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डा श्याम गुप्त का ब्लोग...

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Lucknow, UP, India
एक चिकित्सक, शल्य-चिकित्सक जो हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान व उसकी संस्कृति-सभ्यता के पुनुरुत्थान व समुत्थान को समर्पित है व हिन्दी एवम हिन्दी साहित्य की शुद्धता, सरलता, जन-सम्प्रेषणीयता के साथ कविता को जन-जन के निकट व जन को कविता के निकट लाने को ध्येयबद्ध है क्योंकि साहित्य ही व्यक्ति, समाज, देश राष्ट्र को तथा मानवता को सही राह दिखाने में समर्थ है, आज विश्व के समस्त द्वन्द्वों का मूल कारण मनुष्य का साहित्य से दूर होजाना ही है.... मेरी तेरह पुस्तकें प्रकाशित हैं... काव्य-दूत,काव्य-मुक्तामृत,;काव्य-निर्झरिणी, सृष्टि ( on creation of earth, life and god),प्रेम-महाकाव्य ,on various forms of love as whole. शूर्पणखा काव्य उपन्यास, इन्द्रधनुष उपन्यास एवं अगीत साहित्य दर्पण (-अगीत विधा का छंद-विधान ), ब्रज बांसुरी ( ब्रज भाषा काव्य संग्रह), कुछ शायरी की बात होजाए ( ग़ज़ल, नज़्म, कतए , रुबाई, शेर का संग्रह), अगीत त्रयी ( अगीत विधा के तीन महारथी ), तुम तुम और तुम ( श्रृगार व प्रेम गीत संग्रह ), ईशोपनिषद का काव्यभावानुवाद .. my blogs-- 1.the world of my thoughts श्याम स्मृति... 2.drsbg.wordpres.com, 3.साहित्य श्याम 4.विजानाति-विजानाति-विज्ञान ५ हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान ६ अगीतायन ७ छिद्रान्वेषी ---फेसबुक -डाश्याम गुप्त

शनिवार, 29 जनवरी 2011

पुराणों की कथायें...तात्विक अर्थ......डा श्याम गुप्त....

                                      ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...
             धर्म के तीन स्तर होते हैं----१- तात्विक ज्ञान---(मेटाफिजिक्स )...२-नैतिक ज्ञान--(एथिक्स )...३-कर्मकांड (राइचुअल्स)....मूलतः कर्मकांडों का जो जन-व्यवहार के लिए होते हैं , जन सामान्य के लिए उन्ही में अज्ञान ( तात्विक व नैतिक भाव लोप होने से ) से अतिरेकता आजाने से वे आलोचना के आधार बन जाते हैं | पुराण कथाएं मूलतः कर्मकांड विभाग में आती हैं ताकि जन जन , जन सामान्य को संक्षिप्त में व्यवहार की बातें बताई जा सकें |
            जब भी कोई व्यवस्था , सभ्यता अत्यंत उन्नत होजाती है तो उसकी बातें , तथ्य व कथ्य स्वतः ही सूत्र व कूट रूप होने लगते हैं , संक्षिप्तता की आवश्यकतानुसार | .....(आधुनिक उदाहरण लें जैसे---भारत के लिए शेर , आस्ट्रेलिया के लिए कंगारू कहना आज आम बात होगई है ).....  भारतीय  पुराण कथाएं सदा अन्योक्ति, कूट व सूत्र रूप में कही गयी हैं , परन्तु उनके वास्तविक/तात्विक अर्थ व्यवहारिक,नीति-परक व सामाजिक नीति व्यवस्था के होते है | अर्थ न समझने के कारण लोग उन्हें प्रायः कपोल-कल्पित कह कर  उनका उपहास भी करते हैं और हिन्दू सनातन धर्म के उपहास के लिए उदाहरण भी |
              विस्तृत रूप से स्पष्ट करने के लिए उदाहरण स्वरुप हम कावेरी नदी की कथा को लेते हैं|   कावेरी की पौराणिक कथा व स्थानीय जन श्रुति यह है----
           सहा-पर्वत ने अपनी लजीली बेटी कावेरी को उसके पति समुद्रराज के पास भेजा। जब बेटी घर से विदा होकर चली गई तब सहा-पर्वत को भय हुआ कि कहीं ससुरालवाले मेरी बेटी को गरीब न समझ लें। इसलिए उसने कनका नाम की युवती को कई उपहारों के साथ दौड़ाया और कहा कि तुम जल्दी जाकर कावेरी के साथ हो लो।
            
