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डा श्याम गुप्त का ब्लोग...

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Lucknow, UP, India
एक चिकित्सक, शल्य-चिकित्सक जो हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान व उसकी संस्कृति-सभ्यता के पुनुरुत्थान व समुत्थान को समर्पित है व हिन्दी एवम हिन्दी साहित्य की शुद्धता, सरलता, जन-सम्प्रेषणीयता के साथ कविता को जन-जन के निकट व जन को कविता के निकट लाने को ध्येयबद्ध है क्योंकि साहित्य ही व्यक्ति, समाज, देश राष्ट्र को तथा मानवता को सही राह दिखाने में समर्थ है, आज विश्व के समस्त द्वन्द्वों का मूल कारण मनुष्य का साहित्य से दूर होजाना ही है.... मेरी तेरह पुस्तकें प्रकाशित हैं... काव्य-दूत,काव्य-मुक्तामृत,;काव्य-निर्झरिणी, सृष्टि ( on creation of earth, life and god),प्रेम-महाकाव्य ,on various forms of love as whole. शूर्पणखा काव्य उपन्यास, इन्द्रधनुष उपन्यास एवं अगीत साहित्य दर्पण (-अगीत विधा का छंद-विधान ), ब्रज बांसुरी ( ब्रज भाषा काव्य संग्रह), कुछ शायरी की बात होजाए ( ग़ज़ल, नज़्म, कतए , रुबाई, शेर का संग्रह), अगीत त्रयी ( अगीत विधा के तीन महारथी ), तुम तुम और तुम ( श्रृगार व प्रेम गीत संग्रह ), ईशोपनिषद का काव्यभावानुवाद .. my blogs-- 1.the world of my thoughts श्याम स्मृति... 2.drsbg.wordpres.com, 3.साहित्य श्याम 4.विजानाति-विजानाति-विज्ञान ५ हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान ६ अगीतायन ७ छिद्रान्वेषी ---फेसबुक -डाश्याम गुप्त
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शनिवार, 24 अक्टूबर 2015

सनातन धर्म की वैज्ञानिकता व सतत प्रवाहशीलता ---डा श्याम गुप्त ......

                                    ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...


                  सनातन धर्म की वैज्ञानिकता व सतत प्रवाहशीलता

         मानव जब वृक्षों व कंदराओं से बाहर आया और रहन-सहन के सामूहिक रूप की स्थापना हुई तो सामाजिकता के नियमन व समन्वय हेतु कुछ नियमों का प्रचलन हुआ| वही नियम सार्वभौम होकर धर्म, समाज, संस्कृति व सभ्यता बने| इस प्रकार एक सनातन व्यवस्था मानव की प्रथम उत्पत्ति की भूमि, ब्रह्मा के प्रदेश सुमेरु पर्वतीय क्षेत्र में स्थापित हुई जो ब्रह्मा की मानस पुत्री सरस्वती के उद्गम क्षेत्र मानसरोवर एवं प्रवाह क्षेत्र स्वर्ग आदि में प्रतिष्ठित हुई, तत्पश्चात सरस्वती के पृथ्वी क्षेत्र में अवतरण, वेदों के आविर्भाव एवं मानव के विकास प्रक्रिया में पृथ्वी पर चहुँओर प्रसार द्वारा उसके भूतलीय प्रवाह क्षेत्र में सारस्वत-सभ्यता के नाम से प्रतिष्ठित हुई, जो पृथ्वी की प्रथम सनातन व्यवस्था, धर्म व संस्कृति हुई, सनातन वैदिक सभ्यता |


