अमेरिका में बसे लोग कहरहे हैं किवे दो भाषायें आसानी से बोलते है -हिन्दी,अंग्रेजी। टी शर्त पहनते हैं ,मक्दोनाल्ड में खाते हैं साथ में -रामायण पड़ते हैं ,मन्दिर जाते हैं ,हिन्दी गाने गाते हैं ,अतः अपनी संस्कृति के करीब हैं।
क्या मन्दिर जाना,हिन्दी फिल्में देखना, रामायण पढ़ना ,भारतीयता की निशानी है ?देश को याद कर लेना और अपने धंधे -व्यापार, में मस्त रहना -देश से जुड़े रहना है ?
यह तो वही है---गाँव तो बहुत अच्छा लगता है पर वहाँ ऐ-सी- नहीं है न !, हिन्दुस्तान तो सुंदर है पर वहाँ मोटी तनखा , नहीं है न ! गरमी वहुत है,लोग बनियान पहन कर घूमते हैं, एटीकेट नहीं है न !सिर्फ़ हिन्दी में बोलते हैं , हिन्दू - हिन्दी ,हिन्दुस्तान चिल्लाते रहते हैं , तरक्की नहीं करते।
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डा श्याम गुप्त का ब्लोग...
- shyam gupta
- Lucknow, UP, India
- एक चिकित्सक, शल्य-चिकित्सक जो हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान व उसकी संस्कृति-सभ्यता के पुनुरुत्थान व समुत्थान को समर्पित है व हिन्दी एवम हिन्दी साहित्य की शुद्धता, सरलता, जन-सम्प्रेषणीयता के साथ कविता को जन-जन के निकट व जन को कविता के निकट लाने को ध्येयबद्ध है क्योंकि साहित्य ही व्यक्ति, समाज, देश राष्ट्र को तथा मानवता को सही राह दिखाने में समर्थ है, आज विश्व के समस्त द्वन्द्वों का मूल कारण मनुष्य का साहित्य से दूर होजाना ही है.... मेरी तेरह पुस्तकें प्रकाशित हैं... काव्य-दूत,काव्य-मुक्तामृत,;काव्य-निर्झरिणी, सृष्टि ( on creation of earth, life and god),प्रेम-महाकाव्य ,on various forms of love as whole. शूर्पणखा काव्य उपन्यास, इन्द्रधनुष उपन्यास एवं अगीत साहित्य दर्पण (-अगीत विधा का छंद-विधान ), ब्रज बांसुरी ( ब्रज भाषा काव्य संग्रह), कुछ शायरी की बात होजाए ( ग़ज़ल, नज़्म, कतए , रुबाई, शेर का संग्रह), अगीत त्रयी ( अगीत विधा के तीन महारथी ), तुम तुम और तुम ( श्रृगार व प्रेम गीत संग्रह ), ईशोपनिषद का काव्यभावानुवाद .. my blogs-- 1.the world of my thoughts श्याम स्मृति... 2.drsbg.wordpres.com, 3.साहित्य श्याम 4.विजानाति-विजानाति-विज्ञान ५ हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान ६ अगीतायन ७ छिद्रान्वेषी ---फेसबुक -डाश्याम गुप्त
गुरुवार, 21 मई 2009
धृति --धारण ,धैर्य ,धर्म -सम्प्रति रोगी -चिकित्सक व्यवहार सम्बन्ध .
