ब्लॉग आर्काइव

डा श्याम गुप्त का ब्लोग...

मेरी फ़ोटो
Lucknow, UP, India
एक चिकित्सक, शल्य-चिकित्सक जो हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान व उसकी संस्कृति-सभ्यता के पुनुरुत्थान व समुत्थान को समर्पित है व हिन्दी एवम हिन्दी साहित्य की शुद्धता, सरलता, जन-सम्प्रेषणीयता के साथ कविता को जन-जन के निकट व जन को कविता के निकट लाने को ध्येयबद्ध है क्योंकि साहित्य ही व्यक्ति, समाज, देश राष्ट्र को तथा मानवता को सही राह दिखाने में समर्थ है, आज विश्व के समस्त द्वन्द्वों का मूल कारण मनुष्य का साहित्य से दूर होजाना ही है.... मेरी तेरह पुस्तकें प्रकाशित हैं... काव्य-दूत,काव्य-मुक्तामृत,;काव्य-निर्झरिणी, सृष्टि ( on creation of earth, life and god),प्रेम-महाकाव्य ,on various forms of love as whole. शूर्पणखा काव्य उपन्यास, इन्द्रधनुष उपन्यास एवं अगीत साहित्य दर्पण (-अगीत विधा का छंद-विधान ), ब्रज बांसुरी ( ब्रज भाषा काव्य संग्रह), कुछ शायरी की बात होजाए ( ग़ज़ल, नज़्म, कतए , रुबाई, शेर का संग्रह), अगीत त्रयी ( अगीत विधा के तीन महारथी ), तुम तुम और तुम ( श्रृगार व प्रेम गीत संग्रह ), ईशोपनिषद का काव्यभावानुवाद .. my blogs-- 1.the world of my thoughts श्याम स्मृति... 2.drsbg.wordpres.com, 3.साहित्य श्याम 4.विजानाति-विजानाति-विज्ञान ५ हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान ६ अगीतायन ७ छिद्रान्वेषी ---फेसबुक -डाश्याम गुप्त

मंगलवार, 10 अप्रैल 2012

योग गुरु रामदेव जी के सन्स्थान का खुदरा बाज़ार में उतरना..... डा श्याम गुप्त...

                                        ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...          
                           दादी -माँ के नुस्खों के बीच पलते हुए...वैद्यजी-हकीम जी की पुड़ियों के मध्य गुजरते हुए बचपन ..तत्पश्चात एलोपेथिक मॉडर्न हस्पतालों व डाक्टरों की राह बढ़ते हुए मैं प्रायः दोनों -तीनों पद्धतियों की चमत्कारिक चिकित्सा क्षमता, चिकित्सा सेवा व दवा के मूल्य के अंतर  पर सदा ही विचार किया करता था कि यदि आयुर्वेदिक प्रणाली देश में चलती रहे तो कितने लाभ में रहे गरीब देश की गरीब जनता....। फिर आगे जब आयुर्वेदिक -डाक्टरों-वैद्यों को भी एलोपेथिक दवाएं-प्रयोग करते देखा तो दुःख हुआ व यह एक दुस्वप्न सा ही प्रतीत हुआ।  
                     अपने मेडीकल स्कूल के दिनों में फिर पी जी, रेज़ीडेंट सर्जन  और आगे चिकित्सा प्रेक्टिस के दिनों में जब एलोपेथी  के साथ अन्य.. पेथी...आयुर्वेदिक, होम्योपेथिक  आदि के प्रारम्भिक ज्ञान प्राप्त करने पर मैं प्रायः ..अंग्रेज़ी चिकित्सा पद्धति की ..अधिक मूल्य -प्रभाव, विदेशी पद्धति होने के कारण हमारी अनिवार्यतः परालम्बता एवं स्वयम  अपने देशीय भाव को आगे न बढ़ा पाने की मजबूरी और देश की अधिकाँश सामान्य जनता की मज़बूरी के  चलते यही सोचा करता था कि यदि देश में तथाकथित आधुनिक पद्धति एलोपेथी के साथ साथ--अपनी प्राचीन आयुर्वेदिक पद्धति का बोलबाला हो, आगे बढकर यह पद्धति व उसकी औषध-संस्थान  आगे प्रश्रय पाए तो हम विदेशी दवाओं पर आधारित न होकर ..कितना अधिक देशी-विदेशी मुद्रा को बचाने में सफल हो सकते हैं एवं परालंबन से छुटकारे में भी, जिससे देश को और अधिक तेजी से विकास की राह मिल सकती है।
                 आज  जब योग गुरु रामदेव जी अपने संस्थान की  औषधियों को खुदरा बाज़ार में उचित मूल्य पर लाना चाहते हैं तो कुछ आशा की किरण ही दिखाई देती है, न की कोई बुराई  ।  इसका स्वागत किया जाना चाहिए । निश्चय ही यदि आयुर्वेदिक औषधियां बाज़ार के - प्रभाव से मुक्त होकर सस्ती दरों पर मिलती हैं तो अच्छा ही है। इससे हमें आजकल एलोपेथी व विदेशी तौर तरीकों पर चलने वाली कुछ तथाकथित आयुर्वेदिक
 दवा कंपनियों के जाल से मुक्ति मिलेगी एवं यदि आयुर्वेदिक सस्ती दवाएं प्रचलन में आती हैं तो यह देशी दवाएं ही नहीं  अपितु   आयुर्वेदिक - चिकित्सा पद्धति के भी आगे बढ़ने में एक कदम सिद्ध होगा और अरबों रुपये की विदेशी मुद्रा के बचने का ज़रिया ।       
                    रामदेव जी की सिर्फ इसीलिये विरोध नहीं होनी चाहिए की वे योगी हैं उन्हें योग -शिक्षा से मतलब रखना चाहिए व्यवसाय में नहीं आना चाहिए।    यह अनुचित सोच है । एक तरफ तो हम विश्वविद्यालयों, शिक्षा संस्थानों को अपनी स्वतन्त्र आर्थिक-दृष्टि विकसित करने  हेतु योजनायें बनाने   की बातें करते हैं दूसरी और आयुर्वेद संस्थानों के प्रति भेद- भाव।  राम देव योगी हैं कोई सन्यासी नहीं .... योग का अर्थ ही हर वस्तु, विचार व क्षेत्र में समन्वय करना होता है ..   सामाजिक समन्वय... अतः उनका बाज़ार में उतरना  कोई योग से पथ-भृष्ट होना नहीं है अपितु योग को वास्तविकता देना, सामाजिकता से जोड़ना ही है।  हाँ इसमें उन्हें स्वार्थ से परे रहना होगा । 

शुक्रवार, 6 अप्रैल 2012

. गट्टू पहलवान ...डा श्याम गुप्त की लघु कथा ...

