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डा श्याम गुप्त का ब्लोग...

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Lucknow, UP, India
एक चिकित्सक, शल्य-चिकित्सक जो हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान व उसकी संस्कृति-सभ्यता के पुनुरुत्थान व समुत्थान को समर्पित है व हिन्दी एवम हिन्दी साहित्य की शुद्धता, सरलता, जन-सम्प्रेषणीयता के साथ कविता को जन-जन के निकट व जन को कविता के निकट लाने को ध्येयबद्ध है क्योंकि साहित्य ही व्यक्ति, समाज, देश राष्ट्र को तथा मानवता को सही राह दिखाने में समर्थ है, आज विश्व के समस्त द्वन्द्वों का मूल कारण मनुष्य का साहित्य से दूर होजाना ही है.... मेरी तेरह पुस्तकें प्रकाशित हैं... काव्य-दूत,काव्य-मुक्तामृत,;काव्य-निर्झरिणी, सृष्टि ( on creation of earth, life and god),प्रेम-महाकाव्य ,on various forms of love as whole. शूर्पणखा काव्य उपन्यास, इन्द्रधनुष उपन्यास एवं अगीत साहित्य दर्पण (-अगीत विधा का छंद-विधान ), ब्रज बांसुरी ( ब्रज भाषा काव्य संग्रह), कुछ शायरी की बात होजाए ( ग़ज़ल, नज़्म, कतए , रुबाई, शेर का संग्रह), अगीत त्रयी ( अगीत विधा के तीन महारथी ), तुम तुम और तुम ( श्रृगार व प्रेम गीत संग्रह ), ईशोपनिषद का काव्यभावानुवाद .. my blogs-- 1.the world of my thoughts श्याम स्मृति... 2.drsbg.wordpres.com, 3.साहित्य श्याम 4.विजानाति-विजानाति-विज्ञान ५ हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान ६ अगीतायन ७ छिद्रान्वेषी ---फेसबुक -डाश्याम गुप्त

शनिवार, 14 जनवरी 2012

हिन्दी-ब्लोगिन्ग… एक विहंगम द्रष्टि….डा श्याम गुप्त

                               ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ..

                 ब्लोगिन्ग या चिट्ठाकशी..चिट्ठाकारी …चिट्ठालेखन अर्थात इन्टर्नेट पर लेखन -- एतिहासिक पृष्ठभूमि के द्रष्टिकोण से १९९७ के आस-पास प्रारम्भ हुआ । भारत में हिन्दी-ब्लोगिन्ग का २००८ से त्वरित गति से आरम्भ हुआ, साथ ही साथ स्थानीय भाषाओं में भी इसका प्रसार होने लगा। भारत जैसे विशाल देश एवं हिन्दी व स्थानीय भाषाओं में ब्लोग्गिन्ग प्रारम्भ होने के कारण यह विधा तेजी से फ़ैली। और आज हिन्दी ब्लोगिन्ग विश्व के पटल पर अपना प्रभुत्व स्थापित कर चुकी है ।

