लिए होते हैं, जन सामान्य के लिए.
..... उन्ही में अज्ञान ( तात्विक व नैतिक भाव लोप होने से ) से अतिरेकता आजाने से वे आलोचना के
 आधार बन जाते हैं |पुराण कथाएं मूलतः कर्मकांड विभाग में आती हैं ताकि जन-जन, जनसामान्य
 को संक्षिप्त में व्यवहार की बातें बताई जा सकें |
           
       जब भी कोई व्यवस्था या  सभ्यता अत्यंत उन्नत होजाती है तो उसकी बातें, तथ्य व 
कथ्य स्वतः ही सूत्र व कूट रूप में होने लगते हैं, संक्षिप्तता की आवश्यकतानुसार | आधुनिक उदाहरण
 लें जैसे--भारत के लिए शेर,आस्ट्रेलिया के लिए कंगारू कहना आज आम बात होगई है|                                                          
                    भारतीय  पुराण-कथाएं सदा अन्योक्ति कूट व सूत्र रूप में कही गयी हैं , परन्तु उनके 
वास्तविक/तात्विक अर्थ व्यवहारिक, नीति-परक व सामाजिक नीति व्यवस्था के होते है | अर्थ न समझने
 के कारण लोग उन्हें प्रायः कपोल-कल्पित कह कर  उनका उपहास भी करते हैं और हिन्दू सनातन-धर्म 
के उपहास के लिए उदाहरण भी
 कावेरी नदी की कथा का भी यही तथ्य है |

    स्थानीय..कर्मकान्ड  केअनुसार कावेरी के उदगम-स्थान पर हर साल सावन के महीने में बड़ा भारी उत्सव  
मनाया जाताहै। यह है कावेरी की विदाई का उत्सव कुर्ग के सभी हिन्दू लोग, विशेषकर स्त्रियां, इस उत्सव में 
 बड़ी श्रद्धा के साथ भाग  
लेती हैं।उस दिन कावेरी की मूर्ति की विशेष पूजा होती है। 'तलैकावेरी' कहलानेवाले उदगम-स्थान पर सब स्नान 
 करते हैं। स्नान करनेके बाद प्रत्येक स्त्री कोई  कोई गहना, उपहार के रुप में, उस तालाब में डालती है। यह दृश्य 
 ठीक वैसा ही होता  है, जैसा कि नईविवाहित लड़की की विदाई का दृश्य |
कावेरी की पौराणिक कथा व स्थानीय जनश्रुति यह है----
           सहा-पर्वत ने अपनी लजीली बेटी कावेरी को उसके पति समुद्रराज के पास भेजा। जब बेटी घर से विदा 
 होकर चली गईतब सहा-पर्वत को भय हुआ कि कहीं ससुरालवाले मेरी बेटी को गरीब  समझ लें। इसलिए उसने  
कनका नाम की युवती  को कईउपहारों के साथ दौड़ाया और कहा कि तुम जल्दी जाकर कावेरी के साथ हो लो।
             
कनका चली गई और 'भागमंडलम' नामक स्थान पर कावेरी से मिली। उपहार का शेष भाग यहीं पर  
कावेरी को मिला,इस कारण इस स्थान का नाम 'भागमंडलम' पड़ा। परन्तु पिता सहा-पर्वत का भय अब भी दूर 
 नहीं हुआ। उसे लगा  कि मैंने पुत्रीको उतने उपहार नहीं दिये, जितने कि मैं दे सकता था। उसने  हेमावती  नाम की दूसरी लड़की को बुलाया और बहुत से उपहारदेकर कहा कि तुम किसी ओर रास्ते से तेजी
  से जाओ। हेमावती स्वयं अपनी सहेली के चली जाने पर दुखी थी।  इसलिए सहा-पर्वत की आज्ञा से वह बहुत 
 प्रसन्न हुई और आंख मूंद कर भागी।

