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डा श्याम गुप्त का ब्लोग...

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Lucknow, UP, India
एक चिकित्सक, शल्य-चिकित्सक जो हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान व उसकी संस्कृति-सभ्यता के पुनुरुत्थान व समुत्थान को समर्पित है व हिन्दी एवम हिन्दी साहित्य की शुद्धता, सरलता, जन-सम्प्रेषणीयता के साथ कविता को जन-जन के निकट व जन को कविता के निकट लाने को ध्येयबद्ध है क्योंकि साहित्य ही व्यक्ति, समाज, देश राष्ट्र को तथा मानवता को सही राह दिखाने में समर्थ है, आज विश्व के समस्त द्वन्द्वों का मूल कारण मनुष्य का साहित्य से दूर होजाना ही है.... मेरी तेरह पुस्तकें प्रकाशित हैं... काव्य-दूत,काव्य-मुक्तामृत,;काव्य-निर्झरिणी, सृष्टि ( on creation of earth, life and god),प्रेम-महाकाव्य ,on various forms of love as whole. शूर्पणखा काव्य उपन्यास, इन्द्रधनुष उपन्यास एवं अगीत साहित्य दर्पण (-अगीत विधा का छंद-विधान ), ब्रज बांसुरी ( ब्रज भाषा काव्य संग्रह), कुछ शायरी की बात होजाए ( ग़ज़ल, नज़्म, कतए , रुबाई, शेर का संग्रह), अगीत त्रयी ( अगीत विधा के तीन महारथी ), तुम तुम और तुम ( श्रृगार व प्रेम गीत संग्रह ), ईशोपनिषद का काव्यभावानुवाद .. my blogs-- 1.the world of my thoughts श्याम स्मृति... 2.drsbg.wordpres.com, 3.साहित्य श्याम 4.विजानाति-विजानाति-विज्ञान ५ हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान ६ अगीतायन ७ छिद्रान्वेषी ---फेसबुक -डाश्याम गुप्त

बुधवार, 10 मई 2017

ईशोपनिषद का काव्यभावानुवाद --- प्रस्तावना-डा रंगनाथ मिश्र सत्य--------डा श्याम गुप्त .

                             ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...