    यह बहुदेववादी व्यवस्था थी, केवल सामाजिक विज्ञान से ओत-प्रोत ही नहीं अपितु पूर्णरूपेण वैज्ञानिक तंत्र व नियम आधारित व्यवस्था, जिसमें प्रत्येक मानव क्या विस्तृत रूप में धरती, सूर्य, तारे, मिट्टी, पानी, वृक्ष, प्राणी, जीव-निर्जीव सभी को देव या भगवान माना जाता है | देवताओं को सृष्टि के पालनकर्ता और नैतिक वृत्ति के पोषक के रूप में दर्शाया जाता है। कण कण में भगवान की अवधारणा बनी| यह विज्ञान के साथ साथ ईश्वर पर आस्था व विश्वास की संस्कृति व धर्म था| अत: यह कभी न मिटने वाली सतत-प्रवहमान, कालजयी धर्म व संस्कृति हुई एवं ‘धर्म की जड़ सदा हरी’ जैसे वाक्य अस्तित्व में आये| वेद, उपनिषद्, पुराण साहित्य से ज्ञान का प्रकाश उद्भासित हुआ|  ईश्वर, आत्मा व जीव के सम्बन्ध की श्रेष्ठतम मान्यताएं व दर्शन प्रतिष्ठित हुए | जम्बू द्वीपे, भरत-खंडे से उद्भूत यह व्यवस्था व धर्म मानव के विश्व में प्रसार के साथ समस्त विश्व में फैला |      

        प्रारम्भ से ही उचित-अनुचित, धर्म-अधर्म, कृतित्व-अकृतित्व के समुचित व्याख्या-भाव के कारण इस श्रेष्ठ व्यवस्था को  बुराई से, समाज के नियमों की अवमानना करने वालों से चुनौती मिलती रही है| मानव अहं, कि ईश्वर सर्वोपरि है या मानव स्वयं के प्रश्न पर, भौतिकता, सुख-समृद्धि के अति-प्रचलन तथा मानव आचरण की स्वयं की हीनता से भी विभिन्न पथ व पंथ इसके विरोध में अस्तित्व में आते रहे हैं | जिसके कारण कभी कोई सागर में सभ्यता स्थापित करता है, कभी कोई नभ में नगर स्थापना करता है, कभी कोई समस्त धरती का सम्राट बनाने की लालसा | देव-दैत्य, सुर-असुर, आर्य-अनार्य संस्कृतियों-सभ्यताओं की उत्पत्ति, टकराहट व युद्ध एवं अवतारवाद और अंततः इस प्रक्रिया में प्रत्येक बार सनातन शक्तियों व नियमों की विजय इन्हीं की विश्व-गाथाएँ हैं जो वेदों व पुराणों में वर्णित हैं|

       परशुराम की विजय गाथाएँ, राम द्वारा रावणत्व का विनाश, कृष्ण द्वारा भारत-युद्ध इसी सनातन संस्कृति, धर्म की पुनर्स्थापना की घटनाएं हैं जो हर बार, हर युग में अनैतिकता, अनाचरण, अनाचार, अतिवादिता के विरुद्ध सनातन आचरण, आचार व मानवतावाद की विजय है|

       पश्च द्वापर युग में भी मानव आचरण की कमी, धर्म व सत्कर्मों में आये क्षरण के कारण सनातन व्यवस्था के विरोध में एकेश्वरवाद व अनीश्वरवाद का प्रसार हुआ| ये प्रायः महाभारत युद्ध के पश्चात एवं सम्राट हर्षवर्धन की पराजय के पश्चात समाज में आयी धार्मिक शिथिलता, अकर्मण्यता, ब्राह्मणवाद व निरंकुशता का विरोध था| मूलतः अनीश्वरवादी सम्प्रदाय ये थे---

          गोसाल द्वारा स्‍थापित आजीविक सम्‍प्रदाय .. कर्म सम्‍बन्‍धी कार्य कारण सम्‍बंध के व्‍यवस्‍थाक्रम को स्‍वीकार नहीं करता था। उनकी मान्‍यता थी कि सृष्टि के घटक तत्‍वपृथ्‍वी, जल, अग्नि, वायु, सुख, दुख ओर जीवात्‍मा (जीव)अरचित,  अखंडनीय पदार्थ के अणुओं के रूप में विद्यमान हैं जो परस्‍पर क्रिया नहीं करते हैं।

