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डा श्याम गुप्त का ब्लोग...

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Lucknow, UP, India
एक चिकित्सक, शल्य-चिकित्सक जो हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान व उसकी संस्कृति-सभ्यता के पुनुरुत्थान व समुत्थान को समर्पित है व हिन्दी एवम हिन्दी साहित्य की शुद्धता, सरलता, जन-सम्प्रेषणीयता के साथ कविता को जन-जन के निकट व जन को कविता के निकट लाने को ध्येयबद्ध है क्योंकि साहित्य ही व्यक्ति, समाज, देश राष्ट्र को तथा मानवता को सही राह दिखाने में समर्थ है, आज विश्व के समस्त द्वन्द्वों का मूल कारण मनुष्य का साहित्य से दूर होजाना ही है.... मेरी तेरह पुस्तकें प्रकाशित हैं... काव्य-दूत,काव्य-मुक्तामृत,;काव्य-निर्झरिणी, सृष्टि ( on creation of earth, life and god),प्रेम-महाकाव्य ,on various forms of love as whole. शूर्पणखा काव्य उपन्यास, इन्द्रधनुष उपन्यास एवं अगीत साहित्य दर्पण (-अगीत विधा का छंद-विधान ), ब्रज बांसुरी ( ब्रज भाषा काव्य संग्रह), कुछ शायरी की बात होजाए ( ग़ज़ल, नज़्म, कतए , रुबाई, शेर का संग्रह), अगीत त्रयी ( अगीत विधा के तीन महारथी ), तुम तुम और तुम ( श्रृगार व प्रेम गीत संग्रह ), ईशोपनिषद का काव्यभावानुवाद .. my blogs-- 1.the world of my thoughts श्याम स्मृति... 2.drsbg.wordpres.com, 3.साहित्य श्याम 4.विजानाति-विजानाति-विज्ञान ५ हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान ६ अगीतायन ७ छिद्रान्वेषी ---फेसबुक -डाश्याम गुप्त

मंगलवार, 14 सितंबर 2010

हिन्दी की वास्तविकता ...-बेस्ट सेलर -अनुवाद ...हिंगलिश ..

<---हम हिन्दी भी पढेंगे तो अंग्रेज़ी में , तभी हिन्दी आगे बढ़ेगी (गुलामी में रहकर )--देखिये साथ का समाचार...
अब देखिये --आज के घोषित बेस्टसेलर (हिन्दी में 'बिकाऊ' नहीं?? असभ्य शब्द लगता है ! )--'लेडीस कूपे' ..थ्री मिस्टेक्स....'फाइव पाइंट..द गोड आफ ...स्टे हंगरी ...अमेजिंग रेसल्ट...अल्केमिस्ट ..यूं केन हील...फिश ...सबाल ही जबाव ...गुनाहों का देवता...राग दरवारी ...आग का दरिया ...आदि आदि ...अब है इस हिन्दी की कोई टक्कर ...!! क्या इस बेस्ट सेलर में कितने प्रतिशत हिन्दी , हिन्दी साहित्य व हिन्दी-हिन्दुस्तानी संस्कृति है? वैशाली ...और वाण भट्ट....आदि तो..कोई सिरफिरा साहित्यकार ही पढ़रहा होगा ।
----ये सब अंग्रेज़ी से अनुवाद हैं या बकवास कथाएँ ----हिन्दी के दुर्भाग्य में अनुवादों का भी महत्त्व पूर्ण हाथ है जो वस्तुतः बाज़ार, कमाऊ लेखक, धंधेबाज़ व्यापारी -प्रकाशक गुट के भाषा -साहित्य -संस्कृति द्रोही कलापों का परिणाम है ।
-----अजी छोडिये भी .....कौन सी हिन्दी ??---आर आर इंस्टी टयूट, आई दी एस , परफेक्ट , कोफ्स-२०१० , एस सी, एस टी, इंटर स्कूल फेस्ट लांच , सेलीब्रिटी , एल डी ए...धड़ल्ले से 'यूज़' होरहे हैं ....क्यों व्यर्थ हिन्दी वाले रोराहे हैं ।

शुक्रवार, 10 सितंबर 2010

हिन्दी दिवस के लिए एक विशेष विचार ---डा श्याम गुप्त .......