पुस्तक----ईशोपनिषद का काव्यभावानुवाद ------डा श्याम गुप्त .
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___ प्रस्तावना --डा रंगनाथ मिश्र सत्य ____
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डा श्यामगुप्त बहुमुखी प्रतिभा के धनी लब्धप्रतिष्ठित साहित्यकार हैं | आप आगरा चिकित्सा महाविद्यालय से शल्य-चिकित्सा शास्त्र में विशेषज्ञता ( मास्टर ऑफ़ सर्जरी ) प्राप्त हैं एवं भारतीय रेलवे में कार्य करते हुए वरिष्ठ चिकित्सा अधीक्षक के पद से सेवा निवृत्त हुए | आपके परिवार का वातावरण धार्मिक व आद्यात्मिक चेतना से जुड़ा हुआ था | लेखन की अभिरुचि आपको बचपन से ही थी अतः अध्ययन काल व सेवाकाल के साथ साथ ही आप हिन्दी व अंगरेजी लेखन से जुड़े रहे| आपकी अब तक ग्यारह हिन्दी साहित्यिक कृतियाँ प्रकाशित हैं | अब आपकी प्रस्तुत बारहवीं कृति ‘ईशोपनिषद का काव्यभावानुवाद’ के नाम से प्रकाशित होकर विज्ञ पाठकों के सम्मुख प्रस्तुत होने जा रही है|
-------इस कृति में ईश्वर विद्या पर प्रकाश डालने वाली संस्कृत साहित्य की महत्वपूर्ण उपनिषद् ‘ईशोपनिषद’ में दिए गए अठारह मन्त्रों का खड़ीबोली सरल हिन्दी में अनुवाद किया गया है | सर्वप्रथम कवि ने एक पद व एक गीत में दो वन्दनाएँ की हैं—
‘रे मन! कैसी अब भटकन|
क्यों न रमे तू श्याम भजन नित कैसी मन अटकन |’.....तथा...
‘रे मन ! ले चल सत की राह |
लोभ मोह लालच न जहां हो / लिपट सके न माया |...
मन की शान्ति मिले जिस पथ पर / प्रेम की शीतल छाया |’
ईशोपनिषद के प्रथम मन्त्र के द्वितीय भाग का अनुवाद, जो भारतीय दर्शन / व्यवहार का मूल मन्त्र है, कवि द्वारा बहुत ही स्वाभाविक ढंग से समझाया गया है –
सब कुछ ईश्वर की ही माया / तेरा मेरा कुछ भी नहीं है |
जग को अपना समझ न रे नर / तू तेरा सब कुछ वह ही है ||
पर है कर्म भाव आवश्यक / कर्म बिना कब रह पाया नर |
यह जग बना भोग हित तेरे / जीव अंश तू, तू ही ईश्वर ||’
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इसी प्रकार सभी अठारह मन्त्रों का सहज व सरल भाषा में काव्य-भावानुवाद प्रस्तुत करके डा श्याम गुप्त ने एक महनीय कार्य किया है, क्योंकि मूल वेदों व उपनिषदों का पारायण आम व्यक्ति नहीं कर सकता | अतः इस सरल हिन्दी अनुवाद से हिन्दी के करोड़ों पाठक लाभान्वित होंगे, एसा मेरा मानना है | सभी मन्त्रों का कई कई बन्दों में रोचकता के साथ भावानुवाद प्रस्तुत किया गया है इसकी सहज अनुभूति पाठकों को स्वयं पढ़ने के बाद मिल सकती है | अंतिम मन्त्र अठारह से एक उदाहरण दृष्टव्य है ---
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‘हे तेजस्वी अग्नि रूप प्रभु / सर्व प्रकाशक और द्युतिमान |
सब कर्मों को जानने वाले / सकल विश्व व्यापी विद्वान् ||’
उसी ईश का वरण करें हम / उसी ईश की करें प्रार्थना |
उसके ही प्रति नतमस्तक हो / प्रतिपल प्रतिदिन करें वन्दना ||’
\.
--------डा श्यामगुप्त ने प्रत्येक मन्त्र की कुंजिका एवं मूलार्थ खड़ीबोली गद्य में देदिया है अतः पाठक को प्रत्येक मन्त्र का भावानुवाद पढ़ने व समझने में कोई कठिनाई नहीं होगी | इसके लिए वे बधाई के पात्र हैं |
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डा श्यामगुप्त जी को अब तक अनेकों सम्मान भारत की विभिन्न साहित्यिक/ सांस्कृतिक /राजकीय / स्वैच्छिक / शैक्षिक संस्थाओं द्वारा दिए जा चुके हैं | उनका लेखन सामाजिक सरोकारों से जुड़ा हुआ है एवं वे साहित्य में सदैव नए नए प्रयोग करते रहते है | वे सभी के प्रति समदर्शी दृष्टि रखते हैं, किसी के प्रति ईर्ष्या-द्वेष नहीं, जैसा आदिकाल से अब तक के कवियों, लेखकों में दृष्टिगत होता है | वे जो भीतर हैं उनका वही व्यक्तित्व बाहर से भी परिलक्षित होता है |
---जिस प्रकार कविवर शारदा प्रसाद मिश्र ( गोरखपुर) ने भागवत गीता व चाणक्य-नीति का काव्य-भावानुवाद किया है उसी प्रकार महाकवि डा श्यामगुप्त ने ईशोपनिषद का काव्य-भावानुवाद खड़ीबोली हिन्दी में करके राष्ट्रभाषा हिन्दी के उन्नयन में अमूल्य योगदान दिया है |
-------काव्य-भावानुवाद में अलंकारों का भी प्रयोग हुआ है | अनुप्रास अलंकार की छाटा सर्वत्र देखने को मिलती है | रचनाएँ प्रसाद गुण से ओत-प्रोत हैं | हिंदी व संस्कृत अकादमियों व संस्थानों, विश्वविद्यालयों व पुस्तकालयों द्वारा इसे अपनाकर भारतीय संस्कृति एवं रचनाकार को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए |
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डा श्यामगुप्त पर लखनऊ विश्वविद्यालय से शोध-प्रवंध भी लिखा जा चुका है | वे ऐसे रचनाकार हैं जो सबका साथ और सबका विकास में विश्वास रखते हैं, सभी के लिए सहयोगी हैं एवं स्वयं में स्वाभिमानी भी |
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मुझे यह कहने में गर्व होता है कि महाकवि डा श्यामगुप्त जी अखिल भारतीय अगीत परिषद् के कर्मठ सदस्य हैं | अपनी प्रयोगधर्मिता के कारण वे अगीत कविता विधा की प्रगति हेतु भी जो कार्य कर रहे हैं वह सदैव मननीय व माननीय होगा |
--------उन्होंने इस विधा में भी महाकाव्य व खंडकाव्य लिखकर एक मील-स्तम्भ का कार्य किया है | उनके अनुकरण में अन्य बहुत से साहित्यकार इस विधा में आगे आरहे हैं| उनकी प्रेरणा लेकर कविवर कुमार तरल ने अगीत-विधा में बुद्ध-कथा महाकाव्य की रचना की है |
----- ‘वादे वादे जायते तत्व बोध ..’ के परिप्रेक्ष्य में मैं ईशोपनिषद के काव्यभावानुवाद का स्वागत करता हूँ और माँ भारती से प्रार्थना करता हूँ कि डा श्याम गुप्त जी इसी प्रकार आगे भी अपनी रचनाओं से हिन्दी का भंडार भरते रहें | मंगल कमंनाओं के साथ |
दि.१५-८-२०१६
संपर्क— साहित्य-भूषण डा रंगनाथ मिश्र ‘सत्य’ डी.लिट्
अगीतायन, ई-३८८५,राजाजीपुरम,लखनऊ संस्थापक /अध्यक्ष
मो.९३३५९९०४३५, दूभा-०५२२-२४१४८१७ . अ.भा. अगीत परिषद्, लखनऊ
-----क्रमश - आगे वन्दना व पश्च पृष्ठ का कथन ----


 

मंगलवार, 2 मई 2017

डा श्याम गुप्त की दो नई गज़लें ---- डा श्याम गुप्त

....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...


 डा श्याम गुप्त की दो नई गज़लें ----
 
 ग़ज़ल-१...

साडी व दुपट्टे में यही फ़ायदा है दोस्तो,
भीड़ में भी आँचल डाल, माँ दूध पिला लेती है |

हर जगह अलग से एक केबिन चाहिए उन्हें,
माताएं जो पेंट जींस टॉप सिला लेती हैं |

पत्तियों और छाल की स्कर्ट टॉप पहनते थे सभी,
प्रगति क्या हमें उसी मुकाम पे ला देती है |

पढ़ लिख के हुए काबिल और बदन को ढकना सीखा,
नारी यूं सौन्दर्य, शील औ लज्जा बचा लेती हैं |

कहते हैं ज़माना है नया, माडर्न है नारी औ नर,
दौरे उन्नति क्या श्याम’ कपडे उतरवा लेती है |


ग़ज़ल ---२.
न प्यार मोहब्बत का ग़ज़ल गीत चाहिए |
न हुश्न नाजो-अदा की ही रीति चाहिए |

अब देश पे जीने की मरने की कसम की,
झंकार भरा गीत कोइ मीत चाहिए |

हैं हर तरफ दुश्मनी की अंधेरी वादियाँ ,
अब शौर्य के उजाले भरे गीत चाहिए |

साकी शराब मयकदे की शायरी न कह,
तलवार तीर गोलियों से प्रीति चाहिए |

वीरों के गीत फिर सुना तू ऐ कलम ‘श्याम,
भरे रक्त में उबाल ऐसे गीत चाहिए ||


 

शनिवार, 29 अप्रैल 2017

पुस्तक----ईशोपनिषद का काव्यभावानुवाद -----आत्म- कथ्य – -----भाग तीन ----डा श्याम गुप्त

                                           ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...


