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डा श्याम गुप्त का ब्लोग...

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Lucknow, UP, India
एक चिकित्सक, शल्य-चिकित्सक जो हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान व उसकी संस्कृति-सभ्यता के पुनुरुत्थान व समुत्थान को समर्पित है व हिन्दी एवम हिन्दी साहित्य की शुद्धता, सरलता, जन-सम्प्रेषणीयता के साथ कविता को जन-जन के निकट व जन को कविता के निकट लाने को ध्येयबद्ध है क्योंकि साहित्य ही व्यक्ति, समाज, देश राष्ट्र को तथा मानवता को सही राह दिखाने में समर्थ है, आज विश्व के समस्त द्वन्द्वों का मूल कारण मनुष्य का साहित्य से दूर होजाना ही है.... मेरी तेरह पुस्तकें प्रकाशित हैं... काव्य-दूत,काव्य-मुक्तामृत,;काव्य-निर्झरिणी, सृष्टि ( on creation of earth, life and god),प्रेम-महाकाव्य ,on various forms of love as whole. शूर्पणखा काव्य उपन्यास, इन्द्रधनुष उपन्यास एवं अगीत साहित्य दर्पण (-अगीत विधा का छंद-विधान ), ब्रज बांसुरी ( ब्रज भाषा काव्य संग्रह), कुछ शायरी की बात होजाए ( ग़ज़ल, नज़्म, कतए , रुबाई, शेर का संग्रह), अगीत त्रयी ( अगीत विधा के तीन महारथी ), तुम तुम और तुम ( श्रृगार व प्रेम गीत संग्रह ), ईशोपनिषद का काव्यभावानुवाद .. my blogs-- 1.the world of my thoughts श्याम स्मृति... 2.drsbg.wordpres.com, 3.साहित्य श्याम 4.विजानाति-विजानाति-विज्ञान ५ हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान ६ अगीतायन ७ छिद्रान्वेषी ---फेसबुक -डाश्याम गुप्त

शनिवार, 20 अक्टूबर 2012

प्रेम से प्रथम परिचय ..डा श्याम गुप्त की कहानी ....

                                 ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...