व्यक्ति के सम्मुख -नैतिकता ,यथा - योग्य की समझ व पालन ,मानवीय गुणआदि जब उसका मार्ग दर्शन करने को नहीं होते तो-अति-भौतिकता , होड़ ,विलासप्रियता ,धन आधारित सोच व्यक्ति में अहं की रचना करती है । यह व्यक्ति से समाज में फ़ैल जाती है एवं पुनः चक्रीय व्यवस्थानुसार व्यक्तियों व समस्त समाज को धैर्य के धारण से विमुख कर देती है । यही अधर्म समाज में हर प्रकार की बुराइयां उत्पन्न करता है।
आज हर जगह अस्पतालों में (अन्य स्थानों में भी )इसी धैर्य -धन -धर्म के अभाव के कारण ही हंगामे होते हैं । रोगी व उसके तीमारदारों का अहं कि वह पैसा देता है अतः उसे हर जगह बे रोक टोक जाने देना चाहिए ,२४ घंटे हमें रोगी के पास रहने का अधिकार है। यही बाद में झगडा होने पर ग़लत इलाज़ का बहाना हो जाता है।
चिकित्सा कर्मचारी ,धन कमाने के सोच के कारण रोगी पर उचित ध्यान न देकर तीमारदारों को झगडा के लिए उचित खाद-पानी प्रदान करते हैं ।--- आग है दोनों तरफ़ बराबर लगी हुई।--
अति भौतिक सुख लिप्त हुए नर ,
मद्यपान आदिक बिषयों रत;
कपट, झूठ , छल और दुष्टता ,
के भावों को प्रश्रय देते;
भ्रष्टाचार आतंक बाद में ,
राष्ट्र , समाज लिप्त होजाता।। --शूर्पनखा काव्य -उपन्यास से
आज हर जगह अस्पतालों में (अन्य स्थानों में भी )इसी धैर्य -धन -धर्म के अभाव के कारण ही हंगामे होते हैं । रोगी व उसके तीमारदारों का अहं कि वह पैसा देता है अतः उसे हर जगह बे रोक टोक जाने देना चाहिए ,२४ घंटे हमें रोगी के पास रहने का अधिकार है। यही बाद में झगडा होने पर ग़लत इलाज़ का बहाना हो जाता है।
चिकित्सा कर्मचारी ,धन कमाने के सोच के कारण रोगी पर उचित ध्यान न देकर तीमारदारों को झगडा के लिए उचित खाद-पानी प्रदान करते हैं ।--- आग है दोनों तरफ़ बराबर लगी हुई।--
अति भौतिक सुख लिप्त हुए नर ,
मद्यपान आदिक बिषयों रत;
कपट, झूठ , छल और दुष्टता ,
के भावों को प्रश्रय देते;
भ्रष्टाचार आतंक बाद में ,
राष्ट्र , समाज लिप्त होजाता।। --शूर्पनखा काव्य -उपन्यास से
बुधवार, 20 मई 2009
धूल छंटने और शोर घटने के बाद --हि-स-
पुष्पेश पन्त ठीक ही कहते हैं किआज भारत की आधी आबादी १६ से ३० वर्ष की है ,अतः १८ बर्ष से ऊपर के मत दाताओं का असर जवार्दस्त है ,उनकी महत्वाकांक्षाएं ,आशाएं ,अपेक्षाएं ,चिंताएं पुरुखों से भिन्न हैं । नेहरू युग,इंदिरा युग,से उन्हें क्या मतलव ,वे भूमंडली करण व उपभोक्ता वादी संस्कृति से अनुशासित हैं। ,बंधनों ,वर्जनाओं,निषेधों ,परम्परा से मुक्त हैं ,ये करोड़ों युवा मतदाता हिंदुत्व की निक्कारें पहिन लाठी भांजने को तेयार नहीं हैं। वे मोबाइल ,इन्टरनेट वाले लोग हैं । आतंकवाद को,राष्ट्रीय सुरक्षा ,व पूंजीवादी अमेरिका को खलनायक बना कर कोई उन्हें अपना वोट बैंक नही बना सकता ।
