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डा श्याम गुप्त का ब्लोग...

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Lucknow, UP, India
एक चिकित्सक, शल्य-चिकित्सक जो हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान व उसकी संस्कृति-सभ्यता के पुनुरुत्थान व समुत्थान को समर्पित है व हिन्दी एवम हिन्दी साहित्य की शुद्धता, सरलता, जन-सम्प्रेषणीयता के साथ कविता को जन-जन के निकट व जन को कविता के निकट लाने को ध्येयबद्ध है क्योंकि साहित्य ही व्यक्ति, समाज, देश राष्ट्र को तथा मानवता को सही राह दिखाने में समर्थ है, आज विश्व के समस्त द्वन्द्वों का मूल कारण मनुष्य का साहित्य से दूर होजाना ही है.... मेरी तेरह पुस्तकें प्रकाशित हैं... काव्य-दूत,काव्य-मुक्तामृत,;काव्य-निर्झरिणी, सृष्टि ( on creation of earth, life and god),प्रेम-महाकाव्य ,on various forms of love as whole. शूर्पणखा काव्य उपन्यास, इन्द्रधनुष उपन्यास एवं अगीत साहित्य दर्पण (-अगीत विधा का छंद-विधान ), ब्रज बांसुरी ( ब्रज भाषा काव्य संग्रह), कुछ शायरी की बात होजाए ( ग़ज़ल, नज़्म, कतए , रुबाई, शेर का संग्रह), अगीत त्रयी ( अगीत विधा के तीन महारथी ), तुम तुम और तुम ( श्रृगार व प्रेम गीत संग्रह ), ईशोपनिषद का काव्यभावानुवाद .. my blogs-- 1.the world of my thoughts श्याम स्मृति... 2.drsbg.wordpres.com, 3.साहित्य श्याम 4.विजानाति-विजानाति-विज्ञान ५ हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान ६ अगीतायन ७ छिद्रान्वेषी ---फेसबुक -डाश्याम गुप्त

शुक्रवार, 15 अक्टूबर 2010

डा श्याम गुप्त की कहानी.....

श्याम गुप्त की कहानी – मुक्ति पथ की ओर

न्हैया नंदन जी मेरे परम मित्रों में हैं। वे एक सफल चिकित्सक, कुशल अधिकारी के साथ एक एक अच्छे साहित्यकार भी हैं। सबसे बढ़कर वे एक सफल व्यक्तित्व हैं। जीवन के लगभग सभी क्षेत्रों , ज्ञान, विज्ञान, खेल , कर्मठता, प्रेम, सौहार्द , सम्बन्ध ,मित्रता आदि सभी में वे उन्मुक्त व्यवहारी व सफल व्यक्ति हैं। मेरी मित्रता एक सफल साहित्यकार के नाते रही है। हम एक समारोह में मिले,मित्रता हुई, वाद-विवाद व लम्बे पत्रोत्तरों का सिलसिला चला। लगभग चार वर्षों से उनसे कोई संपर्क नहीं हुआ। कुछ दिन पहले उनका एक पत्र मिला जिससे ज्ञात हुआ कि वे अज्ञातवास में हैं। पत्र के साथ उनके पढ़ने की चाभी भी थी। पत्र का मंतव्य था कि अब वे शीघ्र लौट कर नहीं आयेंगे और उनकी आलमारी में जो भी कागज़-पत्र, अप्रकाशित रचनाएं आदि या जो कुछ भी है अब मेरे स्वामित्व में है , मैं जैसे भी चाहूँ उसका उपयोग व निस्तारण करने को स्वतंत्र हूँ।

वे मुक्ति-पथ की ओर खोजलीन हैं। यह बात मैं उनके परिवार को भी बता दूँ ; वे ढूंढने का उपक्रम न करें , चिंता की कोई बात नहीं है जब ठीक समझेंगे वे स्वयं ही आजाएँगे।
साहित्य से सम्बंधित लगभग सभी सामग्री मैंने हस्तगत करली ; जिसमें एक डायरी , कुछ रचनाएं व कुछ पत्र आदि थे। मुझे सबसे अधिक आकृष्ट किया कुछ हस्तलिखित पत्रों की असंपादित -रद्दी प्रतियों ने , जो उन्होंने लोगों के अपने प्रति विचारों पर अन्य विवेचनात्मक टिप्पणियों सहित भेजे होंगे। वे वास्तव में एक सफल व्यक्तित्व के आत्म-निरीक्षण के दस्तावेज़ थे। वही दस्तावेज़ मैं आगे के पन्नों में आपके सम्मुख ज्यों के त्यों प्रस्तुत कर रहा हूँ।


पत्र एक---
प्रिय अग्रज , सादर चरण स्पर्श ,
आपको मलाल है कि मैं सब विधि कुशल होने पर भी एक महान व प्रसिद्ध चिकित्सक नहीं बना। आपका कहना है कि तुम जहां पहुँच सकते थे नहीं पहुंचे। भाई ! आप बड़े हैं , अनुभवी हैं , परिवार में हम सबसे अधिक कुशाग्र-बुद्धि ; मुझसे अधिक दुनियादार हैं। मैं क्या कहूं , पर सिद्धि को छोड़कर ( प्राप्त करने के बाद ) आगे बढ़ जाना मेरे विचार से मुक्ति पथ की ओर बढ़ना है। सिद्धियों को कभी मैंने अपने हित में भुनाने का कार्य नहीं किया। मैं कभी तेज दौड़ मैं शामिल ही नहीं हुआ। हो सकता है कि दुनियादारी की दौड़ में मैं बहुतों से पीछे रह गया होऊँ ; पर अपने अंतर में मुझे संतोष है। मैंने सिद्धियाँ प्राप्त कीं , शायद इस समय की चिकित्सा-विशेषज्ञता सिद्धि, जन सामान्य में आदर, समाज में स्थापित पहचान। शायद यह माता-पिता की साधना का उचित फल है। सिद्धियों के लाभपूर्ण उपयोग के शिखर पर मैं नहीं पहुँच पाया। प्रभु इच्छा! मैं एसा ही हूँ। पर मुक्ति-पथ की ओर मुझे बढ़ना ही है। आप जानते हैं कि , अनुज, भगिनी,रिश्तेदार आदि सभी लिए मैं प्रभा मंडल युक्त हूँ। वे अभिभूत हैं मेरी कर्मठता , विद्वता, काव्यप्रेम,एवं सभी से समता व युक्ति-युक्त प्रेमपूर्ण व्यवहार के वे कायल हैं। नाते-रिश्तेदार, उनके बच्चों में , पड़ोसियों में , मैं आदर्श, अनुकरणीय व सफल व्यक्ति की भांति चर्चित व प्रशंसित हूँ। शिखर पर पहुंचे परिवार के शिखर पुरुष की तरह माननीय। जब आप किसी को डांट देते हैं या नाराज़ होजाते हैं तो या किसी का आपसे कोई काम नहीं हो पाता तो वे मुझे ही संपर्क करते हैं , सुलझाने के लिए।


