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डा श्याम गुप्त का ब्लोग...

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Lucknow, UP, India
एक चिकित्सक, शल्य-चिकित्सक जो हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान व उसकी संस्कृति-सभ्यता के पुनुरुत्थान व समुत्थान को समर्पित है व हिन्दी एवम हिन्दी साहित्य की शुद्धता, सरलता, जन-सम्प्रेषणीयता के साथ कविता को जन-जन के निकट व जन को कविता के निकट लाने को ध्येयबद्ध है क्योंकि साहित्य ही व्यक्ति, समाज, देश राष्ट्र को तथा मानवता को सही राह दिखाने में समर्थ है, आज विश्व के समस्त द्वन्द्वों का मूल कारण मनुष्य का साहित्य से दूर होजाना ही है.... मेरी तेरह पुस्तकें प्रकाशित हैं... काव्य-दूत,काव्य-मुक्तामृत,;काव्य-निर्झरिणी, सृष्टि ( on creation of earth, life and god),प्रेम-महाकाव्य ,on various forms of love as whole. शूर्पणखा काव्य उपन्यास, इन्द्रधनुष उपन्यास एवं अगीत साहित्य दर्पण (-अगीत विधा का छंद-विधान ), ब्रज बांसुरी ( ब्रज भाषा काव्य संग्रह), कुछ शायरी की बात होजाए ( ग़ज़ल, नज़्म, कतए , रुबाई, शेर का संग्रह), अगीत त्रयी ( अगीत विधा के तीन महारथी ), तुम तुम और तुम ( श्रृगार व प्रेम गीत संग्रह ), ईशोपनिषद का काव्यभावानुवाद .. my blogs-- 1.the world of my thoughts श्याम स्मृति... 2.drsbg.wordpres.com, 3.साहित्य श्याम 4.विजानाति-विजानाति-विज्ञान ५ हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान ६ अगीतायन ७ छिद्रान्वेषी ---फेसबुक -डाश्याम गुप्त
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बुधवार, 11 मार्च 2015

गंगा -प्रदूषण पर ...डा श्याम गुप्त....

                                      ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...
 गंगा -प्रदूषण पर ...

सदियों से पुष्प बहे, दीप-दान होते रहे ,
दूषित हुई न कभी नदियों की धारा है |
होते रहे हैं नहान, मुनियों के ज्ञान-ध्यान,
मानव का  सदा रही,  नदिया सहारा है |
बहते रहे शव भी, मेले- कुंभ  होते रहे ,
ग्राम नगर बस्ती के  जीवन की  धारा है |
 श्रद्धा, भक्ति, आस्था के कृत्यों से प्रदूषित गंगा .
छद्म-ज्ञानी, अज्ञानी, अधर्मियों का नारा है | |

नदीवासी जलचर, मीन  कच्छप मकर ,
नदिया सफाई हित, प्रकृति व्यापार  है |
पुष्प घृत  दीप बाती ,शव अस्थि चिता-भस्म,
जल शुद्धि-कारक,जीव-जन्तु आहार है |
मानव का मल-मूत्र, कारखाना-अपशिष्ट,
बने जल-जीवों के विनाश का आधार है |
यही सब कारण हैं, न कि आस्था के वे दीप,
आस्था बिना हुई प्रदूषित गंगधार है |

फैला अज्ञान तमस, लुप्त है विवेक, ज्ञान ,
श्रृद्धा आस्था से किया मानव ने किनारा है |
अपने ही दुष्कृत्यों का, मानव को नहीं भान
अपने कुकृत्यों से ही मानव स्वयं हारा है |
औद्योगिक गन्दगी, हानिकारक रसायन,
नदियों में बहाए जाते, किसी ने विचारा है |
नगरों के मल-मूत्र, बहाए जाते गंगा में,
इनसे  प्रदूषित हुई, गंगा की धारा है ||






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शनिवार, 10 नवंबर 2012

दीप-पर्व एवं पटाखे व आतिशबाजी और प्रदूषण ....डा श्याम गुप्त ..