पुस्तक----ईशोपनिषद का काव्यभावानुवाद ------डा श्याम गुप्त ....
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------आत्म- कथ्य –डा श्याम गुप्त -----क्रमश -भाग दो से आगे ---


----भाग तीन---

. भाग तीन
भाग दो में ब्रह्म को क्यों जानें, ब्रह्म विद्या क्यों, ईश्वर क्या व कौन है उसकी महत्ता ,,,,जीव का ईश्वर से तादाम्य व उसकी कर्म, सांसारिक कर्मों में एवं व्यष्टि व समष्टि की उन्नति में क्या योगदान है , आदि के बारे में औपनिषदिक दृष्टि का वर्णन किया गया था |
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प्रस्तुत भाग तीन में -----मन्त्र ९ से १४ तक .. मानव कर्तव्यों को कैसे करे, विद्या-अविद्या क्या है...ज्ञान व कर्म का तादाम्य कैसे किया जाय , मृत्यु व अमरता क्या व कैसे ...ताकि व्यक्ति के समुचित व्यवहार से समष्टि व जगत के जीवन व्यवहार में सौम्यता, तादाम्यता बनी रहे .....
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अन्धन्तम प्रविशन्ति ये sविद्यामुपाससते |
ततो भूय इव ते तमो यउ विद्याया रता: ||...९...
---------अविद्या-- पदार्थनिष्ठ विद्या अर्थात सांसारिक ज्ञान-विज्ञान, प्रोफेशनल ज्ञान आदि से उद्भूत कर्म को कहा गया है,
--------- विद्या-- आत्मविद्या अर्थात ज्ञान..वास्तविक मानवीयता युक्त ईश्वरीय-ज्ञान को कहा गया है |
-----अर्थात जो लोग ज्ञान की उपेक्षा करके सिर्फ कर्म, सांसारिक कर्म की ही उपासना करते हैं वे गहरे अन्धकार में गिरते हैं...अर्थात भ्रमों में घिरे रहकर विविध कष्टों, सांसारिक द्वंद्वों से युक्त रहते हैं | -------परन्तु जो कर्म की उपेक्षा करके सिर्फ ज्ञान में ही रत रहते हैं वे तो और भी अधिक अन्धकार को प्राप्त होते हैं |
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अन्येदेवाहुर्विद्यायां अन्यदाहुरविद्याया: |
इति शुश्रुम धीराणां ये नस्त द्विचचक्षिरे||....१०..
----- क्योंकि यह कहा जाता है कि विद्या अर्थात ज्ञान का और ही फल प्राप्त होता है अविद्या अर्थात कर्म का अन्य ही फल प्राप्त होता है | ऐसा हम उन धीर ज्ञानी पुरुषों से सुनते हैं जो हमारे लिए इस विषय पर उपदेश करते हैं |
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विद्यांचाविद्यां च यस्तत वेदोभय सह |
अविद्यया मृत्युं तीर्त्वा विद्ययामृतमश्नुते ||....११..
------अतः जो विद्या व अविद्या अर्थात ज्ञान व कर्म दोनों को साथ साथ जानता है एवं दोनों के समन्वय से कर्मों में प्रवृत्त रहता है वह कर्म से संसार में उचित व सुकृत्य रूप से प्रवृत्त होकर संसार सागर में तैरकर मृत्यु पर विजय प्राप्त करता है एवं विद्या अर्थात ज्ञान के मार्ग में प्रवृत्त होकर सत्कर्मों द्वारा अमरता को प्राप्त होता है |
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------ वस्तुतः अमरता, अमृत क्या हैं | अमृत प्राप्ति क्या है ? कर्म व ज्ञान क्या है ? शरीर में ज्ञानेन्द्रियाँ (आत्मा के ज्ञान गुण की सार्थकता हेतु ) व कर्मेन्द्रियाँ (आत्मा के कर्म गुण की सार्थकता हेतु ) दो ही प्रकार की इन्द्रियाँ होती हैं, आत्मा (या व्यक्ति ) मन के द्वारा इन इन्द्रियों का समन्वय करके जीव को ( स्वयं को ) कर्म में प्रवृत्त करता है |
-------- सिर्फ एक प्रकार की इन्द्रियाँ जीव को उचित कर्म में प्रवृत्त नहीं कर सकतीं | अतः निश्चय ही ज्ञान व कर्म दोनों को जानकर उनका प्रयोग साथ-साथ ही करना चाहिए तभी कोई भी कर्म या क्रिया सत्प्रवृत्ति में, सत्कार्य में फलीभूत होती है |
------- विना सिद्धांत जाने प्रायोगिक कर्म एवं बिना प्रायोगिक कर्म किये कोरा ज्ञान व्यर्थ ही है | ज्ञान को कार्य में परिणत करना ही मानव जीवन का उद्देश्य है क्योंकि सिर्फ ज्ञान मात्र का कोई फल नहीं होता अतः सिर्फ कर्म से अन्धकार में पड़ना एवं सिर्फ ज्ञान से और भी अधिक अन्धकार में रहना कहा गया है |
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-------ज्ञान से कर्म की महत्ता अधिक है परन्तु ज्ञान के बिना कर्म उचित ढंग से नहीं किया जा सकता | ईश्वरीय ज्ञान के बिना सारे कर्म निरुद्देश्य अकर्म ही होंगे जो आजकल प्राय्: देखने में आता है ..घातक अस्त्र-शस्त्र निर्माण की होड़ , धनसंचय की होड़, भ्रष्टाचार, अत्याचार,अनाचार, बलात्कार सभी उद्देश्यहीन अकर्म एवं उनसे उत्पन्न विकार-विकर्म एवं दुष्कर्म हैं जो आत्मा की मृत्यु के प्रतीक हैं इसी मृत्यु को पार करके अमरता प्राप्त करना उद्देश्य है मानव जीवन का ....जो उपनिषद् का मन्त्र है | यहीं से गीताकार ने कर्मयोग का पाठ लिया है | यह वेदों का शाश्वत सिद्धांत है जो सार्वकालिक उपयोगी है |
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अन्धतम: प्रविशन्ति ये sसम्भूति मुपासते |
ततो भूय इव ते तमो य उ सम्भूत्या रताः ||....१२..
------- सम्भूति अर्थात कार्य रूप प्रकृति ( स्थूल शरीर + सूक्ष्म शरीर = नश्वर भौतिक शरीर ) एवं ..
-----असम्भूति या विनाश ( अनश्वर )अर्थात कारण रूप प्रकृति ( कारण शरीर ...मूल आत्म तत्व ).|.......
-------जो सिर्फ असम्भूति अर्थात कारण शरीर ..आत्मा की ही उपासना करते हैं, अन्य शरीरों की उपेक्षा करके, वे घोर अन्धकार में गिरते हैं.....
-------और जो सिर्फ सम्भूति अर्थात भौतिक शरीर के पालन पोषण में ही व्यस्त रहते हैं, कारण शरीर... आत्मा की उपेक्षा करके, वे और भी अधिक अन्धकार में घिरते हैं |
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अन्यदेवाहु : सम्भवादन्यदाहुर सम्भवात |
इति शुश्रुम धीराणां ये नस्त द्विचच क्षिरे ||....१३....

