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डा श्याम गुप्त का ब्लोग...

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Lucknow, UP, India
एक चिकित्सक, शल्य-चिकित्सक जो हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान व उसकी संस्कृति-सभ्यता के पुनुरुत्थान व समुत्थान को समर्पित है व हिन्दी एवम हिन्दी साहित्य की शुद्धता, सरलता, जन-सम्प्रेषणीयता के साथ कविता को जन-जन के निकट व जन को कविता के निकट लाने को ध्येयबद्ध है क्योंकि साहित्य ही व्यक्ति, समाज, देश राष्ट्र को तथा मानवता को सही राह दिखाने में समर्थ है, आज विश्व के समस्त द्वन्द्वों का मूल कारण मनुष्य का साहित्य से दूर होजाना ही है.... मेरी तेरह पुस्तकें प्रकाशित हैं... काव्य-दूत,काव्य-मुक्तामृत,;काव्य-निर्झरिणी, सृष्टि ( on creation of earth, life and god),प्रेम-महाकाव्य ,on various forms of love as whole. शूर्पणखा काव्य उपन्यास, इन्द्रधनुष उपन्यास एवं अगीत साहित्य दर्पण (-अगीत विधा का छंद-विधान ), ब्रज बांसुरी ( ब्रज भाषा काव्य संग्रह), कुछ शायरी की बात होजाए ( ग़ज़ल, नज़्म, कतए , रुबाई, शेर का संग्रह), अगीत त्रयी ( अगीत विधा के तीन महारथी ), तुम तुम और तुम ( श्रृगार व प्रेम गीत संग्रह ), ईशोपनिषद का काव्यभावानुवाद .. my blogs-- 1.the world of my thoughts श्याम स्मृति... 2.drsbg.wordpres.com, 3.साहित्य श्याम 4.विजानाति-विजानाति-विज्ञान ५ हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान ६ अगीतायन ७ छिद्रान्वेषी ---फेसबुक -डाश्याम गुप्त

सोमवार, 6 सितंबर 2010

कर्म या विचार ---क्या श्रेष्ठ ....

---- प्रायः यही कहा जाता है कि कर्म ही श्रेष्ठ है , इस पर आदि गुरुशंकराचार्यके विचार....(विवेक चूडामणि से॥) वस्तुतः गीता कर्म और निष्काम कर्म व फ़लेक्षा की व्याख्या करती है न कि सिर्फ़ कर्म की श्रेष्ठता की----
चित्तष्य शुद्धये कर्म न तु वस्तूपलब्धये
वस्तुसिद्धिर्विचारेण न किंचित कर्मकोटिभिः ||
कर्म चित्त की शुद्धि के लिये ही है, वस्तूपलब्धि (तत्वदृष्टि) के लिये नहीं | वस्तु-सिद्धि तो विचार से ही होती है, करोड़ों कर्मों से कुछ भी नहीं हो सकता

सम्यग्विचारत: सिद्धा रज्जुतत्वावधारणा
भ्रान्त्योदित महासर्पभयदु:खविनाशिनी |

भालिभांति विचार से सिद्ध हुआ रज्जु तत्व का निश्चय भ्रम से उत्पन्न हुए महान सर्पभयरूपी दुख को नष्ट करनेवाला होता है


अर्थस्य निश्चयों दृष्टो विचारेण हितोक्तित:
न स्नानेन न दानेन प्राणायामशतेन व ||

कल्याणप्रद उक्तियों द्वारा विचार करने से ही वस्तु का निश्चय होता देखा जाता है; स्नान, दान अथवा सैंकड़ों प्राणायामों से नहीं----

वस्तुतः विचार करके कर्म करना चाहिए, जो निष्काम हो।


सचिन और भारत रत्न...???????????????????

