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डा श्याम गुप्त का ब्लोग...

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Lucknow, UP, India
एक चिकित्सक, शल्य-चिकित्सक जो हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान व उसकी संस्कृति-सभ्यता के पुनुरुत्थान व समुत्थान को समर्पित है व हिन्दी एवम हिन्दी साहित्य की शुद्धता, सरलता, जन-सम्प्रेषणीयता के साथ कविता को जन-जन के निकट व जन को कविता के निकट लाने को ध्येयबद्ध है क्योंकि साहित्य ही व्यक्ति, समाज, देश राष्ट्र को तथा मानवता को सही राह दिखाने में समर्थ है, आज विश्व के समस्त द्वन्द्वों का मूल कारण मनुष्य का साहित्य से दूर होजाना ही है.... मेरी तेरह पुस्तकें प्रकाशित हैं... काव्य-दूत,काव्य-मुक्तामृत,;काव्य-निर्झरिणी, सृष्टि ( on creation of earth, life and god),प्रेम-महाकाव्य ,on various forms of love as whole. शूर्पणखा काव्य उपन्यास, इन्द्रधनुष उपन्यास एवं अगीत साहित्य दर्पण (-अगीत विधा का छंद-विधान ), ब्रज बांसुरी ( ब्रज भाषा काव्य संग्रह), कुछ शायरी की बात होजाए ( ग़ज़ल, नज़्म, कतए , रुबाई, शेर का संग्रह), अगीत त्रयी ( अगीत विधा के तीन महारथी ), तुम तुम और तुम ( श्रृगार व प्रेम गीत संग्रह ), ईशोपनिषद का काव्यभावानुवाद .. my blogs-- 1.the world of my thoughts श्याम स्मृति... 2.drsbg.wordpres.com, 3.साहित्य श्याम 4.विजानाति-विजानाति-विज्ञान ५ हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान ६ अगीतायन ७ छिद्रान्वेषी ---फेसबुक -डाश्याम गुप्त

सोमवार, 28 जनवरी 2013

श्री लंका यात्रा वृत्त ..भाग छह ...दम्बूला .....

                          



                                ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...




होटल सूदू अरालिया में नाश्ता
                               

                             होटल सूदू अरालिया, पोलोनरूवा में रात्रि विश्राम के उपरांत  प्रातः २६-१२-१२ को हम लोग दम्बूला के लिए चल दिए | दम्बूला  अपने  प्री -हिस्टोरिकल गुफा-मंदिरों के लिए विख्यात है | यह नगर जो एक समय श्रीलंका की राजधानी भी रही है एक महत्वपूर्ण सांकृतिक  त्रिकोणीय जंक्शन पर है जहां  चारों ओर से कोलम्बो, त्रिंकोमाली ,केंडी व अनुराधापुर की सड़कें मिलती हैं|
दम्बूला पर्वत व वन-क्षेत्र
            दम्बूला  क्षेत्र में  प्रारम्भिक लोह-युग मानव के लगभग ८० गुफा -निवास  के खंडहर प्राप्त होचुके हैं (जो सातवीं  शताब्दी  बीसी  से प्रथम शताब्दी बीसी ) जिनमे से दक्षिणी भाग स्थित तमाम गुफाएं  बाद में  बौद्ध -मठों - मंदिरों में परिवर्तित कर दिए गए, जो दम्बूला गोल्डन रोक केव- टेम्पल के नाम से विश्व-प्रसिद्द हैं |
            गुफाओं के वन क्षेत्र में लगभग तीन किलोमीटर में प्राक -एतिहासिक युग के लौह-मानव के शव-गृह -(कब्रों )के अवशेष  फैले हुए हैं जिसे इब्बाना कटुवा कहते हैं| ये निवासी ( ७५० बीसी )अपने शवों को शिलाओं के बने कब्रगाह में दफनाया करते थे जिनके साथ उनकी व्यक्तिगत प्रयोग की वस्तुए ..मनके, वर्तन आदि रख दिए जाते थे | इनमें कंकालों के साथ कीमती रत्न भी पाए गए हैं जो शायद अमीर लोगों की कब्र होंगीं |
आदि-मानव की कब्रों के अवशेष
          श्री लंका के कीमती लकड़ी आयरन वुड , एबोनाईट एवं एशिया की सबसे बड़ी गुलाबी क्वार्टज़ की पर्वत सीरीज यहीं है| दम्बूला पूरे श्रीलंका का शाक-भाजी  प्रदायक क्षेत्र  भी है|    १०वीं  शताब्दी में चोल राजा राज राजे राजेन्द्र के शासन के  समय में   दम्बूला का नाम धम्बल्लई था |