 
                          प्रेम से प्रथम परिचय
         श्रीकांत पढते-पढते कहने लगा, ‘वाह! क्या बात है, अति सुन्दर |’
         क्या सुन्दर है भई, क्या पढ रहे हो ? हरीश ने  पूछा |
         “लव्स लेवर्स लौस्ट “
         ओह ! शेक्सपीयर का प्रसिद्द पर विवादास्पद शीर्षक व विषय वाला नाटक | बहुत पहले पढ़ा था | क्या डिटेल कथा है, फिर सुनते हैं ? हरीश कहने लगा | 
        हाँ, कथा यूँ है कि ...”महिलाओं से दूरी रखने वाले राजा व उसके मित्रगण जब महिलाओं के संपर्क में आते हैं तो वे राजकुमारी व सखियों से प्रेम करने लगते हैं | अंत में अन्य राज्य में सिंहासन की वारिस बनने पर जब राजकुमारी को जाना होता है तो राजा व मित्रगण तो अपने प्रेम को स्वीकारते हैं व वायदे निभाने की बात करते हैं परन्तु राजकुमारी को उस प्रेम पर पूर्ण विश्वास नहीं है अतः वह उन्हें एक वर्ष इंतज़ार को कहती है |”  श्रीकांत ने बताया |
      “यह ऋग्वेद की प्रथम कथा ‘पुरुरवा-उर्वशी’, शायद विश्व की प्रथम प्रेम-कथा, से मेल खाती है| जिसमें उर्वशी भी इसी भान्ति पलायन कर जाती है | स्त्रियाँ स्वभावतः शंकालु व अविश्वासी होती हैं |” हरीश कहने लगा,  “इसी प्रकार टेनीसन की कविता “द प्रिंसेस” है जिसमें ठुकराई हुई राजकुमारी पुरुषों से नफ़रत करती है और सिर्फ महिलाओं की यूनिवर्सिटी स्थापित करती है | परन्तु क्रमिक घटनाओं के फलस्वरूप राजकुमार के संपर्क में आने पर अंतत उससे प्रेम करने लगती है | वास्तव में दोनों ही कृतियाँ तत्कालीन इंग्लेंड में स्त्रियों की स्वतंत्रता व अधिकारों का समर्थन करती हैं |” 
       क्यों, क्या इंग्लेंड में १६-१७ वीं शताब्दी में स्त्रियों को स्वतन्त्रता नहीं थी? श्रीकांत पूछने लगा |
      ‘ हाँ, निश्चय ही, हरीश ने कहा, जबकि हमारे यहाँ तो हज़ारों वर्ष पहले भी सती, पार्वती, उर्वशी, घोषा, गार्गी, राधा आदि स्त्रियों को पूर्ण स्वतन्त्रता प्राप्त थी; यद्यपि यह स्व-आचरण नियमित स्वाधीनता थी | हाँ लंबे पराधीनता काल में विधर्मी प्रभाव जनित उच्छृंखलता-वश महिलाओं की स्थिति अवश्य कमजोर होगई थी |”
      ‘इस नाटक का शीर्षक ही विचित्र व असंगत है | जिसकी योरपीय समाज व साहित्य में भी काफी छीछालेदर हुई थी | हरीश पुनः कहने लगा |, “ भई, प्रेम न तो ‘लेबर’ होता है न कभी ‘लौस्ट’ होता है|  “लव इस नैवर लौस्ट”... प्रेम तो ‘इटरनल’...सर्वव्यापी, सदा- सर्वदा उपस्थित है, जीवित है, सर्वत्र विराजमान, कण कण में व्याप्त सृष्टि का मूल भाव तत्व है| एक छोर पर वेदान्ती का प्रेम ब्रह्म है तो दूसरे छोर पर संसारी मानव का प्रेम अपना प्रेमी-प्रेमिका | आस्तिक ईश्वर से प्रेम करता है तो नास्तिक अपने सहज, प्राकृतिक सिद्धांत से | भौतिक विज्ञानी का प्रेम ‘परमाणु’ है तो दार्शनिक का अध्यात्म | अमीर को पैसे से प्रेम है तो खिलाड़ी को अपने खेल-प्रेम का जुनून |  पंडित जन ‘ज्ञान’ को ही प्रेम करते हैं तो भक्त पाहन-मूर्ति को जिसे वह पूजता है|  यह शिव-शक्ति, माया-ब्रह्म, प्रकृति-पुरुष के जो द्वैत हैं वे ब्रह्माण्ड के तीन मूल तत्वों –त्रिगुण --–सत्, तम, रज ..के चहुँ ओर परिक्रमित रहते हैं | इन तत्वों के मध्य एक आकर्षण शक्ति है जो सृष्ट-सृजन की क्रियाविधि का प्रारंभन करती है; मूल तत्त्व के अद्वैत अर्थात अक्रियाशीलता को द्वैत अर्थात क्रियाशीलता में परिवर्तित करती है | इसी के पश्चात ब्रह्म-माया, शिव-शक्ति, पुरुष-प्रकृति के सृजन सम्बंधित, सम्बन्ध विकसित होते हैं| यही प्रेम है जो सर्वव्यापी, अपरिमापी तथा कभी विनष्ट न होने वाला है ..न सृष्टि में, न स्थिति में न प्रलय में | “