हिन्दी का एक दुर्भाग्य यह भी ---लोक वाणियों का प्रश्रय ...
हिन्दी के प्रसार व उन्नति में अन्य तमाम बाधाओं के साथ एक मुख्य बाधा हिन्दी पट्टीके प्रदेशों की आंचलिक बोलियों को साहित्य-सिनेमा -दूरदर्शन-रेडियो आदि में अलग से प्रश्रय देना भी है। भोजपुरी, अवधी, बृज भाषाबिहारी आदि हिन्दी की बोलियों को आजकल साहित्य में अत्यधिक महत्त्व दिया जाने लगा है जैसे कि वे हिन्दी न होकर हिन्दी-से अलग भाषाएँ हों। जो आगे चलकर साहित्य में भी अलगाव वाद की भूमिका बन सकता है।
-----जो कवि, साहित्यकार, सिने-आर्टिस्ट, रेडियो कलाकार व अन्य कलाकार-- मूल हिन्दी धारा के महासागर में अपनी वैशिष्यता , पहचान खोजाने से डरते हैं , क्योंकि वास्तव में वे उतने योग्य नहीं होते एवं स्वस्थ प्रतियोगिता से डरते हैं , वे अपना स्वार्थ लोक-वाणियों को भाषा बनाकर पूरा करने में सन्निहित होजाते हैं। इस प्रकार इन तथाकथित बोलियों( हिन्दी की ) से बनाई गयी भाषाओं की विविध सन्स्थाएं भी अपना अलग से पुरस्कार, सम्मान, आयोजन इत्यादि करने लगती हैं , सिर्फ शीघ्र व्यक्तिगत व संस्थागत पहचान व ख्याति के लिए |
----इस प्रकार छुद्र व तात्कालिक , व्यक्तिगत स्वार्थों के लिए एक महान कर्तव्य ---हिन्दी को सारे विश्व राष्ट्रभाषा जन-जन की भाषा बनाने के ध्येय को अनदेखा किया जारहा है। ---कुछ मूल प्रश्न ....
१.--क्या सूर, बिहारी, भारतेंदु हरिश्चंद्र, रत्नाकर को सिर्फ -बृज भाषा का, तुलसी को सिर्फ अवधी का कवि कहलाना भारतीय पसंद करेंगे( हो सकता है इसके चलते यह मांग भी उठ खड़ी हो ) या किसी के द्वारा कभी कहीं कहा गया ? ये सभी महान कवि हिन्दी की महान विभूतियों के व कवियों के रूप में विश्व विख्यात हैं |
२. क्या स्वतन्त्रता से पूर्व या बाद में भी इन सभी आंचलिक भाषाओं को हिन्दी मानकर ही नहीं देखा , समझा , जाना व माना नहीं जाता था?
-----वस्तुतः होना यह चाहिए----
१. -हिन्दी -पट्टी की इन सभी बोलियों के साहित्य को अलग साहित्य न मानकर हिन्दी का ही साहित्य माना जाना चाहिए एवं सभी साहित्यिक/ कला के कार्य कलापों के लिए हिन्दी के साथ ही समाहित किया जाना चाहिए।
२. सभी देशज कवियों/ कलाकारों /सिनेमा को हिन्दी का ही माना जाना चाहिए -न कि इन विशिष्ट भाषाओं के ।
३. सभी हिन्दी-बोलियों को हिन्दी भाषा में ही समाहित किया जाना
-------तभी हिन्दी का महासागर और अधिक उमड़ेगा , लहराएगा

कृष्ण लीला तत्वार्थ.....