         गिरिताले-मिनीरिया के झीलों -पर्वतों के  वन-क्षेत्र होते हुए हम लोग लगभग एक बजे दम्बूला पहुंचे | मार्ग में  'अत्रेया हर्बल सेंटर ' में हर्बल औषधियां एवं कोस्मेटिक्स के उद्यान व शोरूम को भी देखा | अत्रेया से महान भारतीय आयुर्वेदाचार्य चिकित्सक अत्रि  मुनि एवं उनके पुत्र आत्रेय का नाम देख कर आश्चर्य भी हुआ और भारत-श्रीलंका आदि कालीन संबंधों पर विश्वास भी|
मुखौटे आदि
विष्णु, कार्तिकेय, श्रीकृष्ण
                 आगे एक बड़े वुडन-शोरूम में एबोनाईट, रबर-वुड आदि  की विभिन्न श्री लंका कला की काष्ठ-कलाकृतियों का कारखाना व भंडार था, जहां कलाकृतियों के निर्माण की प्रक्रिया एवं उन्हें रंगने हेतुविभिन्न रंगों के निर्माण की प्रक्रिया भी बताई गयी| विभिन्न प्राचीन, प्री-हिस्टोरिक मुखौटे, दैनिक कार्यरत स्त्री-पुरुष , वनांचल की क्रियाएं , वन्य-जीव एवं महात्मा बुध की विभिन्न मुद्राओं की काष्ठ-मूर्तिया, कीमती फर्नीचर  व अन्य कलाकृतियों के साथ-साथ  सरस्वती, गणेश,  कार्तिकेय, श्रीकृष्ण, राधाकृष्ण , शिव, राम-लक्ष्मण -सीता, हनुमान , नटराज , विष्णु , कुबेर अदि देवी-देवताओं की  सुन्दर वेश-कीमती  काष्ठ मूर्तियाँ भी थीं | ९० हज़ार डालर कीमत का  एक विशालकाय हाथी  भी  निर्माण प्रकिया में  था|
                  
काष्ठ मूर्तियों का कारखाना
नटराज
विशालकाय हाथी
राम, लक्ष्मण सीता व हनुमान
गणेश व विभिन्न अन्य मूर्तियाँ
बुद्ध मूर्तियाँ
सरस्वती


टॉड पर आसीन आराध्य -
                     
मूसक सवार गणेश 

हनुमान
आराध्य और सिंह


                  


गोल्डन बुद्धा
गोल्डन बुद्धा  -  रोक केव टेम्पल के प्रवेश द्वार पर ही तीन मंजिला बुद्धा-म्यूज़ियम है जिसके ऊपर ही ध्यानस्थ बैठे हुए महात्मा बुद्ध की  विश्व में  सबसे बड़ी स्वर्णिम मूर्ति  है |
दम्बूला रौक -केव टेम्पल्स -     एशिया की सबसे अधिक संरक्षित  व शानदार विश्व-प्रसिद्द गुफा-मंदिर हैं| ये गुफाये जमीन से लगभग १६० मीटर ऊंचाई पर  एवं समुद्र से १११८ फीट की  ऊंचाई पर स्थित एक बहुत बड़ी ग्रेनाईट की  एक ही  महा -शिला पर काट कर निर्मित किये गए हैं जो ६०० फीट ऊंची व २००० फीट लम्बी है, इसे स्थानीय सिंहली लोग दम्बूला-गाला ( दम्बूला पर्वत )  कहते थे  और गुफाओं को रणगिरी दम्बूला विहार | ये गुफाये लगभग प्रथम शताब्दी बी सी की हैं जो
केव टेम्पल का द्वार
गुफाओं के लिए पहाडी चढ़ाई
प्री-हिस्टोरिक काल में आदि-कालीन मानवों ( सात से प्रथम शताब्दी बीसी )  द्वारा प्रयोग होती थीं बाद में बौद्ध पूजा स्थलों में परिवर्तित की गयीं |यह मूल में एक ही बहुत बड़ी गुफा थी जो बाद में तमिल व सिंहल शासकों ने पांच भागों में विभाजित करके बौद्ध  मंदिर स्थापित कर दिए गए|  इसी प्रकार की तामाम गुफाये पर्वत-शिला पर हैं  जिनमें  मानव के निवास में प्रयोग आने के चिन्ह मिलते हैं  |
कमल का तालाब
\केव-टेम्पल्स पर रीना जी
दम्बूला पहाडी पर