कनका चली गई और 'भागमंडलम' नामक स्थान पर कावेरी से मिली। उपहार का शेष भाग यहीं पर कावेरी को मिला, इस कारण इस स्थान का नाम 'भागमंडलम' पड़ा। परन्तु पिता सहा-पर्वत का भय अब भी दूर नहीं हुआ। उसे लगा कि मैंने पुत्री को उतने उपहार नहीं दिये, जितने कि मैं दे सकता था। उसने हेमावती नाम की दूसरी लड़की को बुलाया और बहुत से उपहार देकर कहा कि तुम किसी ओर रास्ते से तेजी से जाओ। हेमावती स्वयं अपनी सहेली के चली जाने पर दुखी थी। इसलिए सहा-पर्वत की आज्ञा से वह बहुत प्रसन्न हुई और आंख मूंद कर भागी।
            
उधर कावेरी कनका से मिलने के बाद बहुत प्रसन्न हुई ओर विदाई का दु:ख भूल गई।'भागमंडलम' से 'चित्र' नामक स्थान तक दोनों सहेलियां ऊंची-ऊंची चट्रटानों के बीच में हंसती-खेलती, किलोलें करती हुई चलीं, परन्तु "चित्रपुरम' पहुंचने के बाद उनके कदम आगे नहीं बढ़े, क्योंकि वे कुर्ग की सीमा पर पहुंच गई थीं। आगे मैसूर राज्य आ गया था। उसमें प्रवेश करने का मतलब नैहर से सदा के लिए बिछुड़ना था। इस कारण वे असमंजस में पड़ गई और ३२ कि.मी. तक कुर्ग और मैसूर की सीमा से साथ-साथ चलीं । चित्रपुरम से 'कण्णेकाल' के आगे कावेरी भारी मन से अपने पिता के घर से सदा के लिए बिछुड़ गई। बिछोह का दु:ख उसे इतना था कि वह मैसूर के हासन जिले में पहाड़ी चट्रटानों के बीच में मुंह छिपाकर रोती हुई चली। तिप्पूर नामक स्थान पर वह उत्तर की ओर मुड़ी, मानो पिता के घर लौट आयगी, परन्तु देखती क्या है कि उसकी सहेली हेमावती उत्तर से बड़े वेग से चली आ रही है। उसी स्थान पर दोनों सहेलियां गले मिलीं।
       अब कावेरी नदी का वास्तविक भौगोलिक स्वरुप देखिये -----
--------पश्चिमी घाट के उत्तरी भाग में एक सुन्दर राज्य है, जिसे कुर्ग कहते हैं। राज्य में एक पहाड़ का नाम सहा-पर्वत है। इस पहाड़ को 'ब्रह्माकपाल' भी कहते हैं।
              
इस पहाड़ के एक कोने में एक छोटा सा तालाब बना है। तालाब में पानी केवल ढाई फुट गहरा है। इस चौकोर तालाब का घेरा एक सौ बीस फुट का है। तालाब के पश्चिमी तट पर एक छोटा सा मन्दिर है। मन्दिर के भीतर एक तरुणी की सुन्दर मूर्ति स्थापित है। मूर्ति के सामने एक दीप लगातार जलता रहता है।
                  