        ब्लोगिन्ग का मूल उद्देश्य लेखक द्वारा अपने मूल व स्वतन्त्र विचारों को बिना सम्पादन व सन्शोधन के समाज व विश्व के सम्मुख प्रस्तुत करना था । यह ठीक उसी प्रकार था जैसे साहित्य में सामयिक ठेकेदारी, गुटबाज़ी, विशिष्ट वर्ग व समूह-संस्कृति को ठुकराकर ..निराला, महादेवी, प्रसाद जैसे महान स्वतन्त्र लेखक-विचारक-विद्वान साहित्यकारों ने साहित्यिक ठेकेदारों को ठेंगा दिखाकर अपनी कृतियों में बिना किसी से भी भूमिका आदि लिखाये, भूमिका के स्थान पर स्वयं ही बडे-बडे विचारपूर्ण तथ्यात्मक आत्मकथन लिखने की परम्परा डाली। ये साहित्य-जगत व हिन्दी-जगत के प्रथम ब्लोग थे जो प्रिन्ट-मीडिया में लिखे गये।
       परन्तु ब्लोगिन्ग में भी विभिन्न भटकाव आरहे हैं, विज्ञापन, ज्योतिषी लोग व अन्य सन्स्थाएं, विभिन्न साइट्स, पोर्न-विज्ञापन व साइट्स आदि धन्धेबाज़ों के कारनामे इस विधा को भी बद्नाम करने में कोई कसर नहीं छोड रहे।  जिससे साहित्य का स्तर भी निम्न होरहा है । कुछ लोगों ने यह भी कहना प्रारम्भ कर दिया है कि यह निठल्ले व अन्य स्थानों पर असफ़ल लोगों काम है । फ़िर भी हिन्दी- ब्लोगिन्ग एक विश्वव्यापी सक्षम, सशक्त व महत्वपूर्ण साहित्यिक व सामाजिक विधा बन कर आगे आई है ।
       महत्वपूर्ण विषयों व बिन्दुओं पर स्वतन्त्र चिन्तनपरक साहि्त्य, काव्य व आलेखों को बढावा, हिन्दी भाषा व साहित्य का उत्थान, देश-विदेश व सुदूर प्रदेशों में भी हिन्दी लेखन का प्रसार, संस्कृति, देशभक्ति, देश-प्रेम, राष्ट्रीयता का उत्थान व प्रसार, ज्ञान के भन्डार की अभिवृद्धि, विश्वभर से सम्बन्धों में अभिवृद्धि एवं ज्ञान का आदान-प्रदान आदि ब्लोगिन्ग के गुणात्मक पहलू हैं ।
        पहेलियां, प्रश्नोत्तरी जैसे निम्नस्तरीय साहित्य का पदार्पण,निशुल्क प्रकाशन सुविधा के होते अचानक बहुत से कवि व साहित्यकार, लेखक उत्पन्न होगये हैं |  उच्च स्तरीय साहित्य एवं गुणवत्ता वाले विषयों की कमी, ब्लोगरों द्वारा भाई बहन बाप गुरु आदि आपसी रिश्ते व वर्ग-समूह बनाना, गूगल व अन्य साइट्स आदि पर उपस्थित अधकचरे ज्ञान के आधार पर लिखे गये घिसे-पिटे आलेख, एवं पोस्टों की पुस्तकें छपबाने का धन्धा, मौलिक उच्चकोटि के आलेखों का अभाव…जो कि ब्लोगिन्ग का मूल उद्देश्य था..आदि ब्लोगिन्ग के मूल ऋणात्मक पहलू हैं। जो संस्कृत की  एक  प्रसिद्द कहावत को सिद्ध करते हैं ---
      "उष्ट्राणाम लग्नवेलायाम,गर्दभा स्तुति पाठका |
      परस्पर प्रशंसन्ति,  अहो रूपमहो ध्वनि ||"
            यदयपि इसका मूल कारण यह है कि मध्यवय के, प्रौढ-वृद्ध -अनुभवी व विद्वान लोग अभी पुरानी पीढी के हैं एवं कम्प्यूटर की लगभग सभी आपरेशन-भाषा, कोड, आदि अन्ग्रेज़ी के हैं तथा उस पीढी के लोगों को कम्प्यूटर के सन्चालन का ज्ञान भी अधिकान्श नहीं है..वे नेटीज़न नहीं बन पाये हैं..। अतः मूलत: जो युवा व प्रौढ पीढी के हैं व दोनों भाषाओं के ज्ञाता हैं तथा कम्प्यूटर- नेट आदि से अच्छी तरह वाकिफ़ हैं वे ही ब्लोगिन्ग में हैं और वे स्वयं कम अनुभवी हैं और ज्ञान की कमी भी है।