गुफा द्वार पर सिंहली आर्ट
गुफा भित्ति चित्र उपदेश देते हुए बुद्ध
गुफा के अन्दर लेटे  हुए बुद्ध व दीवार पर चित्रकारी
 बुद्ध व भित्ति चित्र  ईवा स्तूप जिसमें राजा बलागाम्बा का खजाना छिपाया गया
मकराकृति गुफा द्वार
भित्ति चित्र -ध्यानावस्थित बुध र व मार दैत्य  की सेना
                    भारतीय शासकों के आक्रमण से अनुराधापुरा छोड़कर १४ वर्ष तक जंगल में आश्रय लिए हुए राजा बलागाम्बा ( राजा वातगामनी  अभय ) को इन्हीं गुफाओं में रहने वाले बौद्ध भिक्षुओं ने आश्रय दिया था | उस समय  दम्बूला को ही राजधानी बनाया गया था |  प्रथम शताब्दी बीसी में पुनः अनुराधापुर के सिंहासन पर आसीन होने पर आभार स्वरुप उसने इन गुफाओं को शानदार गुफा मंदिरों में निर्मित किया तीन गुफाओं का नवीनीकरण व निर्माण किया |  
मुकुलिंडा किंग कोबरा छात्र छाया करते हुए
               
         
गरुड़ पर विष्णु -चित्र वरांडे स्थित अस्थायी मंदिर में
पांच गुफाओं में लगभग १९० चित्र व मूर्तियाँ हैं जो  दो शताब्दी बीसी में किंग बलागाम्बा द्वारा निर्मित हैं उसके पश्चात ....बाद में १२वी शताब्दी  में राजा विजयबाहू द्वारा पोलोनारूवा को राजधानी बनाने पर पुनः पुनर्निर्माण , गोल्ड प्लाटिंग एवं बहुत सी बुद्ध-मूर्तियों व चित्रों  आदि से १७ - १८ वीं शताव्दी तक  निसान्कमला ,पराक्रम बाहू,  व  भारतीय चोल शासक   आदि विभिन्न शासकों द्वारा किये गए  पुनर्निर्माण से गुजरती रहीं |
गॉड विष्णु व सामन गॉड व बुद्ध
बुद्ध व महाथेर आनंद
              