         अजित द्वारा प्रतिपादित लोकायत या चार्वाक दर्शन भी कर्म के सिद्धांत को अस्‍वीकार करता था। इतना ही नहीं, यह दर्शन पुनर्जन्‍म और जीवात्‍मा जैसी संकल्‍पना को भी अस्‍वीकार करता था।
       संजयिन द्वारा प्रशस्‍त अनीश्‍वरवादियों के अज्ञान दर्शन में यह कहा गया कि तत्‍वज्ञान सम्‍बन्‍धी चिन्‍तन या तर्क पर आधारित वाद-विवाद से किसी भी प्रकार का निर्णायक ज्ञान प्राप्‍त करना असम्‍भव है। इस दर्शन में ब्रह्मचर्य का पालन करने वाले ऐसे मठों में रहने की शिक्षा दी गई जो केवल साहचर्य के भाव पर बल देते हैं।

         महावीर द्वारा प्रतिपादित जैन या निर्ग्रन्‍थ दर्शन का प्रादुर्भाव लोकायत दर्शन के विरूद्ध कड़ी प्रतिक्रिया के रूप में हुआ। इस दर्शन में कर्म गति के कारण जीवात्‍मा के पुनर्जन्‍म की प्रक्रिया से गुजरने की बात पर बल दिया गया।
        जैन धर्म की अहिंसा वैदिक उपनिषदीय तत्वों से पृथक नहीं है उनकी अपनी राम कथा है एवं अन्य हिन्दू धर्म ग्रंथों की उनकी अपनी व्याख्याएं हैं| स्वामी नेमिनाथ तो स्वयं श्रीकृष्ण के चचेरे भाई थे | अतः उसे सनातन हिन्दू धर्म ने अपने सर्व-आत्मलयी, सर्वग्राही बहुरूप के कारण स्वयं के एक दर्शन के रूप में स्वीकार करलिया, अनीश्वरवादी दर्शन के रूप में | अंतत जैन धर्म केवल एक प्रमुख भारतीय धार्मिक व्‍यवस्‍था के रूप में हिन्दू धर्म का एक पंथ की भांति रह गया|

        बौद्ध मत का प्रादुर्भाव एक ऐसे श्रमण दर्शन के रूप में हुआ जो कर्म गति को पुनर्जन्‍म के कारण के रूप में स्‍वीकार करता था, लेकिन अन्‍य दर्शनों की मान्‍यता वाले आत्‍मा के स्‍वरूप को अस्‍वीकार करता था। बुद्ध ने तर्क और शास्‍त्रार्थ तथा नैतिक आचरण को मुक्ति के मार्ग में सहायक उपायों के रूप में स्‍वीकार किया, लेकिन उन्‍होंने इसे जैन दर्शन जैसी तपश्‍चर्या के रूप में स्‍वीकार नहीं किया।  इस प्रकार बौद्ध मत ने पूर्व में उल्लिखित चारों श्रमण दर्शनों की अतिशयताओं का परिवर्जन किया। महात्मा बुद्ध व बौद्ध धर्म के प्रादुर्भाव ने अतिवादितापूर्ण अन्य सभी मतों को स्वयं ही निर्मूल कर दिया और वे इतिहास बन कर रह गए |
              स्वयं बौद्ध-धर्म जो अपने दया, त्याग, करुणा, संयम आदि के कारण यज्ञों में हिंसा व ब्राहमणत्व के विरोध स्वरुप एक धार्मिक सुधार के रूप में भारत भर में एवं भारत के पडौसी देशों में तेजी से फैला परन्तु आज स्वयं भारत से ही निष्कासित अवस्था में है | क्योंकि बुद्ध के चार आर्य-धर्म, पंचशील, अष्टांगिक मार्ग वैदिक धर्म के ही अंग थे, उन्होंने कोई नवीन तथ्य उपस्थित नहीं किया | उनके दया, करुणा आदि हिन्दू वैष्णव धर्म के ही अंग थे | अंतत उसे भी वैष्णव धर्म ने बुद्ध को कृष्ण के वाद अपना नवां अवतार घोषित करके( जो उनके अनुसार जो विष्णु के नकारात्मक अवतार थे, दुष्टों व अपराधियों को पथभ्रष्ट करने हेतु .. एवं इस प्रकार वैदिक धर्म में आयी कुरीतियों को समाप्त करने को हुआ था..) उसे हिन्दू धर्म का ही एक अनीश्वरवादी दर्शन स्वीकार कर लिया | इस प्रकार  बुद्ध के बाद अत्यधिक तांत्रिकता, मठों आदि में अव्यवस्था, मत-मतान्तर, जन साधारण से पृथक रहने के कारण बौद्ध धर्म ध्वस्त प्राय होगया| शंकराचार्य की वैदिक विजय एवं ईसाई व इस्लाम धर्म के एकेश्वरवाद का आगमन इसकी विलुप्ति का अन्य कारण बना | आखिर देश की साहित्य व संस्कृति पर बौद्ध दर्शन का प्रभाव तो लाभदायी ही रहा | जब वैदिक संस्कृत का लोप हुआ तो पाली भाषा में बौद्ध धर्म की कथा कहानियां, ग्रंथों में भारतीय संस्कृति के मूल किस्सों को जीवित रखा गया |   