             
उधर कावेरी कनका से मिलने के बाद बहुत प्रसन्न हुई ओर विदाई का दु: भूल गई। 'भागमंडलम' से 
 'चित्रपुरम ' नामक स्थान  तक दोनों सहेलियां ऊंची-ऊंची चट्रटानों के बीच में हंसती खेलती, किलोलें करती हुई चलीं,  
परन्तु "चित्रपुरम' पहुंचने के बाद उनके कदम आगे नहीं बढ़े,  क्योंकि वे कुर्ग की सीमा पर पहुंच गई थीं।  आगे मैसूर राज्य  गया था। उसमें प्रवेश करने का मतलब नैहर से सदा के लिए बिछुड़ना था। इस कारण वे  
असमंजस में पड़ गई और ३२ कि.मी. तक कुर्ग और मैसूर की सीमा से साथ-साथ चलीं  चित्रपुरम से 'कण्णेकाल' के आगे कावेरी भारी मन से अपने पिता के घर से सदा के लिए बिछुड़ गई। बिछोहका 
 दु: उसे इतना था कि वह मैसूर के हासन जिले में  पहाड़ी चट्रटानों के बीच में मुंह छिपाकर रोती हुई चली। 
 तिप्पूर  नामक स्थान पर  वह  उत्तर  की ओर मुड़ी,  मानो पिता के घर लौट आयगी,  परन्तु देखती क्या है कि  उसकी सहेली हेमावती उत्तर से बड़ेवेग से चली  रही है। उसी स्थान पर दोनों सहेलियां गले मिलीं।

                   कावेरी नदी का वास्तविक भौगोलिक स्वरुप देखिये... बिलकुल पौराणिक 
अनुश्रुति व कथ्यों से समानता है ..-----


कावेरी के जन्म  - अगस्त्य ऋषि कावेरी को कैलाश पर्वत से लेकर आये थे। एक बार भयंकर सूखा पड़ा जिससे 
दक्षिण भारत में स्थिति बहुत ख़राब हो गयी। यह देखकर अगस्त्य ऋषि बहुत दुखी हुए और मानव जाति को 
बचाने के लिए ब्रह्मा जी के पास पहुंचे। ब्रह्मा जी ने उनसे कहा की अगर वे कैलाश पर्वत से बर्फीला पानी लेकर
 जाएँ तो दक्षिण में नदी का उद्गम कर सकतें हैं। अगस्त्य ऋषि कैलाश पर्वत पर गए, वहां से बर्फीला पानी 
अपने कमंडल में लिया और दक्षिण दिशा की और लौट चले। वें नदी के उद्गम स्थान की खोज करते हुए कुर्ग 
पहुंचे। उचित उद्गम स्थान की  खोज करते-करते ऋषि थक गए और अपना कमंडल भूमि पर रखकर विश्राम 
करने लगे। तभी वहां पर एक कौवा उड़ते हुए आया और कमंडल पर बैठनेलगा। कौवे के बैठते ही कमंडल उलट
 गया और उसका पानी भूमि पर गिर गया। जब ऋषि ने यह देखा तो उन्हें बहुत क्रोध आया। लेकिन तभी वहां 
गणेश जी प्रकट हुए और उन्होंने ऋषि से कहा कि मैं ही कौवे का रूप धारण करके आपकी मदद के लिए आया 
। कावेरी के उद्गम के लिए यही स्थान उचित है। यह सुनकर ऋषि प्रसन्न हुए और भगवान गणेश अंतर्ध्यान 
हो गए। 