..-------.कार्य प्रकृति की उपासना व कारण प्रकृति की उपासना ... सम्भूति योग व असम्भूति योग के भिन्न भिन्न परिणामी फल होते हैं जो धीर व विद्वान् उपदेशकों ने हमें बताया है |
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सम्भूतिंच विनाशंच यस्तद वेदोभय सह |
विनाशेन मृत्युं तीर्त्वा सम्भूत्याsमृतमश्नुते ||...१४...
------- जो कोई कार्यरूप प्रकृति ( सम्भूति---शरीर ) एवं विनाश( असम्भूति ) अर्थात नाशहीन कारण रूप प्रकृति --- आत्म तत्व, को साथ-साथ जानता है वह समयानुरूप नवीन सृजन एवं अवांछनीय का त्याग द्वारा संसार सागर में मृत्यु पर विजय प्राप्त करके अमरता को प्राप्त करता है |
-------- निश्चय ही जो लोग भौतिक शरीर... ( खान-पान, प्राणायाम ,शरीर की देखभाल , खाना-कमाना, परिवार का पालन-पोषण , आमाजिक कर्तव्यों का पालन )...की उपेक्षा करके, कर्म की, कमाने-धमाने की, संसार्रिक ज्ञान की उपेक्षा करके..... सिर्फ आत्मा, ईश्वर, अध्यात्म, ज्ञान आदि की खोज में ही लगे रहते हैं वे धन से, बल से क्षीण रहकर घोर कष्ट पाते हैं....
------ परन्तु जो सिर्फ भौतिक शरीर...रोटी, कपड़ा और मकान, मेरा-तेरा, धनसंपदा का जोड़-तोड़, शारीरिक सुख व भौतिक सुख प्राप्ति में ही लगे रहते हैं, ईश्वर प्राप्ति, ज्ञान प्राप्ति, अध्यात्मिक ज्ञान प्राप्ति, ईश्वर उपासना अदि की उपेक्षा करके ..... वे और भी अधिक घोर कष्टों, मानसिक द्वंद्वों में फंसे रहते हैं |
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-----अतः निर्दिष्ट है कि जैसा हमें विद्वान् बताते हैं कि दोनों की उपासना के भिन्न भिन्न फल मिलते हैं ..मनुष्य को भौतिकता व आध्यात्मिकता, शरीर व आत्मा, संसार व ईश्वर, ज्ञान व कर्म दोनों का ही उचित ज्ञान प्राप्त करके दोनों के समन्वय से चलना चाहिए |
------- संसार में नित्य सत्कर्म रूपी नव-सृजन एवं अकर्म, विकर्म व दुष्कर्म रूपी अवांछनीय का त्याग ही मानव का उद्देश्य होना चाहिए | एसा न कर पाना ही मृत्यु है और इसी समन्वय से चलना संसार में मृत्यु को पार करना व अमरता है | यह सार्वकालिक अनुशासन व नियम है |

" ज्ञान और संसार को, जो दोनों को ध्याय ,
माया बंधन पार कर अमरतत्व पाजाय |"

--क्रमश भाग चार .....
 
 
 

 

गुरुवार, 27 अप्रैल 2017

पुस्तक----ईशोपनिषद का काव्यभावानुवाद -----आत्म- कथ्य---भाग दो -डा श्याम गुप्त .


               ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...


पुस्तक----ईशोपनिषद का काव्यभावानुवाद ------डा श्याम गुप्त ....
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------आत्म- कथ्य –डा श्याम गुप्त -----क्रमश -भाग एक से आगे ---


भाग दो 


-------- प्रथम भाग के तीन मन्त्रों में मानव के मूल कर्तव्यों को बताया गया है कि ...सबकुछ ईश्वर से नियमित है एवं वह सर्वव्यापक है, अतः जगत के पदार्थों को अपना ही न मानकर, ममता को न जोड़कर सिर्फ प्रयोगाधिकार से भोगना चाहिए | कर्म करना आवश्यक है परन्तु उसे अपना कर्त्तव्य व धर्म मानकर करना चाहिए , आत्मा के प्रतिकूल कर्म नहीं करना चाहिए एवं किसी की वस्तु एवं उसके स्वत्व का हनन नहीं करें |