यही तालाब कावेरी नदी का उदगम-स्थान है। पहाड़ के भीतर से फूट निकलनेवाली यह सरिता पहले उस तालाब में गिरती है, फिर एक छोटे से झरने के रुप में बाहर निकलती है। देवी कावेरी की मूर्ति की यहां पर नित्य पूजा होती है। कावेरी का स्रोत कभी नहीं सूखता।

                    
कावेरी कुर्ग से निकलती अवश्य है, पर वहां की जनता को कोई लाभ नहीं पहुंचाती। कुर्ग के घने जंगलों में पानी काफी बरसता है, इस कारण वहां कावेरी का कोई काम भी नहीं है, उल्टे कावेरी कुर्ग की दो और नदियों को भी अपने साथ मिला लेती है और पहाड़ी पट्रटानों के बीच में सांप की तरह टेढ़ी-मेढ़ी चाल चलती, रास्ता बनाती, मॅसूर राज्य की ओर बढ़ती है।

                 
कनका से मिलने से पहले कावेरी की धारा इतनी पतली होती है कि उसे नदी के रुप में पहचानना भी कठिन होता है। कनका से मिलने के बाद उसे नदी का रुप और गति प्राप्त होती है। सहा'पर्वत से बहनेवाले सैकड़ों छोटे-छोटे सोते भी यहां पर उसमे आकर मिल जाते हैं। इस स्थान को 'भागमंडलम' कहते हैं। हेमावती नदी कर्नाटक राज्य के तिप्पूर नामक स्थान पर कावेरी से आकर मिलती है।

             
       --और यह है स्थानीय कर्मकान्ड.......
  कावेरी के उदगम-स्थान पर हर साल सावन के महीने में बड़ा भारी उत्सव मनाया जाता है। यह है कावेरी की विदाई का उत्सव। कुर्ग के सभी हिन्दू लोग, विशेषकर स्त्रियां, इस उत्सव में बड़ी श्रद्धा के साथ भाग लेती हैं। उस दिन कावेरी की मूर्ति की विशेष पूजा होती है।'तलैकावेरी' कहलानेवाले उदगम-स्थान पर सब स्नान करते हैं। स्नान करने के बाद प्रत्येक स्त्री कोई न कोई गहना, उपहार के रुप में, उस तालाब में डालती है। यह दृश्य ठीक वैसा ही होता है, जैसा कि नई विवाहित लड़की की विदाई का दृश्य |
------ कथा का तात्विक अर्थ भौगोलिक वर्णन है तथा नैतिक (एथीकल) अर्थ पिता की पुत्री के प्रति   चिंता का व सखियों के प्रेम का सुन्दर समन्वयात्मक वर्णन|-----यही सभी पौराणिक कथाओं के लिए सत्य है |


गुरुवार, 27 जनवरी 2011

फ़िर न कहना हमें खबर न हुई------डा श्याम गुप्त....