चतुर्थ गुफा के सम्मुख चित्र--गरुड़ पर विष्णु
  महा अलूत विहार, पश्चिम विहार, देवेलीन विहार एवं महाराजाधिराजलीन विहार एवं चौथी गुफा बंद की हुई है आदि पांच गुफाओं में ,महात्मा बुद्ध के विभिन्न मुद्राओं के व निर्वाण के समय  मुद्रा, लेटे  हुए व बैठे हुए बुद्ध , में लगभग ७२ मूर्तियों के अतिरिक्त महामाया द्वारा दिया गया स्वप्न, मार-नामक दैत्य द्वारा  विविध वेश धारी  भयंकर दैत्य सेना द्वारा उन्हें ध्यान से हटाने का आयोजन व उनकी हार , उपदेश , बुधत्व प्राप्ति , बोध-बृक्ष , विविध बुद्ध  आदि के शानदार गोल्डन पेंटेड भित्ति-चित्र समस्त भित्तियों व छतों पर निर्मित हैं  एवं  भयानक आंधी से बचाते हुए नागराजा मुकलिंद द्वारा छत्रछाया ( शायद नाग राजाओं ने ही -- नागराजा टिस्सा के समय बौध धर्म श्रीलंका में फैला-- बौद्ध धर्म को प्रश्रय दिया ) आदि मूर्तियाँ हैं |  इसके साथ ही  ध्यानस्थ बुद्ध के साथ आनंद ( उनके पट्ट-शिष्य जो उनके बाद धम्म के संचालक बने ), गौड सामन [श्री लंका के आदिवासियों --यक्का-वेददा कबीले के आदि-देव जो एडम्स-पर्वत (त्रिकूट पर्वत) पर निबास करता है ]  व गॉड विष्णु  व गॉड उपुलवन ( शायद उपेन्द्र --विष्णु का प्राचीन  नाम )की साथ-साथ मूर्तियाँ , बंद गुफा के सामने मंदिर पर गरुड़ पर आरूढ़ विष्णु के चित्र , मकर तोरण के दरवाजे  आदि हिन्दू -कालीन प्रभाव को दर्शाते हैं|

वो चंद पल..डा श्याम गुप्त की ग़ज़ल....

                                ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...

          

वो चंद पल  जो  तेरे साथ  गुजारे हमने |
ज़िंदगी के  देख लिए  सारे नज़ारे  हमने |

अब कोई  और समां भाता नहीं दिल को,
कर लिए पल वोही दिल के सहारे हमने |

क्या कहैं कैसे कहैं हाले-दिल किस से कहैं ,
खो दिए जो थे सनम जान से प्यारे हमने |

उनकी काज़ल से भरी आँखों में खोये लेकिन,
क्यों नहीं समझे निगाहों  के  इशारे हमने |

आवाज़ तो दो, कोई  इलजाम ही दो  चाहे,
आज लो जानो-जिगर तुम पे ही वारे हमने |

अब कहाँ ढूंढें तुम्हें दिल को सुकूँ-चैन मिले,
श्याम' आजाओ कि ढूंढ लिए जग के किनारे हमने ||

शनिवार, 26 जनवरी 2013

तंत्र में फंसा जन ....गणतंत्र या जनतंत्र ---- डा श्याम गुप्त



                                         ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...

 
                   
जब जब गणतंत्र दिवस आता है तो मैं सदा सोचता हूँ कि हमारा यह लोकतंत्र - जनतंत्र है या गणतंत्र | आखिर हमने इसे गणतंत्र क्यों कहा ..... मेरे विचार से जन-तंत्र शब्द तो उचित है ही ...परन्तु गणतंत्र !!! जन तो सभी जानते हैं सामान्य जनता को कहा जाता है पर गण का क्या अर्थ है | गण – तो विष्णु के, शिव के, देवी-देवताओं के हुआ करते हैं ...गण  अर्थात विशिष्ट कृपापात्र, विशिष्ट शक्ति-प्राप्त ...कुछ विशिष्ट लोग, कुछ गणना योग्य व्यक्ति जिनकी गणना की जा सके|  इसीलिये तो गण्यमान्य या गणमान्य शब्द प्रयोग में आया| अर्थात गणतंत्र का अर्थ विशिष्ट जनों का तंत्र | तो यह जनतंत्र कैसे हो सकता है|