---------इस द्वितीय भाग में मन्त्र 4 से 8 तक में ब्रह्म विद्या के मूल तत्वों एवं ब्रह्म के गुणों का वर्णन है ....
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अनेजदेकं मनसो ज़वीयो नैनद्देवा आप्नुवन पूर्वंमर्षत|
तद्धावतोsन्यान्यत्येति तिष्ठत्तस्मिन्नपो मातरिश्वा दधाति||..४
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-------वह ब्रह्म अचल,एक ही एवं मन से भी अधिक वेगवान है तथा सर्वप्रथम है, प्रत्येक स्थान पर पहले से ही व्याप्त है | उसे इन्द्रियों से प्राप्त (देखा, सुना,अनुभव आदि ) नहीं किया जा सकता क्योंकि वह इन्द्रियों को प्राप्त नहीं है | वह अचल होते हुए भी अन्य सभी दौड़ने वालों से तीब्र गति से प्रत्येक स्थान पर पहुँच जाता है क्योंकि वह पहले से ही सर्वत्र व्याप्त है | वही समस्त वायु, जल आदि विश्व को धारण करता है |
\
तदेज़ति तन्नैजति तद्दूरे तद्वन्तिके |
तदन्तरस्य सर्वस्य तदु सर्वस्यास्य बाह्यतः ||...५ ..
-------वह ब्रह्म गतिशील भी है अर्थात सब को गतिदेता परन्तु वह स्थिर भी है क्योंकि वह स्वयं गति में नहीं आता | वह दूर भी हैक्योंकि समस्त संसार में व्याप्त ..विभु है और सबके समीप भी क्योंकि सबके अंतर में स्थित प्रभु भी है | वह सबके अन्दर भी स्थित है एवं सबको आवृत्त भी किये हुए है , अर्थात सबकुछ उसके अन्दर स्थित है |.
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यस्तु सर्वाणि भूतान्यात्मन्येवानुपश्यति |
सर्वभूतेषु चात्मानं ततो न विजुगुप्सते ||...६...
-------जो कोई समस्त चल-अचल जगत को परमेश्वर में ( एवं आत्म-तत्व में ) ही स्थित देखता समझता है तथा सम्पूर्ण जगत में परमेश्वर को ( एवं आत्म तत्व को ) ही स्थित देखता समझता है वह भ्रमित नहीं होता, घृणा नहीं करता अतः आत्मानुरूप कर्मों के करने से निंदा का पात्र नहीं बनता |
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यस्मिन्त्सर्वाणि भूतान्यात्मैवा भू द्विजानतः |
तत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यत: ||...७....
---------जब व्यक्ति यह उपरोक्त मर्म जाना लेता है कि आत्मतत्व ही समस्त भूतों....चल-अचल संसार में व्याप्त है वह सबको आत्म में स्थित मानकर सबको स्वयं में ही मानकर अभूत .अर्थात एकत्व -भाव होजाता है | ऐसे सबको समत संसार को एक सामान देखने समझाने वाले को न कोई मोह रहता है न शोक ...वह ममत्व से परे परमात्म-रूप ही होजाता है | उसका ध्येय ईश्वरार्पण |
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स पर्यगाच्छुक्रमकायमव्रण-
मस्नाविरंशुद्धमपापविद्धम |
कविर्मनीषी परिभू स्वयन्भूर्याथातथ्यतो
sर्थान- व्यदधाच्छाश्वतीभ्य: समाभ्यः ||....८....
---------और वह ईश्वर परि अगात ,,,सर्वत्र व्यापक, शुक्रं....जगत का उत्पादक, अकायम...शरीर रहित, अव्रणम ...विकार रहित ,अस्नाविरम ..बंधनों से मुक्त, पवित्र,पाप बंधन से रहित कविः...सूक्ष्मदर्शी , ज्ञानी, मनीषी, सर्वोपरि, सर्वव्याप्त ( परिभू). स्वयंभू ....स्वयंसिद्ध , अनादि है | उसने प्रजा अर्थात जीव के लिए समाभ्य अनादिकाल से यातातथ्यतः अर्थात यथायोग्य ..ठीक ठीक कर्मफल का विधान कर रखा है, सदा ही सबके लिए उचित साधनों व अनुशासन की व्यवस्था करता है |
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-----------अर्थात...... आखिर कोई ब्रह्म के, उसके गुणों के, ब्रह्म विद्या के बारे में क्यों जाने ? ईश्वर को क्यों माने, इसका वास्तविक जीवन में क्या कोई महत्व है ?
--------वस्तुतः हमारा, व्यक्ति का, मानव मात्र का उद्देश्य ब्रह्म को जानना, वर्णन करना ज्ञान बघारना आदि ही नहीं अपितु वास्तव में तो ब्रह्म के गुण जानकर, समस्त संसार को ईश्वरमय एवं ईश्वर को संसार मय....आत्ममय ..समस्त विश्व को एकत्व जानकर मानकर, ईश्वर व आत्मतत्व का एकत्व जानकर विश्वबंधुत्व के पथ पर बढ़ना, समत्व से, समता भाव से कर्म करना एवं वर्णित ईश्वरीय गुणों को आत्म में, स्वयं में समाविष्ट करके शारीरिक, मानसिक व आत्मिक उन्नति द्वारा ...व्यष्टि, समष्टि, राष्ट्र, विश्व व मानवता की उन्नति ही इस विद्या का ध्येय है |

---------क्रमश भाग तीन , अगले अंक में ---

पुस्तक----ईशोपनिषद का काव्यभावानुवाद ------------आत्म- कथ्य –डा श्याम गुप्त ..भाग एक---

                                   ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...