कृष्ण लीला तत्वार्थ...नाग नथैया...
( कुण्डलिया छंद )

कालिंदी का तीर औ, वंशी धुन की टेर,
गोप गोपिका मंडली नगर लगाती फेर |
नगर लगाती फेर,सभी को यह समझाती,
ग्राम नगर की सभी गन्दगी जल में जाती |
विष सम काला दूषित जल है यहाँ नदी का,
बना सहसफन नाग कालिया, कालिदी का ||

यमुना तट पर श्याम ने, बंशी दई बजाय,
चहुँ दिशि मोहिनि फेरि कर, सब को लिया बुलाय |
सब को लिया बुलाय, प्रदूषित यमुना भारी,
सभी करें श्रम दान, स्वच्छ हो नदिया सारी |
तोड़ किया विषहीन प्रदूषण नाग का नथुना ,
फेन फेन नाचे श्याम, स्वच्छ हो झूमी यमुना ||

मंगलवार, 7 सितंबर 2010

सृष्टि रचयिता कौन .....?????

<---चित्र १.
अभी
हाल में ही प्रसिद्दभौतिकविद - विज्ञानी स्टीफन वेनबर्ग ने अपनी खोजों से ईश्वर के अस्तित्व को नकारा है , यद्यपि यह कोई नई बात नहीं है , अनीश्वरवादी दर्शन-चार्वाक, जैन, बौद्ध व स्वयम परम्परावादी वैज्ञानिक सदैव से यह कहते रहे हैं , हाँ, यह बात अलग है कि वे अभी तक ईश्वर को नकारने में सफल नहीं हुए हैं| यदि हम स्टीफन वेनबर्ग की व्याख्या-कथनों को बिन्दुवार विश्लेषित करें तो ये तथ्य सामने आते हैं -----
(१.) उनका कथन-कि सृष्टि का अस्तित्व भौतिकी या प्रकृति के बुनियादी नियमों की विशेष प्रक्रिया व ' ग्रेंड डिजायन' से हुआ। ............प्रश्न उठता ,तो उस डिजायन की परिकल्पना किसने की ? प्रकृति के वे मूल नियम किसने बनाए ?--शायद ब्रह्म या ईश्वर ने --यजुर्वेद १.३.७।; सामवेद ३.२१.९ व अथर्व वेद ४.१.५९१ --में निम्न श्लोक है --
"ब्रह्म जज्ञानं प्रथमं पुरस्तात विसीमितः सुरुचो वेन आवः बुघ्न्या उपमा अस्य विष्टा: सतश्च योनिं सतश्च वि वः -----सृष्टि के आरम्भ में जिस परमात्म शक्ति का प्रादुर्भाव हुआ, वह शक्ति ब्रह्माण्ड में व्यवस्था रूप में व्यक्त हुई । वही व्यवस्था विविध रूपों में विभिन्न व्यक्त-अव्यक्त लोकों व जगतों को प्रकाशित ( संचालित ) करती है। तथा ऋग्वेद १०.९०.९८१३ का कथन है---
"सप्तास्यासन परिधियास्त्रि: सप्त समिधः व्रतादेवा यज्ञस्य तन्वाना अबघ्न्म्पुरुषपशुम---जब वे सब देवगण सृष्टि का ताना बाना बुन रहे थे तो इसकी सात परिधियाँ बनाईं, x समिधाएँ हुईं । उनमें स्वाधीन पुरुष (ब्रह्म) को पशु ( बंधन युक्त चेतना) से आवद्ध किया गया। वे सात परिधियाँ हैं--
----रासायन विज्ञान की 'पीरियोडिक टेबल ' में तत्वों के सात वर्ग --
----परमाणु के चारों ओर इलेक्ट्रोंस की सात परिधियाँ ---
----पृथ्वी व आकाश के सात सात स्तर सात रंग ---
पृथ्वी, आकाश व अंतरिक्ष तीनों के लिए त्रिसप्त समिधाएँ अर्थात इनसब केलिए ( सारे जगत/ब्रह्माण्ड) की क्रियाओंव निर्माण के लिए ऊर्जा व पदार्थ का चक्रीय उत्पादन की ' ग्रेंड डिजायन '।
()--बिग बेंग से बना ब्रह्माण्ड-- तो वह शुरूआती अति तापीय ब्रह्माण्ड व बिगबेंग वाला पिंड कहाँ से आया ---यदि विज्ञान मौन है तो शायद ईश्वर ने ही , वैदिक विज्ञान में वर्णन के अनुसार प्रादुर्भूत किया | जिसमें कथन है 'ब्रह्म की सृष्टि इच्छा ', ''एकोहं बहुस्याम' के तीब्र अनाहत नाद से ही ऊर्जा --->उप कण -->कण-->पदार्थ -->.....सृष्टि बनना प्रारम्भ हुई।
()--' मल्टी वर्स ' अर्थात बहुत से ब्रह्माण्ड ---इसका स्पष्ट वर्णन विष्णु पुराण में , आदि महाविष्णु के रोम रोम में अनंत ब्रह्माण्ड बने, तथा ऋग्वेद में ब्रह्म को "सूर्यस्य सूर्य --" महा सूर्य कहा है ,जिसके चारों और असंख्य सूर्य घूमते हैं , अपनी अपनी आकाश गंगाओं के साथ । विज्ञान व वैदिक दर्शन के समन्वय पर लिखा गया 'श्रृष्टि महाकाव्य'में कहा गया है------------------
" महाविष्णु और रमा संयोग से ,
प्रकट हुए चिद बीज अनंत
फैले
थे जो परम व्योम में,
कण
कण में बनाके हेमांड
उस
असीम के महाविष्णु के
रोम रोम में बन ब्रह्माण्ड॥ " एवं --