                                      ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...

              आजकल  यह ट्रेंड बन चला है  कि ज़रा सा--- तथाकथित वैज्ञानिक विचार वाला व्यक्ति, समूह , संस्था-- कुछ पाश्चात्य बातें पढ़ता है ..विशेषकर यदि वे हिन्दू व भारतीय संस्कारों , रीति-रिवाजों, पर्वों , विधियों के बारे में  हैं तो--- तुरंत उनमें खामियां निकालने लगते हैं एवं बुराई की भांति  प्रचार करने में जुट जाते हैं | अभारतीय संस्कृति वाले लोग तो इसमें सम्मिलित होते ही हैं ..कुछ तथाकथित आधुनिक, स्व-संस्कृति पलायनवादी लोग भी जोर-शोर से इस में लग जाते हैं |
आतिशबाजी -दीपावली

आतिशबाजी- सिटी हाल , बाल्टीमोर-यूं एस ऐ  ( चित्र -गूगल - साभार )
        यही बात दीप-पर्व पर पटाखों, आतिशबाजी को लेकर देखी जारही है |
                     यह एक गलत धारणा है कि आतिशबाजी से प्रदूषण होता है ....आतिशबाजी युगों से होरही है और प्रदूषण नहीं होता था ..न हुआ ..आतिशबाजी के प्रकाश, धुंए, ऊष्मा व ध्वनि और रसायनों से ( जो वातावरण के लिए एंटी-सेप्टिक का कार्य करते हैं )  वातावरण से कीट-पतंगे ( जो इस मौसम में अधिक होते हैं)सूक्ष्म-जीव, बेक्टीरिया-आदि नष्ट होते हैंमौसम के संधि-स्थल पर मौसम के अनियमित व्यवहार (कभी गरम-कभी नरम) को सम करते हैं
                     यही कार्य सरसों के तेल के दीपक जलाने से होता है | तेल का एंटी-सेप्टिक  प्रभाव ( यज्ञ , हवं, आहुतियाँ  व होलिका दहन आदि की भांति )  वायुमंडल में वाष्पित होकर वातावरण को इन सभी प्रकार के प्रदूषण से मुक्त करता है |  जहां मोमबत्तियाँ  व  आधुनिक विद्युत बल्ब सिर्फ प्रकाश व ऊष्मा का ही प्रभाव देते हैं ....तेल का नहीं |
                    अधिकाँश लोग बिना कुछ जाने घिसी-पिटी कहानियों को दोहराते रहते हैं ..क्योंकि यह 
भारतीयों का / हिंदुओं का पावन पर्व है ...???? खतरनाक व अत्यधिक आवाज व शक्ति 
वाले...बड़ी-बड़ी कंपनियों में बने आधुनिक शक्तिशाली पटाखों आदि को सरकार को स्वतः ही 
सख्ती से बंद कर देना चाहिए |
 
                   जहां तक सांस के रोगी की सांस की बात है वह तो सदा ही इस मौसम के संधि-स्थल पर सामान्यतया अधिक सक्रिय हो जाती है |
                    और दुर्घटनाओं की बात-- वह तो खाना खाने से, मिलावट की मिठाइयां खाने से भी होती रहती हैं तो क्या खाना खाना बंद करदेंगे | मिलावट को बंद कीजिये ..मिठाइयों को नहीं |
            क्या दुनिया भर में, दुनिया के हर देश में  प्रतिवर्ष एवं वर्ष भर होने वाले खेलों, उत्सवों व अन्य पर्वों आदि में जो आतिशबाजी होती है ... उससे प्रदूषण नहीं होता ????
                 हमें वस्तुओं व तथ्यों को सावधानी पूर्वक चयन करना चाहिए .....अनावश्यक  अति-आधुनिकता व अंधविश्वासी छद्म-वैज्ञानिकता  से व उसके व्यावहारिक -चलन से सावधान रहना आवश्यक है |

मंगलवार, 25 अक्टूबर 2011

आज का छिद्रान्वेषण ....दीप-पर्व एवं पटाखे व आतिशबाजी और प्रदूषण ....डा श्याम गुप्त ..