यही सत्य है ---आज सिर्फ़ युवा को ही नहीं अपितु अधिकाँश लोगों को ही ---इन सब बातों से कोई मतलव नहीं । उन्हें तो दिखावे की व्यवस्था, उधार की अर्थ व्यवस्था ,अधिक से अधिक धन कमाने व उडाने के रास्ते चाहिए ,चाहे वे किसी भी साधन से आयें । देश प्रेम,राष्ट्रीयता,नैतिकता पौराणिक गाथाएँ ,नीति, धर्म से इन्हें क्या वास्ता ?राम और कृष्ण की नैतिकता से इन्हें क्या वास्ता ,इन्हें तो बद्दी बड़ी नौकरियाँ ,पे पॅकेज चाहिए । जो भी दल,पार्टी,इस असलियत को समझी ,सपने दिखाए ,उसी के पीछे धाये। रही सही कसरहिंदुत्व के विरोधियों ने की जो अपने ही घर के भेदी हैं।क्या इसी कारणपार्कों में कंडोम की मशीनें ,वैश्यावृत्ति व शराब खोरी वाली सड़क का नाम बापू के नाम पर,व कार में ्विवाहिता से दुराचार के समाचार हैं आये दिन, व मनमोहन सिंह दंगों को भुलाने की बातें कहते हें जबकि अपराधियों को दंड तक नही मिला है।
बस खाते-पीते रहो,खेलते-गाते ,नाचते -हंसते ,कमाते -मस्ती करते रहो ,आगे कौन सोचे। जो सोचे वह पुरातन पंथी व त्याज्य है।
यही सत्य है ---आज सिर्फ़ युवा को ही नहीं अपितु अधिकाँश लोगों को ही ---इन सब बातों से कोई मतलव नहीं । उन्हें तो दिखावे की व्यवस्था, उधार की अर्थ व्यवस्था ,अधिक से अधिक धन कमाने व उडाने के रास्ते चाहिए ,चाहे वे किसी भी साधन से आयें । देश प्रेम,राष्ट्रीयता,नैतिकता पौराणिक गाथाएँ ,नीति, धर्म से इन्हें क्या वास्ता ?राम और कृष्ण की नैतिकता से इन्हें क्या वास्ता ,इन्हें तो बद्दी बड़ी नौकरियाँ ,पे पॅकेज चाहिए । जो भी दल,पार्टी,इस असलियत को समझी ,सपने दिखाए ,उसी के पीछे धाये। रही सही कसरहिंदुत्व के विरोधियों ने की जो अपने ही घर के भेदी हैं।क्या इसी कारणपार्कों में कंडोम की मशीनें ,वैश्यावृत्ति व शराब खोरी वाली सड़क का नाम बापू के नाम पर,व कार में ्विवाहिता से दुराचार के समाचार हैं आये दिन, व मनमोहन सिंह दंगों को भुलाने की बातें कहते हें जबकि अपराधियों को दंड तक नही मिला है।
बस खाते-पीते रहो,खेलते-गाते ,नाचते -हंसते ,कमाते -मस्ती करते रहो ,आगे कौन सोचे। जो सोचे वह पुरातन पंथी व त्याज्य है।
सोमवार, 18 मई 2009
लोकतंत्र व चुनाव परिणाम के अर्थ
'लघु है पर विभु अर्थ बताये ,उसे मन्त्र कहते हैं ,
लघु काया बहु भार उठाये , उसे यंत्र कहते हैं ।
मिलें बीस प्रतिशत 'मत' जिसको उस नेता की -
बन जाए सरकार ,उसी को लोकतंत्र कहते हैं।। "
चुनाव परिणाम कुछ ख़ास दिशा नहीं अपितु जनता की अपने लाभ के प्रति ललक , युवा लोगों की कोई ख़ास दिशा न होकर प्राचीन को नकारना ,अपनी संस्कृति का विरोध ,नवीन के प्रति विना सोचे दौड़ का परिणाम है। विशिष्ट विषय व घटनाओं पर मुस्लिम व दलित वोटों का --जैसा चलरहा है वैसा ही चलता रहे -मध्यम मार्गी अपने स्वार्थवश लाभ --ध्रुवी करण है। पाश्चात्य रंग लिए ,हिन्दी ,हिन्दू,हिन्दुस्तान के विरुद्ध ,ध्रुवी करण है
लोकतंत्र -जनता का राज्य,जनता द्वारा ,जनता के लिए -अर्थात--जनता शासक,जनता चोर ,जनता दोषी,जनता न्यायाधीश ,, तो किसे कौन सज़ा दे ,क्यों दे ?,किसके लिए दे ? कोई किसी के प्रति जिम्मेवार नहीं। अतः जनता को स्वआत्मानुशाशन से नियमन करना ही चाहिए।