"
और असीम उस महाकाश में,
हैं
असंख्य ब्रह्माण्ड उपस्थित
धारण
करते हैं ये सब ही,
अपने
अपने सूर्य चन्द्र सब
अपने अपने गृह नक्षत्र सब,
है स्वतंत्र सत्ता प्रत्येक की ॥ "

(४)--स्टीफन कहते हैं--'हमें ईश्वर केमस्तिष्क का पता चल सकता है।’---अर्थात वे ईश्वर को एक मनुष्य समझते हैं---इसका उत्तर इस समाचार में देखिये।"ईश्वर कोई तत्व नहीं जो दिखे।"॥काशी के विद्वान--हिन्दी हिन्दुस्तान-दि-०७-९-१० --स्टीफन के असाधारण मस्तिष्क का उद्भव कैसे हुआ , सब का तो इतना असाधारण मस्तिष्क नहीं होता ? विज्ञानी कह सकते हैं कि ' प्राकृतिक चयन', ' उत्परिवर्तन (म्यूटेशन )' ---परन्तु वह चयन कौन करता है ? यदि विज्ञान मौन है तो शायद वही ईश्वर
(5)--एम् थ्योरी , ११आयाम वाला ब्रह्माण्ड------ वैदिक साहित्य में ये ११ आयाम तरह वर्णित हैं---
१---११ रुद्र--मूलतत्व, २---महत्तत्व से=५ तन्मात्राएं+५ महाभूत +१ अव्यक्त(नथिन्ग नेस, रिणात्मकता)=११, ३---४ आदि- मुनि सनक, सनन्दन, सनातन, सनत्कुमार + ७ सप्तर्षि , ४----शीला-अशीला, श्यामा-गौरी, क्रूर-सौम्या आदि ११ नारी-भाव व ११ पुरुष-भाव , ५----५ कर्मेन्द्रियाँ +५ ज्ञानेन्द्रियाँ + १ मन = ११ , ६---गीता के अनुसार --आत्मा, जीव , मन , अहंकार + सप्तर्षि =११.------इन्हीं सारे ११ आयामों से ब्रह्माण्ड बना है।
()--लगता तो यही है कि न्यूटन की धारणा कि-- 'ब्रह्माण्ड का सृजन अवश्य ही ईश्वर ने किया होगा क्योंकि इसकी उत्पत्ति अराजकता के बीच नहीं होसकती '-- सत्य ही है | वैसे भी स्टीफन सिर्फ खगोलविद हैं , उन्होंने न्यूटन के जैसी कोई मूल खोज(गुरुत्व आदि ) भी नहीं की है सिर्फ अटकलें ही अटकलें हैं , जो उन्हें न्यूटन के समक्ष नहीं ठहरातीं | वे पहले अपनी पुस्तक ' ऐ ब्रीफ हिस्टरी ऑफ़ टाइम 'में ईश्वर के अस्तित्व को मानते थे परन्तु अब नहीं , हो सकता है आगे चलाकर वे भी न्यूटन की भांति ईश्वर को मानने लगें।
वस्तुतः वही एक तत्व है जिसे भिन्न भिन्न माध्यम अपने=-अपने ढंग से कहते हैं--" एको सद विप्राः बहुधा वदन्ति " प्रश्न यह नहीं कि सृष्टि का सृजक कौन , ईश्वर या भौतिक नियम या स्वतः ही --प्रोफ यशपाल के शब्दों में-पढ़ें ऊपर -चित्र . में .--- तथा सृष्टि महाकाव्य में ----