                   युगों से भारतीय सन्स्क्रिति, भारतीयता, वैदिक धर्म  के विरुद्ध षड्यन्त्र होते रहे हैं...यह वास्तव में सत-असत, अच्छाई-बुराई, सदाचारी व्यवस्था- भोगी व्यवस्था  में  सनातन संघर्ष है...(वस्तुतः अच्छी व्यवस्था के विरुद्ध सदा षड्यन्त्र होते ही रहते हैं--अन्धकार सदा प्रकाश पर हावी होने का प्रयत्न करता रहता है )---समय समय पर अवतारों की अवधारणा व उत्पत्ति इसी के लिये हुई।  वर्तमान में--मुगल व अन्य विदेशी विधर्मी आक्रान्ताओं द्वारा तलवार के बल पर इस कार्य को अन्जाम देना शुरू किया, विश्व प्रसिद्द भारतीय पुस्तकालयों, ग्रन्थों, विध्यालयों के नाश द्वारा....तत्पश्चात  अन्ग्रेज़ों की सुनियोजित षडयन्त्र्कारी नीति, क्योंकि वे समय क्रमानुसार अधिक चालाक थे , सुनियोजित रूप से भारतीय ग्रन्थों, भारतीय ग्यान,-- प्रत्येक भारतीय विधा चाहे वह सब्जी खाना य बेचना ही हो---को गलत रूप में प्रस्तुत करना प्रारम्भ किया---विग्यान का, उन्नति का , परीक्षण, प्रयोग,खोज ---आदि सभी का सहारा लेकर, भाषा विग्यान, भौगोलिक-तथ्य, धार्मिक तथ्य, वेदिक-पौराणिक ग्यान के अर्थ-अनर्थ करके , तोड मरोड कर प्रस्तुत तथ्यों द्वारा भारतीय /वैदिक सन्स्क्रिति को निम्न, हेय व भारतीय बातों को असत्य प्रस्तुत करना प्रारम्भ किया---और यह सुनियोजित षडयन्त्र आज तक चल रहा है और उसमें कुछ अपने भारतीय...काले-अन्गेज़ भी शामिल हैं( बास्तव में कोई भी चाल अपने देश द्रोही लोगों के मिले बिना पूरी हो ही नहीं सकती)।
                 इसी  का एक नया स्वरूप ब्लोग की दुनिया पर भी अवतरित हुआ है--- कोई डा अनवर ज़माल हैं, जो स्वयं को हिन्दू-ग्रन्थों ..वेद, उपनिषद, पुराणों का ग्याता व  स्वयं को संसार में धर्म, हिन्दूधर्म और भारत का एक मात्र उद्धारक भी घोषित करते रहते हैं।परन्तु वास्तव में उनका उद्देश्य वैदिक-ग्यान व  हिन्दुओं को उनकी, उनके ग्रन्थों, उनके धर्म, शास्त्रों, रीति-रिवाज़ों की अनर्थ मूलक  कमियां दिखा कर  इस्लाम का सुनियोज़ित प्रचार करना है......वे सामुदायिक ब्लोगों पर स्वयं तो धार्मिक( मूलतः हिन्दुओ के) निन्दा के आलेख लिखते रहते हैं  प्रश्न पूछते रहते है परन्तु अन्य लोगों के उत्तर व टिप्पणियों और  पोस्टों पर अशोभनीयभाषा व उत्तेज़नात्मक शब्दों का प्रयोग करके विवादों को जन्म देते हैं  व सभी अन्य लोगों की पोस्ट को  ईश-निन्दा घोषित करते रहते हैं-ताकि अन्य लोगों की पोस्टें धार्मिक -विवादित घोषित होजायं और ब्लोग एड्मिनिस्त्रेटर व लेखक आदि डर कर या विवाद से बचने के लिये ( जैसे लाल चौक पर देश का तिरन्गा झन्डा फ़हराने का सरकारी डर  व तुष्टीकरण नीति)---- हिन्दू/ वैदिक धर्म, विग्यान ,साहित्य  पर  कोई बात ही न कर पाय व सब लोग  लिखना ही बन्द करदें......और उनका मूल उद्देश्य सफ़ल हो.....। आश्चर्य की बात है कि अनवर जी के व्यर्थ के कुतर्कों आदि का किसी भी मुस्लिम या इस्लामी विद्वान ने उत्तर व टिप्पणी नहीं दी। मैनें व हरीश जी  व कुछ अन्य ने प्रति-उत्तर दिये तो अनवर जी अशोभनीय भाषा का प्रयोग करने लगे , ताकि विवाद उत्पन्न हो और वे अपने मूल उद्देश्य में सफ़ल हों।
        एसे लोग न सिर्फ  अन्य धर्म व  मानवता अपितु  स्वयम  अपने धर्म/समाज  के लिए खतरा होते हैं क्योंकि इससे सामाजिक वैमनष्य  फैलता  है एवं क्रिया-प्रतिक्रया उत्पन्न होती है |  जब तक स्वयम उनका अपना समाज व धर्म उनका बहिष्करण व प्रतारण नहीं करेगा अपनी विश्वसनीयता नहीं बना पायेगा |
       अनवर ज़माल जी यह भी कहते हैं कि वे ईश-निन्दा के विरुद्ध अवश्य बोलेंगे और एक अकेले वे ही धर्म व ईश्वर के बारे में सब को ग्यान दे सकते हैं.....लगता है आजकल ईश्वर अपनी रक्षा स्वयं नही करपारहा अतः उसने अपने ऎजेन्ट रख छोडे है स्वयं के प्रचार व रक्षा  के लिये।  तभी तो घर घर, गली-गली, नगर-नगर, महानगरों में भी पन्डे-पुजारी-बाबा-संत-मौलवी-मुल्ला-पादरी, अपनी दुकानें खोले हुए बैठे हैं जो विभिन्न अनाचारों में भी लिप्त पाये जाते हैं।
               सदा की भांति यह भी एक सुनियोजित  षडयन्त्र है  ताकि वैदिक धर्म, शास्त्र, ग्यान, ग्रन्थों पर लिखना बन्द होजाय व उनके विरुद्ध कुप्रचार को खुली भूमि मिलती रहे, और प्रकाश का दीप हाथ में लिये दुनिया को पुनः राह दिखाने को तत्पर  यह भारतदेश फ़िर से  अग्यान के अन्धकार में  समाने लगे.........समझें.....फ़िर न कहना हमें खबर न हुई....