         निशुल्क ब्लोगिन्ग एवं अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता का अनुचित लाभ उठाना भी ब्लोगिन्ग का एक नकारात्मक पहलू है। इसका लाभ उठाकर विभिन्न कम्यूनल साइट्स, व्यवसायिक साइट्स, असांस्कृतिक सन्स्थायें व व्यक्ति  अपने गुणगान व प्रसार-प्रचार  में रत हैं, क्योंकि भारत की जनसन्ख्या देखते हुए यदि ०.१ प्रतिशत लोग भी ब्लोगिन्ग करते या पढते हैं तो भारत अन्य विषय-वस्तुओं की भान्ति इसका भी बहुत बडा बाज़ार है।
         फ़िर भी हिन्दी-ब्लोगिन्ग ने एक महत्वपूर्ण बात तो सिद्ध की ही है कि आज भी मानव अपने मूल सन्स्कारी भाव …धर्म, अध्यात्म में रुचि से डिगा नहीं है जो दशावतार, हनुमान लीला, राम-सीता प्रकरण आदि पोस्टों पर सर्वाधिक—३००-५०० तक टिप्पणियां से प्रदर्शित होता है। जो समाज के लिए एक अच्छा व प्रेरक चिन्ह है | 
         यह भी देखा गया है  महिलाओं की प्रशन्सा में रुचि से भी कवि मानव-मन डिगा नहीं है जो किसी महिला कवयित्री या लेखिका के चार सामान्य पन्क्तियां भी लिख देने पर, युवा, प्रौढ़  व बूढ़े सभी ब्लोगरों का टिप्पणी हेतु लाइन लगा देना और ४०-८० तक टिप्पणियों  के  तुरत-फुरत आजाने से प्रदर्शित होता है।
         परन्तु यह सब तो हर विधा के साथ होता है। अभी तो हिन्दी ब्लोगिन्ग शीघ्रता से बढता हुआ एक होनहार बालक है, टोडलर है । जब वर्तमान पीढी अधिक अनुभवी, युवा व प्रौढ होगी तो यह विधा भी अधिक युवा व प्रौढ होगी। बालक युवा होकर सुपुत्र होगा या नहीं यह तो भविष्य के गर्भ में है; परन्तु आशा करनी चाहिये कि वह होनहार व सुपात्र होकर प्रगति-पथ पर बढे।
           ".. स जातो येन जातेन याति वंश समुन्नितम ||"

बुधवार, 11 जनवरी 2012

मेरे गीत सुरीले क्यों हैं... डा श्याम गुप्त....

                                                        ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ..           .


मेरे गीतों में आकर के तुम क्या बसे,
गीत का स्वर मधुर माधुरी होगया।
अक्षर अक्षर सरस आम्रमंजरि हुआ,
शब्द मधु की भरी गागरी होगया।

तुम जो ख्यालों में आकर समाने लगे,
गीत मेरे कमल दल से खिलने लगे।
मन के भावों में तुमने जो नर्तन किया,
गीत ब्रज की भगति- बावरी होगया।      ...मेरे गीतों में ..... ॥

प्रेम की भक्ति सरिता में होके मगन,
मेरे मन की गली तुम समाने लगे।
पन्ना पन्ना सजा प्रेम रसधार में,
गीत पावन हो मीरा का पद होगया।

भाव चितवन के मन की पहेली बने,
गीत कबीरा का निर्गुण सबद होगया।
तुमने छंदों में सज कर सराहा इन्हें ,
मधुपुरी की चतुर नागरी होगया।         .....मेरे गीतों में..... ॥

मस्त में तो यूहीं गीत गाता रहा,
तुम सजाते रहे,मुस्कुराते रहे।
गीत इठलाके तुम को बुलाने लगे,
मन लजीली कुसुम वल्लरी होगया।

तुम जो हंस हंस के मुझको बुलाते रहे,
दूर से छलना बन कर लुभाते रहे।
भाव भंवरा बने, गुनगुनाने लगे ,
गीत कालिका-नवल-पांखुरी होगया।       .....मेरे गीतों में... ॥

तुम ने कलियों से जब लीं चुरा शोखियाँ ,
बनके गज़रा कली खिलखिलाती रही।
पुष्प चुनकर जो आँचल में भरने चले ,
गीत पल्लव सुमन आंजुरी होगया ।

तेरे स्वर की मधु माधुरी मिल गयी,
गीत राधा की प्रिय बांसुरी होगया ।
भक्ति के भाव में तुमने अर्चन किया,
गीत कान्हा की प्रिय सांवरी होगया ।          .... मेरे गीतों में.... ॥

सोमवार, 9 जनवरी 2012

छिद्रान्वेषण... अकर्म..व अनैतिक कर्म...डा श्याम गुप्त...