पुस्तक----ईशोपनिषद का काव्यभावानुवाद ------डा श्याम गुप्त ....
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------आत्म- कथ्य –डा श्याम गुप्त -----
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------छात्र जीवन में आर्य समाज के ग्रन्थों एवं स्वामी दयानंद रचित ‘सत्यार्थ प्रकाश’ से वैदिक साहित्य एवं उसकी परंपरा से परिचय हुआ, क्योंकि भारतीय संस्कृति के पुजारी पूज्य पिताजी, स्वामी जी से अत्यंत प्रभावित थे | ------तत्पश्चात वेदों के एक प्राचीन संस्करण से उनके पारंपरिक कर्मकांडीय तथा बहु-अर्थीय अर्थार्थ से परिचय हुआ एवं गोरखपुर से प्रकाशित वेदों के पारंपरिक संस्करण तथा गायत्री परिवार के आचार्यवर श्रीराम शर्मा जी के वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी परिचय हुआ|
-------इस विशाल एवं बहु-आयामी, बहुमुखी ज्ञान का तनिक सा आस्वादन ही ज्ञान चक्षुओं को विभोर कर देता है | विभिन्न उपनिषदों से परिचय होने पर मुझे प्रतीत हुआ कि मानव-जीवन के सद-आचरण एवं उचित-जीवन व्यवहार ही समस्त वैदिक साहित्य के ज्ञान का मूलभाव है | ईशोपनिषद उस समस्त ज्ञान का मूल है |
--------महात्मा नारायण स्वामी के ‘उपनिषद् रहस्य’ एवं सस्ता साहित्य प्रकाशन द्वारा प्रकाशित आचार्य विनोवा भावे जी के ‘ईशावास्यवृत्ति’ के अध्ययन से यह धारणा और पुष्ट हुई |
--------बस इन्हीं समस्त विचारों, भावों के आधार पर मुझे सरल हिन्दी में ईशोपनिषद के १८ मन्त्रों के काव्यभावानुवाद लिखने की अन्तःप्रेरणा प्राप्त हुई प्रस्तुत कृति के रूप में |
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--------- विश्व के प्राचीनतम व सर्वश्रेष्ठ ज्ञान के भण्डार 'वेद' , जिनके बारे में कथन है कि जो कुछ भी कहीं है वह वेदों में है और जो वेदों में नहीं है वह कहीं नहीं , के ज्ञान ...परा व अपरा विद्या के आधार उपनिषद् हैं जो भारतीय मनीषा, ज्ञान, विद्या, संस्कृति व आचरण-व्यवहार के आधार तत्व हैं | उपनिषद् भवन की आधार शिला 'ईशोपनिषद ' है जिसमें समस्त वेदों व उपनिषद् शिक्षा का सार है | ईशोपनिषद यजुर्वेद का चालीसवां अध्याय है जो परा व अपरा ब्रह्म-विद्या का मूल है अन्य सभी उपनिषद् उसी का विस्तार हैं |
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---------वेदों के मन्त्रों का भाव मूलतः दो रूपों में प्राप्त होता है ...
१. उपदेश रूप में --जहाँ मानव अपने कर्म में स्वतंत्र है वह उपदेश उस रूप में ग्रहण करे न करे...
२. नियम रूप में -- जो प्राकृतिक नियम रूप हैं एवं अनुल्लंघनीय हैं |
--------ईशोपनिषद में ईश्वर, जीव, संसार, कर्म, कर्त्तव्य, धर्म, सत्य, व्यवहार एवं उनका तादाम्य 18 मन्त्रों में देदिया गया है, जो आज भी प्रासंगिक हैं , समीचीन हैं एवं अनुकरणीय व पालनीय हैं | इसकी सैकड़ों टीकाएँ --- विधर्मी दाराशिकोह, जिसे इसके अध्ययन के बाद ही शान्ति मिली द्वारा फारसी में.... जर्मन विद्वान् शोपेन्हावर को अपनी प्रसिद्ध फिलासफी त्याग कर इसी से संतुष्टि प्राप्त हुई| शंकराचार्य की अद्वैतपरक...रामानुजाचार्य की विशिष्टाद्वेतपरक एवं माधवाचार्य की द्वैतपरक टीकाएँ इस उपनिषद् की महत्ता का वर्णन करती हैं |
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ईशोपनिषद के 18 मन्त्रों में चार भागों में सबकुछ कह दिया गया है | ये हैं--
१.प्रथम भाग...मन्त्र १ से ३ .... कर्तव्य-पंचक -मानव जीवन के मूल कर्त्तव्य ..
२.द्वितीय भाग....मन्त्र ४ से ८... ईश्वर के गुण -ब्रह्म विद्या मूलक सिद्धांत व ईश्वर के गुण व ईश्वर क्यों ...
३.तृतीय भाग....मन्त्र ९ से १४ ...मानव कर्तव्य एवं ब्रह्म प्राप्ति विधि ज्ञान-अज्ञान, यम-नियम, मानव के कर्त्तव्य, विद्या-अविद्या, संसार, ब्रह्म-विद्या प्राप्ति, प्रकृति, कार्य-कारण, मृत्यु-अमरत्व ....आत्मा-शरीर…..
४.चतुर्थ भाग ..... मन्त्र १५ से १८....आत्मरूपता, ईश्वर से तादाम्य, ईश्वर प्राप्ति-.सत्य, धर्म, कर्म, ईश्वर-जीव का मिलन, आत्मा-शरीर का अंतिम परिणाम |
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----- प्रथम भाग ------
\ ( मन्त्र १ से ३ तक )
ईशावास्यं इदं सर्वं यत्किंच जगात्याम् जगत|
तेन त्यक्तेन भुंजीथा मा गृधःकस्यस्विद्धनम || १....
-------इस जगत में अर्थात पृथ्वी पर, संसार में जो कुछ भी चल-अचल, स्थावर, जंगम , प्राणी आदि वस्तु है वह.ईश्वर की माया से आच्छादित है अर्थात उसके अनुशासन से नियमित है | उन सभी पदार्थों को त्याग से अर्थात सिर्फ उपयोगार्थ दिए हुए समझकर उपयोग रूप में ही भोगना चाहिए, क्योंकि यह धन किसी का भी नहीं हुआ है अतः किसी प्रकार के भी धन व अन्य के स्वत्व-स्वामित्व का लालच व ग्रहण नहीं करना चाहिए |
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कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतम समाः |
एवंत्वयि नान्यथेतो sति न कर्म लिप्यते नरः ||..२..
-------यहाँ मानव कर्मों को करते हुए १०० वर्ष जीने की इच्छा करे, अर्थात कर्म के बिना, श्रम के बिना जीने की इच्छा व्यर्थ है | कर्म करने से अन्य जीने का कोई भी उचित मार्ग नहीं है क्योंकि इस प्रकार उद्देश्यपूर्ण, ईश्वर का ही सबकुछ मानकर, इन्द्रियों को वश में रखकर आत्मा की आवाज़ के अनुसार जीवन जीने से मनुष्य कर्मों में लिप्त नहीं होता.... अर्थात अनुचित कर्मों में, ममत्व में लिप्त नहीं होता, अपना-तेरा, सांसारिक द्वंद्व दुष्कर्म, विकर्म आदि उससे लिप्त नहीं होते |
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.असुर्या नाम ते लोका अन्धेन तमसावृता |
तांस्ते प्रेत्याभिगच्छन्ति ये के चात्महनो जनाः ||-३ ...
------ जो आत्मा के घातक अर्थात ईश्वर आधारित व आत्मा के विरुद्ध , केवल शरीर व इन्द्रियों आदि की शक्ति व इच्छानुसार सद्विवेकआदि की उपेक्षा करके कर्म ( या अपकर्म आदि ) करते हैं वे अन्धकारमय लोकों में पड़ते हैं अर्थात विभिन्न कष्टों, मानसिक कष्टों, सांसारिक द्वेष-द्वंद्व रूपी यातनाओं में फंसते हैं |
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-------- निश्चय ही मानव का आत्म... स्वयं शक्ति का केंद्र है उस शक्ति के अनुसार चलना, मन वाणी शरीर से कर्म करना ही उचित है यही आस्तिकता है, ईश्वर-भक्ति है, अन्य कोई मार्ग नहीं है| इस ईश्वर .. श्रेष्ठ -इच्छा एवं आत्म-शक्ति से ही समस्त विश्व संचालित है, आच्छादित है, अनुशासित है ..
तू ही तू है ,
सब कहीं है |
सब वस्तु ईश्वर की न मानना अर्थात धन एवं अपने स्वत्व को ईश्वर से पृथक मानना.. मैं ,ममत्व..ममता, मैं -तू का द्वैत ही समस्त दुखों, द्वंद्वों, घृणा आदि का मूल है| ...
सब कुछ ईश्वर के ऊपर छोडो यारो ,
अच्छे कर्मों का फल है अच्छा ही होता |
----------कर्म- संसार का अटूट नियम है ..जगत में कोई भी वस्तु क्रिया रहित नहीं होती, अतः कर्मनिष्ठ होना ही मानव की नियति है | परन्तु जो लोग अपनी आत्मा ( सेल्फ कोंशियस ) के विपरीत, मूल नियम के विरुद्ध, ईश्वरीय नियम के विरुद्ध अर्थात प्रतिकूल कर्म करते हैं वे विविध कष्टों को प्राप्त होते हैं|
"" मिलता तुझको वही सदा जो तू बोता है |""
--------यही आत्मप्रेरणा से चरित्र निर्माण का मार्ग है |