बुधवार, 26 जनवरी 2011

भारत माता...डा श्याम गुप्त की काव्य रचना....

                        
 
                भारत माता
                ( श्याम-सवैया छन्द--६ पन्क्ति )

                            --१--
भाल रचे  कंकुम केसर, निज हाथ में  प्यारा तिरंगा  उठाए।
राष्ट्र के गीत बसें मन में,उर राष्ट्र के गान की प्रीति सजाये।
अम्बुधि धोता है पांव सदा,नैनों में विशाल गगन लहराये।
गंगा जमुना शुचि नदियों ने,मणि मुक्ताहार जिसे पहनाये।
है सुन्दर ह्रदय प्रदेश सदा,  हरियाली जिसके मन भाये।
भारत मां शुभ्र ज्योत्सिनामय,सब जग के मन को हरषाये॥

                   -२-
हिम से मंडित इसका किरीट,गर्वोन्नत गगनांगन भाया ।
उगता जब रवि इस आंगन में,लगता है सोना बरसाया ।
मरुभूमि व सुन्दरवन से सजी, दो सुन्दर बांहों युत काया ।
वो पुरुष-पुरातन विन्ध्याचल,कटि-मेखला बना हरषाया ।
कण-कण में शूरवीर बसते,नस-नस में शौर्य भाव छाया ।
हर   तृण ने इसकी हवाओं के,शूरों का परचम लहराया  ।

                             -३-
इस ओर उठाये आंख कोई,वह शीश न फ़िर उठपाता है ।
वह द्रष्टि न फ़िर से देख सके,इस पर जो द्रष्टि गढाता है ।
यह भारत प्रेम -पुजारी है,   जग -हित ही इसे सुहाता है ।
हम विश्व-शान्ति हित के नायक,यह शान्ति दूत कहलाता है।
यह विश्व सदा से भारत को, गुरु जगत का कहता आता है।
इस युग में भी यह ज्ञान-ध्वजा,नित-नित फ़हराता जाता है।।

                           -४-
इतिहास बसे अनुभव-संबल,मेधा-बल,वेद-रिचाओं में।
अब रोक सकेगा कौन इसे,चलदिया आज नव-राहों में।
नित नव तकनीक सजाये कर,विग्यान का बल ले बाहों में।
नव ज्ञान तरंगित इसके गुण,फ़ैले अब दशों दिशाओं में।
नित नूतन विविध भाव गूंजें,इसकी नव कला-कथाओं में।
ललचाते देव मिले जीवन, भारत की सुखद हवाओं में ॥
       

सोमवार, 24 जनवरी 2011

..दशावतार. व बुद्ध अवतार....बलराम या बुद्ध...एक स्प्ष्टीकरण---- डा श्याम गुप्त....