राज्य तंत्र --राजा दोषी व जिम्मेवार ,वह प्रजा को दंड देकर नियमित रखता है । जनता राजा के कार्यों पर niyantran - विभिन्न संस्थाए -पंचायत,विद्वत मंडली आदि द्वारा । परन्तु --राजा हो चोरी करे ,न्याय कौन पर जाय ? वाली स्थिती हो तो । अर्थात व्यक्तियों को स्व.नियमन करना पडेगा ।
अर्थात --हर परिस्थिति में व्यक्ति को स्वयं ही सदाचरण ,सद -व्यवहार वाला,कर्तव्य निष्ठ ,ईमान दार होना चाहिए ,हर व्यक्ति को , राज्य पद,अधिकार के पदों पर जो हैं उनका दायित्व अधिक होता है। तथा चाहे लोकतंत्र हो या राज्य तंत्र कोई फर्क नहीं पङता । तंत्र स्वयं में जड़ बस्तु है अच्छा-बुरा उसके गुणनहीं ;अच्छा बुरा जीव ,व्यक्ति होता है। उसे ही अच्छा होना चाहिए सब कुछ ठीक होगा।
यही तो धर्म कहता है। और जिसे हम भूल गए हैं। और यथा स्थित वादी -जैसा हे चलने दो वालों को समर्थन दे रहे हैं।
लघु काया बहु भार उठाये , उसे यंत्र कहते हैं ।
मिलें बीस प्रतिशत 'मत' जिसको उस नेता की -
बन जाए सरकार ,उसी को लोकतंत्र कहते हैं।। "
चुनाव परिणाम कुछ ख़ास दिशा नहीं अपितु जनता की अपने लाभ के प्रति ललक , युवा लोगों की कोई ख़ास दिशा न होकर प्राचीन को नकारना ,अपनी संस्कृति का विरोध ,नवीन के प्रति विना सोचे दौड़ का परिणाम है। विशिष्ट विषय व घटनाओं पर मुस्लिम व दलित वोटों का --जैसा चलरहा है वैसा ही चलता रहे -मध्यम मार्गी अपने स्वार्थवश लाभ --ध्रुवी करण है। पाश्चात्य रंग लिए ,हिन्दी ,हिन्दू,हिन्दुस्तान के विरुद्ध ,ध्रुवी करण है
लोकतंत्र -जनता का राज्य,जनता द्वारा ,जनता के लिए -अर्थात--जनता शासक,जनता चोर ,जनता दोषी,जनता न्यायाधीश ,, तो किसे कौन सज़ा दे ,क्यों दे ?,किसके लिए दे ? कोई किसी के प्रति जिम्मेवार नहीं। अतः जनता को स्वआत्मानुशाशन से नियमन करना ही चाहिए।
राज्य तंत्र --राजा दोषी व जिम्मेवार ,वह प्रजा को दंड देकर नियमित रखता है । जनता राजा के कार्यों पर niyantran - विभिन्न संस्थाए -पंचायत,विद्वत मंडली आदि द्वारा । परन्तु --राजा हो चोरी करे ,न्याय कौन पर जाय ? वाली स्थिती हो तो । अर्थात व्यक्तियों को स्व.नियमन करना पडेगा ।
अर्थात --हर परिस्थिति में व्यक्ति को स्वयं ही सदाचरण ,सद -व्यवहार वाला,कर्तव्य निष्ठ ,ईमान दार होना चाहिए ,हर व्यक्ति को , राज्य पद,अधिकार के पदों पर जो हैं उनका दायित्व अधिक होता है। तथा चाहे लोकतंत्र हो या राज्य तंत्र कोई फर्क नहीं पङता । तंत्र स्वयं में जड़ बस्तु है अच्छा-बुरा उसके गुणनहीं ;अच्छा बुरा जीव ,व्यक्ति होता है। उसे ही अच्छा होना चाहिए सब कुछ ठीक होगा।
यही तो धर्म कहता है। और जिसे हम भूल गए हैं। और यथा स्थित वादी -जैसा हे चलने दो वालों को समर्थन दे रहे हैं।
रविवार, 17 मई 2009
ग़ज़ल
एक छोटी बहरकी ग़ज़ल---
दर्दे-दिल भागये
ज़ख्म रास आगये।
तुमने पुकारा नहीं ,
हमीं पास आगये।
कोई तो बात करो,
मौसमे इश्क आगये।
जब भी ख्वाब आए,
तेरे अक्स आगये।
इवादत की खुदा की,
दिल में आप आगये।।
दर्दे-दिल भागये
ज़ख्म रास आगये।
तुमने पुकारा नहीं ,
हमीं पास आगये।
कोई तो बात करो,
मौसमे इश्क आगये।
जब भी ख्वाब आए,
तेरे अक्स आगये।
इवादत की खुदा की,