       अब बात दो विदेशी धर्मों की है | अनीश्वरवादियों की अनास्था एवं बुद्ध व जैन धर्मों की अकर्मण्यता से उत्पन्न भारतीय समाज असमंजसता की स्थिति में था | अनिश्चयता व राजनैतिक अस्थिरता के इस काल में देश पर इस्लाम का आक्रमण हुआ | इस्लाम एकेश्वरवादी धर्म है जो तलवार के जोर पर दुनिया में फैला | इस्लाम शब्द का अर्थ है – 'अल्लाह को समर्पण'। इस्लाम धर्म का आधारभूत सिद्धांत अल्लाह को सर्वशक्तिमान, एकमात्र ईश्वर और जगत का पालक तथा हज़रत मुहम्मद को उनका संदेशवाहक या पैगम्बर मानना है। भारत में पृथ्वीराज चौहान की निर्णायक हार के पश्चात् यह शासन के धर्म एवं तलबार के बल पर भारत में फैला | परन्तु सनातन धर्म के सच्चे अनुयाइयों ने कभी भी इसे नहीं स्वीकारा | 

         ईसाई धर्म मूलतः योरोपीय धर्म है | बौद्ध धर्म की दया, करुणा व सेवा ईसाई धर्म का भी मूल है | ईसाई  एकेश्वरवादी  हैं, लेकिन वे ईश्वर को त्रिक के रूप में समझते हैं -- परमपिता परमेश्वर, उनके पुत्र यीशु मसीह और पवित्र आत्मा। ईसामसीह ने ईसाई धर्म का फ़िलीस्तीन में सर्वप्रथम प्रचार किया, जहाँ से वह रोम और फिर सारे योरोप में फैला। ईसाई धर्म अधिकाँश राजनैतिक संरक्षण युद्धों व तलवार के बल पर एवं गरीब व दलित जनता को लालच लोभ व चमत्कारों के बल पर फैला | इस्लाम व ईसाइयों के धर्म-युद्ध सारे योरोप में अधिकार के लिए होते रहे हैं जिनका रक्तरंजित इतिहास है | ईसामसीह द्वारा सभी के पाप माफ़ कर देने की व्यवस्था के कारण अनुपालन में सबसे सरल यह धर्म विश्व का सबसे अधिक अनुयायियों वाला धर्म है |
         ईसा मसीह के प्रमुख शिष्यों में से एक संत टामस ने प्रथम शताब्दी ईस्वी में ही भारत में मद्रास के पास आकर ईसाई धर्म का प्रचार किया था। उसी समय से इस क्षेत्र में ईसाई धर्म का स्वतंत्र रूप में प्रसार होता रहा है। उत्तर भारत में अकबर के दरबार में सर्व धर्म सभा में विचार-विमर्श हेतु जेसुइट फ़ादर उपस्थित थे। उन्होंने आगरा में एक चर्च भी स्थापित किया था। इसी काल में ईसाई सम्प्रदाय रोथ ने लैटिन भाषा में संस्कृत व्याकरण लिखा। 16वीं सदी में पुर्तग़ालियों के साथ आये रोमन कैथोलिक धर्म प्रचारकों के माध्यम से उनका सम्पर्क पोप के कैथोलिक चर्च से हुआ। अंग्रेजों के भारत पर अधिकार के साथ शासन के धर्म के सारे लाभ ईसाई धर्म को मिले | भारत में सुदूर पूर्वोत्तर व दक्षिण के कुछ भागों में में ईसाई धर्म का प्रभाव है | मदर टेरेसा द्वारा 1950 में कलकत्ता में शासन की सहायता से स्थापित मिशनरीज और चेरिटी मानवता की सेवा में कार्यरत हैं।भारत में ईसाइयों मूलतः दो प्रकार की धाराएं हैं –