                                   ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...

              आजकल  यह ट्रेंड बन् चला है कि ज़रा सा--- तथाकथित वैज्ञानिक विचार वाला व्यक्ति, समूह , संस्था कुछ पाश्चात्य बातें पढ़ता है ..विशेषकर यदि वे हिन्दू व भारतीय संस्कारों , रीति-रिवाजों, पर्वों , विधियों के बारे में हैं तो--- तुरंत उनमें खामियां निकालने लगते हैं एवं बुराई की भांति  प्रचार करने में जुट जाते हैं | अभारतीय संस्कृति वाले लोग तो इसमें सम्मिलित होते ही हैं ..कुछ तथाकथित आधुनिक ,स्व-संस्कृति पलायनवादी लोग भी जोर-शोर से इस में लग जाते हैं |

आतिशबाजी- सिटी हाल , बाल्टीमोर-यूं एस ऐ  ( चित्र -गूगल - साभार )
        यही बात दीप-पर्व पर पटाखों, आतिशबाजी को लेकर देखी जारही है |
                     यह एक गलत धारणा है कि आतिशबाजी से केवल प्रदूषण होता है ....आतिशबाजी युगों से होरही है और प्रदूषण नहीं होता था ..न हुआ ..आतिशबाजी के प्रकाश, धुंए, ऊष्मा व ध्वनि और रसायनों से ( जो वातावरण के लिए एंटी-सेप्टिक का कार्य करते हैं ) से वातावरण से कीट-पतंगे ( जो इस मौसम में अधिक होते हैं)सूक्ष्म-जीव, बेक्टीरिया-आदि नष्ट होते हैंमौसम के संधि-स्थल पर मौसम के अनियमित व्यवहार (कभी गरम-कभी नरम) को सम करते हैं
                     यही कार्य सरसों के तेल के दीपक जलाने से होता है | तेल का एंटी-सेप्टिक  प्रभाव ( यज्ञ , हवं, आहुतियाँ  व होलिका दहन आदि की भांति )  वायुमंडल में वाष्पित होकर वातावरण को इन सभी प्रकार के प्रदूषण से मुक्त करता है |  जहां मोमबत्तियाँ  व  आधुनिक विद्युत बल्ब सिर्फ प्रकाश व ऊष्मा का ही प्रभाव देते हैं ....तेल का नहीं |
                    अधिकाँश लोग बिना कुछ जाने घिसी-पिटी कहानियों को दोहराते रहते हैं ..क्योंकि यह भारतीयों का/ हिंदुओं का 
पावन पर्व है ...???? खतरनाक व अत्यधिक आवाज व शक्ति वाले...बड़ी-बड़ी कंपनियों में बने आधुनिक शक्तिशाली पटाखों आदि को सरकार को स्वतः ही सख्ती से बंद कर देना चाहिए |
                   जहां तक सांस के रोगी की सांस की बात है वह तो सदा ही इस मौसम के संधि-स्थल पर सामान्यतया अधिक सक्रिय हो जाती है |
                    और दुर्घटनाओं की बात-- वह तो खाना खाने से, मिलावट की मिठाइयां खाने से भी होती रहती हैं तो क्या खाना खाना बंद करदेंगे | मिलावट को बंद कीजिये ..मिठाइयों को नहीं |
            क्या दुनिया भर में, दुनिया के हर देश में  प्रतिवर्ष एवं वर्ष भर होने वाले खेलों, उत्सवों व अन्य पर्वों आदि में जो आतिशबाजी होती है ... उससे प्रदूषण नहीं होता ????
                 हमें वस्तुओं व तथ्यों को सावधानी पूर्वक चयन करना चाहिए .....अनावश्यक अति- आधुनिकता व अंधविश्वासी छद्म-वैज्ञानिकता से व उसके व्यावहारिक -चलन से सावधान रहना आवश्यक है |

शुक्रवार, 10 सितंबर 2010

कृष्ण लीला तत्वार्थ.....