दिल में आप आगये।।
शुक्रवार, 15 मई 2009
परिवार दिवस पर विशेष --मानवता का पहला परिवार
जब मानव एकाकी था ,सिर्फ़ एक अकेला मानव शायद मनु या आदम ( मनुष्य,आदमी ,मैन) हाथ में एक हथौडानुमा हथियार लिए घूमता रहता था,एक अकेला । एक दिन अचानक घूमते-घूमते उसने एक अपने जैसे ही अन्य आकृति के जानवर ( व्यक्ति) को जाते हुए देखा। उसने छिप कर उसका पीछा किया। चलते -चलते वह आकृति एक गुफा के अन्दर चली गयी। उस मानव ने चुपके से गुफा के अन्दर प्रवेश किया तो देखा की एक उसके जैसा ही मानव बैठा फल आदि खा रहा है। उसकी आहात जानकर अचानक वह आकृति उठी और अपने हाथ के हथौदेनुमा हथियार को उठालिया। अपने जैसे ही आकृति को वह आश्चर्य से देख कर बोली-तुम कौन ? अचानक क्यों घुसे यहाँ ,अगर में हथौडा चलादेता तो ! पहला मानव चारों और देख कर बोला ,अच्छा तुम यहाँ रहते हो । मैं तुमसे अधिक बलशाली हूँ । मैं भी तुम्हें मार सकता था । यह स्थान भी अधिक सुरक्षित नहीं है। तुम्हारे पास फल भी कम हें ,इसीलिये तुम कम जोर हो . अच्छा अब हम मित्र हैं ,मैंतुम्हें अपनी गुफा दिखाता हूँ।
दूसरा मानव उसकी गुफा देख कर प्रभावित हुआ। प्रसंशापूर्ण निगाहों से देखा . पहले मानंव ने कहा तुम यहाँ ही क्यों न ही n आजाते , मिलकर फल एकत्रित करेंगे और भोजन करे गे . उस
ने ध्यान से देखा, उसका हथौडा भी बहुत बड़ा है,उसकी गुफा भी अधिक बड़ी है ,उसके पास फल आदि भी अधिक मात्रा में एकत्रित हैं , उसने उसकी बाहों की पेशियाँ छू कर देखी ,वो अधिक मांसल ,कठोर थीं ,उसका शरीर भी उससे अधिक बड़ा था। दूसरे मानव ने कुछ सोचा और वह अपने फल आदि उठाकर पहले मानव की गुफा में आगया।
और यह वही प्रथम दिन था जव नारी ( शायद -शतरूपा या कामायिनी की श्रद्धा ) ने स्वेक्षा से पुरूष के साथ सह जीवन स्वीकार किया। यह प्रथम परिवार था। यह सहजीवन था। कोई किसी के आधीन नहीं। नर-नारी स्वयं में स्वच्छंद थे ,जीने ,रहने ,किसी के भी साथ रहने आदि के लिए।अन्य जीवों,पशु-पक्षियों की तरह । ,यद्यपि सिंहों, हंसों आदि उच्च जातियों की भांति प्रायः जीवन पर्यंत एक साथी के साथ ही रहने की मूल प्रवृत्ति तब भी थी अब की तरह,(निम्न जातियाँ ,कुत्ते,बिल्ली आदि की भांति कभी भी किसी के भी साथ नहीं.) और यह युगों तक चलता रहा।
जब संतानोत्पत्ति हुई,यह देखा गया की दोनों साथियों के भोजन इकट्ठा कराने जाने पर अन्य जानवरों आदि की भांति ,उनके बच्चे भी असुरक्षित रह जाते हें। तो किसी एक को घर रहने की आवश्यकता हुई । फल इकट्ठा कराने वाली सभ्यता में शारीरिक बल अधिक महत्वपूर्ण होने से पुरूष ने बाहर का कार्य सम्भाला। क्योंकि नारी स्वभावतः अधिक तीक्ष्ण बुद्धि,सामयिक बुद्धि,व त्वरित निर्णय क्षमता में कुशल थी अतः वह घर का ,परिवार का प्रबंधन कराने लगी। यह नारी -सत्तात्मक समाज की स्थापना थी। पुरूष का कार्य सिर्फ़ भोजन एकत्रित करना ,सुरक्षा व श्रमिक कार्य था। यह भी सहजीवन की ही परिपाटी थी। स्त्री-पुरूष कोई किसी के बंधन में नहीं था,सब अपना जीवन जीने के लिए स्वतंत्र थे। युगों तक यह प्रबंधन चलता रहा, आज भी कहीं कहीं दिखता है।