मेरे कवि मित्र मुझे आशु-कवि, आध्यात्मिक रचनाकार, भावुक, सुविनयी, ज्ञानी जाने क्या क्या कहते हैं। कवि ह्रदय की महानता ही है यह सब। ज्ञानी व सत्संगति वाले विद्वानों की संगति- सान्निध्य में जो रस प्राप्त होता है, ज्ञान व अनुभव होता है , उसी को अपने जीवन के अनुभवों से मिलाकर कलमबद्ध कर लेता हूं। उस असीम की कृपा होती है तो कविता बन जाती है और मैं कर्ता का भ्रम पाले रहता हूँ।


मेरे सहकर्मी साथी चिकित्सक मुझे कर्मठ , ईमानदार, अपने काम में मस्त , निर्णय में कठोर,कानूनची पर सभी में समभाव रखने वाला विद्वान् व्यक्ति कहते हैं। कुछ सुधी चिकित्सक मित्र , भाई , आपकी तरह यह भी कहते हैं कि तुम अपने मुख्य पेशे में कभी नहीं रम पाए। अपनी सिद्धि-यात्रा से भटक गए। विशेषज्ञ कर्म सिद्धि-रूप था, योग था; तुम योग भ्रष्ट व पथ-भ्रष्ट योगी होकर रह गए। भाई ! जीवन का लक्ष्य क्या है ? सिद्धि या मुक्ति ? निश्चय ही मुक्ति। वे कहते हैं- सिद्धि प्राप्ति से ही तो जीवन सफल बनाया जा सकता है। पर भाई जी, मुक्ति ही वास्तविक सफलता है, जीवन है। आनंद, परमानंद, सत-चित भाव आदि ही मुक्ति है , वही सफल जीवन है। मुक्ति का आधार-भूत भाव - मानव कल्याण द्वारा शान्ति व परमानंद मार्ग है। सिद्धियों द्वारा मानव कल्याण , मुक्तिपथ की खोज से मानव कल्याण , प्रेम भाव के पथ से मानव कल्याण या किसी भी भाव व कर्म से मानव कल्याण का मार्ग प्रशस्त करके मुक्ति प्राप्ति की राह पर अग्रसर हुआ जा सकता है। सिद्धियाँ भौतिक बस्तु हैं , सांसारिक हैं। ऋद्धि-सिद्धि में लक्ष्मी व् सरस्वती दौनों की ही कृपा दृष्टि होती है जो इस काल-खंड की रीति है। अतः सिद्धि में अहं तत्व के प्रमुखता पाने का, वैभव-भ्रष्टता का अधिक अंदेशा होता है। वहां से गिर कर, पथभ्रष्ट होकर उठा नहीं जा सकता। अतः सिद्धि से इतर अन्य राहें भी मुक्ति हेतु अपनाई जा सकतीं हैं। मैं वही राह अपनाने का प्रयत्न कर रहा हूँ।


मैं योग भ्रष्ट हूँ ,शायद, पर भ्रष्ट या पथभ्रष्ट नहीं। मैं सिद्धि प्राप्ति के बाद रुका नहीं , छोड़कर आगे बढ़ गया हूँ। यह सिद्धि प्राप्ति के बाद जीवन का अगला सोपान है,योग भ्रष्टता नहीं। सिद्धि भ्रष्ट या सिद्धि में भ्रष्ट व्यक्ति प्राय: पथ भ्रष्ट हो जाता है। यह आज के युग की रीति है क्योंकि सिद्धि का मार्ग लक्ष्मी के मार्ग से टकराकर ही जाता है। जीवन का लक्ष्य या उद्देश्य क्या है -मुक्ति ; जिसके साधन चार पदार्थ हैं -धर्म, अर्थ, काम , मोक्ष। सिद्धियाँ कर्म व पुरुषार्थ द्वारा प्राप्त सीढियां हैं , साधनों को प्राप्त करने की , जो स्वयं धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष मूलक होती हैं। यहाँ रुक जाना , रम जाना, सांसारिकता है, माया है। दौड़कर , छोड़कर आगे बढ़ जाना योग भाव है , ईश्वर से युक्त होने का पथ है। परमार्थ भाव व सच्चे प्रेम प्राप्ति भाव में इनको छोड़कर आगे बढ़ जाना चाहिए, रमने का अर्थ पथ-भ्रष्टता है। छोड़कर आगे बढ़ जाना ब्रह्म प्राप्ति, अमृतत्व व मोक्ष के लक्ष्य को प्राप्त करना है। जीवन में विद्याप्राप्ति, हठयोग, विशेषज्ञ कर्म व विद्या ,अर्थोपार्जन , भक्ति- भाव रत रहना--सभी सिद्धियाँ हैं यदि इनमें परमार्थ भाव है तो, अन्यथा स्वार्थ भाव में यही बंधन है, माया है, पतन के रास्ते हैं। परमार्थ-भाव सिद्धियों में भी, मगन होकर रम जाना, मुक्ति पथ पर रुक जाना है, अतः इनको भी छोड़कर आगे बढ़ना होगा ; तभी मुक्ति की ओर बढ़ा जा सकता है।