-----गोवा, मंगलोर, महाराष्ट्रियन समूह, जो पश्चिमी विचारों से प्रभावित था परन्तु पूरी तरह भारतीय आचार विचारों से कटा नहीं है |
----तमिल समूह जो ईसाई धर्म में होते हुए भी अपनी प्राचीन भाषा-संस्कृति से जुड़ा रहा है |

         वस्तुतः यह सनातन धर्म या दर्शन, सभ्यता, संस्कृति या जीवन व्यवहार, मानव सभ्यता के अत्यंत उच्चतम शिखर पर स्थित होने पर वैचारिक प्रक्रिया के द्वारा उत्पन्न व प्रतिष्ठित हुआ कि इसे अंतिम सत्य की भांति स्वीकारा गया | इसका ताना-बाना इतना विशाल, बहुरूपवादी, सर्वग्राही, उदार है कि मानवता के सत्य का प्रत्येक विचार, दर्शन, धर्म व तत्व इसके अन्दर समाहित होसकता है व होता आया है, हाँ उसके मानव हितकारी अंश को स्वयं में लय एवं अनिष्टकारी अंश को अस्वीकार करके | यह सतत विकासमान प्रक्रिया का धर्म है | हर युग में, प्रत्येक बार सारे झंझावातों, अनिष्टों, आक्रमणों से जूझकर विजयी भाव में प्रतिष्ठित होता है, क्योंकि इसकी विजय मानवता व मानव मात्र के विजय है |  
        देश की स्वतन्त्रता के पश्चात विश्व स्थित व वैश्विक-राजनीति के अनुसार भारत एक धर्म निरपेक्ष राष्ट्र है आज यहाँ विश्व के प्रत्येक धर्म व देश के निवासी अपने अपने धार्मिक विश्वासों के अनुसार रह रहे हैं जो सनातन धार्मिक विश्वास के अनुसार इसी मूल सनातन धर्म की विकृतियाँ, शाखाएं, प्रशाखाएं हैं जो अपने मूल से दिग्भ्रमित या नवोन्मेषी भाव में उत्पन्न होती हैं | यह धार्मिक निरपेक्षता वस्तुतः उसी सनातन भारतीय धर्म का ही मूल-भाव है | विश्व में आज भारतीय संस्कृति, सभ्यता व धर्म का पुनः डंका बजने लगा है | हिन्दू व सनातन-धर्मियों के जाग्रत व क्रियाशील होते जाने एवं गरीबी, अशिक्षा के निराकरण के साथ भारत में सनातन धर्म का पुनर्जागरण होरहा है जो एक बार पुनः विश्व को दिशा प्रदान करेगा सदा की भांति |

गुरुवार, 30 जनवरी 2014

श्रुतियों व पुराण-कथाओं में वैज्ञानिक तथ्य .-- अंक-१ ...सुमेरु .....डा श्याम गुप्त ...