कृष्ण लीला तत्वार्थ...नाग नथैया...
( कुण्डलिया छंद )

कालिंदी का तीर औ, वंशी धुन की टेर,
गोप गोपिका मंडली नगर लगाती फेर |
नगर लगाती फेर,सभी को यह समझाती,
ग्राम नगर की सभी गन्दगी जल में जाती |
विष सम काला दूषित जल है यहाँ नदी का,
बना सहसफन नाग कालिया, कालिदी का ||

यमुना तट पर श्याम ने, बंशी दई बजाय,
चहुँ दिशि मोहिनि फेरि कर, सब को लिया बुलाय |
सब को लिया बुलाय, प्रदूषित यमुना भारी,
सभी करें श्रम दान, स्वच्छ हो नदिया सारी |
तोड़ किया विषहीन प्रदूषण नाग का नथुना ,
फेन फेन नाचे श्याम, स्वच्छ हो झूमी यमुना ||

रविवार, 20 जून 2010

गंगा दशहरा पर.....

गन्गोत्री ग्लशिअर नीचे खिसकता हुआ ----->
स्वर्ग से गंगावतरण का दृश्य ---->

सदा
नीरा माँ गंगा भारतवर्ष की जीवन दायिनी, जन-जीवन है अतः माँ रूप में सर्वत्र पूजी व जानी गयी । यद्यपि आज हमारे अपने ही कृतित्वों से वह क्षीणकाय व प्रदूषित होती जारही है परन्तु फिर भी जन जन की आस्था कम नहीं हुई है । अच्छा होगा यदि हम आस्था के साथ साथ गंगा को प्रदूषण रहित करने में भी योगदान दें । कहीं एसा हो सरस्वती की भांति सिर्फ आस्था ही रह जाय गंगा विलुप्त होजाय
तुलसी दास जी ने -कवितावली’ में गंगा को विष्णुपदी, त्रिपथगामिनी और पापनाशिनी आदि कहा गया है-
जिनको पुनीत वारि धारे सिर पे मुरारि।
त्रिपथगामिनी जसु वेद कहैं गाइ कै।।

गन्गा जी के दर्शन के लिए देवांगनाएँ झगड़ती हैं, देवराज इन्द्र विमान सजाते हैं, ब्रह्मा पूजन की सामग्री जुटाते हैं क्योंकि गंगा दर्शन से समस्त पाप नष्ट होजाते हैं और उसका विष्णु लोक में जाना निश्चित हो जाता है-
देवनदी कहँ जो जन जान किए मनसा कहुँ कोटि उधारे।
देखि चले झगरैं सुरनारि, सुरेस बनाइ विमान सवाँरे।

पूजा को साजु विरंचि रचैं तुलसी जे महातम जानि तिहारे।

ओक की लोक परी हरिलोक विलोकत गंग!तरंग तिहारे।।
(कवितावली-उत्तरकाण्ड 145)

---वास्तव मे सर्वव्यापी परमब्रह्म परमात्मा जो ब्रह्मा, शिव और मुनिजनों का स्वामी है, जो संसार की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय का कारण है, वही गंगा रूप में जल रूप हो गया है-
ब्रह्म जो व्यापक वेद कहैं, गमनाहिं गिरा गुन-ग्यान-गुनी को।
जो करता, भरता, हरता, सुर साहेबु, साहेबु दीन दुखी को।
सोइ भयो द्रव रूप सही, जो है नाथ विरंचि महेस मुनी को।
मानि प्रतीति सदा तुलसी, जगु काहे न सेवत देव धुनी को।।
(कवितावली-उत्तरकाण्ड 146)

और -----
जै जै विष्णु-पदी गंगे।
पतित उघारनि सब जग तारनि नव उज्ज्वल अंगे।
शिव शिर मालति माल सरिस वर तरल तर तरंगे।
‘हरीचन्द’ जन उधरनि पाप-भोग-भंगे।