भाई जी, मेरे बरिष्ठ अधिकारी मुझे कर्मठ, अनुशासित, न्याय प्रिय, ईमानदार , योज्ञ अधिकारी की तरह देखते हैं , मानते भी हैं। सब मेरे इन गुणों का उपयोग भी करते हैं। पर परिस्थितियों को चतुरता व टेक्ट से सुलझाने में , लटकाने में ताकि उनके पास समस्याएं न पहुंचें , इसमें मुझे सफल नहीं समझते। उनको कमाई कराने में मैं समर्थ नहीं हूँ। अतः प्रायः लाभ के दायित्व मुझे सौंपने से कतराते हैं। भ्रष्ट अधिकारी तो मुझे नाकारा, योज्ञ, अदूरदर्शी भी कहा करते हैं। कठोर व अप्रिय निर्णय लेने के कार्य मुझे खुशी से सौंपते हैं। मैंने स्वयं आज तक किसी विशिष्ट पद या नगर , स्थान के बारे में स्वयं मांग नहीं की। जो होता है वही मान लेता हूँ। हरि इच्छा ! ईश्वर ने सब कुछ अपने आप ही दिया है वही मैं अपने लायक समझ कर प्रसन्न हूँ। आवश्यकता से अधिक प्राप्ति अहंकार की ओर ले जाती है।


मेरे कनिष्ठ अधीनस्थ , जो स्वयं कर्मठ व अनुशासित हैं , मेरे अनुशासन प्रियता,समदर्शिता का सम्मान करते हैं। जाने कितनों को मैंने आर्थिक, सामाजिक, अनुशासनात्मक,कठिनाइयों से उबारा होगा, बिना भेद-भाव व बिना प्रति-प्राप्ति की इच्छा के। उनकी दृष्टि में मैं एक न्याय-प्रिय अधिकारी हूँ जो सभी छोटे-बड़े समान भाव से उचित न्याय व दंड , दोनों में विश्वास रखता है। यदि एक तरफ मैं शासकीय कार्य में कठोर व निर्मम कर्तव्यपालक हूँ तो व्यक्तिगत स्तर पर एकदम विपरीत। कार्यालय के कार्य के प्रतिद्वंद्विता ,छद्म भावना, द्वंद्व या विरोध को मैं कार्यालय के बाहर याद नहीं रखता। उसका व्यक्तिगत भाव से कोई लेना-देना नहीं होता। कामचोर, चालाक, नेता की भांति व्यवहार करने वाले कर्मचारी, अधीनस्थ व सामान्य जन मुझे अशिष्ट , सिर-फिरा, अकडू यहाँ तक कि भ्रष्ट भी कहते हैं , जिनको मैंने कभी अवांछित लाभ नहीं पहुंचाया। शैतानी शक्तियां सदैव आप पर हावी होने का यत्न करती हैं। यदि एक बार भी आप जाल में फंस गए तो उसी के उदाहरण स्वरुप वे पुनः पुनः आपका शोषण करती रहती हैं। न कहना भी एक कला है , और उस पर दृढ रहना -इच्छाशक्ति, जो सत्याचरण से मिलती है। प्रथम बार ही न , सदा का छुटकारा।


अच्छा-बुरा व्यक्ति समानुपातिक ,सापेक्षिक भाव है ; जो आपसे लाभान्वित होते हैं वे अच्छा कहेंगे; अन्यथा आप बुरे हैं। हाँ, जो स्वयं विज्ञ व उच्चकोटि के व्यक्तित्व हैं , वे उनका गलत कार्य नकारने पर भी पीठ-पीछे आपकी प्रशंसा करेंगे। दुर्जन का क्या कहा जा सकता है ? अतः जिस अधिकारी/ कर्मचारी को सभी अच्छा कहें वह टेक्टफुल, चलता पुर्जा होता है। अच्छा वह है जिसे अधिक लोग अच्छा कहें तो कुछ लोग बुरा अवश्य कहें। पीठ पीछे ऐसे लोगों को सब अच्छा ही कहते हैं। अच्छाई का कभी पूर्ण अंत नहीं होता।


हम क्या हैं ? व्यक्ति क्या है ? मैं क्या हूँ ? मेरे अंतस में ये शाश्वत प्रश्न मुझे लगता है युगों से मंथित हो रहा है। अहं ब्रह्मास्मि, सर्व खल्विदं ब्रह्म जैसे वाक्य यह जानने की इच्छा और तीव्र करदेते हैं कि हम क्या हैं , क्यों हैं ? इसका उत्तर आत्म-निरीक्षण, आत्मालोचन , अपने को पहचानने के अतिरिक्त और कैसे किया जा सकता है। और यह जानने के लिए यह जानना, समझना व मनन करना आवश्यक है कि आपके चारों ओर के जन-जन आपको क्या समझते व मानते हैं। आखिर हम क्या हैं? व्यक्ति स्वयं में कुछ नहीं होता। वह उसके चारों ओर एकत्रित जन मानस के कारण ही अस्तित्व में होता है। अस्तित्व का अर्थ ही है कि उपस्थित अन्य लोग उसकी उपस्थिति अनुभव करें। वे अन्य यदि नहीं हैं तो आप भी नहीं हैं। आप एक अज्ञात, गुमनाम, अनजान, अनाम -प्राकृतिक जड़ तत्व संसार की ही भांति हैं। अतः यह जानना व विवेचना आवश्यक है कि अन्य आपके बारे में का सोचते हैं। इससे सत्य के मार्ग पर चलने की राह व दिशा प्राप्त होती है। भटकने पर सुधार की प्रवृत्ति होती है। आत्मालोचन व आत्म विवेचना से आपको मुक्ति पथ की ओर उचित दिशा निर्देश में सहायक होती है। यह जड़ तत्व जब एकोहं वाली स्थिति में होता है तो उसे- गति व नियति , बहुस्याम की इच्छा रूपी चित-शक्ति-यही जन जन इच्छा रूपी माया प्रदान करती है और उसे स्वत्व मिलता है। यही माया बंधन तोड़कर , छोड़कर जब आत्मतत्व अपना स्वत्त्व खोकर , अहं भाव त्यागकर , अस्तित्वहीन हो जाता है तो पुनः माया से अलिप्त होकर , प्रकृतिस्थ , जड़ भाव , ईश्वरोन्लय हो जाता है। यह मुक्ति है। मुक्ति और अस्तित्व के बीच यह अनवरत चलने वाला द्वंद्व , जीव की जीवन यात्रा है, जीवन है, मुक्ति पथ है।