                  
                  इसीलिये आज ‘गणतंत्र’ और ‘जन गण मन’ से भी जन ( सामान्य जन ) और मन ( विचार, चिंतन, मनन ) तो हट गया बस ‘गण’ ही रहगया है ...हर व्यक्ति जो जरा भी पढ़-लिख जाता है, पैसा कमा लेता है या कमाने की जुगत-योग्यता रखता है ,वह जन छोड़कर गण में सम्मिलित होजाता है, विशेष होजाता है | इसीलिये जन सामान्य की महत्ता कम होने से  अब ‘गण’ भी गौण होता जारहा है और सिर्फ ‘तंत्र’ महत्वपूर्ण रह गया है |
              आज इस तंत्र में फंस कर यह गण  और जन सभी  असहाय से
दिखाई देते हैं| दिन रात उसी बंधी-बंधाई लीक पर यंत्रवत चलना...सुबह जल्दी-जल्दी, भागते-भागते, कभी-कभी तो  लिफ्ट या कार में ही नाश्ता –आधा-अधूरा कर लेना (लड़कियाँ बाल भी एसे ही बना रहीं हैं )| घर में बिजली, पानी, किराया, विविध किश्तें, इन्श्योरेंस, मोबाइल, टीवी के बिलों, कोई न कोई खराब होते गेजेट के रिपेयर की आदि की चिंता, नौकरानी का चक्कर .. घर पर भी...छुट्टी के दिन भी मोबाइल या लैपटॉप  पर भी काम-धंधे-दफ्तर – बॉस की बातें या फिर शेयर, फ्लेट, कार, की बातें—| आफिस में उसे बंधी-बंधाई लीक पर काम करते रहना, आफिस में घर की चिंता...घर में आफिस की चिंता .. |  न अखबार पढ़ने की फुर्सत ( अंग्रेज़ी अखबार आता अवश्य है ) न टीवी देखने की फुर्सत (शानदार ४२’ का टीवी लगा अवश्य है ) न माँ-बाप से बात करने की...न संतान की स्वयं देख-भाल की | न पति-पत्नी के रिश्ते-निभाने की वही रोटी -कपड़ा और मकान...वह भी.....
‘घर को सेवे सेविका, पत्नी सेवै अन्य,

छुट्टी लें तब मिल सकें, सो पति-पत्नी धन्य |’

           
छुट्टियां भी हों या लें तो वही पार्टी, मस्ती होटलों, बीचों पर मस्ती न विचार की चिंता न चिंतन –मनन की फुर्सत, न साहित्य आदि पढने की |  इस प्रकार गणतंत्र से गण ही विलीन होता गया सिर्फ तंत्र रह गया है और  मानव उस तंत्र में फंस कर निरुपाय रह गया है | ....जन सामान्य की महत्ता कम होने पर यही होता है |
  


            इसी प्रकार हमारे संविधान में दो मूल बिन्दुओं पर  गौर करें जो इस प्रकार हैं –
१ ----भारत के नागरिकों को सामजिक, आर्थिक, और राजनैतिक न्याय, पद,अवसर और कानूनों की
समानता, विचार,भाषण, विश्वास, व्यवसाय , संघ निर्माण और कार्य की स्वतन्त्रता ....क़ानून तथा सार्वजनिक नैतिकता के आधार पर प्राप्त होगी |

२ -----अल्पसंख्यक वर्ग, पिछड़ी जातियों, और कवायली जातियों के हितों की रक्षा की व्यवस्था की जायगी |

                 प्रश्न यह उठता है कि जब ‘भारत के नागरिकों’  में सभी समानता की बात प्रथम बिंदु  में कह दी गयी है ...तो दूसरे  बिंदु की आवश्यकता ही क्या है ...


                मेरे विचार से संविधान की इस मूल त्रुटि से ...दूसरे बिंदु में वर्णित अन्य वर्गों को ‘भारत के नागरिकों’ से पृथक कर दिया गया जो लोकतंत्र में समानता के विचार के विपरीत है यही जन व गण के मन में पृथकता के बीज पनपने का कारण है अन्यथा भारत के नागरिक होने से उनके हितों की रक्षा तो प्रथम बिंदु से स्वतः ही होरही है |
 

बुधवार, 23 जनवरी 2013

श्री लंका यात्रावृत्त ..भाग पांच ---पोलोनरूवा .....



                                 ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...