                           ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...




                             खाने की  छुट्टी में किशोर जब अपना खाना खाकर स्कूल के पीछे वाले खुले स्थान में पहुंचा, जिसे बच्चे खेलने के लिए प्रयोग करते थे, तो सारे बच्चे चुपचाप थे । कोई भी न लट्टू चला रहा था न कंचे खेले जारहे थे ।
          सब चुपचाप क्यों हैं, खेल क्यों नहीं रहे। क्या हुआ ? किशोर पूछने लगा ।
           गट्टू राकेश का लट्टू व कंचे छीन ले गया है ।
           ये कौन है, उसने राकेश के कंचे क्यों छीन लिए और तुम लोगों ने रोका  नहीं ? किशोर बोला । क्या वो अपने स्कूल में पढ़ता है ।
            अबे ! वो  पहलवान  है, गट्टू दादा । अपने स्कूल का तो नहीं है | वह पीछे की गली में रहता है और पहलवान है, ताकतबर भी ।  मंदिर के  पंडित परिवार का है । कोई कुछ नहीं कह सकता । परसों राकेश ने अपना लट्टू देने से मना किया था तो  पिटाई कर दी । रोशन बोला, जो स्वयं  इसी गली में रहता था ।
              पर बाहर वाले का यहाँ क्या काम, और पहलवान का बच्चों से क्या मतलब। किशोर ने कहा।
             क्या करें वह दादा जो है ।
             क्यों सब लोग पकड़कर पीटें, तो उसे भागना पडेगा ।
             अच्छा  तुम करके देखना, पता चल जाएगा। यह किताब पढ़ना थोड़े ही है  जो रटकर होशियार बन जाओ,  मास्टर जी क्लास का मानीटर बना देंगे।
            लोहार गली में  जैन श्वेताम्बर मंदिर का प्राइमरी स्कूल था।  किशोर का अभी अभी दाखिला हुआ था। खाने की छुट्टी में बच्चे स्कूल के पीछे वाली गली में एक खाली स्थान पर खेलने में व्यस्त होजाते थे । कभी कभी सुबह स्कूल खुलने से पहले आकर एवं पूरी छुट्टी के बाद भी खेला करते थे । गट्टू पहलवान पीछे वाली गली में स्थित शहर के बड़े वाले शिव-मंदिर के पंडित परिवार का छोटा बेटा था । पंडित परिवार शहर के धाकड़ खानदानों में था । यद्यपि पंडित खानदान ने शहर को बड़े बड़े डाक्टर , अफसर अदि भी दिए थे परन्तु वह दादागीरी के लिए भी मशहूर था ।  इस शहर में धाकड़, अकड़बाज़ व पहलवान टाइप के  लोगों को को दादा कहा जाता था । हर गली मोहल्ले का एक दादा हुआ करता था । उनके  बच्चे व परिवारी जन भी दादा होते थे ।
            अगले दिन  जब   किशोर खेल के मैदान में पहुंचा तो देखा कि सभी बच्चे एक  गठीले बदन  व गट्टे शरीर के एक लडके को घेर कर खड़े थे, उसका शरीर अन्य सामान्य बच्चों से कुछ अधिक बड़ा था । किशोर को देखते ही रोशन बोला, चलो इन्हें प्रणाम करो हाथ जोड़कर ।
              कौन है ये । किशोर बोला, अपने स्कूल का तो नहीं लगता।
              ये  दादा हैं, गट्टू पहलवान । रोशन बोला, प्रणाम करो ।
              क्यों ?
               सब प्रणाम करते हैं दादा को ।
              'अबे कौन है तू ?' गट्टू ने किशोर को घूरकर  देखते हुए कहा। नया नया आया है क्या ।
               हाँ, उस्ताद, ये किशोर है , नया नया आया है, क्लास का मानीटर भी है । कल पूछ रहा था, कौन है ये। किशोर चुपचाप खडा रहा तो गट्टू बोला ,       
             ' चल चुपचाप अपना लट्टू दे ।'
             नहीं देता, क्या कर लोगे ? पहलवान हैं तो अखाड़े में जाएँ, बच्चों को क्या धमकाते हो। किशोर बोला।
             अबे उल्लू के........। गट्टू तेजी से आगे बढ़ा तो किशोर ने उसे जोर से धक्का दिया। फिर वे एक दूसरे से भिड़ गए, गुत्थम -गुत्था होगये । कभी किशोर ऊपर तो कभी गट्टू । बच्चे डर के कारण गट्टू की वाह वाह किये जारहे थे । तभी खाने की  छुट्टी  समाप्त होने की घंटी बजी । दोनों खड़े होकर एक दूसरे को देखने लगे। बच्चे किशोर से कहने लगे, खूब पिटे...खूब पिटे ।
               पीटा भी तो पहलवान को, दादा को, किशोर बोला ।
                गट्टू धमकाता हुआ, फिर देखूंगा कहता हुआ चला गया । बच्चे खुश भी थे कि आज उनके लट्टू-कंचे छीने जाने से बच गए।
                 अगले दिन खाने की छुट्टी पर बच्चे कहने लगे,  'रोशन, आज तुम्हारे गट्टू दादा नहीं आये !'
     


गुरुवार, 5 अप्रैल 2012

इन्द्रधनुष.....अंक ९-----स्त्री-पुरुष विमर्श पर..... डा श्याम गुप्त का उपन्यास.....

           

 


                      
                                          ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...


      
        ’ इन्द्रधनुष’ ------ स्त्री-पुरुष विमर्श पर एक नवीन दृष्टि प्रदायक उपन्यास...पिछले अंक आठ   से क्रमश:......
                                                                 अंक नौ  