----गन्गा दशहरा पर गन्गा स्नान करने से दशों प्रकार के कायिक मानसिक वाचिक पाप नष्ट होते हैं इसीलिये इसे गंगा दशहरा कहाजाता है।
- कायिक पाप()-- बिना पूछे किसी की वस्तु लेना , शास्त्र वर्जित हिंसा, पर स्त्री गमन
-वाचिक पाप()--कटु बचन बोलना, झूठ बोलना,परनिंदा वअसत्य परदोषारोपण एवं निष्प्रयोजन बातें
-मनसा पाप ()--दूसरों पर अन्याय करने का विचार, अनिष्ट चिंतन, नास्तिक बुद्धि





शनिवार, 5 जून 2010

पर्यावरण दिवस पर श्याम गुप्त का एक पद...

पर्यावरण पर एक पद--

प्रभु तेरी पूजा वंदन को मैं कैसे आऊँ |
नदिया ताल नहर जल दूषित कौन सो नीर चढाऊँ |
चहुँ दिशि डीज़ल धुंआ प्रदूषण अँखियाँ नीर बहाऊँ |
सड़क चौराहे जाम लगे हैं कौन राहि चलि आऊँ |
गलियन -राह शोर अति कैसे घंटा ध्वनि सुनि पाऊँ |
खून खराबा ,लूट-पाट , घर- बाहर कैसे जाऊं |
तुम अपने घर, मैं अपने घर, गोविन्द गोबिंद गाऊँ ||

शनिवार, 24 अप्रैल 2010

पानी की बूँद --जलचक्र .....

में पानी की वही बूँद ,
इतिहास मेरा देखा भाला |
मैं शाश्वत विविध रूप मेरे,
सागर घन वर्षा हिम नाला। 1

धरती इक आग का गोला थी,
जब मार्तंड से विलग हुई।
शीतल हो अणु परमाणु बने,
बहु विधि तत्वों की सृष्टि हुई । 2

आकाश व धरती मध्य बना,
जल वाष्प रूप में छाया था।
शीतल होने पर पुनः वही,
बन प्रथम बूँद इठलाया था । 3

जग का हर कण कण मेरी इस ,
शीतलता का था मतवाला
मैं पानी की वही बूँद,
इतिहास मेरा देखा भाला।। 4

फिर युगों युगों तक वर्षा बन,
मैं रही उतरती धरती पर ।
तन मन पृथ्वी का शीतल कर,
मैं निखरी सप्त सिन्धु बनकर। 5

पहली मछली जिसमें तैरी,
मैं उस पानी का हिस्सा हूँ।
अतिकाय जंतु से मानव तक,
की प्यास बुझाता किस्सा हूँ। 6

रवि ने ज्वाला से वाष्पित कर,
फिर बादल मुझे बना डाला।
मैं पानी की वही बूँद,
इतिहास मेरा देखा भाला॥ 7

मैं वही बूँद जो पृथ्वी पर,
पहला बादल बनकर बरसी।
नदिया नाला बनकर बहती,
झीलों तालों को थी भरती। 8

राजा संतों की राहों को,
मुझसे ही सींचा जाता था।
मीठा ठंडा और शुद्ध नीर,
कुओं से खींचा जाता था। 9

बन कुए सरोवर नद झीलें ,
मैंने सब धरती को पाला।
मैं वही बूँद हूँ पानी की ,
इतिहास मेरा देखा भाला॥ 10

ऊँचे ऊँचे गिरि- पर्वत पर,
शीतल होकर जम जाती हूँ।
हिमवानों की गोदी में पल,
हिमनद बनकर इठलाती हूँ। 11

सविता के शौर्य रूप से मैं,
हो द्रवित भाव जब बहती हूँ।
प्रेयसि सा नदिया रूप लिए,
सागर में पुनः सिमटती हूँ। 12