आजकल एक वर्ग काफ़ी चिल्ला रहा है कि सचिन को भारत रत्न दो। आखिर सचिन ने एसा कौन सा देशभक्ति का कार्य किया है। पैसे लेकर खेलना तो व्यवसाय है। फ़िर तो प्रत्येक देशवासी को भारत रत्न मिलना चाहिये, सभी आर्थिक वृत्ति पर अपने अपने कार्य करते हैं , अपितु अन्य लोग तो कुछ गुणात्मक कार्य करते हैं , क्रिकेट-खेलने जैसा अनावश्यक, देश का समय, धन व जन बल का हानिकारक कार्य से तो अच्छा कार्य ही करते हैं |इस प्रकार तो प्रत्येक सैनिक को अवश्य ही भारत रत्न मिलना चाहिए | इससे अच्छा तो हमारेफ़िल्मी हीरो/एक्टर / डाइरेक्टरों को यह पुरस्कार मिलना चाहिए कम से कम वे देश भक्ति का प्रचार-प्रसार तो करते हैं |
न जाने लोग क्या सोच कर एसे अनर्गल मांगें उठाते हैं| प्राचीन राजा लोग भी अपने अपने राज्य में-नट, विदूषक, कवि, विद्वानों आदि को पुरस्कार दिया करते थे। इसी भांति अपने-अपने फ़ील्ड में खेल पुरस्कार आदि तो सरकार देती ही है। भारत रत्न देने का कोई अर्थ नहीं है।

रविवार, 5 सितंबर 2010

्डा श्याम गुप्त के दोहे----शिक्षक दिवस पर....

शिक्षक- दिवस पर प्रत्येक शिक्षक को अपना आत्मविश्लेषण करना चाहिये,और हमें भी. शिक्षक कोई भी, कहीं भी, किसी भी क्षेत्र का व्यक्ति होसकता है, सि्र्फ़ वेतन-भोगी स्कूल मास्टर/ प्रोफ़ नहीं--कुछ दोहे- -----

गुरु

सदाचार स्थापना, शास्त्र अर्थ समझाय।
आप करे सदाआचरण , सो आचार्य कहाय॥

यदकिन्चित भी ग्यान जो, हम को देय बताय।
ग्यानी उसको मानकर, फ़िर गुरु लेंय बनाय॥

इस संसार अपार को किस विधि कीजै पार।
श्याम गुरु क्रपा पाइये,सब विधि हो उद्धार।।

अध्यापक को दीजिये,अति गौरव सम्मान।
श्याम करें आचार्य का, सदा दश गुना मान ॥

गु अक्षर का अर्थ है, अन्धकार अग्यान।
रु से उसको रोकता,सो है गुरु महान ॥

जब तक मन स्थिर नहीं, मन नहिं शास्त्र विचार।
गुरु की क्रपा न प्राप्त हो,मिले न तत्व विचार॥

आलोकित हो श्याम का,मन रूपी आकाश ।
सूरज बन कर ग्यान का, जब गुरु करे प्रकाश॥

त्रि-गुरु-----गुरु, माता, पिता

शत आचार्य समान है श्याम पिता का मान।
नित प्रति वंदन कीजिये,मिले धर्म संग्यान॥

माता एक महान है, सहस पिता का मान।
पद वंदन नित कीजिये, माता गुरू महान ॥

सभी तपस्या पूर्ण हों, यदि संतुष्ठ प्रमाण।
मात-पिता-गुरु का करें, श्याम नित्य सम्मान॥

मनसा वाचा कर्मणा, कार्य करें जो कोय।
मातु पिता गुरु की सदा, सुसहमति से होय॥

और

अन्योनास्ति----जगत गुरु-----ईश्वर........

त्रिभुवन गुरु और जगत गुरु,जो प्रत्यक्ष प्रमाण।
जन्म मरण से मुक्ति दे , "ईश्वर" करूं प्रणाम॥

शनिवार, 4 सितंबर 2010

एक शाम डा सत्य के नाम----












चित्र १व २ -डा श्याम गुप्त आलेख पढ़ते हुए व सम्मान ....३.डा सत्य का शाल व प्रशस्ति पत्र से सम्मान