                                 सोचते सोचते न जाने कब नींद लग गयी । सुबह किसी के झिंझोड़ने पर मैं जागा ।
             '  क्या है सुभद्रे ! सोने दो न ।'
               ' उठो, मैं सुमि हूँ, केजी ! तुम ट्रेन मैं हो घर में नहीं ।'
               'ओह, मैं हडबडाकर उठा । सुमि फ्रेश होकर दोनों हाथों में कप पकडे खड़ी हुई थी ।'
             ' गुड मार्निंग '   मैंने कहा ।
               वेरी वेरी गुड है ये मार्निंग, तुम्हारे साथ कृष्ण, चलो काफी होजाय ।  
               हम दोनों ही हंस पड़े ।
               'तुम तो एक दम घोड़े बेचकर सोरहीं थी, बेफिक्र । मैडम, ये ट्रेन है बैडरूम नहीं । सुना नहीं है--
  "तेरी गठरी में लागा चोर , मुसाफिर जाग ज़रा ।"
                'प्रथम क्लास  ऐसी है, कौन चोर आता है । और गठरी में तो चोर जाने कब से लगा हुआ है ।' , वह मुस्कुराई ।
               ' फिर भी यात्रा में इतना बेफिक्र नहीं सोना चाहिए ।' मैंने सहज भाव में ही कहा ।
                'तुम थे न तभी तो......।'
                'इतना विश्वास है मुझ पर ?'
                ' क्या हुआ है तुम्हें ? पता भी है क्या कह रहे हो । चलो काफी ख़त्म करो ।'
                 ' अच्छा, स्त्री-पुरुष मित्रता पर अब तुम्हारे क्या विचार हैं ?'
                ' आगये न अपनी पर ।' उसने बाल संवारते हुए कहा ,' वही, स्वस्थं मित्रता होनी चाहिए। जब तक एक दूसरे के बारे में पूर्ण ज्ञान न हो, नहीं होनी चाहिए । एक दम ख़ास विश्वासी मित्र के अलावा किसी के साथ एकांत में न जाना चाहिए न घूमना । एकांत में तो ख़ास मित्र के साथ भी नहीं । टाइम-टैस्टेड मित्र के साथ अकेले जा सकते हैं, तुम्हारे जैसे ।' उसने मुस्कुराते हुए कहा ।
                ' और मेरे जैसा विश्वादी मित्र धोका दे तो ?'
                ' हरि इच्छा ! मेरा दुर्भाग्य,ईश्वरेच्छा पर किसका वश । हमें तो अपना व्यवहार उचित प्रकार से करते रहना चाहिए, न कि "आ बैल मुझे मार । "   दुनिया के कार्य तो चलते ही रहेंगे । वैसे तुम्हारे अपने मस्तिष्क  में तो यह बात कभी आई ही नहीं होगी ।', वह खुलकर हंसी ।
                  ' आं....ss  आई नहीं होती तो  बात निकलती ही कैसे ? और  तुम्हारे अपने मस्तिष्क  में .....क्या मस्तिष्क  भी दो तरह के होते हैं मनुष्य के पास...एक अपना एक पराया ?'
                  ' हाँ, आई होगी पर दूसरों के लिए, अन्य के सन्दर्भ में । जब हम अपने लिए सोचें तो अपना स्वयं का मस्तिष्क  और अन्य लोगों के सन्दर्भ में सोचें तो सामाजिक मस्तिष्क  कार्य कर रहा होता है ।  तुम्हारे पास तो अवश्य ही दो हैं ।'  वह हास्य स्मित अधरों से बोलती गयी ।
                   ' वाह ! क्या नयी रिसर्च की है ।' मैंने हंसते हुए सर हिलाकर कहा ।'
                  'कब तक दूसरों के लिए ही सोचते रहोगे, जीते रहोगे ?'   
                   ' हम सदा अपने लिए ही तो जीते हैं। मैं सदा ही तो यह कहता हूँ । अच्छे बनने के लिए ही तो, कि लोग हमें अच्छा कहें, प्रशंसा करें, हम दूसरों के कार्य करते हैं । ' 
                   'वस्तुतः व्यक्ति की स्वयं अकेले की क्या स्थिति होती है ?  हम वह होते हैं जो अन्य हमें कहते हैं, समझते हैं । हम चाहे लाख तीसमार खां हों, यदि अन्य नहीं  समझते तो हम कुछ भी नहीं हैं । यह व्यवहारगत मूल संसारी तथ्य है । वीतरागी की बात पृथक है । परन्तु वीतरागी भी तो वही बन सकता है जिसने पहले राग को जाना हो तब त्यागा हो ।'
                   ' इसी प्रकार जैसे नारी की पिता, पुत्र, भाई, पति या मित्र के बिना कोई पहचान नहीं होती।  उसका नारीत्व कैसे सफल होगा ? उसी प्रकार पुरुष की भी स्थिति है। नारी, पत्नी, भगिनी, मां, पुत्री, मित्र के बिना कौन उसके पुरुषत्व को सराहेगा और क्यों । अतः स्वयं को अच्छा साबित करने के लिए ही हम दूसरों पर कृपा व उनके कार्य करते हैं ।'
                   ' मैं तुमसे ही तो नहीं जीत पायी, कृष्ण ।'
                    ' तो वैसे  तुमने विश्व-विजय कर लिया है, क्या !'
                  ' वह हंसकर रह गयी।  फिर बोली, ' अपने आस पास का संसार तो मैंने विजय किया ही है ।' 
                   ' बड़े संसारी होगई हो । तो सांसारिक समता समानता पर अब क्या विचार बने हैं तुम्हारे ?'
                   वह हँसने लगी, फिर बोली, ' सभी एक समान कैसे हो सकते हैं ? मैं प्रथम श्रेणी में यात्रा कर रही हूँ, मेरे पास किराया देने को धन है । क्योंकि मैंने परिश्रम व साधना की है ।वह सड़क पर खड़ी भिखारिन मेरे बराबर कैसे हो सकती है । वह अपने कर्मों के कारण वहां है , मेरे कारण नहीं । मनुष्य के कर्म ही यह फैसला करते हैं कि उसे कहाँ होना चाहिए । बस उसे परमार्थ-हित, स्वार्थ रहित कर्म करते जाना चाहिए ।'
                   ' क्या यह गर्व नहीं है ?'
                   ' यह आत्मविश्वास है, गर्व नहीं, कृष्ण ! मुझे पता है तुम जानते हो । और गर्व करूंगी, वो भी केजी के सामने ?' वह जोर से हंसी, ' इसका यह अर्थ भी नहीं कि हम उस भिखारिन से घृणा करें या प्रताड़ित करें । यह ईश्वर का काम है, हमारा नहीं । हम चाहें तो उसकी सहायता कर सकते हैं ।'
                  ' और जो लोग अपनी साधना-सिद्धि का दुरुपयोग करके, या  अवैध और अनधिकृत ढंग से कमाई करते हैं उनका क्या इस स्थिति से कोई सम्बन्ध है ?'
                  ' हाँ, अवश्य ही वे उसकी व देश समाज की इस स्थिति के लिए दोषी हैं । तभी तो भिखारी को एक पैसा दे देना या गरीब की सहायता कर देने वाला भारतीय स्वभाव यह दर्शाता है कि एसे व्यक्तियों के पाप-पूर्ण कार्यों का हम कुछ निराकरण करके अपने दायित्व की कुछ पूर्ति कर  रहे हैं । और यदि जाने अनजाने उस स्थिति के लिए कहीं हम भी थोड़ा सा जिम्मेदार हों तो उसका प्रायश्चित ।'
                 ' और यदि स्वयं तुमको भी ऐसी परिस्थिति से दो-चार होना पड़े तो ?'
                 'वह भी मेरे कर्मफल के कारण होगा, कोई गिला-शिकवा नहीं। झेलना चाहिए ।'
                ' कहना बहुत आसान है', मैंने कहा । 
                ' हाँ, सचमुच, पर कठिन कार्य आने पर ही तो इंसान निखरता है ।  वैसे कौन सा अच्छा कार्य सरल होता है ?'
               ओह, सुमि !  'यू आर स्टिल जीनियस ।'
               ' स्टिल !...'तो क्या मुझे उम्र के साथ कम अक्ल होते जाना चाहिए ? या तुम्हारा मतलब है तुमसे दूर रहकर ..'
                              " वह दूर भी  है पास भी है,
                                दिल के करीब रहता है ।
                                जोशो जुनूँ को मेरे ,
                               कोई तो हवा देता है ।।"    
                                            मैंने उसे ध्यान से देखा । पच्चीस वर्ष बाद  की  सुमि;  वही तेज तर्रार आत्मविश्वास से युक्त गहरी आँखें, मर्यादित पहनावा, गरिमामय सौन्दर्य । कनपटी पर झांकते समय की कहानी कहने को आतुर रुपहले बाल । 
                    ' क्या देख रहे हो ?'
                    " दिल ढूँढता है फिर वही सुमि वो रात दिन ।
                     बैठे है तसब्बुर में जवाँ यादें लिए हुए ।।" 
                    ' तुम तो वैसे के वैसे हो, योगीराज !'
                                 