यदि अस्तित्व ही न हो तो मुक्ति कैसे प्राप्त होगी ? अतः आपको अपना अस्तित्व तो स्थापित करना ही होता है। इसके लिए आवश्यक है जन जन से जुड़ना। यह जुड़ाव सामाजिक अवधारणा का बीज रूप है। समाज है तो व्यक्ति का अस्तित्व है। सिद्धि-प्रसिद्धि , सामाजिक उपलब्धियां , धर्म, अर्थ, काम सभी व्यक्ति के अस्तित्व के लिए हैं और यही मोक्ष के द्वार हैं। उपलब्धियां कर्म से ही प्राप्त होती हैं अतः कर्म ही मोक्ष का वास्तविक द्वार है। सत्कर्म, निष्काम कर्म , सिद्धियों के मोह अहं से पथ भ्रष्ट न होकर कर्तव्य पथ पर चलते जाना ही वास्तविक कर्म है। यही मुक्ति-पथ है। मुझे चलना ही है। आशीर्वाद दें।


पत्र -दो ----
नीरा, आशीर्वाद;
बेटी , तुम बेटी जैसी ही हो। मैं जानता हूँ तुम चाहती हो उसे। मैं जानता हूँ तुम उस माहौल से बाहर आना चाहती हो। स्वच्छंद स्वतंत्र आकाश में उड़ना चाहती हो। हम तो हैं ही मुक्ति राह के, नारी स्वतन्त्रता के झंडावरदार। तुम में मैं अपने मन की इच्छा की प्रतिच्छाया , नारी मुक्ति की बात ही देखता हूँ। मैं अवश्य तुम्हारी मुक्ति-सेतु की नींव बनूंगा। वर्षों पहले जो नारी उत्थान के बहाने समाज कल्याण का दुष्कर मार्ग मैंने घर फूंक कलाप से अपनाया था उसे अवश्य ही आगे बढ़ाऊंगा। मेरा आशीर्वाद व शुभकामनाएं हैं तुम्हारे साथ। पर इस पथ पर कमर कस कर चलना होगा। संघर्ष को दृढ़ता से जीतना होगा। दुर्बलता के क्षणों में धैर्य बनाए रखना होगा , वही सफलता दिलाएगा। मैं हूँ न तुम्हारे साथ , मैं आऊँगा लौटकर अवश्य , तुम्हारी सफलता का साक्षी बनने। पूर्णाहुति के लिए।


पत्र -तीन -----
नीरज ,
आशीर्वाद। बेटे तुम कुछ नया करना चाहते हो। नीति -रीति के नए अंदाज़ से मुझे चौंकाना चाहते हो। पुत्र का पिता से प्रतिद्वंद्विता का भाव होता है। तुम , हम भी कुछ हैं , यह जमाने को बताना चाहते हो। नीति-रीति की संकीर्णता तोड़कर समाज में विचार वैविध्य व उन्नन्ति के सोपानों की एक सीढ़ी अंतरजातीय विवाह भी है। प्रसन्न ही हूँ , चाहे चौंकाने के भाव से ही सही , मेरे भाव को ही तुम आगे बढाओगे। मैं तो कलम का सिपाही हूँ। चाहे कलम हो या कूंची-ब्रुश या चाकू -- सर्जना मेरा कर्म है, धर्म है। आशीर्वाद है।


लगभग ३५ वर्ष पहले जब मैंने सामाजिक व्यवस्था के अनुसार विवाह किया था तो वह बहुत सी व्यक्तिगत, सामाजिक , आर्थिक लालसाओं व आकर्षणों को त्याग कर , समाज में नारी को उन्नंत दिशा प्रदान करके भावी पीढ़ी को आगे दिशा निर्देश का प्रयास भर था। अब लगता है उसका परिणामी रूप सम्मुख आ रहा है। मैं साथ हूँ। मैं आऊँगा तुम्हारी सफलता का एक पृष्ठ लिखने।


बेटे ! तुम कहते हो कि आपको किसी बात से कोई फर्क ही नहीं पड़ता। आपके लिए तो "आउट आफ साईट आउट आफ माइंड"। कविता से दुनिया नहीं चलती आदि। इसका अर्थ है कि मैं तुम्हारे किये कार्यों व उपलब्धियों की , नए नए कलापों की तुम्हारी माँ की भांति अत्यधिक प्रशंसा नहीं करता। पुत्र की उपलब्धियों पर अत्यधिक उत्सुकता , एक्साईटमेंट प्रदर्शित नहीं करता। सच है। हाँ, मैं ऐसा ही हूँ। आज तुम्हारे कथन से मुझे लगता है कि शायद मैं अपने जीवन के लक्ष्य की ओर वास्तव में उन्मुख हूँ। भेदा-भेद, फलाफल से परे , ज्ञान अज्ञान से परे , गुणातीत अवस्था की ओर , मुक्ति की ओर। धन्यवाद , आनंदित हूँ। और बेटे ! कवि का अर्थ क्रान्तिदर्शी होता है, आत्मदर्शी। समदर्शी, कवि, मनीषी, स्वयंभू, परिभू -ईश्वर के गुण हैं। ईश्वर ने ही सारा संसार , माया जगत बनाया है , रचाया सजाया है। यह कैसे हो सकता है कि कवि, दुनिया-जगत को न जाने , न पहचाने। हाँ यह हो सकता है कि वह उसमें रमे नहीं। सिर्फ माया जगत उसका लक्ष्य न हो। सिद्धियाँ प्राप्ति के बाद त्यागकर , मुक्ति पथ उसका लक्ष्य हो।


तुम कहते हो कि आप स्वयं कोई निर्णय नहीं लेते,ताकि जवाब-देही न करनी पड़े। हो सकता है यह सत्य हो ; पर किसी भी प्रभावशाली, दूरगामी व अंतिम निर्णयों से पहले पक्की तौर पर जांच आवश्यक है। अतः मुखिया को सर्वदा अन्य व मातहतों को ही निर्णय लेने देना चाहिए। क्योंकि दूर से देखने पर कमियों व भूलों का ज्ञान सरलता से होता है। स्वयं कार्य करते समय , कार्य सदैव सही लगते हैं। हाँ तुरंत व हानिकारक होने वाले क्रिया-कलापों पर तो मैं तुरंत वीटो-पावर ( विशेषाधिकार ) से निर्णय लेता हूँ। यह सत्य ही लोकरंजक व एकतान्त्रिक के साथ लोकतांत्रिक व्यवस्था है।