--अभी हाल में ही एक ब्लोग पर दशावतार के बारे में लिखे जाने पर --बुद्ध अवतार पर काफ़ी चर्चा हुई ,अपितु कुछ लोग तो, बलराम अवतार नहीं, बुद्ध को  भागवत में पापावतार क्यों लिखा गया,आदि के प्रश्नों के ही पीछे पडे रहे...अतः इस बारे मे कुछ तथ्य रखना आवश्यक होगया...... ----------निश्चय ही भागवत से पहले दशावतार में बलराम का नाम था।...  ये अवतार सदा सन्ख्या में बदलते रहे हैं जो १ से लेकर २-३-४-२४-२२-९-१० माने जाते रहे है( यहविस्तृत वर्णन विष्णु-पुराण में है) क्रमशः इतिहास व मानव प्रगति के साथ सामाजिक/ सांस्कृतिक समन्वय व  गतिमयता हेतु--- सबसे पहला अवतार  पुरुष अवतार था एकाकी...ईश्वर का व्यक्त भाव---  तत्पश्चात २-४-२२-२४ होते गए , बाद में समन्वयात्मकतानुसार  मूल दशावतार स्वीकारे गए | युगों पश्चात बुद्ध के आविर्भाव से पहले  -कालान्तर में--- हिन्दू धर्म में कालक्रम प्रभाव व भौतिकता बढने के कारण वैदिक विग्यान/ ग्यान की कमी से कर्मकान्डों की अतिरेकता होचली थी,अतः वैदिक नीति--अति-सर्वत्र वर्ज्ययेत -के पालन  अनुसार क्रम में  ---- १- बुद्ध की कर्मकान्ड विरोधी बातें सामयिक रूप से उचित थीं अतः उन्हें भागवतकार ने बुद्ध को विष्णु का एक अवतार का रूप मानकर राष्ट्रीय, सामाजिक व सान्स्क्रितिक समन्वय के भारतीय स्वरूप का प्रतिपादन किया। बाद में कुछ अन्य पुराणों में भी बुद्ध को अवतार स्वीकार किया गया | यद्यपि अन्य पुराण व शास्त्र बलराम को ही अवतार मानते रहे | २- क्योंकि उनका दर्शन अनीश्वरवादी था अतः उन्हें रिणात्मक अवतार ( वास्तव में स्पष्टतः कहीं उन्हे पाप अवतार नहीं कहा गया है) कहागया कि, स्वयम विष्णु  अतिरेकता समाप्ति के लिए अवतरित हुए । ३- भागवत धर्म की एक शाखा कृष्ण  को पूर्ण भगवान मानकर सिर्फ़ ९ अवतार ही मानती थी, अतः कहीं बलराम+=१०, कहीं बाद में बुद्ध+= १० कहीं क्रष्ण+बुद्ध= १० माना जाने लगा । ४-वास्तव में भागवतकार ने अत्यन्त चतुरता का परिचय दिया, विद्रोही को अपना बनालो, विद्रोह समाप्त--निंदक नियरे राखिये...-बुद्ध धर्म के( अनीश्वरीय व अति-वैराग्य  दर्शन अंततः पतन को प्राप्त होता है)  प्रभाव को कम करने व बुद्ध-दर्शन से भारतीय-वैदिक धर्म की शुद्धि्करण करने हेतु बुद्ध को भगवान की अपेक्षा विष्णु का अवतार स्वीकृति  से बौद्ध धर्म का फ़ैलाव कम हुआ। और अंतत वह महत्वहीन होकर रहगया | ----वास्तव में बौद्ध लोगों ने उन्हें कभी भी विष्णु अवतार स्वीकार नहीं किया ।और कुछ शास्त्र व पुराण भी बलराम को ही अवतार मानते रहे |
-यदि  ध्यान से देखा जाय  तो हिन्दू/वैदिक धर्म में अवतारों का वास्तविक अभिप्रायः ही--बोधिसत्व भाव, बुद्ध भावना रही है,जो बुद्ध के जन्म से बहुत पहले ही से उपस्थित है अर्थात समय समय पर धर्म का बोध कराना---"यदा यदा हि..".आदि। अतः इस सर्वग्राही कल्चर, संस्क्रिति, धर्म, जीवन शैली को- समाज, देश, राष्ट्र ,संस्कृति व मानवता   की भलाई हेतु बुद्ध को भी स्वीकार करने में उन्हें कोई परेशानी नही हुई।