                             **                              **                           **
                                         
                               निर्धारित कार्यक्रमानुसार हम लोग चौपाटी, मैरीन ड्राइव आदि घूमते रहे । भेलपूरी चाट आदि के वर्किंग-लंच के बीच पुरानी यादें ताजा करते रहे ।  केरियर,  परिवार सभी के बारे में बातें होती रहीं । काव्य-संग्रह के अंश सुनकर पुरानी सुमि लौट आई थी । जम कर प्रशंसा व समीक्षा करती रही । बोली -
                    'कुछ मुझे भी समर्पण करो ।'
                     ' सब तुम्हीं को अर्पण है , अब समर्पण की बात कहाँ ?'
                    हूँ, सुमि कहने लगी,  'सच कृष्ण, जब भी मैं उदास या डिप्रेस्सेड  होती हूँ  तो चुपचाप झूले पर बैठकर कालिज व तुमसे जुडी यादों में खो जाती हूँ, जो  मुझमें पुनः जीवन व नवीनता का संचार करती हैं ।  सच है, सुखद, सुहानी यादें बड़े सशक्त टानिक होती हैं ।  क्या मैं विभक्त व्यक्तित्व हूँ । तुम तो अपने बारे में कहते ही नहीं ।'
                      ' नहीं, सुमि ! तुम अभक्त, अनंत, परमसुखी व्यक्तित्व हो , और मैं भी ।' 
                    ' हर बात का उत्तर है तुम्हारे पास और तुरंत ?' चलो अब कुछ सुना दो ।
                     हूँ, मैंने कहा, सुनो ----
                                             
                                                 " प्रियतम प्रिय का मिलना जीवन ,
                                                  साँसों का चलना है जीवन ।
                                                  मिलना और बिछुड़ना जीवन ,
                                                  जीवन हार भी जीत भी जीवन ।।"       
                       सुमि सुनाने लगी ---
                                                   "प्यार है शाश्वत कब मरता है,                                            
                                                    रोम  रोम में  रहता  है ।
                                                    अज़र अमर है वह अविनाशी,
                                                    मन में रच बस रहता है ।।"   
                        ' ये कहाँ से याद किया ?', मैंने पूछा ।
                        ' मैंने तुम्हारी हर पुस्तक खरीदी है ।'
                        ' ओह ! शायद एक अकेली तुम ही खरीदती हो मेरेी पुस्तकें ?’ हम दोनों हंसने लगे ।
                        ’ ये क्या होगया है हमें केजी ?  वह सेीरियस होकर बोली, ’  साहित्य में हमें कोई रूचि ही नहीं रह गयी है । न संस्कृति में न अध्यात्म में  । सत्साहित्य आज कल पढ़ा ही नहीं जाता । स्कूल व कालिज के बच्चे जादू की, चोर-उचक्कों की, फंतासी वाले अंग्रेज़ी  उपन्यास व पुस्तकें पढ़ने में व्यस्त है । सामान्य जनता कामर्शियल पेपर, चटपटे नाविल पढ़कर फैंक देने में लगी है ।  अंग्रेज़ी नावेल हम लोग भी  पढ़ते थे, फ़िल्में भी देखते थे । पर साहित्यिक रचनाएँ -शरत, प्रसाद, टेगोर, प्रेमचंद, गोर्की, निराला, महादेवी, पन्त, वर्ड्स वर्थ, शेली, कीट्स आदि को भी कितना पढ़ते थे । सिर्फ एकेडेमिक क्लासेज़ में ही नहीं, मेडीकल के कठिन अध्ययन के साथ भी ।'
                        ' आज चारों और सभी वर्गों में अंतर्द्वंद्व व असंतुष्टि का यही तो कारण है कि उत्तम साहित्य के पठन -पाठन का मार्ग अवरुद्ध होगया है ।  साहित्य ही तो इतिहास, धर्म व संस्कृति का प्रतिपादन करता है । साहित्य क्या है ?  यों ही नहीं होता काव्य में कोई कथा, कथ्य व तथ्य ।  मानव जीवन की कथाओं, ज्ञान-विज्ञान के समन्वित अनुभवों का निचोड़ होता है साहित्य , उनका इतिहास होता है साहित्य ।  इतिहास जाने बिना हमें अनुभवजन्य ज्ञान कैसे प्राप्त हो सकता है ?  इसी ज्ञान के न होने से आज का युवा व प्रौढ़ वर्ग सामाजिक व मानवीय ज्ञान से अछूता रहता है और केवल कार्यात्मक, प्रोफेशनल व दैनिक व्यवहारिक ज्ञान को ही ज्ञान मानकर   सब कुछ ज्ञाता   होने का भ्रम   पाले   रहता है ।  जीवन का मूल उद्देश्य व दिशा न पाकर अंतर्द्वंद्वों में घिरा रहता है या पलायनवादी, अति-भौतिकवादी बन जाता है ।'  मैंने विस्तार से कहा ।  'परन्तु त्रुटि व भूल कहाँ हुई ?'  क्या  सारा दोष  आज की पीढी का ही है ?'  मैंने शायद स्वयं से ही प्रश्न किया ।
                          'भूल हमारी ही है केजी, शायद ।  उन्नति, विकास, भौतिकता की चकाचौंध व शीघ्रातिशीघ्र फल प्राप्ति की दौड़ में एवं अंधाधुंध पाश्चात्य नक़ल करके बराबरी की होड़ में, सदियों की दासता के फलस्वरूप अपना गौरव, अपनी संस्कृति व इतिहास भूले हुए हम लोग - अपनी स्वयं की अस्मिता, भारतीय भाव , भाषा व संस्कारों को संभाल कर नहीं  रख पाए तथा आगे आने वाली पीढी के अनुकरण व अनुसरण के लिए  एक उदाहरण प्रस्तुत करने में असफल रहे । जो राष्ट्र व देश एक लम्बी राजनैतिक  गुलामी में भी सिद्धांततः अपनी संस्कृति व धर्म बचाए हुए था ;  राजनैतिक स्वतन्त्रता मिलने पर  पाश्चात्य रंग-ढंग व विश्व-राजनीति का शिकार होकर सांस्कृतिक रूप से गुलाम होगया ।  सरकार, समाज व बौद्धिक संसार में सभी में वही भारतवासी हैं तो वही स्थिति है ।', सुमि ने अपना विचार व्याख्यायित किया ।' 
                              ' और यदि साहित्य समाज का दर्पण है तो दर्पण में झांके बिना समाज कैसे दिखाई देगा । उत्तरोत्तर विकास की से सीढी कैसे बनेगी ?  बिना इतिहास व शास्त्र, सत्साहित्य के कोई भी  समाज व राष्ट्र कब उन्नत हुआ है ?’ सुमि ने पुनःकहा ।
                              -----क्रमशः अन्क नौ का शेष....अगलेी पोस्ट में.....
       