पत्र चार ---
दक्षा ,
बेटी तुम दहेज़ के नाम पर तीव्र प्रतिक्रिया करती हो। नारी-नर समानता व नारी की महानता पर गौरवान्वित हो। कभी कभी शादी-विवाह के विपरीत विचार भी व्यक्त करती हो। तुम कहती हो कि ( जब कभी नाराज होकर झगड़ा करती हो तो ) अब आप पिता की तरह सोच रहे हैं। अच्छा लगता है; तुम मेरी ही प्रतिकृति हो इस स्थान पर। यदि पुत्र , पिता की ज्ञान कृति है तो पुत्री भाव कृति। पर बेटी, पुरुष अर्थात प्रकृति के सामान्य अर्ध-भाव को ठुकराने या दबाकर पूर्ण-काम कैसे हुआ जा सकता है ? यह ठीक उसी तरह है जैसे प्रकृति की सुकुमार कृति नारी को ठुकराने या पुरुष अहं-भाव से दबाकर कोई भी पुरुष पूर्ण-काम नहीं हो सकता। सम्पूर्ण नहीं हो सकता। हिन्दू देवों -राधा-कृष्ण ,शिव-पार्वती, सीता-राम आदि के युगल रूप होने का यही अर्थ है। हमें साध्य से नहीं साधनों से होशियार रहना चाहिए। साधन ही उचित-अनुचित, सही-गलत होते हैं। साध्य तो लक्ष्य ही होता है ,गलत या सही नहीं। हाँ, यदि वह साध्य शास्त्रोचित , परमार्थ भाव युक्त है तो , और अहंकार भाव से ग्रसित नहीं है। अपनी इच्छा भाव से उचित चुनाव करो , मैं तो साथ हूँ ही। शेष स्वयं सब कुछ सोच विचार कर , न कि इच्छाभाव में बहकर व सांसारिक चकाचौंध से ग्रसित व मोहित होकर। आशीर्वाद है।


पत्र पांच ----
सुप्रिया,
तुम कहती हो कि तुम बहुत भोले हो। बात करना नहीं आता। बुद्धू हो। घर- गृहस्थी से मतलब नहीं रखते। कुछ नहीं समझते। छोटी-छोटी बात पर झल्लाते हो , छोटी छोटी गलतियों पर गुस्सा होते हो। रूठने पर कभी मनाते नहीं। वक्त पर जरूरी काम याद आते नहीं। प्रिया ! पूर्णकाम कौन हो पाया है ? मानव मन भूलों की गठरी है, अधभरी गगरी है , खामियों की नगरी है। पर सोचो, समझो ,बताओ कि जीवन की डगर पर जीवन-सुख में कहीं तुम्हें कमी आखरी ? या किसी भी त्रुटि पर , कमी पर या हानि-क्षति पर कभी मुझे क्रोध आया? अन्य लोग तो कहते हैं कि मुझे क्रोध आता ही नहीं। छोटी छोटी कमियों या त्रुटियों पर गुस्सा , सुधारने की कोशिस का फ़साना है। ये सुधर सकतीं हैं यह कहने का बहाना है। गुस्सा अपनों पर ही आता है , गैरों पर नहीं। मैं अवश्य आऊँगा। पर कब ......?


पत्र छः ---
सुमि,
तुम कहती हो, तुम पूर्ण-काम हो, राधा के श्याम। राधा का श्याम होना , पूर्णकाम होना , व्यक्ति को जग से ऊपर उठा देता है। सारे जग से समभाव प्रेम करना सिखा देता है। वह राधा का श्याम तो हो जाता है, योगेश्वर ! तो बन जाता है पर गोकुल का कान्हा कहाँ रह पाता है ? राधारानी का कन्हैया कहाँ रह जाता है, उसे माया रूपी पटरानियों का स्वामी, पति या दास बन जाना पड़ता है। वह वृन्दावन बिहारी नहीं रहता, चक्र सुदर्शन धारी हो जाता है। कृष्ण मुरारी होना पड़ता है। वह राधा प्यारी के रूप रस भाव पर मुग्ध, मन ही मन मुस्काता है, गीत गाता है , हरषता -तरसता तो है , पर वो प्रीति कहाँ पाता है? राधा का कहाँ हो पाता है ? समझी न ......।


पत्र सात ---
श्री प्रकाश ,
तुम कहते हो कि तुम तो कलियुग के कृष्ण हो , पर विज्ञान के छात्र व आधुनिक चिकित्सा शास्त्री होने पर भी ईश्वर भक्ति व ज्ञान-अज्ञान की बातें कैसे कर लेते हो ? हाँ भई ! सच है , मैं अति आधुनिक विचार वादी , अत्यंत उदार वादी, तार्किक, न्याय वादी , कभी पूजा न करने वाला, कठोर अनुशासन वादी, रूढ़ियाँ व लीक छोड़कर चलने वाला, होते हुए भी ईश्वर में आस्था रखता हूँ। हाँ , मैं समरसता में जीवन व्यतीत करना व अधिक झंझट में न पड़ने वाला व्यक्ति हूँ। परन्तु यदि बात मेरे देश, समाज, संस्कृति व मानवता की है तो मैं किसी भी हद तक जा सकता हूँ। कभी भी , किसी के भी साथ। हाँ , सच ही मैं श्री कृष्ण का प्रशंसक,उपासक, साधक हूँ , इस भाव में भक्त हूँ। तुम जानते हो कि भक्ति की चरम अवस्था में भक्त- भगवन्लय हो जाता है। जैसा कि वेदान्त कहता है कि आत्मा अपने चरम ज्ञान के उत्कर्ष में ज्ञान और ज्ञाता का भेद मिटा कर परमात्म लीन हो जाती है , तदाकार, तदनुरूप हो जाती है, द्वैत अद्वैत में लय हो जाता है। जीव स्वयं परमात्मा हो जाता है। मैं अभी उस राह पर चलने को प्रयत्न शील हूँ।
" जल में कुंभ कुम्भ में जल है , बाहर भीतर पानी।
टूटा कुम्भ जल जलहि समाना, यह तथ कथ्यों गियानी।।"
परिणाम तो वही जानता है।


तो हे कलियुग के श्री दामा ! हे ऊधो ! श्री प्रकाश जी , कहीं तुम गोपियों को सबक पढ़ाने मत पहुँच जाना। कहीं मेरा राग भाव उन पर व्यक्त मत कर देना। अब इस स्तर पर कहीं वे सब मिलकर भ्रमर-गीत में ताने देने लगीं तो मुश्किल होगी। जो जहां है वहीं ठीक है। मैं तो वैसे भी तुम्हारे अनुसार कृष्ण भाव हूँ -राग-विराग से परे। पत्रोत्तर की आवश्यकता ही नहीं है। शेष मिलने पर।

---
------डा श्याम गुप्त , के-३४८, आशियाना , लखनऊ -२२६०१२.