                             २४-१२-१२ को सिगीरिया फ़ोरेस्ट विलेज के रिसोर्ट में रात्रि-विश्राम के पश्चात्  २५-१२-१२ प्रातः को  नाश्ते के बाद हमारा कारवां प्री-हिस्टोरिक साइट्स  एवं एक और प्राचीन राजधानी पोलोनरूवा के लिए चल दिया जहां प्री-हिस्टोरीकल सभ्यता  व नगर के अवशेष  व  म्यूज़ियम  हैं| रास्ते में   मिन्नेरिया फारेस्ट रेंज के  वन में जंगली हाथियों का झुण्ड चरते हुए लगभग सड़क के एक दम नज़दीक आगया था | सुन्दर व दुर्लभ नज़ारा  सभी  ने कमरों में कैद किया | दम्बूला रोड पर बुटीक-कला के कारखाने  में बुटीक-छपाई कला का कारीगरों ने प्रदर्शन किया  एवं  पब्लिक रिलेशन अधिकारी द्वारा जानकारी  दी गयी, शो-रूम व विक्रय -केंद्र का भी अवलोकन किया गया |  त्रिंकोमाली रोड पर दम्बूला के निकट प्रसिद्द 'गामिनी जेम एंड ज्वेलरी'  के  शो रूम में पब्लिक रिलेशन अधिकारी द्वारा  श्रीलंका के प्रसिद्द नगर रतनपुरा ( जिसके रत्नों के कारण श्री लंका  रत्नद्वीप कहलाता था )में  विभिन्न रत्नों के खानों के  निकालने के अत्यंत जोखिमपूर्ण व श्रमसाध्य कार्य एवं उनकी प्राप्ति को फिल्म द्वारा दिखाया व समझाया गया | तदुपरांत घिसने, चमकाने, कटिंग आदि के उपकरण व कारखाना भी दिखाया गया | काफी बड़े शो-रूम में काफी मात्रा में विभिन्न प्रकार के रत्न एवं आभूषण का अच्छा भंडार था| रीना जी एवं सुषमा जी ने कई वेराइटी के रत्न एवं आभूषण खरीद डाले | शायद कुछ बाजिव दाम लगे होंगें |
मिनीरिया फारेस्ट में जंगली हाथियों का दल
सुषमा जी व रीना रतनपुरा के जेम्स खरीदते हुए
बुटीक शोरूम
        

बुटीक - कारखाना एवं सिंहली महिला सुपर वाइज़र..विशेष सिंहली स्टाइल की साडी में






विशाल पराक्रम समुद्र लेक
               दोपहर को दो बजे तक हम लोग पोलोनरूवा गाँव पहुंचे | बहुत बड़ी अथाह सागर के समान  पराक्रम समुद्र लेक के किनारे प्री-हिस्टोरिक  म्यूज़ियम है| वही नगर के लिए नालियों द्वारा  शानदार प्राचीन जल सप्लाई सिस्टम भी है |
             

 अनंत नाग पोकुना व दीप उयाना
              म्यूज़ियम के समीप ही किंग पराक्रम वाहू ११५३ एडी द्वारा बनवाया सभागार , निसान्क्मला  ११९६ एडी द्वारा निर्माण कराया गया स्नान-का तालाब 'अनंत नाग पोकुना ' ' व आइस लेंड  सभागार व बाग़ 'दीप उयाना '( द्वीप-उद्यान) है जिसे किंग पराक्रम समुद्र  ने अपनी  ग्रीष्म कालीन राजधानी  'कलिंग उयाना '( कलिंग प्राचीन भारतीय  सिंहल राज्य --आज का उडीसा... ) का नाम दिया था |
              पोलोनारूवा म्यूज़ियम -- में फोटोग्राफी मना है , टिकट २५ डालर व भारतीयों के लिए आधी १२.५ डालर है |अन्दर प्रागेतिहासिक काल के कई चिन्ह , हरप्पा सभ्यता की भांति ...मनके , टेराकोटा मूर्तियां, पके-मिट्टी के  वर्तन, आभूषण, मूर्तियाँ आदि प्रदर्शित  हैं| बौद्ध कालीन  अवशेष भी | सूर्य देव की मूर्ति -दो पत्नियां ऊषा-प्रत्यूषा के साथ प्रथम बार देखने को मिली , गज-लक्ष्मी -- जिसमें लक्ष्मी पर दोनों ओरसे हाथी जल सिंचन करके अभिषेक करते हुए...., विष्णु,  शिव का नंदी बुल , शिव-लिंग, कार्तिकेय व गणेश , गन्धर्वों, यक्षों की मूर्तियाँ , चौमुखा दीप , शिव-भक्त सुन्दर स्त्री  प्रगीतावती का कुरूप होकर  काली-कोविल बन जाने पर पति व समाज द्ववारा परित्याग एवं शिव के तांडव नृत्य से ठीक होने की कथा सहित प्रतिमा हिन्दू-धर्म के प्रतीक एवं  शिव-पूजा के होने के प्रमाण है जो यक्ष-कुबेर व रक्ष-रावण के काल का स्मरण करा सकते  हैं मूर्तियाँ चाहे बाद के काल में निर्मित की गई हों | मानव कंकाल के अधूरे अवशेष भी प्री-एतिहासिक काल की सभ्यता का भान कराते हैं|
जंगल में प्री-हिस्टोरिक सरीसृप -इगुआना