        “वाह ! क्या प्रेम गाथा है | वैसे वास्तविक सांसारिक भाव में तो प्रेम दो विपरीत-लिंगी के मध्य आकर्षण को कहते हैं | और सही में तो यह ‘पालने’ में ही प्रस्फुटित  होजाता है जैसा सिगमंड फ्रायड व अन्य मनो-दार्शनिक कहते हैं कि पुत्र माँ को अधिक चाहता है, पुत्री, पिता को, भाई-बहन के मध्य भी यही स्वाभाविक आकर्षण रहता है इसी सर्व-व्यापी फेक्टर- गुण, विपरीत लिंगी आकर्षण, के कारण |” श्रीकांत ने भी जोड़ा |
         “ हाँ सही कहा, इस प्रकार माँ व संतान का प्रेम सर्वप्रथम भाव है जो जीव, आत्म-तत्व अनुभव करता है गर्भ से बाहर आकर, अपितु गर्भ के अंदर भी | यह वात्सल्य है | और आगे चलें तो एच्छिक व स्वाभाविक प्रेम दो अनजान विपरीत लिंगी, स्त्री तत्व—पुरुष तत्व, के मध्य आकर्षण होता है| यही वास्तविक प्रेम है जिसे सांसारिक मानव व्यवहार में जाना व समझा जाता है | यह अनजान-प्रेम...  ‘काफ-लव’ भी होसकता है...एक तरफा भी, अव्यक्त प्रेम भी या एक प्रेम-कहानी |”  हरीश ने और अधिक स्पष्ट करते हुए कहा |
         “यार, बड़ी शोध कर रखी है प्रेम पर ! कहानी भी लिखी जा सकती है..लिख डालो|” श्रीकांत हंसते हुए कहने लगा |  
         हाँ, सच कह रहे हो, हरीश भी हंसकर कहने लगा, “लो आज खोल ही देते हैं उस फ़साने को |” इसी बात पर आज तुम्हें अपना ही प्रेम से प्रथम परिचय की मजेदार गाथा सुना ही देता हूँ | क्या याद करोगे | कहानी समझकर ही सुनना |”
         अरे वाह ! क्या कहने |..श्रीकांत पालथी मार कर बैठ गया |
         “प्रेम से मेरा प्रथम परिचय जब हुआ जब मैं एक बालक था, कक्षा एक का छात्र “हरीश मुस्कुराकर कहने लगा,
        “ क्या, कक्षा एक का छात्र !..! “  वेवकूफ बना रहे हो |
         ‘हाँ, ठीक सुना, अब वेवकूफ बनते हुए सुनते जाओ, टोको मत |’ हरीश बोला, ‘मेरा दाखिला मेरी बड़ी बहन के साथ कन्या पाठशाला में ही कराया गया, जो स्वयं कक्षा ८ की छात्रा थी | एक बार जब में कक्षा से बाहर गया तो पायजामे का नाड़ा ही नहीं बाँध पा रहा था, न बहन का क्लास-रूम ही पता था | इसी क्षोभ में मैं आंसू लिए हुए स्कूल के मुख्य द्वार की चौकी पर बैठा काफी देर तक सुबकता रहा |’
        मुझे अभी भी जहां तक स्मृति की गलियों में कदमताल है, याद है कि अचानक ही मेरी बड़ी बहन की सबसे सुन्दर सहेली ( जो मुझे बाद में ज्ञात हुआ ) वहाँ आई और पूछने लगी, ‘अरे छोटू! क्या हुआ?’  शर्म व झिझक से आरक्त-आनन मैं चुप रहा और कुछ भी नहीं बता पाया | उसने स्वयं ही समझते हुए मुस्कुराते हुए पायजामे की गाँठ बांधकर दिखाया कि ‘‘ऐसे बांधी जाती है |” वो सुन्दर चेहरा, दैवीय छवि, मोहक मुस्कान व कोकिला-वाणी से मुग्ध मैं इतना हतप्रभ था कि रोना व क्षोभ भूलकर एकटक देखता ही रह गया और उसी दिन नाड़ा बांधना सीख गया | 
      मेरी बहन को जब यह घटना ज्ञात हुई तो उसने पूछ ,’फिर किसने बांधा था छोटू ?’
      तुम्हारी सबसे अच्छी और सुन्दर सहेली ने ‘, मैंने जबाव दिया | जब उन सबको पता चला कि किसने नाड़ा बांधा था तो सब उसकी तरफ देख देख कर, मुंह दबा-दबा कर हंसने लगीं | वह सुधा सक्सेना थी उस समूह की सबसे सुन्दर लडकी |
       ‘अच्छा छोटू, तो वो तुम्हें अच्छी लगती है, पसंद है |’ सबने एक साथ पूछा |
        हाँ, मैंने सर हिलाते हुए कहा | और फिर सबका समवेत स्वर में ओहो.... के साथ ठहाके से मैं स्वयं कुछ न समझते हुए सहम गया |
      ‘आज स्मृतियों में मुस्कुराते हुए मैं सोचता हूँ’, हरीश कहने लगा, ‘ कि अवश्य ही सब सहेलियाँ इस बात पर काफी समय तक ठिठोली करती रही होंगीं | हाँ कृष्ण-जन्माष्टमी पर मेकेनाइज्ड हिंडोले उसी के घर में सजाये जाते थे जिनमें जेल के फाटक अपने आप खुलना, वासुदेव का कृष्ण को टोकरी में लेकर यमुना में जाना आदि होता था और मेरी खूब खातिरदारी हुआ करती थी |’
       