--- इसे कहते हैं ..अकर्म ...
१.-------वाह ! वाह!  क्या बात है...क्या न्याय   है ..लोगों को तो ओढने को मुहैया नहीं है....दो गज कपड़ा ..जानवरों की मूर्तियों को पोलीथीन की ओढनी..?
----जिस तथ्य के , अनावश्यक खर्च, के कारण आलोचना  हुई उसी के कारण ,आज्ञा-पालन में वही तथ्य, अनावश्यक खर्च... .....क्या हम ..हमारी संस्थायें दूरंदेशी से कार्य कर रही हैं ......
---मुख्यमंत्री मायावती जी को आभारी होना चाहिए  कि इस प्रकार उन्हें और अधिक पब्लीसिटी मिलेगी, ढकी हुई मूर्ति देख कर और अधिक लोग पूछेंगे कि ये क्या है ...और जबाव मिलेगा...बसपा का हाथी ....बहुत खूब....
----क्या  चुनाव चिन्ह ’साइकल ’  का भी सडक पर, शहर में चलना /चलाना बन्द किया जायगा ...?

       २-  यदि आप  किक होने को तैयार  है, यदि आप  क्लिक होना चाहते हैं  तो आपको निश्चय ही... बटन खोलने होंगे ......                     

रविवार, 8 जनवरी 2012

लघु कथा....सीट....डा श्याम गुप्त....

                                         ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...

      'नहीं कोई सीट खाली नहीं है |'         
      'प्लीज़ सर,  बहुत आवश्यक काम है,  कंपनी में इंटरव्यू है, जाना तो है ही |'
       'अच्छा  सोफ्टवेयर कंपनी में इंटरव्यू है,  बड़ी  सेलेरी मिलेगी |  ठीक है मिल जायगी ....५०० लगेंगे |'
       'सर, अभी तो ज्वाइन करने जा रहे हैं, ५०० तो बहुत ज्यादा हैं, सेलेरी तो अगले महीने मिलेगी | अभी कहाँ '
      'अच्छा ठीक है ३०० में काम हो जायगा | ए सी ३ में  चले जाओ |'
                 एक्सप्रेस ट्रेन  के एसी कोच में टी टी ई व किसी  कंपनी में ज्वाइन करने जारहे प्रशांत के मध्य ये वार्तालाप होरहा था | 
                 सुनकर श्रीमती जी बोलीं , ' भला इस तरह की बातें सुनकर, करके, झेलकर ये बच्चे, नौकरी आदि प्रारम्भ करेंगे तो क्या दिशा क्या सन्देश मिलेगा उन्हें | वे भी यही करेंगे | ये क्या सिखा रहे हैं हम अपनी युवा पीढी को !'
           ' हर जगह यही तो होरहा है', रमेश जी  कहने लगे, 'ये लोग भी तो अपने ऊपरवालों को इसी प्रकार चढ़ावा देकर लम्बी गाडी में पोस्टिंग लेते हैं, तो वे भी यही करते हैं |'
              तभी प्रशांत व सुन्दरम की बातें सुनाई पडीं |  सुन्दरम ने पूछा, कहाँ ज्वाइन करने जारहे हो ?   प्रशांत चहक कर बोला, अरे मैं तो दो साल से सर्विस में हूँ |  वह तो बस यूंही टीटीई को वेवकूफ बनाया था |  ५०० की बजाय ३०० में ही काम बन गया न |


                 

गुरुवार, 5 जनवरी 2012

नव वर्ष में नव-नीति दोहा-एकादश --डा श्याम गुप्त..

                               ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...            

माँ तेरे ही चित्र पर नित-नित पुष्प चढ़ायं  |
मिश्री सी वाणी मिले, मंत्री पद मिलि जाय ||    


श्याम  खडा बाज़ार में, देखे सबका हाल,
चोर लुटेरे सब सुखी, सच्चा  है  बेहाल |


चाहे जो कुल जनमियाँ, करनी जो भी होय |
नेता-मंत्री पद मिला, मुझ सा भला न कोय ||

तेरा मेरा क्या करे,  मेरा  मेरा  जाप |
जो तू ही खुश ना रहे,तो क्या करिहै जाप ||


तुझ को कुछ भी ना मिले, सब कुछ मेरा होय |
इससे बढ़कर जगत में,  भली नीति क्या होय ||