         कावेरी कर्नाटक की पूर्व कुर्ग रियासत से निकलती है। यह पूर्व मैसूर राज्य को सींचती हुई दक्षिण 
पूर्व की ओर बहती है और तमिलनाडु के एक विशाल प्रदेश को हरा-भरा बनाकर बंगाल की खाड़ी में गिरती है।
 इस लम्बी यात्रा में कावेरी का रुप सैकड़ो बार बदलता है। कहीं वह पतली धार की तरह दो ऊंची चट्रटानों के  
बीच बहती है, जहां एक छलांग में उसे पार कर सकते है कहीं उसकी चौड़ाई डेढ़ कि.मी. के करीब होती है ओर 
वह सागर सी दिखाई देती है कहीं वह साढ़े तीन सौ फुट की ऊंचाई से जल प्रपात के रुप में गिरती है, जहां 
उसका भीषण रुप देखकर और चीत्कार सुनकर रोंगटे खड़े हो जाते है,कहीं वह इतनी सरल और प्यारी होती है 
कि उस पर बांस की लकड़ी का पुल बनाकर लोग उसे पार कर जाते हैं।
       पश्चिमी घाट के उत्तरी भाग में एक सुन्दर राज्य है, जिसे कुर्ग कहते हैं। राज्य में एक पहाड़ का नाम ...
 सहापर्वत है। इस पहाड़ को 'ब्रह्माकपाल' भी कहते हैं।
               
इस पहाड़ के एक कोने में एक छोटा सा तालाब बना है। तालाब में पानी केवल ढाई फुट गहरा है। इस  
चौकोर तालाब काघेरा एक सौ बीस फुट का है। तालाब के पश्चिमी तट पर एक छोटा सा मन्दिर है। मन्दिर के  
भीतर एक तरुणी की सुन्दर मूर्तिस्थापित है। मूर्ति के सामने एक दीप लगातार जलता रहता है।
                   
यही तालाब कावेरी नदी का उदगम-स्थान है। पहाड़ के भीतर से फूट निकलनेवाली यह सरिता पहले 
 उस तालाब मेंगिरती है, फिर एक छोटे से झरने के रुप में बाहर निकलती है। देवी कावेरी की मूर्ति की यहां पर 
 नित्य पूजा होती है। कावेरी कास्रोत कभी नहीं सूखता।

                     
कावेरी कुर्ग से निकलती अवश्य है, पर वहां की जनता को कोई लाभ नहीं पहुंचाती। कुर्ग के घने  
जंगलों में पानीकाफी बरसता है, इस कारण वहां कावेरी का कोई काम भी नहीं है, उल्टे कावेरी कुर्ग की दो और 
 नदियों को भी अपने साथ मिलालेती है और पहाड़ी पट्रटानों के बीच में सांप की तरह टेढ़ी-मेढ़ी चाल चलती, 
 रास्ता बनाती, मॅसूर राज्य की ओर बढ़ती है।

                  
कनका से मिलने से पहले कावेरी की धारा इतनी पतली होती है कि उसे नदी के रुप में पहचानना भी 
 कठिन होता है।कनका से मिलने के बाद उसे नदी का रुप और गति प्राप्त होती है। सहा'पर्वत से बहनेवाले सैकड़ों 
 छोटे-छोटे सोते भी यहां परउसमे आकर मिल जाते हैं। इस स्थान को 'भागमंडलम' कहते हैं। हेमावती नदी 
 कर्नाटक राज्य के तिप्पूर नामक स्थान पर कावेरी से आकर मिलती है।


         तमिल भाषा में कावेरी को प्यार से 'पोन्नी' कहते हैं। पोन्नी का अर्थ है सोना उगानेवाली। कहा जाता
 है किकावेरी के जल में सोने की धूल मिली हुई है। इस कारण इसका यह नाम पड़ा। जानने योग्य बात यह है
 कि कावेरी मेंमिलने वाली कई उपनदियों में से दो के नाम कनका और हेमावती हैं। इन दोनों नामों में भी सोने
 का संकेत है।
       
------ कथा का तात्विक अर्थ भौगोलिक वर्णन है तथा नैतिक (एथीकल) अर्थ पिता की पुत्री के 
प्रति   चिंता का सखियों के प्रेम का सुन्दर समन्वयात्मक वर्णन|-----|
कावेरी बांध