"नहीं महत्ता इसकी है कि,
ईश्वर ने यह जगत बनाया।
अथवा वैज्ञानिक भाषा में,
आदि अंत बिन, स्वतःरच गया।
अथवा ईश्वर की सत्ता है,
अथवा ईश्वर कहीं नहीं है॥"

यदि मानव खुद ही कर्ता है,
और स्वयं ही भाग्य विधाता।
इसी सोच का पोषण हो तो,
अहं भाव जाग्रत होजाता,
मानव संभ्रम में घिर जाता,
और पतन की राह यही है॥

पर ईश्वर है जगत नियंता,
कोई है अपने ऊपर भी।
रहे तिरोहित अहं भाव सब,
सत्व गुणों से युत हो मानव ,
सत्यं शिवं भाव अपनाता,
सारा जग सुन्दर होजाता ॥ " -----और अंत में --

" सूर्य चन्द्रम्सौ धाता यथापूर्वामकल्पयतदिवं प्रिथवीं चान्तारिक्षशयो स्वः"--सूर्य चन्द्र, पृथ्वी,अंतरक्ष ,द्यावा आदि सब कुछ पूर्व में कल्पित ( सुनिश्चित - द ग्रेंड डिजायन के अनुसार ), या पूर्व की भांति --बार बार , विज्ञान के अनुसार सृष्टि की बारम्बारिता, से वह विधाता, ईश्वर, ब्रह्म या प्रकृति-भौतिक नियम, इन सब की सृष्टि करता है

सोमवार, 6 सितंबर 2010

कर्म या विचार ---क्या श्रेष्ठ ....

---- प्रायः यही कहा जाता है कि कर्म ही श्रेष्ठ है , इस पर आदि गुरुशंकराचार्यके विचार....(विवेक चूडामणि से॥) वस्तुतः गीता कर्म और निष्काम कर्म व फ़लेक्षा की व्याख्या करती है न कि सिर्फ़ कर्म की श्रेष्ठता की----
चित्तष्य शुद्धये कर्म न तु वस्तूपलब्धये
वस्तुसिद्धिर्विचारेण न किंचित कर्मकोटिभिः ||
कर्म चित्त की शुद्धि के लिये ही है, वस्तूपलब्धि (तत्वदृष्टि) के लिये नहीं | वस्तु-सिद्धि तो विचार से ही होती है, करोड़ों कर्मों से कुछ भी नहीं हो सकता

सम्यग्विचारत: सिद्धा रज्जुतत्वावधारणा
भ्रान्त्योदित महासर्पभयदु:खविनाशिनी |

भालिभांति विचार से सिद्ध हुआ रज्जु तत्व का निश्चय भ्रम से उत्पन्न हुए महान सर्पभयरूपी दुख को नष्ट करनेवाला होता है


अर्थस्य निश्चयों दृष्टो विचारेण हितोक्तित:
न स्नानेन न दानेन प्राणायामशतेन व ||

कल्याणप्रद उक्तियों द्वारा विचार करने से ही वस्तु का निश्चय होता देखा जाता है; स्नान, दान अथवा सैंकड़ों प्राणायामों से नहीं----

वस्तुतः विचार करके कर्म करना चाहिए, जो निष्काम हो।


सचिन और भारत रत्न...???????????????????