मैथमेटीकल स्टडी सर्कल ,राजाजीपुरम लखनऊ में सृजन साहित्यिक संस्था के वार्षिक अधिवेशन में संस्था की ओर से अगीत के प्रवर्तक अगीत कवि-कुल-गुरु , वरिष्ठ साहित्यकार डा रंगनाथ मिश्र 'सत्य' की कविताओं के एकल पाठ का आयोजन "एक शाम डा सत्य के नाम " से किया गया जिसमें डा रंग नाथ मिश्र सत्य द्वारा अपनी काव्य-यात्रा , अगीत विधा की काव्य यात्रा पर प्रकाश डालते हुए स्वरचित अगीत व छंदोबद्ध , तुकांत रचनाओं का पाठ सस्वर किया गया
संस्था द्वारा डा सत्य एवं अन्य साहित्यकारों को सम्मानित भी किया गया डा सत्य के साहित्य, उनकी साहित्य यात्रा व व्यक्तित्व व कृतित्व के विविध पहलुओं एवं अगीत कविता पर विभिन्न विद्वानों द्वारा आलेख भी पढ़े गएसमारोह की अध्यक्षता श्री विनोद चन्द्र पाण्डेय , वरिष्ठ साहित्यकार एवं भू पू अध्यक्ष हिन्दी संस्थान द्वारा की गयी बावा रविकांत खरे , अध्यक्ष अखिल भारत वैचारिक क्रान्ति मंच , श्री राम चन्द्र शुक्ल पूर्व जज मुख्य अतिथि थे संस्था के अध्यक्ष डा योगेश गुप्त द्वारा धन्यवाद ज्ञापन किया गया

बुधवार, 1 सितंबर 2010

जन्माष्टमी पर विशेष ...गोवर्धन धारण क्यों ....


























गोवर्धन
गिरिधारी ने जब, गिरि गोधन को उठाया होगा ।
मन में एक बार तो हरि के, एसा भी कुछ आया होगा।

गीता ज्ञान दिया गोविन्द ने , मन कुछ भाव समाया होगा |
नटवर ने कुछ सोचा होगा, मन कुछ भाव बसाया होगा।।

युग युग तक ये कर्म कथाएँ ,जन मानस में पलती रहें।
तथा कर्म, कर्मों की गति पर,संतति युग युग चलाती रहें ।

कर्म भाव को धर्म मानकर ,जनहित कर्म ध्वजा फहरे ।
परहित भाव सजे जन जन में,मन यह भाव सुहाया होगा ।।

सुख समृद्धि पले यह अंचल, युग युग यह युग-धर्म रहे।
दुःख दारिद्र्य दूर हों सारे, मन श्रम -ज्ञान का मर्म रहे ।

भक्ति, ज्ञान ,विज्ञान, साधना , में रत रहें सभी प्रियजन ।
सैट-आराधन की महिमा का, मन में भाव सजाया होगा।।

रूढि, अंध श्रृद्धा को छोड़कर, गोवर्धन पूजन अपनाया ।
गर्व चूर करने सुरपति का,गोवर्धन कान्हा ने बसाया।

चाहे जितना कुपित इंद्र हो, चाहे जितनी वर्षा आये।
नहीं तवाही अब आयेगी,मन दृढ भाव बनाया होगा।।

कान्हा ,राधा, सखी-सखा मिल,कार्य असंभव करके दिखाया।
सात दिवस में सभी ग्राम को,गोवर्धन अंचल में बसाया।

कुशल संगठन दृढ संकल्प,श्रमदान का एसा खेल रचा।
कहते कान्हा ने उंगली पर गोवर्धन को उठाया होगा ।।

वही देश वासी कान्हाके,भूल गए हैं श्रम-आराधन
भक्ति श्रृद्धा का भक्तों की,करते रहते केवल दोहन

ताल, सरोवर, नदी, गली सब, कूड़े-करकट भरे पड़े हैं।
जिन्हें कृष्ण-राधा ने मिलकर,निज हाथों से सजाया होगा।।

कर्म भावना ही न रही जब, धर्म भाव कैसे रह पाए।
दुहते धेनु अंध-श्रृद्धा की,पत्थर पर घृत -दुग्ध बहाए।

रूढि, अन्ध श्रृद्धा में जीते, दुःख-दारिद्र्य हर जगह छाया।
जिसे मिटाने कभी 'श्याम' ने ,जन अभियान चलाया होगा।।

आज जो गिरिधारी आजायें, कर्मभूमि की करें समीक्षा।
निज कान्हा की कर्मभूमि की, राधारानी करें परीक्षा।

अश्रु नयन में भर आयेंगे, वंशी नहीं बजा पायेंगे
कर्म साधना भूलेंगे सब, कभी मन में आया होगा