                              ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...

         श्रुतियों व पुराण-कथाओं में भक्ति-पक्ष के साथ व्यवहारिक-वैज्ञानिक तथ्य --
                

         श्रुतियों व पुराणों एवं अन्य भारतीय शास्त्रों में जो कथाएं भक्ति भाव से परिपूर्ण व अतिरंजित लगती हैं उनके मूल में वस्तुतः वैज्ञानिक एवं व्यवहारिक पक्ष निहित है परन्तु वे भारतीय जीवन-दर्शन के मूल वैदिक सूत्र ...’ईशावास्यम इदं सर्वं.....’ के आधार पर सब कुछ ईश्वर को याद करते हुए, उसी को समर्पित करते हुए, उसी के आप न्यासी हैं यह समझते हुए ही करना चाहिए .....की भाव-भूमि पर सांकेतिक व उदाहरण रूप में काव्यात्मकता के साथ वर्णित हैं, ताकि विज्ञजन,सर्वजन व सामान्य जन सभी उन्हें जीवन–व्यवस्था का अंग मानकर उन्हें व्यवहार में लायें |...... स्पष्ट करने हेतु..... कुछ उदाहरण एवं उनका वैज्ञानिक पक्ष यहाँ क्रमिक रूप में प्रस्तुत किया जायगा....

                  सुमेरु व विन्द्याचल..

....... ऋग्वेद में वर्णन आता है कि..
            इन्द्र ने उड़ते हुए पर्वतों के पंखों को काटकर स्थिर कर दिया।‘
 
       पृथ्वी अपने विकास की प्रारंभिक अवस्था में बहुत गरम थी। उसका ऊपरी धरातल ठण्डा होता गया पर केन्द्र में हलचलें चलती रहती थीं । विशाल चट्टानें भूगर्भ केन्द्र में हो रहे परिवर्तन के कारण इधर-उधर खिसकती रहती थीं  जिसके कारण पृथ्वी की ऊपरी ठोस-द्रवीय सतह पर पर्वत विकसित व विलुप्त होते रहते थे | उनकी ऊंचाई में परिवर्तन होते रहते थे ।
 
       हिमालय श्रृंखला के बनने से पूर्व आर्कटिक से दक्षिण-सागर तक समस्त सागरीय व महाद्वीपीय-भाग, वृहद् भारतीय-भूभाग ही था, आर्यों का निवास स्थान | सम्पूर्ण क्षेत्र सुमेरु नाम से जाना जाता था शायद इसी को भारतीय शास्त्रों में जम्बू-द्वीप कहा गया है जिसके मध्य स्थित पर्वत संसार का केंद्र व सुमेरु-पर्वत था यह विश्व का सबसे प्राचीन क्षेत्र है यहीं इसके दक्षिण भूभाग में जो सदा ही पृथ्वी पर भूमि व सागरों-महाद्वीपों की हलचलों से अप्रभावित रहा एवं प्रारम्भ से अंतिम स्थल-खंड गोंडवाना-लेंड आदि के बनने व पुनः टूटने तक कभी भी पुनः सागर के अन्दर नहीं गया तथा प्राणी के रहने एवं विकसित होने के हेतु सबसे उपयुक्त स्थान था जो तत्पश्चात हिमालय के उद्गम पर भारतीय-प्रायद्वीप कहलाया, जहां मानव का जन्म हुआ| 
 