जब मानव कृषि आदि कार्यों से उन्नत हुआ । घुमक्कड़ ,घुमंतू समाज स्थिर हुआ ,भौतिक उन्नति,मकान,घर,कपडे,मुद्रा आदि का प्रचालन हुआ तो तो पुरूष व्यवशायिक कर्मों में अधिक समर्थ होने लगा ,स्त्री का दायरा घर रहा ,पुरूष के अधिकार बढ़ने लगे ,राजनीति ,धर्म,शास्त्र, आदि पर पुरुषों ने आवश्यक खोजें कीं ,अबंधित शारीरिक व यौन संबंधों के रोगों ,द्वंदों आदि रूप में विकार सम्मुख आने लगे तो नैतिक आचरण ,शुचिता,मर्यादाओं का बिकास हुआ। नारी -मर्यादा -बंधन प्रारंभ हुए। और समाज पुरूष-सत्तात्मक होगया। परन्तु सहजीवन अभी भी था। नारी मंत्री,सलाहकार,सहकार ,विदुषी के रूप में घर में रहते हुए भी स्वतंत्र व्यक्तित्व थी। यस्तु नार्यस्तु पूज्यन्ते ..का भाव रहा। महाकाव्य काल तक यह व्यवस्था चलती रही।
पश्च पौराणिक काल में अत्यधिक भौतिक उन्नति,मानवों के नैतिकता से गिराने के कारण ,धन की महत्ता के कारण सामाजिक -चारित्रिक पतन हुआ ,महिलाओं को पुरूष अहम् द्वारा उनका अधिकार छीना गया ( मुख्यतया ,घर,ज़मीन ,जायदाद ही कारण थे ) और पुरूष नारी का मालिक बन बैठा। आगे की व्यवस्था सब देख ही रहे हैं। इस सब के साथ साथ प्रत्येक युग में-अनाचारी होते ही रहते हैं । हर युग में अच्छाई-बुराई का युद्ध चलता रहता है । तभी राम व कृष्ण जन्म लेते हैं। और ---यदा यदा धर्मस्य --का क्रम होता है। नैतिक लोग नारी का सदैव आदर करते हैं ,बुरे नहीं --अतः बात वही है कि समाज व सिस्टम नहीं ,व्यक्ति ही खराव होकर समाज को ख़राब व बदनाम करता है।
दूसरा मानव उसकी गुफा देख कर प्रभावित हुआ। प्रसंशापूर्ण निगाहों से देखा . पहले मानंव ने कहा तुम यहाँ ही क्यों न ही n आजाते , मिलकर फल एकत्रित करेंगे और भोजन करे गे . उस
ने ध्यान से देखा, उसका हथौडा भी बहुत बड़ा है,उसकी गुफा भी अधिक बड़ी है ,उसके पास फल आदि भी अधिक मात्रा में एकत्रित हैं , उसने उसकी बाहों की पेशियाँ छू कर देखी ,वो अधिक मांसल ,कठोर थीं ,उसका शरीर भी उससे अधिक बड़ा था। दूसरे मानव ने कुछ सोचा और वह अपने फल आदि उठाकर पहले मानव की गुफा में आगया।
और यह वही प्रथम दिन था जव नारी ( शायद -शतरूपा या कामायिनी की श्रद्धा ) ने स्वेक्षा से पुरूष के साथ सह जीवन स्वीकार किया। यह प्रथम परिवार था। यह सहजीवन था। कोई किसी के आधीन नहीं। नर-नारी स्वयं में स्वच्छंद थे ,जीने ,रहने ,किसी के भी साथ रहने आदि के लिए।अन्य जीवों,पशु-पक्षियों की तरह । ,यद्यपि सिंहों, हंसों आदि उच्च जातियों की भांति प्रायः जीवन पर्यंत एक साथी के साथ ही रहने की मूल प्रवृत्ति तब भी थी अब की तरह,(निम्न जातियाँ ,कुत्ते,बिल्ली आदि की भांति कभी भी किसी के भी साथ नहीं.) और यह युगों तक चलता रहा।