   

जो बोले सो कुंडी खोले ...एक नाटिका ...डा श्याम गुप्त

                         ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...

                       जो बोले सो कुंडी खोले  ...एक नाटिका ...डा श्याम गुप्त

                (  नगर की एक सामाजिक संस्था की शाखा सभा की एक साधारण बैठक ....)
                
                                                    दृश्य -एक
सत्येन्द्र जी ( फोन पर)--हेलो रमेश जी ! आज शाखा सभा की बैठक है,  इन्ज. रवि जी के यहाँ, चलेंगे ?
रमेश जी -- हाँ ..हाँ ..चलेंगे, रमेश जी ने तो डिनर भी रखा है । जायेंगे...जायेंगे ..।
                                           
                                                   दृश्य दो
      (  समय--सायं चार बजे....दिन ..रविवार...स्थान -इंजी. रवि जी का निवास ... इंजी. रवि गेट पर सब का अभिवादन -स्वागत कररहे हैं ।)
           आइये  आइये डाक्टर साहब..पधारें ।
           आइये वकील साहब...ओहो, नगेन्द्र जी आइये...भाभीजी नमस्कार ....नमस्कार सुधीर जी ..अरे अनिल जी ....आइये अन्दर चलें ।  आइये जज साहब ..नमस्कार ।
           सब लोग अन्दर चलकर सोफों  व कुर्सियों पर बैठते हैं। महिलायें  एक तरफ बैठी महिलाओं के ग्रुप में चली जाती हैं और बातें करने लगती हैं । अध्यक्ष जी व मंत्री अपना स्थान  ग्रहण करते हैं ।
बिमल जी ---समय तो काफी होगया । अभी कम लोग ही आये हैं ।
प्रकाश जी ---अरे यहाँ तो फिर भी काफी लोग आगये । चूड़ी वाले किशोर जी के यहाँ तो लगभग कोई पहुंचा ही नहीं । मुश्किल से किया हुआ इंतज़ाम भी काफी बेकार  गया ।
कुछ लोग एक साथ---- अरे जिनको आना था आ चुके...कार्यवाही आरम्भ की जाय ।
मंत्री जी---पहले ईश-प्रार्थना ....
                               सब गाते हैं .....वह शक्ति .......।
              प्रार्थना समाप्त होने पर मंत्री पूर्व बैठक की कार्यवाही पढ़ते हैं । सदस्य गण  बातें करते रहते हैं ।
मंत्री जी---किसी को इसमें कोई कमी,  शंका, समाधान हो तो बताएं ।  अन्यथा यह पारित समझा जाय ।
सब-- हाँ ...पारित है...पारित है...।
अनिल जी --- ( नए सदस्य हैं  दो माह पहले ही यहाँ ट्रांसफर होकर आये हैं ) एक विशेष विचार बिंदु रखना चाहता हूँ ।
सब--हाँ हाँ ...।
अनिल जी---अब तक की बैठकों में मैंने अनुभव किया है कि यहाँ के स्थानीय निवासी, व्यापारी वर्ग व  अन्य वर्ग आदि कभी बैठक में नहीं आता । इसका क्या कारण है ? क्या उपस्थिति बढाने के लिए कोई ठोस उपाय नहीं किया जा सकता, जिससे सभी वर्ग का सहयोग प्राप्त हो ?
मंत्री---यह प्रश्न कई बार उठ चुका है तथा बहुत बहस भी होचुकी है । हम किसी को जबरदस्ती तो ला नहीं सकते ।
अनिल--- पर कोई कारण तो होगा ।
कुछ सदस्य ---कोई कारण नहीं, जिन्हें  नहीं आना वे आयेंगे ही नहीं ।   
 श्रीनाथ जी---कारण क्यों नहीं है....मुख्य कारण तो यह है कि--एक तो बैठक के लिए एक निर्धारित निश्चित स्थान नहीं है ।  हर बार आधा समय तो बैठक के नए स्थान को ढूँढने में लग जाता है,  इतने बढे शहर में और बैठक में आने का प्रयोजन ही समाप्त होजाता है । हमारा आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग सकुचाता है कि अपने घर बैठक कराएं तो अन्य लोगों जैसा नाश्ता-पानी कैसे कराया जाय । सभी तो इस योग्य नहीं  हैं कि सभी को डिनर करा सकें ।
                    ( आपका क्या विचार है ...अनिल जी की तरफ देखते हैं ।)
इंज.रवि---- ये तो कोई बात नहीं है । किसी ने एसा नहीं कहा।जिस पर जैसा है वैसा खिलाये ।
श्री नाथ जी व कुछ अन्य --- कोई कहता थोड़े ही है ..बस आना और भाग लेना बंद कर देते हैं । जब हम खिला नहीं सकते तो खाने क्यों जाँय।
अनिल जी-- अन्य कई शहरों की भाँति एक नियम बन जाय कि सभी के यहाँ सिर्फ एक नग बिस्कुट आदि व एक चाय के अलावा कुछ नहीं करना है । तो शायद सभी लोग अपने यहाँ बैठक कराने  में संकोच नहीं करेंगे एवं भागीदारी भी निभायेंगे ।
प्रकाश जी---  और यदि एक जगह निश्चित होजाय एवं चाय आदि शाखा सभा के तरफ से ही हो तो शायद और अच्छा हो ।
मंत्री----  इतना अधिक धन कहाँ है शाखा के पास ।
कुछ सदस्य गण--- मासिक या वार्षिक चन्दा लिया जाय ।
मंत्री--चन्दा लेने कौन जाता है ?