      उस काल के आर्यों का नायक इन्द्र कहलाता था जो आवश्यकतानुसार अस्थिर पर्वतों-झीलों-भूमि आदि के नियमन (अभियांत्रिकी कौशल एवं विविध युद्धों आदि अन्य तरीकों )  से आवागमन, आवास एवं सुरक्षा आदि की व्यवस्था किया करता था। वेद.. इन्द्र की इन गाथाओं से भरे-पड़े हैं।
    
      हिमालय-श्रेणी का उद्गम प्रारम्भ होने पर उसके दक्षिण में स्थित समस्त क्षेत्र ( आज का अफ्रीका, मध्य-एशिया, भारत, चीन-जापान-पूर्वी द्वीप-समूह आदि ) तीनों ओर स्थित सागर व उत्तर में उठते हुए हिमालय श्रृंखला से सुरक्षित क्षेत्र- बृहद-भारत हुआ एवं श्रृंखला के उत्तर का भाग आज के योरोप व आधुनिक रूस के साइबेरिया,–तिब्बत आदि समस्त भूमध्य सागर एवं  हिमालय-पार के क्षेत्र बने |   ( रूस में साइबेरिया की अल्टाई पर्वत-श्रंखला से उत्तर में उसी के समीप 5 हजार फीट की ऊंचाई पर बेलूखा झील है। इसी के तट पर 14784 फीट ऊंचा बेलूखा पर्वत है जिसे आज भी अल्टाई भाषा ( अतलाई या इलावृतायी) में उच्च-सुमेर कहा जाता है।  )
 
         उस युग में पूरे क्षेत्र में आवागमन सरल था उत्तरी ध्रुव प्रदेश भी हिम से ढका हुआ नहीं रह गया था था और हिमालय आज इतना ऊंचा नहीं था। वह क्रमश: बढ़ रहा था, मध्य सागर ( टेथिस सागर ) इस क्षेत्र से विलुप्त हो चुका था | पृथ्वी पर जीवन योग्य परिस्थितियों बढ़ने पर  जीवन व जीव का तेजी से विकास इसी क्षेत्र में हुआ | 

          हिमालय के उद्भव के उपरांत इसका दक्षिणी भाग जो तदुपरांत भारतीय प्रायद्वीप बना |  भौगोलिक रूप से पृथ्वी का सबसे सुरक्षित एवं जीवन योग्य स्थल होने के कारण यही स्थल मानव का प्रथम पालना बना जहां आदि-मानव अवतरित एवं विकसित हुआ, उन्नत हुआ मनु-पुत्र मानव बना | 
        पृथ्वी स्थिर हो चली थी  तदन्तर हिमालय द्वारा उत्तरीय भाग से पृथक हुए भौगोलिक खतरों, जलवायु, हिमयुगों से अपेक्षाकृत सुरक्षित दक्षिण के भूभाग ‘भारतीय उपमहाद्वीप’ में मानव स्थिर होना प्रारम्भ हुआ एवं आगे प्रगति-पथ पर आरूढ़ हुआ,..उन्नति के विभिन्न सोपानों को प्राप्त करता हुआ चतुर्दिक विश्व भर में फैलता एवं प्रगति का पथ दिखाता हुआ गतिमान होता रहा एवं वंश वृद्धि करता रहा
         इसी क्षेत्र में  मानव कोटियाँ एवं  आदि बोलियों / भाषाओं इत्यादि का विकास प्रारम्भ हुआ जिसका उन्नत रूप आदि-संस्कृत.....आर्यन-संस्कृत था जो समस्त विश्व, जम्बू-द्वीप की भाषा थी, जिससे मानव के विश्व में प्रसार के साथ-साथ समस्त विश्व की भाषाओं व संस्कृतियों का जन्म हुआ| 
                     
       इस प्रकार मानव के उन्नततम रूप, संसार की सबसे उन्नत भाषा वैदिक-संस्कृत व संस्कृति का क्रमिक विकास भारत में हुआ और उन्नत मानव सारे विश्व में अपनी संस्कृति व ज्ञान एवं दिव्यता लेकर फैलता रहा विविध देशों व जीव-मानव की उन्नत कोटियों का सृजन करते हुए|..