मंगलवार, 31 अगस्त 2010

कर्णाटक महिला सेवा समिति ,बन्गलोर----.एक अभिनव संस्था


<--समिति भवन
वर्त्तमान
पदाधिकारी-->
कर्नाटक महिला हिन्दी सेवा समिति, चामराज पेट ,बंगलौर की स्थापना स्व.पी आर श्री निवास शास्त्री जी ने गांधीजी के आदर्शों पर चलते हुए , महिलाओं को संगठित करके १९५३ में की थी। यह महिलाओं द्वारा संचालित एक स्वैक्षिक संस्था है जो कर्नाटक के लगभग २७ जिलों में राष्ट्र भाषा हिन्दी के प्रचार -प्रसार में संलग्न है। यह संस्था भारत में एक मात्र ऐसी स्वायत्त शासी संस्था है जो पूर्ण रूप से महिलाओं द्वारा ही संचालित है। इसका संचालन कार्यकारिणी समिति द्वारा होता है एवं बुज़ुर्ग ,सक्रिय महिलाओं का मार्गदर्शन मिलता है।वर्तमान में यह संस्था एक बडे तीन मंज़िले भवन में सुश्री शान्ता बाई के संरक्षण में चलरही है जो एक कुशल अधिकारी , हिन्दी बोलने में पटु व मिलनसार महिला हैं, उन्होंने सारा संस्थान बडे प्रेम से दिखाया एवं समिति के उद्देश्य व क्रिया-कलापों का ब्योरा दिया।
समिति का उद्देश्य हिन्दी प्रचार के साथ भारत की एकता बनाये रखना व प्रान्तीय व अन्य भाषाओं के सहयोग से हिन्दी का विकास करना है। समिति का मुख्य कार्य हिन्दी प्रचार,साहित्य काप्रकाशन,हिन्दी की परीक्षायें लेना व उनके लिये पुस्तकें छापना तथा महिलाओं को ट्रेनिंग देना है। इसके लिये समिति -हिन्दी सुबोध, प्रथमा, मध्यमा, उत्तमा , भाषा भूषण व भाषा प्रवण--की डिग्री देती है। हिन्दी विषयों पर शोध-एम फ़िल, पी एच डी भी कराई जाती है। संस्था अपनी मासिक पत्रिका"हिन्दी प्रचार वाणी" भी प्रकाशित करती है जिसमें हिन्दी भाषा व साहित्य संबन्धी उच्चकोटि के लेख व अन्य साहित्य हो्ता समिति विश्वविध्यालय स्तर की व हिन्दी से कन्नड व कन्नड से हिन्दी की पुस्तकें अनुवाद कराकर भी प्रकाशित करती है। समिति के पांच पुस्तकालय भी हैं जिनमें विविध विषयों की लगभग २५००० पुस्तकें है। समिति का अपनास्वयं का मुद्रणालय ( प्रिन्टिंग प्रेस) भी है एवं अपना कम्प्यूटर विभाग भी है जिनका समस्त कार्य महिलायें ही देखती व करती हैं। समिति १८ वर्ष से ’ हिन्दी शिक्षक प्रशिक्षण’ कार्यक्रम अपने सात हिन्दी प्रशिक्षण कालेजों द्वारा चलारही है।

रविवार, 29 अगस्त 2010

हिन्दी नागप्पा ---कर्नाटक में हिन्दी के अलख निरंजन .....