गुरुवार, 14 अक्टूबर 2010

डा श्याम गुप्त की ग़ज़ल......क्या होगा...

मन में द्वंद्व भरे क्या होगा।
होगा ना होगा क्या होगा ।

दो नावों की करे सवारी,
डूब न जाए तो क्या होगा।

मैं तू मेरा-तेरा मत कर,
कोई न तेरा तो क्या होगा।

दर्द किसी का बाँट सका ना,
दर्दे-दिल होगा क्या होगा।

अपना पराया भूल प्रीति कर,
इससे सुन्दर जग क्या होगा।

यह वह मैं तू उसी ईश के,
तेरा मेरा किये क्या होगा।

वैर-द्वेष की निद्रा त्यागे,
इससे सुखद भोर क्या होगा ।

चलन हो जग में रीति-प्रीति का,
सोच न होगा 'श्याम, क्या होगा ॥

सोमवार, 11 अक्टूबर 2010

’वफदारेी का लाइसेन्स है करवा चौथ '......

अखिल भारतीय जनवादी महिला समिति के सेमीनार -'वर्चस्व की संस्कृति और महिलायें ' में मैत्रेयी पुष्पा , मधु गर्ग आदि स्वघोषित तथाकथित महान महिलाओं द्वारा कुछ अविचारशील बातें कही गयी |
.’वफदारेी का लाइसेन्स है करवा चौथ '. हर साल नवीनीकरण कराना पड़ता है |---
-----क्या मैत्रेयी समझती हैं कि करवा चौथ व्रत वफादारी के लिए रखा जाता है ? वह तो सिर्फ पति की लम्बी आयु के लिए होता है, ताकि पत्नी सदा सुहागिन रहे और पति की पहले मृत्यु होजाने पर वे तमाम सुखों से बंचित न हों । जिन्हें उस व्रत के उद्देश्य का ही ज्ञान नहीं उसके बारे में उनके कथन का क्या महत्त्व ? फिर क्या मैत्रेयी बताएंगी कि करवा चौथ व्रत रखने से वफादारी कैसे सिद्ध होगी, क्या करवा चौथ व्रत रखकर भी स्त्री / पत्नी वेवफा रहे तो किसी को क्या पता चलेगा , कोई क्या कर लेगा, होता भी है एसा ।

. लड़कियां घरों से बाहर निकलकर भी पुरुषों के बीच बंधी हुई हैं , चिड़िया की तरह आज़ाद नहीं । ----
--------क्या ये महान महिलायें चाहती हैं कि महिलायें सिर्फ महिलाओं से बंधकर , उनके साथ ही कार्य करें , कार्य स्थलों से पुरुषों को हटा दिया जाय , सिर्फ महिलाएं ही रहें ; या घरों से भी पुरुषों को हटा दिया जाय , महिला-राज्य, महिला देश स्थापित किया जाय ?----क्या ये देख कर आयी हैं कि चिड़ियाँ -चिरौटों के बिना रहतीं हैं , आकाश में अकेली उड़ती हैं | कैसे कैसे मूर्खतापूर्ण विचार -कथन एसे लोगों के दिमाग में आते हैं । भाई --अगर गाडी चलानी है तो एक पहिये से कैसे चलेगी , सोचें -विचारें , तब कहें । " अति सर्वत्र वर्ज्ययेत । "
----इतिहास में स्त्री देश का भी ज़िक्र है जहां के अत्याचार एक राजकुमार ने ही जाकर बंद कराये थे | गुरु मत्स्येन्द्र नाथ को भी स्त्री देश से गुरु गोरखनाथ ने आज़ाद कराया था ।
----यदि स्त्री को अपना अलग संसार ही रखना है जहां सब कुछ स्त्रियों का ही हो तो फिर वही भारतीय परम्परा क्या बुरी है जहां महिलायें --महिलाओं में ही उठती बैठती हैं , महिलाओं से ही दोस्ती , नाच-गान , अपना अलग संसार होता है जहां पुरुषों , पुरुष-मित्रों-दोस्तों आदि का कोई दखल-मतलब नहीं होता ।
३- वर्चस्व की संस्कृति-----आखिर वर्चस्व की बात ही क्यों हो , किसी का भी वर्चस्व क्यों हो , युक्ति-युक्त पूर्ण तथ्यों की बात क्यों न हो , नकिसी का वर्चस्व न, किसी का अधिकार हनन अन्यथा फिर पुरुषों द्वारा वर्चस्व हनन की बात उठेगी |

------- एसे व्यर्थ के अतिवादी , अविचारशील, अवैज्ञानिक कथनों व कृत्यों से ही कोई भी अच्छा भाव/ विचार / कार्य आकार लेने से पहले ही विनष्ट होजाता है | इनसे महिलाओं व समाज की हानि हो रही है ।
-----बस्तुतः यह कोई स्त्री-पुरुष का झगड़ा नहीं है अपितु अच्छे -बुरे मानव , मानवीयता , आचरण -शुचिता , चरित्र के अवनति की बात है जिसकी हर जगह बात होनी चाहिए ।

रविवार, 10 अक्टूबर 2010

चार समाचार बिंदु---चार प्रश्न ---डा श्याम गुप्त .....