           देव अर्यमा, मित्र व वरुण- पृथ्वी... स्थल, जल व आकाश.....के संचालक हुए | विचार, सत्य, ज्ञान, न्याय व आचरण श्रेष्ठता के कारण मनु-पुत्र... पृथ्वी के मानव को  पृथ्वी, पितरलोक व न्याय के  देवता अर्यमा के नाम पर आर्य कहा जाने लगा जो तत्पश्चात श्रेष्ठ के अर्थों में प्रयोग लाया गया एवं अन्य सभी देवताओं व मानव से इतर एवं मानवीय श्रेष्ठता से च्युत जातियों  को अनार्य कहा गया| 
          .  
             रूद्रशिव, ब्रह्मा, इंद्र, विष्णु व अन्य देवता आर्यों के आराध्य थे | केस्पियन-सागर क्षेत्र जीव-सृष्टि के सृष्टा महर्षि कश्यप एवं कैलाश क्षेत्र समस्त जीव-सृष्टि के ज्ञान-विज्ञान प्रदाता, कुशलतम योद्धा आदि महानायक भगवान शिव का निवास क्षेत्र बना | 

         
         (  यूयं विश्वं परि पाथ वरुणो मित्रो अर्यमा |
                      
युष्माकंशर्मणि परिये सयाम सुप्रणीतयो.अति दविषः ||
             मेरुश्रृंगान्तरचर: कमलाकरबान्धव:।
                        अर्यमा तु सदा भूत्यै भूयस्यै प्रणतस्य मे।। )

      लगभग बीस हजार वर्ष पूर्व जब हिमालय श्रेणी का विकास होगया उसे पार करना कठिन हुआ तो उन्नत सभ्यता सहित भारतीय आर्य चारों ओर विश्व में प्रसार करने लगे और दक्षिण-भारत की और उन्मुख हुए परन्तु विंध्यगिरि पर्वतमाला दुर्गम थी जिसको आर्यगण पार करना चाहते थे |
  
                        विंध्यगिरि-
     पौराणिक कथ्य है कि---- अगस्त ऋषि से अनुरोध किया गया ...आप विन्ध्याचल की वृद्धि रोकने की कृपा करें। वे अपनी पत्नी लोपामुद्रा सहित विंध्यगिरि के पास पहुंचे और और कहा..."हे विंध्य ! मैं दक्षिण जाना चाहता हूं, तुम मुझे मार्ग दो। विंध्य ने सिर झुकाकर अभिवादन किया, अगस्त्य ने आशीर्वाद के साथ कहा जब तक मैं लौटकर नहीं आता, उस समय तक तुम इसी प्रकार झुके ही रहो | विंध्यगिरि बिना ऊंचा उठे आज भी ऋषि अगस्त और उनकी पत्नी के वापस आने की प्रतीक्षा कर रहा है।
      वस्तुतः ऋषि अगस्त एक महान खोजकर्ता व वैज्ञानिक थे| विन्ध्याचल विश्व की सबसे पुरानी पर्वत श्रृंखला है इसीलिये दुर्गम भी, उनसे अनुरोध किया गया किइस क्षेत्र में जनसंख्या की वृद्धि के कारण दक्षिण के क्षेत्र को बसाने की व उन्नत करने की आवश्यकता है अतः आप इस दुर्गम श्रृंखला में सुगम मार्ग खोजें एवं पर्वत श्रंखला तथा उस पार के क्षेत्र को प्रगति व उन्नति की मुख्य धारा में सम्मिलित करने का उपक्रम करें | ऋषिवर ने यह कर दिखाया और वह स्वयं दक्षिण में ही जाकर बस गए | आवागमन सुलभ होजाने के कारण विंध्यगिरी को अचल, रुका हुआ व झुका हुआ तथा 'विंध्याचल' कहा जाने लगा।