अनिल-- पदाधिकारी किस लिए हैं ।
मंत्री, अध्यक्ष व इंजी. रवि---- भई अपने घर किसी को बुलाएं तो तो' एक चाय' क्या अच्छा लगेगा ।
अनिल-- भई बैठक का उद्देश्य समाज के काम और उन्नति पर विचार करना है । खाने थोड़े ही आते हैं ।
श्री नाथ जी --- कुछ लोग तो सदैव अंतिम समय पर ही आते हैं जैसे खाना ही उद्देश्य हो । अन्य बैठक आदि से कोई लेना-देना नहीं ।
                ( तभी वीरेन्द्र जी प्रवेश करते हैं, कुछ लोग अर्थपूर्ण हंसी हंसते हैं । )
श्रीनाथ -- ये देखिये सदैव की भाँति आख़िरी वक्त पर....।
विमल जी-- आखिर जन संपर्क करके कारण पता करने और उसके निवारण में क्या हर्ज़ है ।
 मंत्री अध्यक्ष इंजी. रवि व रमेश जी ---बहुत बार कोशिश कर के देख चुके हैं । सब होचुका है, बार बार  वही   प्रश्न व बहस का कोई अर्थ नहीं है ।
विमल जी-- क्यों, बार बार कोशिश करने में क्या हर्ज़ है ? बार बार प्रयत्न से ही तो सफलता मिलती है ।
श्री नाथ जी-- मैं तो दस साल से देख रहा हूँ , कभी कुछ नया व जन संपर्क करने की कोशिश ही नहीं  हुई । न हमारा महिला वर्ग ही कुछ नया कार्य या किसी बहस, विचार विमर्श में भाग लेता है । बस वही लोग सदा आते हैं और खा पीकर चल देते हैं ।
मंत्री--- सलाह देना आसान है। जो आगे आये, करके दिखाए ।
श्री नाथ जी --भई, तो फिर ये मासिक सभाएं, सामान्य सभाएं क्यों होती हैं । परामर्श कमेटी, विशिष्ट परामर्श कमेटी आदि क्यों बना रखे हैं। मंत्री अध्यक्ष को ही अपनी मर्जी चलानी है तो  वे ही जो करते हैं करें..अन्य लोग क्यों आयें ।
विमल जी -- मंत्री अध्यक्ष तो सिर्फ कार्य करते हैं,  फैसले तो सामान्य बैठक द्वारा लिए जाने चाहिए।  विशेष सलाहकार व कार्यकारी समिति मिल कर कार्यक्रम तैयार करे।
अनिल जी -- महिला वर्ग से भी तो कोई परामर्श व विचार बिंदु या उदाहरण आना चाहिए ।
                         ( महिलाओं की और उन्मुख होकर )
                       आप सब क्या सिर्फ बातें करने आते हैं । या बस सिर्फ वर्ष में एकाध बार २६ जन. आदि को खेल-कूद करने । आपके भी हर बिंदु पर विचार प्रस्तुत होने चाहिए। आप भी तो आगे आइये।  महिला शक्ति का भी तो उचित उपयोग होना चाहिए।
                         ( महिलायें चुपचाप मुस्कुराती रहती हैं )
मंत्री -- तो भैया, आप ये संभालो और करो । हम तो जैसा कर रहे हैं वैसा ठीक -ठाक ही चल रहा है ।
विमल जी -- अरे यह तो वही बात हुई , " जो बोले सो कुंडा खोले " इसलिए तो सब चुपचाप अपनी अपनी रजाइयों में सिकुड़कर बैठे हैं । जब न कोइ नया विचार, नई बात पर बहस करने, सुनने- मानने को तैयार ही नहीं है तो कौन समाज -बैठक आदि के पचड़े में पड़े ।  ये भी कम उपस्थिति होने का एक कारण है ।
इंजी. रवि -- चलिए ..चलिए  ... डिनर तैयार है, कृपया चलें ।
                             ( सब बातें करते हुए जाते हैं )
                    




बुधवार, 4 अप्रैल 2012

आयुर्वेद एक सारभूत वर्णन--- भाग- तीन ......डा श्याम गुप्त ...

                                                      


                          ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...
               

        ( अन्य भारतीय ज्ञान व विद्याओं की भाँति भारतीय चिकित्सा विज्ञान भी अत्यंत विकसित था । गुलामी के काल में अन्य ज्ञान व विध्याओं की भाँति सुनियोजित षडयंत्र व क्रमिक प्रकार से इसका भी प्रसार व विकास भी रोका गया ताकि एलोपेथिक आदि पाश्चात्य चिकित्सा को प्रश्रय दिया जा सके । अतः भारत के इतिहास के अन्धकार काल में आयुर्वेद का कोई उत्थान नहीं हुआ अपितु निरंतर गिरावट होती रही । हर्ष का विषय है की आज भारत के  नए भोर के साथ आयुर्वेद भी नए नए आयाम छू रहा है।  आयुर्वेद के नाम से जाना जाने वाला यह आदि चिकित्सा विज्ञान है, जिसके सारभूत सिद्धांतों से विश्व के सभी चिकित्सा-विज्ञान प्रादुर्भूत हुए हैं । आधुनिक चिकित्सा विज्ञान के लगभग सभी अंग-उपांग आयुर्वेद में पहले ही निहित हैं। यद्यपि आजकल आयुर्वेद "प्राचीन भारतीय चिकित्सा पद्धति' के संकुचित अर्थ में प्रयुक्त होता ।  इस क्रमिक पोस्ट द्वारा हम आयुर्वेद के इस विशद ज्ञान को संक्षिप्त में वर्णन करेंगे । )  प्रस्तुत है भाग तीन----
   