चाहे करो प्रशंसा , करो प्रेम संवाद |
पर पानी की बाल्टी, भरना मेरे बाद ||


स्वारथ में ही छिपा है, अर्थ प्राप्ति का भेद |
परमारथ को भूलकर, परम-अर्थ को देख ||


घर को सेवै  सेविका, पत्नी  सेवै  अन्य |
छुट्टी लें तब मिलि सकें, सो पति-पत्नी धन्य  ||


निषिद चाकरी अब कहाँ, अब चाकर हर कोय |
इक दूजे को लूट कर, जन-जन हर्षित होय ||


भाँति-भाँति के रूप धरि, खड़े  मचाएं  शोर |
किसको हम सच्चा कहें, किसको कह दें चोर ||


कवि, बन पायं जो मसखरे, सकें रात भर गाय |
बजें तालियाँ ज्यों रहे, नट सरकस दिखलाय ||

मंगलवार, 3 जनवरी 2012

'सृजन' साहित्यिक व सांस्कृतिक संस्था, लखनऊ के तृतीय वार्षिकोत्सव पर.. पार्थो सेन द्वारा पढ़ा गया आलेख........सुषमा गुप्ता

                                           ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ. 

                              युवा रचनाकारों के संस्था ..'सृजन' साहित्यिक व सांस्कृतिक संस्था लखनऊ के तृतीय  वार्षिकोत्सव पर, समारोह  एवं अखिल भारतीय अगीत परिषद् के संयोजक श्री पार्थो सेन द्वारा पढ़ा गया आलेख....                    
                                           महाकवि  डा श्याम गुप्त : मेरी नज़र में ...
               सृजन साहित्यिक व सांस्कृतिक संस्था अपने तृतीय वार्षिकोत्सव पर सुप्रसिद्ध शल्य चिकित्सक एवं समान्तर रूप से साहित्य जगत के वरिष्ठ कवि, लेखक, कहानीकार , उपन्यासकार एवं समीक्षक डॉ श्याम गुप्त जी को 'सृजन साधना ' वरिष्ठ रचनाकार सम्मान से विभूषित करके गौरवान्वित है | यहाँ हम उनके व्यक्तित्व व कृतित्व पर चर्चा करेंगे |
                व्यक्तित्  व कृतित्व एक ही सिक्के के दो पहलू हैं | यहाँ यह कहना समीचीन होगा की कृतित्व ही व्यक्तित्व को ऊंचा करने में सहायक होता है | आज हम जिन्हें महापुरुष कहकर सम्मान करते हैं, उनके कर्मों ने ही उन्हें महान बनाया जो उनका व्यक्तित्व होगया |
                डॉ श्याम बाबू गुप्ता ....डा श्याम गुप्त जी.... ने  साहित्य जगत में विधिवत पदार्पण २००४ में अपनी प्रथम कृति ' काव्य दूत ' से किया | अब तक  उनकी छः पुस्तकें प्रकाशित होकर प्रशंसित हो चुकी हैं | आपका जन्म १० नवम्बर, १९४४ ई को, ग्राम मिढाकुर, जिला आगरा  में हुआ | आपके पिता श्री जगन्नाथ प्रसाद गुप्त व माता श्रीमती रामभेजी देवी, दोनों संस्कारित व धर्मपारायण थे, जिसका प्रभाव उनके जीवन एवं साहित्य में स्पष्ट रूप से झलकता है | आप चार भाई व बहन के मध्य पले व बढ़े |
                 साहित्य क्षेत्र में पदार्पण का भी कोइ कारण व संयोग हुआ करता है जहाँ से व्यक्ति शनै : शनै : उस क्षेत्र में अग्रसर होता है | एसा ही कुछ डॉ श्याम गुप्त के साथ हुआ, कक्षा आठ में विद्यार्थी  के रूप में इनके सहपाठी श्री राम कुमार अग्रवाल कवितायें लिखते थे व इन्हें दिखाते थे |यहीं से आपके ह्रदय में परिवर्तन आया और आप कलम के साधक बन गए | यह सत्य ही है की आप पहले साहित्य के क्षेत्र में आये, तत्पश्चात चिकित्सा जगत में | चूंकि शल्य-चिकित्सा आपकी आजीविका रही अतः आवश्यक था की वे उसका निर्वाह करते | अतः सन २००४ में सेवा निवृत्त होते ही उन्होंने अपनी प्रथम कृति 'काव्य दूत' को हम सबके समक्ष प्रस्तुत कर दिया | जो तुकांत व अतुकांत रचनाओं की विविधता लिए हुए काव्य संग्रह है जिसमें कवि मन के अंतर्द्वंद्व सामने आये हैं और इसे उन्होंने अपनी जीवन संगिनी को समर्पित किया है | एक अंश देखिये....