मैं उस हिमनद का हिस्सा हूँ,
निकला पहला नदिया नाला।
मैं पानी की वही बूँद,
इतिहास मेरा देखा भाला॥ 13

तब से अब तक मैं वही बूँद,
तन मन मेरा यह शाश्वत है।
वाष्पन संघनन व द्रवणन से ,
मेरा यह जीवन नियमित है। 14

मैं वही पुरातन जल कण हूँ ,
शाश्वत हैं नष्ट न होते हैं ।
यह मेरी शाश्वत यात्रा है,
जलचक्र इसी को कहते हैं। 15

सूरज सागर नभ महि गिरि ने,
मिलकर मुझको पाला ढाला।
मैं ही पानी बादल वर्षा,
ओला हिमपात ओस पाला। 16

मेरे कारण ही तो अब तक,
नश्वर जीवन भी शाश्वत है।
अति सुखाभिलाषा से नर की,
अब जल थल वायु प्रदूषित है । 17

सागर सर नदी कूप पर्वत,
मानव कृत्यों से प्रदूषित हैं।
इनसे ही पोषित होता यह,
मानव तन मन भी दूषित है। 18

प्रकृति का नर ने स्वार्थ हेतु,
है भीषण शोषण कर डाला।
मैं पानी की वही बूँद ,
इतिहास मेरा देखा भाला॥ 19

कर रहा प्रदूषण तप्त सभी,
धरती आकाश वायु जल को।
अपने अपने सुख मस्त मनुज,
है नहीं सोचता उस पल को। 20

पर्वतों ध्रुवों की हिम पिघले,
सारा पानी बन जायेगी।
भीषण गर्मी से बादल बन,
उस महावृष्टि को लायेगी। 21

आयेगी महा जलप्रलय जब,
उमड़े सागर हो मतवाला।
मैं वही बूँद हूँ पानी की ,
इतिहास मेरा देखा भाला॥ २२.

मंगलवार, 5 जनवरी 2010

प्रदूषण उन्मुक्ति में साहित्य की भूमिका एवं वैदिक साहित्य में पर्यावरण -------डा श्याम गुप्ता का aalekh