        आयुर्वेद में रोग और स्वास्थ्य---- भाग-३       
 आयुर्वेद के अनुसार स्वास्थ्य की परिभाषा ( अर्थात रोग और आरोग्य का लक्षण )---
आचार्य चरक के अनुसार ---मूल आयुर्वेदीय तकनीकी भाषा में----"वात, पित्त और कफ इन तीनों दोषों का सम मात्रा (उचित प्रमाण) में होना ही आरोग्य ( निरोगी होना) और इनमें विषमता होना ही रोग है।"

महर्षि सुश्रुत के अनुसार---"जिसके सभी दोष (त्रिदोष-वात, पित्त, कफ़) सम मात्रा में हों, अग्नि सम हो, धातु, मल और उनकी क्रियाएं भी सम (उचित रूप में) हों तथा जिसकी आत्मा, इंद्रिय और मन प्रसन्न (शुद्ध) हों उसे स्वस्थ,  इसके विपरीत लक्षण हों तो अस्वस्थ समझना चाहिए। अत: शरीर, इंद्रिय और मन के प्राकृतिक (स्वाभाविक) रूप या क्रिया में विकृति होना ही रोग है। (आधुनिक चिकित्सा विग्यान के अनुसार—Health is not only absence of disease but complete physical, social & mental well-being )
   रोगों के हेतु या कारण -इटियॉलोजी-Aetiology- (कारण व फ़ेक्टर्स)—
              ---- संक्षेप में इन्हें पांच वर्गों में  बांटा जा सकता  है :
(१) प्रज्ञापराध ( सोशिओ-साइकोलोजीकल-मेन्टल अनियमिततायें)- अविवेक ,अधीरता तथा पूर्व अनुभव और वास्तविकता की उपेक्षा के कारण लाभ हानि का विचार किए बिना ही किसी विषय का सेवन या जानते हुए भी अनुचित वस्तु का सेवन करना।  इसी को दूसरे और स्पष्ट शब्दों में कर्म (शारीरिक, वाचिक और मानसिक चेष्टाएं) का हीन, मिथ्या और अति योग भी कहते हैं।
(2)--इंद्रियों का विषयों के साथ असात्म्य –(अर्थात शरीर के साथ प्रत्येक प्रकार की अति व अत्याचार –ओवर स्ट्रेनिन्ग )..  चक्षु आदि इंद्रियों का अपने-अपने रूप आदि विषयों के साथ असंगत व्यवहार  (प्रतिकूल, हीन, मिथ्या और अति) इंद्रियों, शरीर और मन के विकार का कारण होता है- यथा आँख से बिलकुल न देखना (अयोग), अति तेज अथवा कम प्रकाश में देखना और बहुत अधिक देखना (अतियोग) तथा अतिसूक्ष्म, संकीर्ण, अति दूर में स्थित तथा भयानक, बीभत्स, एवं विकृतरूप वस्तुओं को देखना (मिथ्यायोग)। ये इन्द्रियां अपने आश्रय-अन्ग के साथ मन और शरीर में भी विकार उत्पन्न करते हैं। ग्रीष्म, वर्षा, शीत आदि ऋतुओं तथा बाल्य, युवा और वृद्धावस्थाओं का भी शरीर आदि पर प्रभाव पड़ता ही है, किंतु इनके हीन, मिथ्या और अतियोग का प्रभाव विशेष रूप से हानिकर होता है।
(३)-अन्य हेतु---( फ़ेक्टर्स )—
(१) विप्रकृष्ट कारण (रिमोट कॉज़), जो शरीर में दोषों का संचय करता रहता है और अनुकूल समय पर रोग को उत्पन्न करता है-यथा-टीबी का प्राइमरी कम्प्लेक्स
(२) संनिकृष्ट कारण (इम्मीडिएट कॉज़), जो रोग का तात्कालिक  कारण होता है… यथा— टीबी के बेकटीरिया का इन्फ़ेक्शन…..
(३) व्यभिचारी कारण (अबॉर्टिव कॉज़) जो परिस्थितिवश  रोग को उत्पन्न करता है और नहीं भी करता --यथा टीबी रोगी के साथ कुछ समय तक सम्पर्क में रहने पर ..
 (४) प्राधानिक कारण (स्पेसिफ़िक कॉज़), जो तत्काल किसी धातु या अवयव विशेष पर प्रभाव  डालकर निश्चित लक्षणोंवाले विकार को उत्पन्न करता है, जैसे विभिन्न  जन्तुओं के विष।
अन्य फ़ेक्टर्स---
     (१) उत्पादक (प्रीडिस्पोज़िंग फ़ेक्टर्स), जो शरीर में रोगविशेष की उत्पत्ति के अनुकूल परिवर्तन कर देता है—कमजोरी, कुपोषण, रक्ताल्पता- से ग्रसित शरीर में टीबी का इन्फ़ेक्शन….या एड्स का..
     (२) व्यंजक (एक्साइटिंग), जो पहले से रोगानुकूल शरीर में तत्काल विकारों को व्यक्त करता है
      (३) निज (इडियोपैथिक)- जब पूर्वोक्त कारणों से क्रमश: शरीरगत वातादि दोष में, और उनके द्वारा धातुओं में, विकार उत्पन्न होते हैं तो उनको निज हेतु या निज रोग कहते हैं।
    (४) आगंतुक (ऐक्सिडेंटल)- चोट लगना, आग से जलना, विद्युत्प्रभाव, सांप आदि विषैले जीवों के काटने या विषप्रयोग से जब एकाएक विकार उत्पन्न होते हैं तो उनमें भी वातादि दोषों का विकार होते हुए भी, कारण की भिन्नता और प्रबलता से, वे कारण और उनसे उत्पन्न रोग आगंतुक कहलाते
  (५-)आदि- कारण --जिन पदार्थों के प्रभाव से वात आदि दोषों में विकृतियां होती हैं तथा वे वातादि दोष, जो शारीरिक धातुओं को विकृत करते हैं, दोनों ही हेतु (कारण) या निदान (आदिकारण) कहलाते हैं।