"मन के अंतर्द्वंद्व से ,
यह विचार उभर कर आया |
चेतना ने,
जीवन की कविता 
लिखने को सुझाया ||"
               दूसरी कृति 'काव्य निर्झरिणी ' २००५ में गेय  गीतों का संग्रह है | जिसमें नीति, शिक्षा,विज्ञान, धर्म, दर्शन,संस्कृति आदि सभी निहित हैं | सरल भाषा में रचित यह कृति माता-पिता को समर्पित है |....दो पंक्तियाँ यहाँ प्रस्तुत हैं....
" कविता वह है जो रहे , सुन्दर सरल सुबोध |
जन मानस को कर सके, हर्षित प्रखर प्रबोध  ||" 
                 तृतीय कृति  'काव्यमुक्तामृत '  २००५ में ही अतुकांत गीतों का संग्रह है | मूल रूप से रचनायें मर्यादा, नैतिकता व आचरण-शुचिता पर आधारित हैं , जिसे अपने अग्रज डा राम बाबू गुप्त को समर्पण किया गया है | कवि स्वयं कविता की समीक्षा करते हुए कहता है....
" कवि को भरना होता है ,
गागर में सागर,
तब कविता होजाती है मुक्त ,
छंद से, छंद भाव जाल से , और-
बन जाती है , मुक्त छंद कविता ||"
            आपकी चतुर्थ कृति एक नवीनता लिए हुए २००६ में  ' सृष्टि महाकाव्य -ईशत इच्छा या बिग बेंग "  के शीर्षक से प्रकाशित हुई | जिसमें प्रथम बार एक अमूर्त नायक सृष्टि व ब्रह्माण्ड के रचयिता ब्रह्म  या ईश्वर को नायकत्व का रूप देकर महाकाव्य की रचना हिन्दी साहित्य जगत को अगीत विधा में प्रस्तुत करना सराहनीय कार्य रहा | कृति अपनी पुत्री व दामाद को समर्पित है | एक उदाहरण देखें ...
" निज को जग को जानेंगे,
समता भाव तभी मानेंगे;
तब नर नर से करे समन्वय,
आपस के भावों का अन्वय ..|"
                २००७ में आपकी पांचवी कृति  गीति विधा महाकाव्य ' प्रेम काव्य' प्रकाशित हुई जो, अमूर्त भाव 'प्रेम' को नायक व नायिका बनाकर गीतों व छंदों में रचित है | कृति प्रेम की प्रेरणादायी राधाजी को समर्पित है | यह कृति बहुत चर्चित रही | एक उदाहरण देखें ---
" प्रेम के आधार हे मन!
मन तुम्हारा करूँ वंदन |"
             आपकी छटी पुस्तक . 'शूर्पणखा' अगीत विधा पर आधारित खंड काव्य है , जिसे कवि ने 'काव्य-उपन्यास' की संज्ञा देकर साहित्य जगत को एक नवीन सन्देश  दिया है | इसमें मानवीय अनाचार, आचरण, शुचिता, पुरुष व नारी समाज के साथ में धर्म पर भी चर्चा की गयी है | यह कृति कवि ने अपने पिता एवं राष्ट्रपिता महात्मा गांधीजी को समर्पित की है | एक उदाहरण प्रस्तुत है....
" विदुषी शिक्षित और  साक्षर ,
नारी ही आधार है सदा ,
हर समाज की नर जीवन की ..|"
                   इन सभी कृतियों की समीक्षाए कई प्रमुख दैनिक तथा साप्ताहिक समाचार पत्रों विशेष रूप से ,दैनिक जागरण' व 'अगीतायन'  में प्रकाशित हुईं |  कृतियों  के शीर्षक, सामग्री, विषय-वस्तु एक आदर्श स्थापित करते हैं |  नि:संदेह डा श्याम गुप्त  एक सिद्धहस्त कवि व महाकवि हैं |
                  इन कृतियों के साथ साथ वे इंटरनेट पर ब्लॉग लेखन से भी जुड़ गए | और ' प्रेम महाभारत '२०११प्रथम ..में ..निर्णायक  के रूप में  एवं महाभारत द्वितीय ' भ्रष्टाचार -वास्तविक दोषी कौन ' के प्रथम विजेता घोषित हुए | परिमार्जित हिन्दी के अतिरिक्त आपने बृज-भाषा  व अंग्रेज़ी भाषाओं में भी कवितायें लिखी हैं -- नीचे उदाहरण प्रस्तुत हैं---
"साँचु न्याय ब्रत नेमु धरम 
अब काहू कों न सुहावै  |
कारे धन की खूब कमाई ,
पाछे सब जग धावै ||"      तथा----