क्रमश ---- द्वितीय भाग----मन्त्र ४ से ८ तक-----
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बुधवार, 26 अप्रैल 2017

सखीं संग राधाजी दर्शन पाए----‘श्याम सवैया छंद...श्याम गुप्त...

                       ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...

सखीं संग राधाजी दर्शन पाए----‘श्याम सवैया छंद...श्याम गुप्त...

-----सखीं संग राधाजी दर्शन पाए------..
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चित्रकूट के घाट पर भई संतन की भीर,
तुलसी दास चन्दन घिसें तिलक देत रघुबीर |

-------इस घटना को चाहे कुछ लोग कल्पित रचना मानते हों परन्तु रचना में अन्तर्निहित जो भगवद भक्ति, जो कल्पना व भावना के अंतर्संबंध का जो सत्य स्वरुप आनंद है, रसानंद है, ब्रह्मानंद है, वह अनिर्वचनीय है |


\\--उसी प्रकार ---
-------यदि आपको बिहारी जी के विग्रह के दर्शन रूपी रसानंद के साथ तुरंत ही राधाजी के सचल स्वरुप के दर्शन –सुख का आनंद प्राप्त होजाय तो वह अनिर्वचनीय परमानंद वर्णनातीत है, मोक्ष स्वरुप है | 
 
--------- एसी ही एक सत्य घटना का काव्यमय वर्णन प्रस्तुत है | जिसके लिए मैंने सवैया छंद के नवीन प्रारूप का सृजन किया और उसे ‘श्याम सवैया छंद’ का नाम दिया |
( श्याम सवैया छंद –छः पंक्तियाँ, वर्णिक, २४ वर्ण, अंत यगण )


**** सखीं संग राधाजी दर्शन पाए..***** १.
श्रृद्धा जगी उर भक्ति पगी प्रभु रीति सुहाई जो निज मन मांहीं |
कान्हा की वंसी जु मन मैं बजी सुख आनंद रीति सजी मन मांहीं|
राधा की मथुरा बुलावे लगी मन मीत बसें उर प्रीति सुहाई |
देखें चलें कहूँ कुञ्ज कुटीर में बैठे मिलहिं कान्हा राधिका पाहीं |
उर प्रीति उमंग भरे मन मांहि चले मथुरा की सुन्दर छाहीं |
देखी जो मथुरा की दीन दशा मन भाव भरे अँखियाँ भरि आईं ||