जब संतानोत्पत्ति हुई,यह देखा गया की दोनों साथियों के भोजन इकट्ठा कराने जाने पर अन्य जानवरों आदि की भांति ,उनके बच्चे भी असुरक्षित रह जाते हें। तो किसी एक को घर रहने की आवश्यकता हुई । फल इकट्ठा कराने वाली सभ्यता में शारीरिक बल अधिक महत्वपूर्ण होने से पुरूष ने बाहर का कार्य सम्भाला। क्योंकि नारी स्वभावतः अधिक तीक्ष्ण बुद्धि,सामयिक बुद्धि,व त्वरित निर्णय क्षमता में कुशल थी अतः वह घर का ,परिवार का प्रबंधन कराने लगी। यह नारी -सत्तात्मक समाज की स्थापना थी। पुरूष का कार्य सिर्फ़ भोजन एकत्रित करना ,सुरक्षा व श्रमिक कार्य था। यह भी सहजीवन की ही परिपाटी थी। स्त्री-पुरूष कोई किसी के बंधन में नहीं था,सब अपना जीवन जीने के लिए स्वतंत्र थे। युगों तक यह प्रबंधन चलता रहा, आज भी कहीं कहीं दिखता है।
जब मानव कृषि आदि कार्यों से उन्नत हुआ । घुमक्कड़ ,घुमंतू समाज स्थिर हुआ ,भौतिक उन्नति,मकान,घर,कपडे,मुद्रा आदि का प्रचालन हुआ तो तो पुरूष व्यवशायिक कर्मों में अधिक समर्थ होने लगा ,स्त्री का दायरा घर रहा ,पुरूष के अधिकार बढ़ने लगे ,राजनीति ,धर्म,शास्त्र, आदि पर पुरुषों ने आवश्यक खोजें कीं ,अबंधित शारीरिक व यौन संबंधों के रोगों ,द्वंदों आदि रूप में विकार सम्मुख आने लगे तो नैतिक आचरण ,शुचिता,मर्यादाओं का बिकास हुआ। नारी -मर्यादा -बंधन प्रारंभ हुए। और समाज पुरूष-सत्तात्मक होगया। परन्तु सहजीवन अभी भी था। नारी मंत्री,सलाहकार,सहकार ,विदुषी के रूप में घर में रहते हुए भी स्वतंत्र व्यक्तित्व थी। यस्तु नार्यस्तु पूज्यन्ते ..का भाव रहा। महाकाव्य काल तक यह व्यवस्था चलती रही।
पश्च पौराणिक काल में अत्यधिक भौतिक उन्नति,मानवों के नैतिकता से गिराने के कारण ,धन की महत्ता के कारण सामाजिक -चारित्रिक पतन हुआ ,महिलाओं को पुरूष अहम् द्वारा उनका अधिकार छीना गया ( मुख्यतया ,घर,ज़मीन ,जायदाद ही कारण थे ) और पुरूष नारी का मालिक बन बैठा। आगे की व्यवस्था सब देख ही रहे हैं। इस सब के साथ साथ प्रत्येक युग में-अनाचारी होते ही रहते हैं । हर युग में अच्छाई-बुराई का युद्ध चलता रहता है । तभी राम व कृष्ण जन्म लेते हैं। और ---यदा यदा धर्मस्य --का क्रम होता है। नैतिक लोग नारी का सदैव आदर करते हैं ,बुरे नहीं --अतः बात वही है कि समाज व सिस्टम नहीं ,व्यक्ति ही खराव होकर समाज को ख़राब व बदनाम करता है।
अंतर्राष्ट्रीय फैमिली डे-
आप चाहे कुछ भी कहिये,मानिए ,गाइए ,चिल्लाइये पर युग सत्य यही है कि----
कुछ तुम कहो कुछ हम कहें ,कहती रहे ये ज़िंदगी ,
कुछ तुम सुनो कुछ हम सुनें ,सुनती रहे ये ज़िंदगी।
कुछ तुम झुको ,कुछ हम झुकें ,चलती रहे ये ज़िंदगी
बहकें जो साथ साथ तो , ढलती रहे ये ज़िंदगी ॥
और
कहानी हमारी तुम्हारी न होती ,
न ये गीत होते ,न संगीत होता।
सुमुखि ! तुम अगर जो हमारे न होते,
सजनि! जो अगर हम तुम्हारे न होते।
कुछ तुम कहो कुछ हम कहें ,कहती रहे ये ज़िंदगी ,
कुछ तुम सुनो कुछ हम सुनें ,सुनती रहे ये ज़िंदगी।
कुछ तुम झुको ,कुछ हम झुकें ,चलती रहे ये ज़िंदगी
बहकें जो साथ साथ तो , ढलती रहे ये ज़िंदगी ॥
और
कहानी हमारी तुम्हारी न होती ,
न ये गीत होते ,न संगीत होता।
सुमुखि ! तुम अगर जो हमारे न होते,
सजनि! जो अगर हम तुम्हारे न होते।
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