आज के कुछ मूल समाचारों में चार बिन्दुओं पर हम चर्चा करेंगे------

.अब सुलह सफाई कर रहे हासिम चाचा --हि हि --आखिर तब से हाशिम चाचा क्या कर रहे थे ? क्यों नहीं अब तक यह कार्य किया , शायद काफी उम्मीदों केयथार्थ भ्रम में थे |

.अयोध्या आज क्यों नहीं जगाती ---शशि शेखर हि हि --वे न जाने क्या क्या सोवियत संघ , बर्लिन की दीवार आदि का हवाला देकर अयोध्या को स्वयं निर्णायक बनने की बात कहते हैं ----क्यों जी क्यों ? क्या सिर्फ अयोध्या बासी ही राम के भक्त हैं , राम सारे हिन्दुस्तान के हैं सारे भारत का उन पर हक़ है , उनके जन्म स्थान के बारे में जानने , राय देने का हक़ है| दुनिया भर के हिन्दुओं/ भारतीयों को राय देने का हक़ है | अधिकतर धार्मिक स्थानों पर यह ही देखा गया है कि स्थानीय लोग अपने दैनिक स्वार्थ के कारण वहां स्थित देवीय स्थानों आदि पर कोई ध्यान नहीं देते , साफ़ सफाई , उन्नयन पर कोई कार्य नहीं करते |उनके बारे में समुचित ज्ञान भी उन्हें नहीं होता | बाहर से आये लोग उनके बारे में अधिक जानते हैं , वे या सरकार ही इन सबका ध्यान रखते हैं एवं आर्थिक मदद करते हैं|
------ लोग भूल जाते हैं कि सोवियत संघ या बर्लिन दीवार --राजनैतिक मसले हैं , क्रूरता, अमानवीयता के जबकि अयोध्या मसला धार्मिक मानवीय आस्था, संस्कृति का मसला है आपस में कोई तुलना नहीं |
--- लेखक जब वहां गए तो कुछ रामनामी ओढ़े युवक नारे लगारहे थे तो पुलिस ने उन्हें रोका नहीं --क्यों जी क्याउन्हें शान्ति से नारे लगाने का भी अधिकार नहीं है क्योंकि वे रामनामी ओढ़े हैं ? एक अदद फेक्ट्री का मज़दूर सिर्फ अपनी तनखा व सुविधा के लिए चिल्ला सकता है | वाह! क्या जनतंत्र है आपका |

.जिनके हौसले ने लिखी तकदीर----विदेशी यहाँ आकर अपने लोगों का अपमान करते रहें क्यों कि ये ब्रिटेन के गुलाम राष्ट्रमंडल देशों के खेल हैं | आप व्यर्थ के हौसलों ---वेट लिफ्टरों , धावकों , कूदने वालों के पदकों पर तकदीर बनाने की बात कहते रहें ----क्या इन सबसे उनकी तकदीर बन रही है , क्या उन्हें कुलीगीरी करनी है वज़न उठा कर, या मंजिलों से कूदने - दौड़ने का धंधा करना है जो तकदीर बना गयी | अरे तकदीर फूट रही है कि वे जिसप्रतिभा को किसी अच्छे काम धंधे , सामाजिक-वैज्ञानिक कार्य में लगाने की बजाय मूर्खता पूर्ण कार्य में जिन्दगी खराब कर रहे हैं |
- आनर-डिस आनर किलिंग -सांझी दुनिया की गोष्ठी --वाह क्या गोष्ठी है अंग्रेज़ी में सोचने- बोलने-लिखने -समझने वालों की ---अजी क्यों ? क्यों , देश के कितने युवा ( बड़े शहरों के अंग्रेज़ी पढ़े युवा के अलावा ) इन दोनों शब्दों का अर्थ समझते होंगे , जिनके लिए यह सन्देश है | क्योंकि मूलतः पिछड़े , ग्रामीण इलाकों में इस सन्देश की अधिक आवश्यकता है| इसे कहते है कि अज्ञान के कारण किसी अच्छे अभिप्रा: का भी कबाड़ा कर देना

गुरुवार, 7 अक्टूबर 2010

साहित्य- समाज में कथ्यों -तथ्यों की अनदेखी.....


---अभी मेरी नज़र एक ब्लोग पर ,एक कहानी पर पडी , आप भी सुनिये---

""उस दिन अपनी एक डॉक्टर मित्र संजना के यहाँ किसी काम से गयी थी ! संजना अपने क्लीनिक में मरीजों को देख रही थी ! मुझे हाथ के संकेत से अपने पास ही बैठा लिया ! सामने की दोनों कुर्सियों पर एक अति क्षीणकाय और जर्जर लगभग ८० वर्ष के आस पास की वृद्ध महिला और एक नौजवान लड़की, लगभग १६ -१७ साल की, बैठी हुईं थीं ! वृद्धा की आँखों पर मोटा चश्मा चढ़ा हुआ था ! कदाचित वह अपनी पोती के साथ अपनी किसी तकलीफ के निदान के लिये संजना के पास आई थीं ! संजना ने उनकी सारी बातें ध्यान से सुनीं और प्रिस्क्रिप्शन लिखने के लिये पेन उठाया ! आगे का वार्तालाप जो हुआ उसे आप भी सुनिए –
संजना - अम्मा जी अपना नाम बताइये !
पोती - आंटी ज़रा जोर से बोलिए दादी ऊँचा सुनती हैं !
संजना - अम्मा जी आपका नाम क्या है ?
पोती - दादी आंटी आपका नाम पूछ रही हैं !
दादी - नाम ? मेरो नाम का है ? मोए तो खुद ना पतो !
संजना – तुम ही बता दो उन्हें याद नहीं आ रहा है तो !
पोती – आंटी दादी का नाम तो मुझे भी नहीं पता ! हम तो बस दादी ही बुलाते हैं ! ""


------मैने अपने ६० वर्ष में गावं से लेकर महानगर तक आज तक कोई एसी ब्रद्ध , युवा, प्रौढ महिला नहीं देखी जो अपना नाम नही जानती हो, अपितु इस स्थिति में वे खुशी-खुशी अपना नाम बताती है कि चलो किसी ने तो हमारा नाम पूछा । जो भी ८० वर्ष का व्यक्ति होता है वह अपना नाम भी ’ याददास्त कमजोरी "; जो विभिन्न कारणों से होती है; के कारण भूल सकता है, या बेटे-बेटियों के मां- बाप होने पर कोई भी छोटा-बडा उनका नाम नहीं लेता। यह सिर्फ़ एक कहानी है पर क्यों ?
-----अन्य बात यह है कि आज की युवती ( आन्टी कहने वाली पोती-चाहे ग्रामीण ही सही इतनी अपढ/मूर्ख नहीं होती ) भी इतनी असंवेदन शील ,अन कन्सेर्न्ड व अग्यानी है कि कभी अपनी दादी का नाम ग्यात करने की आवश्यकता नहीं हुई।
----और " व्हाट इज़ इन द नेम"--- पति द्वारा नाम पुकारा जाकर आज कल की स्त्रियां क्या हासिल करती हैं, नाम महत्वपूर्ण है या प्रेम , ज़िन्दगी , स्त्रियों का नाम पुरुषों ( घर की बडी स्त्रियों द्वारा भी ) न लेने का भाव यह है कि हर कोई एरा-गेरा उनका नाम जानकर अनुचित क्रिया-कलाप न कर पाये ।बेटियों का नाम भी वास्तविक नाम कौन लेता था, छोटा या प्यार का नाम पुकारा जाता था। आज भी काफ़ी युवक- प्रेमिका व पत्नी का नाम की बजाय -डार्लिन्ग आदि कहना पसन्द करते हैं।