रविवार, 23 जनवरी 2011

-प्रयाण गीत ---डा श्याम गुप्त ....

नवीन राह पग धरो....२३ जनवरी नेताजी सुभाष बोस के जन्मदिवस  पर --प्रयाण गीत ---


न तुम निराश हो कि,
पूछता हमें नहीं कोई |
न तुम निराश हो कि,
सूझती न राह अब कोई ||


हर तरफ है स्वार्थ और-
दंभ की हवा चली |
कराहती मनुष्यता, औ-
आस्था गयी छली ||


मनुष्य ही मनुष्यता का,
शत्रु होरहा है अब |
सज़ा रहा स्वयं के ,
विनाश का ही साज़ सब ||


आदमी को आदमी से,
प्रीति-भाव ही नहीं|
न्याय सत की बात अब,
कोई समझ पाता नहीं ||


हाँ राजनीति आजकी,
कुटिलता नीति होगई |
हाँ रीति-नीति आज सब,
अनीति प्रीति हो गयी ||


हाँ धर्म नीति ,शास्त्र से,
विभिन्न रीति बन गयी |
औ कर्म-नीति स्वार्थ से,
अभिन्न हुई तन गयी ||


मानते हैं सत को आज 
पूछता ही कौन है |
काक गाते रागिनी,औ 
कीर-पिक मौन हैं ||


न देश राष्ट्र भक्ति की,
भावना उभर रही |
न राष्ट्र-देश हेतु ,कोई-
कामना संवर रही ||


सुख-साधनों की भीड़ में,
हम अकेले होगये|
मीत मौज मस्तियों के,
मेले कहीं खोगये ||


कवि और शायर भी कहाँ ,
अब , राष्ट्र गीत गारहे |
चारणों के वेश में ,
हैं वन्दना सुना रहे ||

हाँ आज काली रात है,
आयेगा नव प्रभात भी |
 चढ़ेगा सूर्य फिर वही,
फैलेगा नव-प्रकाश भी ||

निज शास्त्र नीति भूलकर,
अप-भाव नीति बह चले |
बैठ करके कागजों की,
नाव में हैं हम चले ||


थका नहीं प्रताप था,
जो जीतने की चाह थी |
झुका नहीं सुभाष था ,
क्या जूझने की राह  थी ||


न कोई साथ दे अगर,
जो राह में,न गम करो |
अकेले ही चले चलो,
न तुम रुको न तुम डरो ||


जो धीर हैं भला कभी,
रुकावटों से कब रुके |
है वीर,जो न दुश्मनों के,
सामने कभी झुके ||


न भटको सत्य राह से,
न छोडो राह , आस की |
वो राह चलके आयगी,
स्वयं तुम्हारे पास ही ||


तुम सपूत देश के ,
यूं कंटकों से क्यों डरो  |
नव दीप लिए हाथ में,
नवीन राह पग धरो ||

शुक्रवार, 21 जनवरी 2011

महंगाई .....उद्योगपतियों ने सरकार को चेताया....