     हेतुओं का शरीर पर प्रभाव-(पेथोफ़िज़िओलोजी-) शरीर पर इन सभी कारणों के तीन प्रकार के प्रभाव होते हैं ---
(१) दोषप्रकोप- अनेक कारणों से शरीर के पन्च तत्वों में से किसी एक या अनेक में परिवर्तन  होकर उनके स्वाभाविक अनुपात में अंतर आ जाना । इसी के आधार पर आयुर्वेदाचार्यों ने इन विकारों को वात, पित्त और कफ  इन वर्गों में विभक्त किया है। । शरीर की धातुओं में या उनके संघटकों में जिस तत्व की बहुलता रहती है वे उसी श्रेणी के गिने जाते हैं। इन पांचों में आकाश तो निर्विकार- है अप्रभावी तथा पृथ्वी सबसे स्थूल जिसपर सभी प्रभाव पडता है। शेष तीन (वायु, तेज और जल) सब प्रकार के परिवर्तन या विकार उत्पन्न करने में समर्थ होते हैं। अत: तीनों की प्रचुरता के आधार पर, विभिन्न धातुओं एवं उनके संघटकों को वात, पित्त और कफ  की संज्ञा दी गई है। सामान्य रूप से ये तीनों धातुएं शरीर की पोषक होने के कारण विकृत होने पर अन्य धातुओं को भी दूषित करती हैं। अत: दोष तथा मल रूप होने से मल कहलाती हैं। रोग में किसी भी कारण से इन्हीं तीनों की न्यूनता या अधिकता होती है, जिसे दोषप्रकोप कहते हैं।
(२) धातुदूषण- कुछ पदार्थ या कारण ऐसे होते हैं जो किसी विशिष्ट धातु या अवयव में ही विकार करते हैं। इनका प्रभाव सारे शरीर पर नहीं होता। इन्हें धातुप्रदूषक कहते हैं।
(३) उभयहेतु- वे पदार्थ जो सारे शरीर में वात आदि दोषों को कुपित करते हुए भी किसी धातु या अंग विशेष में भी विशेष विकार उत्पन्न करते हैं, उभयहेतु कहलाते हैं।
         इन तीनों में जो परिवर्तन होते हैं वे वात, पित्त या कफ इन तीनों में से किसी एक, दो या तीनों में ही विकार उत्पन्न करते हैं। अत: ये ही तीनों दोष प्रधान शरीरगत कारण होते हैं, क्योंकि इनके स्वाभाविक अनुपात में परिवर्तन होने से शरीर की धातुओं आदि में भी विकृति होती है। रचना में विकार होने से क्रिया में भी विकार होना स्वाभाविक है। इस अस्वाभाविक रचना और क्रिया के परिणामस्वरूप अतिसार, कास आदि लक्षण उत्पन्न होते हैं और इन लक्षणों के समूह को ही रोग कहते हैं।
        रोग की जानकारी के साधन( लिन्ग, पहचान - डायग्नोसिस)…
   चार विधियां है-- ---पूर्वरूप, रूप, संप्राप्ति और उपशय।

१-पूर्वरूप-( प्री मोनिटेरी सिम्प्टम्स) किसी रोग के व्यक्त होने के पूर्व शरीर के भीतर हुई अत्यल्प या आरंभिक विकृति के कारण जो लक्षण उत्पन्न होकर किसी रोगविशेष की उत्पत्ति की संभावना  प्रकट करते हैं उन्हें पूर्वरूप (प्रोडामेटा) कहते हैं। यथा—यक्ष्मा में प्रारम्भिक बार बार ज्वर आना, खांसी, भार कम होना…
२-रूप (साइन्स एंड सिंप्टम्स) - जिन लक्षणों से रोग या विकृति का स्पष्ट परिचय मिलता है उन्हें रूप कहते हैं--- खांसी, ज्वर, बल्गम आना व एक्स रे में टीबी के प्रभाव..
३-संप्राप्ति (पैथोजेनेसिस) : किस कारण से कौन सा दोष स्वतंत्र रूप में या परतंत्र रूप में, अकेले या दूसरे के साथ, कितने अंश में और कितनी मात्रा में प्रकुपित होकर, किस धातु या किस अंग में, किस-किस स्वरूपश् का विकार उत्पन्न करता है, इसके निर्धारण को संप्राप्ति कहते हैं। चिकित्सा में इसी की महत्वपूर्ण उपयोगिता है। वस्तुत: इन परिवर्तनों से ही ज्वरादि रूप में रोग उत्पन्न होते हैं, अत: इन्हें ही वास्तव में रोग भी कहा जा सकता है और इन्हीं परिवर्तनों को ध्यान में रखकर की गई चिकित्सा भी सफल होती है।
४-उपशय और अनुपशय (थेराप्यूटिक टेस्ट) - जब अल्पता या संकीर्णता आदि के कारण रोगों के वास्तविक कारणों या स्वरूपों का निर्णय करने में संदेह होता है, तब उस संदेह के निराकरण के लिए संभावित दोषों या विकारों में से किसी एक के विकार से उपयुक्त आहार-विहार और औषध का प्रयोग करने पर जिससे लाभ होता है आयुर्वेदाचार्यो ने छह प्रकार से आहार-विहार और औषध के प्रयोगों का सूत्र बतलाए हैं।  आयुर्वेद के ये सूत्र इतने महत्व के हैं कि इनमें से एक-एक के आधार पर ---- अन्य चिकित्सा-पद्धतियों का उदय  हो गया है; जैसा कि पहले बताया जा चुका है। ये इस प्रकार हैं—
(१) हेतु के विपरीत आहार विहार या औषध का प्रयोग करना।
(२) व्याधि, वेदना या लक्षणों के विपरीत आहार विहार या औषध का प्रयोग करना। स्वयं ऐलोपैथी की स्थापना इसी पद्धति पर हुई थी --ऐलोज़ (विपरीत) पेथी ( व्यवहार या तरीका )= ऐलोपैथी ।
(३) हेतु और व्याधि, दोनों के विपरीत आहार विहार और औषध का प्रयोग करना।
(४) हेतु-विपरीतार्थकारी, अर्थात्‌ रोग के कारण के समान होते हुए भी उस कारण के विपरीत कार्य करनेवाले आहार आदि का प्रयोग; जैसे, आग से जलने पर सेंकने या गरम वस्तुओं का लेप करने से उस स्थान पर रक्तसंचार बढ़कर दोषों का स्थानांतरण होता है ।
(५) व्याधि-विपरीतार्थकारी, अर्थात्‌ रोग या वेदना को बढ़ानेवाला प्रतीत होते हुए भी व्याधि के विपरीत कार्य करनेवाले आहार आदि का प्रयोग ( होमियापैथी इसी सिद्धान्त पर है--- होमियो (समान) पेथी( व्यवहार-तरीका) ।
(६) उभयविरीतार्थकारी, अर्थात्‌ कारण और वेदना दोनों के समान प्रतीत होते हुए भी दोनों के विपरीत कार्य करनेवाले आहार विहार और औषध का प्रयोग।
-------हेतु और लिंगों  से रोग की परीक्षा होती है, किंतु इनके समुचित ज्ञान के लिए रोगी की परीक्षा  अनिवार्य है।
                                ---- क्रमश: