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डा श्याम गुप्त का ब्लोग...

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Lucknow, UP, India
एक चिकित्सक, शल्य-चिकित्सक जो हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान व उसकी संस्कृति-सभ्यता के पुनुरुत्थान व समुत्थान को समर्पित है व हिन्दी एवम हिन्दी साहित्य की शुद्धता, सरलता, जन-सम्प्रेषणीयता के साथ कविता को जन-जन के निकट व जन को कविता के निकट लाने को ध्येयबद्ध है क्योंकि साहित्य ही व्यक्ति, समाज, देश राष्ट्र को तथा मानवता को सही राह दिखाने में समर्थ है, आज विश्व के समस्त द्वन्द्वों का मूल कारण मनुष्य का साहित्य से दूर होजाना ही है.... मेरी तेरह पुस्तकें प्रकाशित हैं... काव्य-दूत,काव्य-मुक्तामृत,;काव्य-निर्झरिणी, सृष्टि ( on creation of earth, life and god),प्रेम-महाकाव्य ,on various forms of love as whole. शूर्पणखा काव्य उपन्यास, इन्द्रधनुष उपन्यास एवं अगीत साहित्य दर्पण (-अगीत विधा का छंद-विधान ), ब्रज बांसुरी ( ब्रज भाषा काव्य संग्रह), कुछ शायरी की बात होजाए ( ग़ज़ल, नज़्म, कतए , रुबाई, शेर का संग्रह), अगीत त्रयी ( अगीत विधा के तीन महारथी ), तुम तुम और तुम ( श्रृगार व प्रेम गीत संग्रह ), ईशोपनिषद का काव्यभावानुवाद .. my blogs-- 1.the world of my thoughts श्याम स्मृति... 2.drsbg.wordpres.com, 3.साहित्य श्याम 4.विजानाति-विजानाति-विज्ञान ५ हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान ६ अगीतायन ७ छिद्रान्वेषी ---फेसबुक -डाश्याम गुप्त

बुधवार, 18 जनवरी 2012

कविता (ब्रज भाषा ) कवि, कविता ,अखबार ......डा श्याम गुप्त

                               ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...

पहुन्चौ एक दिना मैं ,
एक कवि सम्मलेन में |
घोषणा हती-' कछु पल माहिं-
कविजी कौ आगमन होत रहै|'                

गरीब जी हते वे , अरु -
कहलावें थे जा युग के 'निराला'-
कांख में लटकौ  झोला खाली,
गले में अटकी हाला |

बातनि बातनि बीच ही वे ,
कही लेत थे उक्तियाँ ,
भारी भरकम विनकी काया ,
कहि रहे थे पंक्तियाँ ;-
" हाय कैसी करुन गाथा ,
बाल मिट्टी छांटते |
और अवलाएं बिचारी ,
कूटती भईं गिट्टियां |
भूख ते बेहाल तन मन ,
जुवा माटी ढोय  रहे,
वृद्ध बालक उन घरन में ,
भूखी ते हैं रोय  रहे |"

दई गयीं  नेतान कौं, अरु-
सासन कौं हूँ कछु गालियाँ |
झूमि उठे लोग सब,
सुनिकैं बजाईं तालियाँ |

एक श्रोता नैं जो उठि कें, पूछौ-
कै ये तौ बताइये |
कौन, का कारण है जाकौ ,
किरपा करि समुझाइये |
और सबके सार में -
 समाधान तौ कहि जाइए |
कविता सुनिवे कौ हमें ,
कछु लाभ तौ दिलवाइये |

कविजी बोले, भैया-
हम तौ कवि हैं ,
यथारथवादी हैं ,
दरपन दिखावत हैं ,
भौगौ साँचु बतावत हैं ;
समाज में का है रहौ है ,
ये समुझावत हैं |
समाधान तौ -
सासन व जनता कौं खोजिवै  चाहियें -
हम तौ कवि हैं ,
लिखत हैं और गावत हैं |

श्रोता बोलौ--फिरि-                                      
कविता कवि और साहित्य की ,              
का  आवश्यकता है, महाराज ;
समाचार जानिवे कें लियें तौ -
अखबार ही सबते सस्तौ  है आज ||

सोमवार, 16 जनवरी 2012

भारतीय तत्व-ज्ञान का सार व महत्ता .. डा श्याम गुप्त

                          ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...

            भारतीय तत्व ज्ञान जिन्हें  सनातन धर्म या वैदिक धर्म के मूल सिद्धांत कहा जाता है वस्तुतः सिर्फ एक धर्म ही नहीं अपितु एक जीवन शैली है, संसार-जगत में मानव कैसे व्यवहार करे , इसकी एक सुस्पष्ट अवधारणा है   | यह विश्व में एवं मानव इतिहास में एक अनूठी, अप्रतिम , अप्रमेय  अवधारणा है जो  ब्रह्म, जीव, माया की त्रिगुण भाव धारणा के साथ  संसार-सागर  में कैसे उतरें व पार करें का स्पष्ट ज्ञान देती है |  मानव के प्रत्येक प्रश्न, तर्क, शंका, भ्रम का समाधान व निवारण करके सदैव प्रश्नातुर मानव-मन को परम शान्ति प्रदान करके अपने स्व-कर्म में स्थित होने का सन्देश देती है |  यद्यपि इस  आदि-ज्ञान  पर प्रायः द्विधा-पूर्ण, भ्रमात्मक, दोहरी बातें कहने के आरोप लगाए जाते हैं | परन्तु यही तो विशिष्टता है इस अध्यात्मिक-धार्मिक -व्यवहारिक दर्शन की जो अनूठी है |
           उदाहरण के लिए हम एक घटना को लें |  आदि- शंकराचार्य जब एक चांडाल के अपने रास्ते में आजाने पर  'दूर हटो ' कहने लगे तो चांडाल का कथन था की आप ही तो कहते हैं की ब्रह्म एक है सभी तत्वों में वही ब्रह्म है तो फिर मुझे दूर हटाने को क्यों कह रहे हैं ....शंकराचार्य ने अपनी भूल मानी और चांडाल को ज्ञानी मानकर उसे अपना गुरु माना|  कहा तो यह जाता है कि वह चांडाल स्वयं महादेव थे |
             शंकराचार्य अपने स्तर पर सही थे, ब्रह्म एक ही है तो फिर यह सब क्या, परन्तु वे कृष्ण नहीं थे ..स्वयम ब्रह्म-रूप नहीं थे  |   यदि कृष्ण होते तो वे क्या कहते ?  वे कहते कि..महात्मन सत्य ही ब्रह्म एक है आप में भी वही ब्रह्म है परन्तु इस बेश-भूषा, इस कर्म-भाव में वह ब्रह्म जो जीव रूप में आपमें है वह माया से ढका हुआ है |  वह ब्रह्म इस समय  ज्ञान व भक्ति से परे सिर्फ कर्म  का धर्म धारण किये हुए है अतः  निश्चय ही  वह शुद्ध ब्रह्म नहीं है और मुझे ( प्रत्येक व्यक्ति को ) आपसे सचेत रहना चाहिए | जब वह माया लिपटा हुआ जीव रूपी  ब्रह्म, ज्ञान भक्ति सहित कर्म से शुद्ध ब्रह्म रूप में आयेगा तभी वह ब्रह्म - ब्रह्म समझा जाएगा | इस रूप में तो आप अपने निकृष्ट कर्म के कारण अस्पर्श्य हैं |
             जब आदि-शंकर कहते हैं कि ..'ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या ..'  यदि जगत मिथ्या है तो क्या कर्म न किया जाय | क्या शंकर असत्य कहते हैं ? नहीं....  जगत वास्तव में ही मिथ्या है ब्रह्म ही सत्य है ..जगत तो- ब्रह्म के ( संसार-चक्र हेतु ), जीव रूप में  माया से लिप्त हो  जाने के कारण  रूप सृष्टि का भाव बनता है .अतः ...इसे मिथ्या मान कर ही समस्त कर्म करना चाहिए..परन्तु ज्ञान व भक्ति के साथ .... | उपनिषद् कहती है..'कुर्वन्नेह कर्मणि जिजीविषेच्छतं समा ..' अर्थात कर्म तो अवश्य ही  करना है ....फिर कौन असत्य है ?  यही तो विशिष्टता है---द्वैत  में एकत्व  व ..स्पष्टता..|   गीता कहती है कि ...ज्ञान व भक्ति के योग के साथ यदि कर्म किया जाय वही योग है ,...' मा फलेषु कदाचन ' तभी  उपनिषदकार के अनुसार ...,.न कर्म लिप्यते नर ..' | इसे सम्पूर्ण करती हुई ईशोपनिषद कहती है....कि     जो अविद्या ( अर्थात ..भौतिकता, सांसारिक, व्यवसायिक ज्ञान ) में ही लिप्त रहता है वह अनेकों अन्धकार में अर्थात कष्टों में घिर जाता है--जो आज के भौतिकता में लिप्त मानव के कष्टों  की दशा स्पष्ट करता है ;  परन्तु जो सिर्फ विद्या ( ब्रह्म ज्ञान, ज्ञान  )में ही लिप्त रहता है वह तो और भी अधिक रौरव अन्धकार अर्थात महानतम कष्टों में घिर जाता है,जो आज के कर्महीन लोग सिर्फ वाचालता, धार्मिक पाखण्ड , अंधविश्वास में रत मानव, एवं सिर्फ ज्ञानान्डम्बर व ज्ञान अहं में रत विज्ञ जन की दशा कहता है ; अतः मनुष्य को .....
"विद्या  सह अविद्या यस्तत वेदोभय सह |
अविध्यायां मृत्युं तीर्त्वा , विद्यया अमृतमनुश्ते  ||"  
            मनुष्य को ज्ञान व भौतिकता, ईश्वर व संसार, अध्यात्म, भक्ति व सांसारिकता के ज्ञान को साथ-साथ लेकर चलना चाहिए, व्यवहार करना चाहिए  |  सांसारिक,व्यवसायिक  भौतिक ज्ञान से मृत्यु अर्थात इस सांसारिकता को जीत कर( सफल जीवन यापन करके )- ज्ञान,  अध्यात्म,  व भक्ति से --अमृत, अमृतत्व , अमरता अर्थात   मुक्ति-ज्ञान( परम शान्ति, आत्मिक सुख-शान्ति  प्राप्त करना चाहिए |  यही व्यवहारिक मानव कर्तव्य व ज्ञान है |  यही धर्म है, यही अध्यात्म है, यही मोक्ष है |
              

शनिवार, 14 जनवरी 2012

हिन्दी-ब्लोगिन्ग… एक विहंगम द्रष्टि….डा श्याम गुप्त

                               ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ..

                 ब्लोगिन्ग या चिट्ठाकशी..चिट्ठाकारी …चिट्ठालेखन अर्थात इन्टर्नेट पर लेखन -- एतिहासिक पृष्ठभूमि के द्रष्टिकोण से १९९७ के आस-पास प्रारम्भ हुआ । भारत में हिन्दी-ब्लोगिन्ग का २००८ से त्वरित गति से आरम्भ हुआ, साथ ही साथ स्थानीय भाषाओं में भी इसका प्रसार होने लगा। भारत जैसे विशाल देश एवं हिन्दी व स्थानीय भाषाओं में ब्लोग्गिन्ग प्रारम्भ होने के कारण यह विधा तेजी से फ़ैली। और आज हिन्दी ब्लोगिन्ग विश्व के पटल पर अपना प्रभुत्व स्थापित कर चुकी है ।

        ब्लोगिन्ग का मूल उद्देश्य लेखक द्वारा अपने मूल व स्वतन्त्र विचारों को बिना सम्पादन व सन्शोधन के समाज व विश्व के सम्मुख प्रस्तुत करना था । यह ठीक उसी प्रकार था जैसे साहित्य में सामयिक ठेकेदारी, गुटबाज़ी, विशिष्ट वर्ग व समूह-संस्कृति को ठुकराकर ..निराला, महादेवी, प्रसाद जैसे महान स्वतन्त्र लेखक-विचारक-विद्वान साहित्यकारों ने साहित्यिक ठेकेदारों को ठेंगा दिखाकर अपनी कृतियों में बिना किसी से भी भूमिका आदि लिखाये, भूमिका के स्थान पर स्वयं ही बडे-बडे विचारपूर्ण तथ्यात्मक आत्मकथन लिखने की परम्परा डाली। ये साहित्य-जगत व हिन्दी-जगत के प्रथम ब्लोग थे जो प्रिन्ट-मीडिया में लिखे गये।
       परन्तु ब्लोगिन्ग में भी विभिन्न भटकाव आरहे हैं, विज्ञापन, ज्योतिषी लोग व अन्य सन्स्थाएं, विभिन्न साइट्स, पोर्न-विज्ञापन व साइट्स आदि धन्धेबाज़ों के कारनामे इस विधा को भी बद्नाम करने में कोई कसर नहीं छोड रहे।  जिससे साहित्य का स्तर भी निम्न होरहा है । कुछ लोगों ने यह भी कहना प्रारम्भ कर दिया है कि यह निठल्ले व अन्य स्थानों पर असफ़ल लोगों काम है । फ़िर भी हिन्दी- ब्लोगिन्ग एक विश्वव्यापी सक्षम, सशक्त व महत्वपूर्ण साहित्यिक व सामाजिक विधा बन कर आगे आई है ।
       महत्वपूर्ण विषयों व बिन्दुओं पर स्वतन्त्र चिन्तनपरक साहि्त्य, काव्य व आलेखों को बढावा, हिन्दी भाषा व साहित्य का उत्थान, देश-विदेश व सुदूर प्रदेशों में भी हिन्दी लेखन का प्रसार, संस्कृति, देशभक्ति, देश-प्रेम, राष्ट्रीयता का उत्थान व प्रसार, ज्ञान के भन्डार की अभिवृद्धि, विश्वभर से सम्बन्धों में अभिवृद्धि एवं ज्ञान का आदान-प्रदान आदि ब्लोगिन्ग के गुणात्मक पहलू हैं ।
        पहेलियां, प्रश्नोत्तरी जैसे निम्नस्तरीय साहित्य का पदार्पण,निशुल्क प्रकाशन सुविधा के होते अचानक बहुत से कवि व साहित्यकार, लेखक उत्पन्न होगये हैं |  उच्च स्तरीय साहित्य एवं गुणवत्ता वाले विषयों की कमी, ब्लोगरों द्वारा भाई बहन बाप गुरु आदि आपसी रिश्ते व वर्ग-समूह बनाना, गूगल व अन्य साइट्स आदि पर उपस्थित अधकचरे ज्ञान के आधार पर लिखे गये घिसे-पिटे आलेख, एवं पोस्टों की पुस्तकें छपबाने का धन्धा, मौलिक उच्चकोटि के आलेखों का अभाव…जो कि ब्लोगिन्ग का मूल उद्देश्य था..आदि ब्लोगिन्ग के मूल ऋणात्मक पहलू हैं। जो संस्कृत की  एक  प्रसिद्द कहावत को सिद्ध करते हैं ---
      "उष्ट्राणाम लग्नवेलायाम,गर्दभा स्तुति पाठका |
      परस्पर प्रशंसन्ति,  अहो रूपमहो ध्वनि ||"
            यदयपि इसका मूल कारण यह है कि मध्यवय के, प्रौढ-वृद्ध -अनुभवी व विद्वान लोग अभी पुरानी पीढी के हैं एवं कम्प्यूटर की लगभग सभी आपरेशन-भाषा, कोड, आदि अन्ग्रेज़ी के हैं तथा उस पीढी के लोगों को कम्प्यूटर के सन्चालन का ज्ञान भी अधिकान्श नहीं है..वे नेटीज़न नहीं बन पाये हैं..। अतः मूलत: जो युवा व प्रौढ पीढी के हैं व दोनों भाषाओं के ज्ञाता हैं तथा कम्प्यूटर- नेट आदि से अच्छी तरह वाकिफ़ हैं वे ही ब्लोगिन्ग में हैं और वे स्वयं कम अनुभवी हैं और ज्ञान की कमी भी है।

         निशुल्क ब्लोगिन्ग एवं अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता का अनुचित लाभ उठाना भी ब्लोगिन्ग का एक नकारात्मक पहलू है। इसका लाभ उठाकर विभिन्न कम्यूनल साइट्स, व्यवसायिक साइट्स, असांस्कृतिक सन्स्थायें व व्यक्ति  अपने गुणगान व प्रसार-प्रचार  में रत हैं, क्योंकि भारत की जनसन्ख्या देखते हुए यदि ०.१ प्रतिशत लोग भी ब्लोगिन्ग करते या पढते हैं तो भारत अन्य विषय-वस्तुओं की भान्ति इसका भी बहुत बडा बाज़ार है।
         फ़िर भी हिन्दी-ब्लोगिन्ग ने एक महत्वपूर्ण बात तो सिद्ध की ही है कि आज भी मानव अपने मूल सन्स्कारी भाव …धर्म, अध्यात्म में रुचि से डिगा नहीं है जो दशावतार, हनुमान लीला, राम-सीता प्रकरण आदि पोस्टों पर सर्वाधिक—३००-५०० तक टिप्पणियां से प्रदर्शित होता है। जो समाज के लिए एक अच्छा व प्रेरक चिन्ह है | 
         यह भी देखा गया है  महिलाओं की प्रशन्सा में रुचि से भी कवि मानव-मन डिगा नहीं है जो किसी महिला कवयित्री या लेखिका के चार सामान्य पन्क्तियां भी लिख देने पर, युवा, प्रौढ़  व बूढ़े सभी ब्लोगरों का टिप्पणी हेतु लाइन लगा देना और ४०-८० तक टिप्पणियों  के  तुरत-फुरत आजाने से प्रदर्शित होता है।
         परन्तु यह सब तो हर विधा के साथ होता है। अभी तो हिन्दी ब्लोगिन्ग शीघ्रता से बढता हुआ एक होनहार बालक है, टोडलर है । जब वर्तमान पीढी अधिक अनुभवी, युवा व प्रौढ होगी तो यह विधा भी अधिक युवा व प्रौढ होगी। बालक युवा होकर सुपुत्र होगा या नहीं यह तो भविष्य के गर्भ में है; परन्तु आशा करनी चाहिये कि वह होनहार व सुपात्र होकर प्रगति-पथ पर बढे।
           ".. स जातो येन जातेन याति वंश समुन्नितम ||"

बुधवार, 11 जनवरी 2012

मेरे गीत सुरीले क्यों हैं... डा श्याम गुप्त....

                                                        ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ..           .


मेरे गीतों में आकर के तुम क्या बसे,
गीत का स्वर मधुर माधुरी होगया
अक्षर अक्षर सरस आम्रमंजरि हुआ,
शब्द मधु की भरी गागरी होगया

तुम जो ख्यालों में आकर समाने लगे,
गीत मेरे कमल दल से खिलने लगे
मन के भावों में तुमने जो नर्तन किया,
गीत ब्रज की भगति- बावरी होगया।      ...मेरे गीतों में ..... ॥

प्रेम की भक्ति सरिता में होके मगन,
मेरे मन की गली तुम समाने लगे
पन्ना पन्ना सजा प्रेम रसधार में,
गीत पावन हो मीरा का पद होगया

भाव चितवन के मन की पहेली बने,
गीत कबीरा का निर्गुण सबद होगया
तुमने छंदों में सज कर सराहा इन्हें ,
मधुपुरी की चतुर नागरी होगया।         .....मेरे गीतों में..... ॥

मस्त में तो यूहीं गीत गाता रहा,
तुम सजाते रहे,मुस्कुराते रहे
गीत इठलाके तुम को बुलाने लगे,
मन लजीली कुसुम वल्लरी होगया

तुम जो हंस हंस के मुझको बुलाते रहे,
दूर से छलना बन कर लुभाते रहे
भाव भंवरा बने, गुनगुनाने लगे ,
गीत कालिका-नवल-पांखुरी होगया।       .....मेरे गीतों में... ॥

तुम ने कलियों से जब लीं चुरा शोखियाँ ,
बनके गज़रा कली खिलखिलाती रही
पुष्प चुनकर जो आँचल में भरने चले ,
गीत पल्लव सुमन आंजुरी होगया

तेरे स्वर की मधु माधुरी मिल गयी,
गीत राधा की प्रिय बांसुरी होगया
भक्ति के भाव में तुमने अर्चन किया,
गीत कान्हा की प्रिय सांवरी होगया ।          .... मेरे गीतों में.... ॥

सोमवार, 9 जनवरी 2012

छिद्रान्वेषण... अकर्म..व अनैतिक कर्म...डा श्याम गुप्त...

--- इसे कहते हैं ..अकर्म ...
१.-------वाह ! वाह!  क्या बात है...क्या न्याय   है ..लोगों को तो ओढने को मुहैया नहीं है....दो गज कपड़ा ..जानवरों की मूर्तियों को पोलीथीन की ओढनी..?
----जिस तथ्य के , अनावश्यक खर्च, के कारण आलोचना  हुई उसी के कारण ,आज्ञा-पालन में वही तथ्य, अनावश्यक खर्च... .....क्या हम ..हमारी संस्थायें दूरंदेशी से कार्य कर रही हैं ......
---मुख्यमंत्री मायावती जी को आभारी होना चाहिए  कि इस प्रकार उन्हें और अधिक पब्लीसिटी मिलेगी, ढकी हुई मूर्ति देख कर और अधिक लोग पूछेंगे कि ये क्या है ...और जबाव मिलेगा...बसपा का हाथी ....बहुत खूब....
----क्या  चुनाव चिन्ह ’साइकल ’  का भी सडक पर, शहर में चलना /चलाना बन्द किया जायगा ...?

       २-  यदि आप  किक होने को तैयार  है, यदि आप  क्लिक होना चाहते हैं  तो आपको निश्चय ही... बटन खोलने होंगे ......                     

रविवार, 8 जनवरी 2012

लघु कथा....सीट....डा श्याम गुप्त....

                                         ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...

      'नहीं कोई सीट खाली नहीं है |'         
      'प्लीज़ सर,  बहुत आवश्यक काम है,  कंपनी में इंटरव्यू है, जाना तो है ही |'
       'अच्छा  सोफ्टवेयर कंपनी में इंटरव्यू है,  बड़ी  सेलेरी मिलेगी |  ठीक है मिल जायगी ....५०० लगेंगे |'
       'सर, अभी तो ज्वाइन करने जा रहे हैं, ५०० तो बहुत ज्यादा हैं, सेलेरी तो अगले महीने मिलेगी | अभी कहाँ '
      'अच्छा ठीक है ३०० में काम हो जायगा | ए सी ३ में  चले जाओ |'
                 एक्सप्रेस ट्रेन  के एसी कोच में टी टी ई व किसी  कंपनी में ज्वाइन करने जारहे प्रशांत के मध्य ये वार्तालाप होरहा था | 
                 सुनकर श्रीमती जी बोलीं , ' भला इस तरह की बातें सुनकर, करके, झेलकर ये बच्चे, नौकरी आदि प्रारम्भ करेंगे तो क्या दिशा क्या सन्देश मिलेगा उन्हें | वे भी यही करेंगे | ये क्या सिखा रहे हैं हम अपनी युवा पीढी को !'
           ' हर जगह यही तो होरहा है', रमेश जी  कहने लगे, 'ये लोग भी तो अपने ऊपरवालों को इसी प्रकार चढ़ावा देकर लम्बी गाडी में पोस्टिंग लेते हैं, तो वे भी यही करते हैं |'
              तभी प्रशांत व सुन्दरम की बातें सुनाई पडीं |  सुन्दरम ने पूछा, कहाँ ज्वाइन करने जारहे हो ?   प्रशांत चहक कर बोला, अरे मैं तो दो साल से सर्विस में हूँ |  वह तो बस यूंही टीटीई को वेवकूफ बनाया था |  ५०० की बजाय ३०० में ही काम बन गया न |


                 

गुरुवार, 5 जनवरी 2012

नव वर्ष में नव-नीति दोहा-एकादश --डा श्याम गुप्त..

                               ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...            

माँ तेरे ही चित्र पर नित-नित पुष्प चढ़ायं  |
मिश्री सी वाणी मिले, मंत्री पद मिलि जाय ||    


श्याम  खडा बाज़ार में, देखे सबका हाल,
चोर लुटेरे सब सुखी, सच्चा  है  बेहाल |


चाहे जो कुल जनमियाँ, करनी जो भी होय |
नेता-मंत्री पद मिला, मुझ सा भला न कोय ||

तेरा मेरा क्या करे,  मेरा  मेरा  जाप |
जो तू ही खुश ना रहे,तो क्या करिहै जाप ||


तुझ को कुछ भी ना मिले, सब कुछ मेरा होय |
इससे बढ़कर जगत में,  भली नीति क्या होय ||


चाहे करो प्रशंसा , करो प्रेम संवाद |
पर पानी की बाल्टी, भरना मेरे बाद ||


स्वारथ में ही छिपा है, अर्थ प्राप्ति का भेद |
परमारथ को भूलकर, परम-अर्थ को देख ||


घर को सेवै  सेविका, पत्नी  सेवै  अन्य |
छुट्टी लें तब मिलि सकें, सो पति-पत्नी धन्य  ||


निषिद चाकरी अब कहाँ, अब चाकर हर कोय |
इक दूजे को लूट कर, जन-जन हर्षित होय ||


भाँति-भाँति के रूप धरि, खड़े  मचाएं  शोर |
किसको हम सच्चा कहें, किसको कह दें चोर ||


कवि, बन पायं जो मसखरे, सकें रात भर गाय |
बजें तालियाँ ज्यों रहे, नट सरकस दिखलाय ||