          देश के छः उद्योगपतियों ने सरकार को चेताया ...महंगाई त्राहिमाम...इसे कहते हैं ...मौसेरे भाइयों का नाटक ....बम्बैया सिनेमा में एक सीन बार बार आता है कि ..........एक चोर चोरी करके भागता हा..उसके पीछे लोग पकड़ने दौड़ते हैं...चोर भी उन्हीं में शामिल होकर .चोर चोर चिल्लाता हुआ एक तरफ निकलजाता है और लोग ढूँढते रह जाते हैं...... मेरा एक अगीत भी याद आता है....
"चोरों ने संगठन बनाए,
मिलकर चोर-चोर चिल्लाए 
चालें चल हरिचंद हटाये,
  जोड़ तोड़ ,सत्ता में आये
जनता सिर धुन कर पछताए |"
              बड़े बड़े उद्योगपति जो स्वयं ही महंगाई, भ्रष्टाचार, अनाचार, कुसंस्कार के मूल कारण हैं वही आज ६०-६२ साल तक  जनता-देश को खूब लूटकर आज महंगाई के लिए सरकार को ख़त लिख रहे हैं.......
---१-  ये उद्योगपति ही नेताओं व सरकार, मंत्रियों  के साथ मिलकर अरबों का घुटाला करते हैं ,उन्हें (सरकारी अफसर /बाबू जिनका अक्सर ज़िक्र होता है वे तो बहुत पीछे हैं )बड़ी बड़ी  रिश्वत देकर भ्रष्टाचार  में लिप्त होकर महंगाई  व नकली महंगाई  की उत्पत्ति के कारण बनाते हैं |
---२--ये उद्योगपति ही व्यापार/बाज़ार  स्पर्धा के कारण नित नए नए उपभोग के संसाधन ..कार,मोबाइल. टीवी आदि के नए नए माडल पेश करके, बनाकर, विदेशों से नक़ल करके उपभोगिता बाद को बढ़ावा देकर ...महात्मा गांधी के सादा जीवन के विचारों की होली जलाकर ...भ्रष्टाचार व महंगाई का कारण पैदा करते हैं....( गांधी की भांति विदेशी सामान की होली फिर से जलाना शायद इसका उपाय हो सकता है)
---३--ये लोग ही साठ करोड़ के कर की चोरी करके दस करोड़ टेक्स जमा करके स्वयं को अधिक कर प्रदाता बताते हैं और इनकम टेक्स विभाग को लांछन भी ...
---४--ये लोग ही खेळ व खिलाड़ियों पर पैसा लगाकर , खिलाड़ियों की कीमत पर अरबों कमाते व घुटाले में लिप्त होकर घर घर में भ्रष्टाचार तथा महंगाई का कारण बनाते हैं.....
---५-- ये लोग ही अमेरिका से क्लर्की के काम को ( मूलतः इन्फो-टेक अमेरिका का बाबूगीरी वाला काम ही है ) ठेके पर लेकर  देश के युवाओं को लम्बी लम्बी तनखाओं के रूप में उनकी परचेजिंग पावर / खर्चे की पावर बढ़ाकर --उसी विदेशी माल पर उस तनखा को खर्च कराकर देश में , अति-सुविधाभोगी संस्कृति द्वारा महंगाई , भ्रष्टाचार एवं रात रात भर जाग कर कार्य करने की शैली द्वारा अनाचार की संस्कृति को प्रश्रय देते हैं....
---६-- ये उद्योगपति ही अपनी पत्नियों. प्रेमिकाओं को अरबों -खरबों के महलनुमा घर तोहफे देकर --देश के युवाओं को येन-केन -प्रकारेण शीघ्रातिशीघ्र ..अम्बानी, नारायनमूर्ती, माल्या ,  होने का सपना दिखाते हैं , जिसकी परिणति  अंततः अति-सुविधाभोगी संस्कृति का दुश्चक्र  द्वारा भ्रष्टाचार, महंगाई, अनाचार, दुराचार में ही होती है |