<--युवा नागप्पा जब वे गांधीजी से मिले

<---हिन्दी नागप्पा ....
बेंगलूरू पहुँच कर मैंने डा ललिताम्मा , अव प्रा प्रोफ एवं विभागाध्यक्ष , हिन्दी विभाग ,मैसूर वि वि से फोन पर संपर्क किया , उन्होंने तुरंत ही पुनः फोन करके कहा कि तुरंत आयें हमारे गुरूजी नागप्पा जी की प्रथम बर्षी है, सारे साहित्यकार भी एकत्र होंगे | बहाँ पहुंचकर ललिताम्बा जी ने कई हिन्दी विद्वानों से मुलाक़ात कराई कहा कि अब आप हिन्दी में बात करिए | मुझे कर्नाटक में हिन्दी व नागप्पा जी के बारे में और अधिक जानने की इच्छा हुई।
गांधीजी ने हिन्दी के प्रचार के लिए अपने पुत्र देवदास गांधी को दक्षिण भेजा । गांधीजी के रचनात्मक कार्यों की आंधी में उन दिनों हज़ारों नवजवान बहगये, लोगों ने अपना वर्ग, स्वर्ग अपवर्ग छोड़ा। उन्हीं नौजवानों में कर्नाटक के नागराज नागप्पा भी थे जिन्होंने हिन्दी का क्षेत्र चुना । बेलगावं सम्मलेन में उन्होंने गांधीजी के दर्शन किये और फिर हिन्दी के होकर रहगये। उस समय युवक नागराज नागप्पा गणित ( सांख्यकीय ) में बी कर चुके थे तथा कहीं भी अच्छी नौकरी पा सकते थे परन्तु उन्होंने दक्षिण भाषा प्रचार सभा से राष्ट्र भाषा परिक्षा पास की तथा काशी जाकर वनारस हिन्दू वि वि से हिन्दी में एम् किया, जहां उन्होंने आचार्य रामचंद्र शुक्ल ,श्याम सुन्दर दास जैसे हिन्दी के महारथियों के चरणों में बैठकर हिन्दी सीखी। । इस प्रकार वे दक्षिण भारत में हिन्दी से एम् करने वाले प्रथम विद्वान् बने।
१९३५ में इंदौर सम्मलेन में गांधीजी व आचार्य रामचंद्र शुक्ल जी के परामर्श पर वे पुनः अगस्त्य की भांति दक्षिण लौटे एवं मद्रास में हिन्दी प्रचारक के रूप में कार्य प्रारम्भ किया। धारवाड़ , मैसूर,आदि कर्नाटक के सभी कालेजों में हिन्दी पठन पाठन, शोध आदि प्रारम्भ करने में उन्हीं का योगदान था । यद्यपि कन्नड़ के कवि-कुल गुरु व राष्ट्र कवि के वी पुटप्पा ( कु वें पू ) हिन्दी के पक्षधर नहीं थे परन्तु नागप्पा जी ने उन्हें भी मना कर हिन्दी का ध्वज फहराया। इस प्रकार सारे कर्नाटक व दक्षिण भारत में अपने अथक परिश्रम से जन जन में हिन्दी के प्रसार-प्रचार के प्रणेता बन कर वे 'हिन्दी नागप्पा" के नाम से प्रसिद्ध हुए । उनके शिष्य- शिष्याओं , प्रसंशकों की संख्या समस्त दक्षिण भारत कर्नाटक व देश भर में फ़ैली है। सेवा निवृत्ति के बाद भी वे कर्नाटक हिन्दी प्रचार समिति से जुड़े रहे एवं 'भाषा पीयूष' नामक पत्रिका प्रारम्भ की। वे भारत सरकार के विभिन्न संस्थानों के अध्यक्ष, परामेश समितियों के सदस्य व केन्द्रीय हिन्दी संस्थान आगरा के अध्यक्ष रहे। उन्हें देश भर से तमाम पुरस्कार व सम्मान भी प्राप्त हुए | २००२ ई में ९० वर्ष की आयु में पूर्ण करने पर उन्हें 'पूर्ण-कुंभअभिनन्दन ग्रन्थ भी समर्पित किया गया।
नागप्पा जी तुलसी दास के अनन्य भक्त प्रशंसक थे। उनके मुंह से दोहे चौपाई धडाधड निकलते थे। अतः उन के बारे में ' नागप्पा जी हिन्दी --कहियत भिन्न भिन्न ' कहाजाता है। एसे हिन्दी नागप्पा ०६-०७-२००९ को स्मृति-शेष हो गए। डा वी वेंकटेश साहित्यालंकार का कथन है--
" ना नागप्पा नमस्तुभ्यं , अमित सुबल सम्पन्नम
ज्ञान उर्वर कर्नाटक क्षेत्रे -संजात धीमनतम
सुललित हिन्दी भाषा कल्पतरु रोपसमुद्भव
प्रणतोअस्मि आचार्य नानागुरुवर्य कीर्तिशेषं "