प्रदूषण उन्मुक्ति में साहित्य की भूमिका एवं वैदिक साहित्य में पर्यावरण

साहित्य व पर्यावरण यद्यपि अलग अलग संस्थाएं हैं, एक कला क्षेत्र दूसरा विज्ञान का क्षेत्र | परन्तु विज्ञान कहाँ नहीं है, कला कहाँ नहीं है,उनमें घनिष्ठ सम्बन्ध है क्योंकि दोनों ही का केंद्र बिंदु मानव है | यह सृष्टि ही मानव के लिए हुई है। यहाँ सबकुछ मनुष्य का, मनुष्य के लिए एवं मनुष्य द्वारा संचालित है। साहित्य मानव ही गढ़ता है ,पर्यावरण भी मानव ही प्रदूषित करता है ,उसका प्रभाव भी मानव पर ही होता है।
सामाजिक प्राणी होने से जहां मानव के कलापों का प्रभाव समाज पर पड़ता है वहीं समाज के नियम व अनुशासन मनुष्य का नियमन करते हैं| मनुष्य जहां सामाजिकता व उसके अनुशासन के विपरीत असामाजिक क्रिया-कलाप अपनाता है तो समाज के वातावरण को दूषित करता है और यह मानसिक व सामाजिक प्रदूषण के साथ-साथ पर्यावरण प्रदूषण का कारण भी बन जाता | वस्तुतः असामाजिक वातावरण, अनैतिक कर्म, अति-सुखाभिलाषा , सामाजिक,राष्ट्रीय शास्त्रीय अनुशासनों का पालन करने पर ही पर्यावरणीय प्रदूषण की राह प्रशस्त होती है
साहित्य व साहित्यकार सामाजिक प्रचेतना के वर्ग में अग्रगण्य स्थान रखते हैं । उनका दायित्व है कि प्रत्येक प्रकार के अनुशासन एवं उदात्त भावों का पुनः पुनः स्मरण कराते रहें, जिनमे प्रदूषण भी शामिल है। प्राचीन काल से ही भारतीय साहित्य प्रदूषण के प्रति चैतन्य रहा है | वास्तव में साहित्य ही समाज के क्रिया कलापों का लेखा जोखा रखता है । यजुर्वेद (५/३६/२०) में ऋषि प्रार्थना करता है--"अग्ने नय सुपथा राये " प्रकाशवान अग्नि ( विद्वान,सत्यवादी लोग साहित्य व विचार ) हमें सन्मार्ग पर ले जाएँ ; तथा " युयोध्य्स्म ज्जुहू राणि ये नो..." तथा कुटिल आचरण व पाप से हमें बचाएं |
पृथ्वी की रक्षक पर्त, ओजोन लेयर आयनोस्फ़ीअर के बारे में यजु.१३/५० के मन्त्रं में कैसा अच्छा वर्णन है --"इमं भ्रूर्णायु वरुणस्य नाभिं त्वचम पशूनां द्विपदा चतुषपदं|
त्विष्टुं प्रजानां प्रथमं जनित्रमाने , माँ हिंसी परमे व्योमन ॥ ""
यह जो पृथ्वी के चारों और रक्षक आवरण त्वचा की तरह रहकर छन्ने की तरह अंतरिक्ष कणों को प्रविष्ट न होने देकर प्राणियों की रक्षा करता है ,उसे ऊर्जा की अति उपयोग से नष्ट नकरें । तथा पर्यावरण के प्रति चेतना देतेहुए ऋषि कहता है -"" यदस्य कश्मैचिद भोगाय बलात कश्मिद्ध प्रक्रितांते|
तत क्रिस्तेन म्रियन्ते वत्सोश्च धानुको वृकः ॥ ""--(अथर्व -४/७)
अर्थात जो सिर्फ भोग व अति लिप्सा के कारण प्रकृति का कर्तन व दोहन करते हैं उनकी संतानें, पशु व पक्षी मृत्यु को प्राप्त होते हैं | तथा--"" यदस्य गौपदो सत्यालोप अजोहितः , तत्कुमारा म्रियन्ते यक्ष्मो विन्दतनाशयात ॥ "
जिस नगर ग्राम गृह में पर्यावरण बिगड़ जाता है वहां संतति को यक्ष्मा (आदि विभिन्न रोगों )आदि जकड कर haani पहुंचाते है । अतः ऋग्वेद ४/१८ में कहा गया है कि-
'' अयं पन्था अनिवित्तः पुराणो,यतां देवाः उपजायंत विश्वे ।
अताश्चिदा जनायीष्ट प्रवुद्धो माँ मातराममुया पंतावे कः ॥ "" यह पंथ सनातन है (सृष्टि के आदि में उत्पन्न प्राकृतिक पर्यावरण चक्र) अतः प्रबुद्ध लोग अपनी आधारभूता माता ( प्रकृति व पर्यावरण ) को विनष्ट न करें।
पर्यावरण व प्रदूषण से बचाव की विधि के रूप में अथर्व वेद (१०/५/१८ ) का एक मन्त्र है--"अजः पक्वः स्वर्ग लोके दधान्ति पंचौदानो निसृन्ति बाधयान ॥ " --यह अजः ( यग्य में समर्पित सामग्री -अन्न, कर्म, विचार, भाव रूपी ) स्वर्ग (अंतरिक्ष ,पृथ्वी ,वत्तावरण ,आकाश, ईथर )में पंचौदन अजः ( सृष्टि के समय तैयार किया गया सृष्टि निर्माण तत्व -मेटीरिअल, मिट्टी , आटा) बनकर सब जगह स्थापित होजाता है तथा पाप देवता ( प्रदूषण, विकृति उत्पादक- प्री एटोमिक, सब एटोमिक , परमाणु , अणु व पदार्थ ) को दूर हटाते हैं ।
इस प्रकार कहा जासकता है कि समाज व व्यक्तियों के सदाचरण , सामाजिक सरोकार से युक्त सत्साहित्य व पर्यावरण प्रदूषण में घनिष्ठ सम्बन्ध है एवं व इन सबके समायाजन व समन्वय को लेकर चलने वाला भारतीय विश्वबंधुत्व भाव ,साहित्य शास्त्र परम्परा व वैदिक विज्ञान के मार्ग पर चलकर ही मानवता के कल्याण का मार्ग प्रशस्त होगा , जो आज के भौतिकवादी युग की अनन्यतम आवश्यकता है ।