२.
ऐसी बेहाल सी गलियाँ परीं दोउ लोचन नीर कपोल पे आये |
तिहूँ लोक ते न्यारी ये पावन भूमि जन्मे जहं देवकी लाल सुहाए |
टूटी परीं सड़कें चहुँ और हैं लता औ पता भरि धूरि नहाए |
हैं गोप कहाँ कहँ श्याम सखा किट गोपी कुञ्ज कतहूँ नहिं पाए |
कित न्यारे से खेल कन्हैया के कहूँ गोपीन की पग राह न पाए |
हाय यही है मथुरा नगर जहं लीला धरन लीला धरि आये ||
३.
रिक्शा चलाय रहे ब्रज वाल किट ग्वाल-गुपाल के खेल सुहाए |
गोरस की नदियाँ बहें कित गली राहन कीचड़ नीर बहाए |
कुंकुम केसरि की धूर कहाँ धुंआ डीज़ल कौ चहुँ ओर उडाये |
माखन मिसरी के ढेर कितें चहुँ ओर तो कूड़न ढेर सजाये |
सोची चले वृन्दावन धाम मिलें वृंदा वन बहु भाँति सुहाए |
दोलत ऊबड़-खाबड़ राह औ फाँकत धूल वृन्दावन आये ||
४.
कालिंदी कूल जो निरखें लगे मन शीतल कुञ्ज कुटीर निहारे ,
कौन सो निरमल पावन नीर औ पाए कहूँ न कदम्ब के डारे |
नाथ के कालिया नाग प्रभो जो किये तुम पावन जमुना के धारे |
कारी सी माटी के रंग को जल हैं प्रदूषित कालिंदी कूल किनारे |
दुई सौ गज की चौड़ी नदिया कटि छीन तिया सी बहे बहु धारे |
कौन प्रदूषण नाग कों नाथि कें पावन नीर को नाथ सुधारे ||
५.
गोवरधन गिरिराज वही जेहि श्याम धरे ब्रज वृन्द बचाए |
खोजी थके हरियाली छटा पग राह कहूं औ कतहूँ नहिं पाए |
सूखे से ठूंठ से ब्रक्ष कदम्ब कटे फटे गिरि पाहन बिखराये |
शीर्ण विदीर्ण किये अंग भंग गिरिराज बने हैं कबंध सुहाए |
सब ताल तलैया हैं कीच भरे गिरिराज परे रहें नीर बहाए |
कौन प्रदूषन, खननासुर संहार करहि ब्रजधाम बचाए ||
६.
मंदिर देखि बिहारी लला मन आनंद शीतल नयन जुड़ाने |
हिय हर्षित आनंद रूप लखे, मन भाव, मनों प्रभु मुसकाने |
बोले उदास से नैन किये अति ही सुख आनंद हम तौ सजाने |
देखी तुमहूँ मथुरा की दशा हम कैसें रहें यहाँ रोज लजाने |
अपने अपने सुख चैन लसे मथुरा के नागर धीर सयाने |
श्याम कछू अब तुमहिं करौ, हम तौ यहाँ पाहन रूप समाने ||
७.
भाव भरे कर जोरि कें दोऊ, भरे मन बाहर गलियन आये |
बांस फटे लिए हाथन में सखियन संग राधाजू भेष बनाए |
नागरि चतुर सी मथुरा कीं रहीं घूमि नगर में धूम मचाये |
हौले से राधा सरूप नै पायं हमारे जो दीन्हीं लकुटियां लगाए |
जोरि दोऊ कर शीश नवाय हम कीन्हों प्रनाम हिये हुलसाये |
जीवन धन्य सुफल भयो श्याम, सखीं संग राधाजी दर्शन पाए ||


 

मंगलवार, 25 अप्रैल 2017

श्याम स्मृति- १७४.....पत्नी-सह-धर्मिणी..... डा श्याम गुप्त

                                         ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...

श्याम स्मृति- १७४.....पत्नी-सह-धर्मिणी.....

               पत्नी को सहकर्मिणी नहीं कहा गया, क्यों? स्त्री, सखी, प्रेमिका, सहकर्मिणी हो सकती है, स्त्री माया रूप है, शक्ति-रूप, ऊर्जा-रूप वह अक्रिय-क्रियाशील ( सामान्य-पेसिव ) पात्र, रोल अदा करे तभी उन्नति होती है, जैसे वैदिक-पौराणिक काल में हुई |

------पत्नी सह-धर्मिणी है, केवल सहकर्मिणी नहीं | हाँ, पुरुष के कार्य में यथासमय, यथासंभव, यथाशक्ति सहकर्म-धर्म निभा सकती है | सह्कर्मिणी होने पर पुरुष भटकता है और सभ्यता अवनति की ओर | अतः पत्नी को सहकर्म नहीं सहजीवन व्यतीत करना है – सहधर्म |

------स्त्री-पुरुष के साथ-साथ काम करने से उच्च विचार प्रश्रय नहीं पाते, व्यक्ति स्वतंत्र नहीं सोच पाता, विचारों को केंद्रित नहीं कर पाता, हाँ भौतिक कर्मों व उनसे सम्बंधित विचारों की बात पृथक है| |

------ तभी तो पति-पत्नी सदा पृथक-पृथक शयन किया करते थे | राजा-रानियों के पृथक-पृथक महल व कक्ष हुआ करते थे | सिर्फ मिलने की इच्छा होने पर ही वे एक दूसरे के महल या कमरे में जाया करते थे | माया की नज़दीकी व्यक्ति को भरमाती है, उच्च विचारों से दूर करती है |

----- यूं तो कहा जाता है कि प्रत्येक सफल व्यक्ति के पीछे नारी होती है, पर ये क्यों नहीं कहा गया कि सफल नारी के पीछे पुरुष होता है |

------नारी की तपस्या, त्याग, प्रेम, धैर्य, धरित्री जैसे महान गुणों व व्यक्तित्व की महानता के कारण ही तो पुरुष महान बनते हैं, सदा बने हैं, जो नारी का भी समादर कर पाते हैं और दोनों के समन्वय से समाज व सभ्यता नित नए सोपान चढ़ती है|