सतमहला भवन
गज लक्ष्मी
बौद्ध  स्तूप पर रीना आराध्य व सुषमा जी
बौद्ध  मंदिर में पुष्पों से पूजा
               पोलोनारूवा प्री -हिस्टोरिक नगर  साईट पर .. पराक्रम  बाहू का निर्मित सतमहला भवन , जिसमें  अब भी सात मंजिले मौजूद हैं ...प्लास्तर  उखड गया है परन्तु दूसरी मंजिल पर किसी पुरुष की मूर्ति व  छटी मंजिल पर स्त्री मूर्ति नज़र आती है| नज़दीक ही एक बहुत बडी शिला पर जो सतमहला व समीप के ही बौद्ध मंदिर की बगल में है,  किंग निसंकमला  के वंश एवं वीरता के किस्से लिखे गये  हैं , यह भी कि यह शिला १०० मील दूर मिहिंताले से  यहाँ लाई गयी  थी | इस शिला पर गज-लक्ष्मी की मूर्ति है  जो आम भारतीय मूर्तियों व चित्रों में देखी जाती है |समीप ही बौद्ध मंदिर है जिसे  मूल टूथ टेम्पल कहा जाता है , केंडी स्थित टूथ टेम्पल से पहले महात्मा  बुद्ध के दांत के अवशेष यहीं रखे गए थे |  ११ एडी का बौद्ध स्तूप  है जिसमें स्तूप  के चारों ओर प्रत्येक दिशा  में एक बुद्ध  मूर्ति है, स्तूप परकोटे से घिरा है |जिसकी सीढ़ियों पर गन्धर्व की भाँति  मानवाकृति व तथाकथित  मून स्टोन एवं गार्ड-स्टोन हैं जो हिन्दू व गन्धर्व कला के कुम्भ हस्त द्वारपाल लगते है शेष फण से नाग कालीन प्रतीत होते हैं| जंगल क्षेत्र में प्राचीन दुर्लभ सरीसृप , बड़ी छिपकली जैसे जंतु इगुआना  के दर्शन भी हुए |

सुनसान व उपेक्षित -प्री-हिस्टोरिक शिव मंदिर पर निर्विकार एवं रीना अन्दर प्रांगण  में शिव-लिंग

काले कान  व लाल मुख बन्दर

थूपारामा
               शिव-मंदिर .. जहां बौद्ध मंदिर में जूते उतारने का बोर्ड लगा है  व पूजा  भी होती है वही दूसरी ओर शिव-लिंग  सहित शिवमंदिर बिना किसी देख रेख के , जीर्ण-शीर्ण अवस्था में है जूते पहन कर या चाहे जैसे जाएँ | मंदिर अति-प्राचीन ..शायद सबसे प्राचीन इमारत है|  समीप ही कुबेर की मूर्ति व  किसी प्रागैतिहासिक विश्वविद्यालय के भांति किसी संस्थान के अवशेष हैं |जिसे बौद्ध  विहार बताया जाता है | लंकातिलक मंदिर का
 यक्ष -कुबेर की मूर्ति
कैप्शन जोड़ें