मंगलवार, 8 दिसंबर 2009

कैसे कम होगा कार्बन उत्सर्जन ----


कार्बन उत्सर्जन कैसे कम होगा ,हमे इसकी चिंता तो हैक्योंकि ये सब विकाश शील देशों के लिए हैं , पर कैसे रुके , इसका क्या ?क्या विक्सित देश अपनी सुख -सुविधा बंद करने को राजी हैं या होंगे ? जो दुनिया का अधिकतम मात्रा में प्रदूषण के लिए जिम्मेदार हैं |
ऊपर के समाचार में आप कार्बन कम करने के विभिन्न उपाय देख रहे हैं , अब हम इन उपायों पर अलग-अलग चर्चा करें---
१. व २.सौर ऊर्जा। --- पवन चक्किय्याँ ---अच्छी बात है , परन्तु ये आधिनिक पवन चक्कियां ,सोलर पेनल , बैटरियां , बनाने के लिए भी तो वही सब साजो-सामान -आयातित -आवश्यक होगा जो स्वयं प्रदूषण उत्पन्न करता है व हमारा मुद्रा भण्डार का दोहन करता है|यदि सामान्य (बगैर इलेक्ट्रोनिक /मेकेनिकल ) चक्कियां आदि प्रयोग हों तो बात बने |
३.पन बिजली योजनाओं के लिए भी हमें विदेशी तकनीक, व तमाम गेजेट्स चाहिए ,जो हम नहीं बनाते , यदि स्वदेशी सामान से छोटे-छोटे पन बिजली घर-बाँध आदि बनें तब यह उद्देश्य पूरा हो|
४। बायोमास ---सदियों से हिन्दुस्तान में घर-घर में कागज़ का कूड़ा, मूंगफली छिलके, भूसा, गन्ने की खोई,गोबर के कंडेऊर्जा के रोप में स्तेमाल होरहे हैं ( आज भी ) | पहले तो इन्हें धुंआ से प्रदूषण कारक कहकर नकारा गया ,कि नए-नए हीटर-गीज़र खरीदो( जब हम इन्हें नहीं बनाते थे ) |जबकि सदियों से कोई प्रदूषण नहीं हुआ| अब पावर-प्लांट लगाकर क्या कुछ मशीनी करण नही चाहिए होगा ( शायद वह भी बाहर से आयेंगे -जैसे गेंहू -दाल )|
५.परमाणु ऊर्जा--क्या उसके संयंत्रों के लिए वही सब नहीं करना होगा जो प्रदूषण कारक क्रियाएं व साजो-सामान हैं परमाणु -प्रदूषण की घटनाएं आए रोज़ होरहीं हैं ,उनका क्या रोक-थाम-निराकरण है|
६। अन्य--सी ऍफ़ एल -एलईडी-आदि बनाने के लिए क्या वही तकनीक नहीं स्तेमाल होंगीं जो प्रदूषण करतीं हैं?
----मूलतः भारत तो यह करने को तैयार है ही,पर क्या हमें/दुनिया को यह नहीं सोचना है कि यदि विक्सित देश अपनी विलासिता ,आसमान में उड़ने की भ्रमित इच्छा छोड़ा दें तो यह स्थिति उत्पन्न ही न हो |
----इसे कहते हैं पहले कुआ खोदो फ़िर उसे पार करने को पुल बनाओ और फ़िर...... शुरू दुश्चक्र |