आजकल एक वर्ग काफ़ी चिल्ला रहा है कि सचिन को भारत रत्न दो। आखिर सचिन ने एसा कौन सा देशभक्ति का कार्य किया है। पैसे लेकर खेलना तो व्यवसाय है। फ़िर तो प्रत्येक देशवासी को भारत रत्न मिलना चाहिये, सभी आर्थिक वृत्ति पर अपने अपने कार्य करते हैं , अपितु अन्य लोग तो कुछ गुणात्मक कार्य करते हैं , क्रिकेट-खेलने जैसा अनावश्यक, देश का समय, धन व जन बल का हानिकारक कार्य से तो अच्छा कार्य ही करते हैं |इस प्रकार तो प्रत्येक सैनिक को अवश्य ही भारत रत्न मिलना चाहिए | इससे अच्छा तो हमारेफ़िल्मी हीरो/एक्टर / डाइरेक्टरों को यह पुरस्कार मिलना चाहिए कम से कम वे देश भक्ति का प्रचार-प्रसार तो करते हैं |
न जाने लोग क्या सोच कर एसे अनर्गल मांगें उठाते हैं| प्राचीन राजा लोग भी अपने अपने राज्य में-नट, विदूषक, कवि, विद्वानों आदि को पुरस्कार दिया करते थे। इसी भांति अपने-अपने फ़ील्ड में खेल पुरस्कार आदि तो सरकार देती ही है। भारत रत्न देने का कोई अर्थ नहीं है।

रविवार, 5 सितंबर 2010

्डा श्याम गुप्त के दोहे----शिक्षक दिवस पर....

शिक्षक- दिवस पर प्रत्येक शिक्षक को अपना आत्मविश्लेषण करना चाहिये,और हमें भी. शिक्षक कोई भी, कहीं भी, किसी भी क्षेत्र का व्यक्ति होसकता है, सि्र्फ़ वेतन-भोगी स्कूल मास्टर/ प्रोफ़ नहीं--कुछ दोहे- -----

गुरु

सदाचार स्थापना, शास्त्र अर्थ समझाय।
आप करे सदाआचरण , सो आचार्य कहाय॥

यदकिन्चित भी ग्यान जो, हम को देय बताय।
ग्यानी उसको मानकर, फ़िर गुरु लेंय बनाय॥

इस संसार अपार को किस विधि कीजै पार।
श्याम गुरु क्रपा पाइये,सब विधि हो उद्धार।।

अध्यापक को दीजिये,अति गौरव सम्मान।
श्याम करें आचार्य का, सदा दश गुना मान ॥

गु अक्षर का अर्थ है, अन्धकार अग्यान।
रु से उसको रोकता,सो है गुरु महान ॥

जब तक मन स्थिर नहीं, मन नहिं शास्त्र विचार।
गुरु की क्रपा न प्राप्त हो,मिले न तत्व विचार॥

आलोकित हो श्याम का,मन रूपी आकाश ।
सूरज बन कर ग्यान का, जब गुरु करे प्रकाश॥

त्रि-गुरु-----गुरु, माता, पिता

शत आचार्य समान है श्याम पिता का मान।
नित प्रति वंदन कीजिये,मिले धर्म संग्यान॥

माता एक महान है, सहस पिता का मान।
पद वंदन नित कीजिये, माता गुरू महान ॥

सभी तपस्या पूर्ण हों, यदि संतुष्ठ प्रमाण।
मात-पिता-गुरु का करें, श्याम नित्य सम्मान॥

मनसा वाचा कर्मणा, कार्य करें जो कोय।
मातु पिता गुरु की सदा, सुसहमति से होय॥

और

अन्योनास्ति----जगत गुरु-----ईश्वर........

त्रिभुवन गुरु और जगत गुरु,जो प्रत्यक्ष प्रमाण।
जन्म मरण से मुक्ति दे , "ईश्वर" करूं प्रणाम॥