नवीनीकरण किया जारहा है यह काफी ऊंचा व दोमहला इमारत लगती है | दरवाजे, छतें, खिड़कियों व खम्भों की कारीगरी, नक्काशी काफी सुन्दर है  व प्राचीन भारतीय घरों से मिलती-जुलती  है|  अन्य निवास-स्थानों , मंदिरों , सभामंडप आदि के अवशेष हैं जिनमें बीच  में शिव-लिंग एवं डिजायनदार खम्भे हैं | काले कान व लाल मुख व सुनहरे शरीर वाले पूंछ वाले व पूंछहींन बंदर हर ओर दिखाई पड़ते हैं परन्तु अपेक्षाकृत शान्ति-प्रकृति के,  वे उदंड नहीं हैं |
सिंहल सभाभवन पर निर्विकार
सतमंजिला राज भवन के खंडहर में  -निर्विकार व रीना , आराध्य
प्राचीन मंदिर --मध्य में शिव-लिंग ..डिजायन दार खम्भे

सभाभवन की दीवार -हाथी, सिंह व बौने मानव विभिन्न मुद्राओं में
            सिंहल सभा-भवन व स्नान- तालाब व  सत मंजिला  राज-महल -- आगे अन्दर कुछ घना वन प्रदेश  है  कच्चे -पक्के प्राचीन रास्ते के दोनों ओर क्रमबद्ध  दुकानों व बाज़ार के अवशेष है जिससे प्रतीत होता है कि यह नगर का प्रमुख व अच्छा बाज़ार था एवं नगर समृद्धिपूर्ण रहा होगा  ...सिंहल सभाभवन विशाल सभाभवन का अवशेष है जिसमें हाथियों, सिंहों व बौने मानवों  के विभिन्न भाव-भंगिमाओं सहित भित्ति-मूर्तियाँ है | द्वार पर सिन्हलों का प्रतीक चिन्ह सिंह हैं|लगभग चार -पांच फीट मोटाई की दीवारों से बने सत मंजिला राज-महल व कमरों के अवशेष जिनमें सिर्फ दो मंजिलें ही शेष हैं |
क्रमबद्ध दुकानें व बाजार में सुषमा जी व आराध्य
प्राचीन नगर के ध्वन्शावशेष --रीना व आराध्य
 
लेटे हुए बुद्ध की विशाल मूर्ति
               लेटे हुए बुद्ध  व पुलस्त्य मुनि की मूर्ति  व पुलस्त्यपुरा ---पराक्रम समुद्र   लेक के दूसरी ओर पहाडी के समीप छोटी सी झील के किनारे विशाल आकार की लेटे-बुद्ध की मूर्ति है समीप ही ध्यान में बैठे बुद्ध भी हैं | साथ में ही बहुत बड़ी शिला मूर्ति एक व्यक्ति की है जो दोनों हाथ में पुस्तक लिए हुए है| इसे पराक्रम बाहू की मूर्ति बताया  जाता है ..हाथ में ओला-लीफ  लिए हुए, उन्हें खेती का महान वैज्ञानिक कहा जाता है |
महर्षि पुलस्त्य
             परन्तु वास्तव में यह रावण के पितामह ( दादा या बाबा ), पिता  विश्रवा  मुनि के पिता महामुनि व  प्रारंभिक मानव एवं ब्रह्मा के पुत्र सप्तर्षियों  में से एक ऋषि पुलस्त्य की मूर्ति है , जो एक ब्राह्मण थे एवं स्वयं महान वैज्ञानिक , कृषि वैज्ञानिक , महान विचारक-दार्शनिक  थे एवं हाथ में  प्राचीन लिखने के पत्र ,अरक-पत्र की( ताड़ पत्र या भोजपत्र ) पुस्तक है |
                            वस्तुतः पोलोनरूवा का वास्तविक नाम पुलस्त्यपुरा....पुलस्त्यनगर  था जो बौद्ध काल में पोलोनरूवा कर दिया गया|