"There were darkness in the life,
And life was a great strife.
Someone brought the ray of hope,
And filled the heart with light . "
       
                 कविता के अध्याय  के पश्चात, संतुलित कहानीकार के रूप में भी आपका परिचय आवश्यक है |
मूलतः आप संतुलित व लघु कहानियां लिखते हैं | 'खरगोश के जोड़े की कहानी'- जो पर्यावरण पर आधारित है , 'विकृति की जड़'-जो माँ-बाप व बच्चों के संस्कार पर आधारित है , 'भव-चक्र'  जो वृद्धावस्था से सम्बंधित है ; आदि सराहनीय हैं |  आपसे साहित्य का कोइ अंग छूटा नहीं है | स्नेह प्रभा जी की रचना 'कर्मवीर ", श्रीमती मधु त्रिपाठी की रचना 'मधु माधुरी ' एवं  डा उषा गुप्ता जी की प्रसिद्ध  कृति " अमेरिकी प्रवासी भारतीय कवि ' की समीक्षाएं व संघात्मक समीक्षाएं  प्रशंसित हैं जो अन्य समीक्षकों को दिशा प्रदान करती हैं |  समय समय पर आप अन्य लेखकों, रचनाकारों की पुस्तकों में शुभाशंसायें भी देते है  जिसमें श्री अजित कुमार वर्मा की व्यंग्य लेखों का संग्रह ' मैं गधा हूँ ' उल्लेखनीय हैं |
                   डा श्याम गुप्त अब तक २२ छोटी- बड़ी कहानियां , ५० के लगभग आलेख व ६ प्रकाशित कृतियों के अतिरिक्त लगभग ८ अप्रकाशित कृतियाँ आपकी उपलब्धि के अंग हैं | आपको लखनऊ व देश के विभिन्न नगरों के  साहित्यिक मंचों से सम्मान भी  मिले हैं |  मासिक कवि-गोष्ठियों के माध्यम से आपकी लेखनी और प्रखर हुई है | आपकी साहित्यिक यात्रा इसी प्रकार गतिमान रहे इसी मंगलकामना के साथ मैं डा श्याम गुप्त जी को नमन करता हूँ |
                                                                               ---पार्थो सेन,  सी ,३०८७, राजाजी पुरम ,लखनऊ-17
                                                                                       मो. .९३३५७३१३६७
 प्रस्तुति--- श्रीमती सुषमा गुप्ता...                                                         
                
              

            




खुली पवन में आखिर कब तक..... डा श्याम गुप्त......

                                     ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...
   
                  आखिर कब तक सब  जानबूझकर  आँखें बंद रखेंगे  .............और क्यों ?

 कब तक बंद रखेंगे,
अखियों के झरोखों को ||

इन नैन झरोखों से ,
जो छन कर आती है ;
वो हवा सभी के मन को -
तन को भरमाती है ।।

कब तक मन से तन से ,
खेलेंगे आँख-मिचौली|
फिर सम्मुख खुली पवन  हो,
रोकें क्यों झोंकों को॥