---साहित्य में आजकल यह कमी काफ़ी खल रही है कि हम सिर्फ़ कुछ कहने के लिये , कुछ सत्यों व वास्तविक तथ्यों को अनदेखा कर रहे हैं।

सभी राष्ट्रीय,राष्ट्रमंडल ,अन्तर्राष्ट्रीय व व्यवसायिक संस्थानों में खेल आयोजन बंद होने चाहिए.....डा श्याम गुप्त

----- वस्तुतः खेल हम क्यों खेलते हैं , मूलतः शारीरिक क्षमता वाले ---व्यायाम, स्वास्थ्य के लिए ; व मानसिक खेल मानसिक क्षमता के लिए , न कि प्रतियोगिता के लिए , कमाई के लिए, देश का नाम ऊंचा करने के लिए ( खेल से देश का क्या नाम ऊंचा होता है? अधिकतर तो बदनाम ही होता है; नाम ऊंचा तो प्रगति कारक कृतियों , वैज्ञानिक, सामाजिक उपलब्धियों से होता है |) खेल आदि सिर्फ स्कूल- कालेज स्तर पर होकर वहीं समाप्त होजाने चाहिए |आगे जीवन में खेलों का क्या काम ? सभी व्यवसायिक संस्थानों आदि में खेल कोटा - नौकरी , भव्य खेल आयोजनों को बंद करा देना चाहिए |
---- इतिहास गवाह है जब भी खेल, मनोरंजन आदि को व्यवसायिक-भाव, प्रतियोगिता-भाव, कमाई, धंधा से देखा गया , राष्ट्र व समाज-संस्कृति का विनाश ही हुआ है |हमारे शास्त्रों में स्पष्ट निर्देश है कि मनोरंजन व्यवसाय नहीं बनना चाहिए |( खेल गाँव में दिन में ६००० कंडोम समाप्त होगये ....क्यों , खेलने आते हैं या कंडोम प्रयोग करने , कौन करता है , क्यों ,किस पर, किस प्रयोजन के लिए , खिलाड़ियों व अधिकारियों के एस्कोर्ट के लिए लड़कियां ही क्यों ...पुरुष क्यों नहीं ????)|
रोम के विनाश में ओलम्पिक आदि खेलों का महत्वपूर्ण योगदान था, अति-खेल प्रियता, प्रतियोगिता -व्यर्थ की अप-संस्कृति, भ्रष्टाचार, भ्रष्ट -आचरण ,राजनीतीकरण , राजनैतिक अपराधीकरण व व्यक्तिगत -सामाजिक कुटिलता को जन्म देती है | 'जबरोम जलरहा था तो नीरो बांसुरी बजारहा था '- -कूट वाक्य का अर्थ यही है कि स्वयम शासक व जनता, अधिकारी सभी मनो-विनोद , आमोद-प्रमोद में , खेल-कूद आदि में मगन थे; शासकीय , सामाजिक , नैतिक कार्यों से विमुख होगये थे | कितने आपराधिक -कार्य , कहानियां , कथाएं व जघन्य क्रिया -कलाप जुड़े हैं रोमन-खेलों से किसी से छिपा नहीं है | और आज भी |
-----हमारे यहाँ गाँवों , कस्बों में सदा से ही ये खेल -कूद आदि होते रहे हैं परन्तु सिर्फ मेलों -सामाजिक उत्सवों आदि में जब सभी इनमें सहज रूप से भाग लेते हैं , कहीं कोई धंधे -पैसे की बात नहीं | अलग से व्यवसाय बनाकर कमाई का जरिया नहीं | सभी वर्ष भर अपने सामान्य दैनिक कार्य में व्यस्त रहते हैं न कि झूठे विज्ञापन आदि की भ्रष्ट कमाई में , जो देश की अर्थ व्यवस्था के समान्तर एक अर्थ व्यवस्था पैदा करती है, और सामाजिक असंतुलन |

मंगलवार, 5 अक्टूबर 2010

अजनबी तुम भी थे अजनबी हम भी थे....डा श्याम गुप्त का गीत...

अजनबी तुम भी थे, अजनबी हम भी थे,
साथ चलते रहे अजनबी की तरह ।।

हम तो मुड़ मुड़ के राहों में देखा किये,
तुम भी देखोगे मुड़ सोचते ही रहे।
तुम ने देखा न हंसकर कभी इस तरफ,
यूं ही चलते रहे अजनबी की तरह॥

मैं तो सपनों में तुमको सजाता रहा,
तुम पुकारोगे मुझको मनाता रहा।
तुमने मुझको कभी यूं पुकारा नहीं,
स्वप्न से ही रहे अजनबी की तरह ॥

मैंने मंदिर में मस्जिद में सिज़दे किये,
साथ आकर कभी तुम भी सिज़दा करो।
तुम कभी पास आकर रुके ही नहीं ,
यूं ही चलते गए अजनबी की तरह॥

अपने गीतों में तुमको सजाते रहे,
छंद बनाकर तुम्ही मुस्कुराते रहे।
तुम कभी मन का संगीत बन कर मिलो,
यह मनाते रहे गुनगुनाते रहे ।

तुमने मेरा कोई गीत गाया नहीं ,
यूं ही सुनते रहे अजनबी से बने

कुछ कदम जो तेरे साथ हम चल लिए,
ज़िंदगी के कई रंग हम जीलिये।
मैं मनाता रहा तुम कभी यह कहो,
साथ मेरे चलो हर खुशी के लिए।

साथ चलने को तुमने कहा ही नहीं,
हम भी चलते गए अजनबी से बने ॥