      

           
            
             

शुक्रवार, 19 अक्टूबर 2012

देवी के नौ रूप अर्थात – नारी के नौ रूप-भाव ...डा श्याम गुप्त





                                      ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...



            देवी के नौ रूप अर्थात –  नारी के नौ रूप-भाव 
 

               नारी को सदा ही आदि-शक्ति का रूप माना जाता है | संसार की उत्पत्ति, स्थिति, संसार चक्र की व्यवस्था, व लय .... सभी आदि-शक्ति का ही कृतित्व होता है | इसी प्रकार समस्त संसार व जीवन-जगत एवं पुरुष जीवन –नारी के ही चारों ओर परिक्रमित होता है | आदि-शक्ति या देवी के ये नौ रूप एवं नौ -दिवस ---वस्तुतः  नारी के विभिन्न रूपों व कृतित्वों के प्रतीक ही हैं | यथा----

१- शैलपुत्री --- वृषभ वाहिनी –अर्थात ...नारी बल का प्रतीक है...समस्त प्राणि-जगत व मानव की शक्ति प्रदायक ....पत्नी, माँ, पुत्री, भगिनी, मित्र ...प्रत्येक रूप में नारी- संसार व  पुरुष के लिए शारीरिक, मानसिक व आत्मिक बल प्रदायक होती है |

२-ब्रह्मचारिणी --–अष्टकमल आरूढा, श्वेत वस्त्र धारिणी ----- अर्थात नारी विद्या रूप है ---विद्या ही   शालीनता, तप, त्याग, सदाचार, संयम समयोचित वैराज्ञ प्रदान करती है, ये सभी नारी-शक्ति के मूल गुण हैं | यह ब्रह्म-ज्ञान है | नारी ही अपने विविध रूपों में मानव को, पुरुष को अष्ट-कमल रूपी विविध ज्ञान से युक्त करके उसे संसार में प्रवृत्त भी करती है-----विरत भी कर सकती है |

३-चंद्रघंटा --- मष्तिस्क पर चन्द्र का घंटा रूप –तीन नेत्र व दस भुजाएं, बाघ के सवारी --- स्वर्ण शरीर ---अर्थात तीनों लोकों  दशों दिशाओं में स्थित अपनी त्रिगुणमयी  माया –सत्, तम, रज से नियमित संसार चक्र द्वारा-- बलशाली होते हुए भी शान्ति का उद्घोष ---- नारी ही समस्त संसार में, पुरुष के मन में, जीवन में शारीरिक, मानसिक व आत्मिक शांति स्थापना द्वारा –ज्ञान का तेज, आयुष्य, आरोग्य, सुख, सम्पन्नता व कल्याण का मार्ग प्रशस्त करती है | 

४-कुष्मांडा ---बाघ पर सवार व अष्ट-भुजी --- दुर्गा .. अर्थात ब्रह्माण्ड, ब्रह्म-अंड की सृष्टि --- नारी ही तो सृष्टि की जनक है | मानव व संसार की रक्षा-सुरक्षा हेतु विविध प्रकार के दुर्ग बनाने में सक्षम, समस्त रोग, शोक आदि निवारक होती है  |

५-स्कन्द माता--- सवारी कमल एवं सिंह दोनों ....पद्मा व सिंह वाहिनी – समस्त प्रकार का कल्याण | है |  ब्रह्म रूप सनत्कुमार को गोद में लिए एवं सूक्ष् रूप में छह सिर वाली देवी भी गोद में | अर्थात नारी पुरुष व संसार के कल्याण हेतु कल्याण हेतु भयानक व दुर्दम्य निर्णय व रूप भी ले सकती है | नारी समस्त जगत व पुरुष की पालक धारक माता भी है | जीवन, जगत व शरीर के षट्चक्रों-विविध क्रियाओं( षटरसों या खटरस—दुनिया के प्रपंच , व्यावहारिक कला, ज्ञान, कर्म  ) की नियामक भी है |

६-कात्यायिनी ---पापियों की नाशक –ऋषियों-मुनियों की सहायक, चार भुजा, सिंह सवारी – नारी का सज्जनों व  ज्ञानियों के प्रति सदा ही सम्मान, प्रेम-भाव रहता है व  उन्हें दुष्ट जनों, पापियों से सदा ही सहायता व संरक्षण उनकी प्राथमिकता होती है |

७-कालरात्रि --- या शुभंकरी –काला शरीर, केश फैले हुए, विकट-स्वरुप, आँखों से अग्नि, अर्धनारीश्वर शिव की तांडव-मुद्रा ... काली रूप ... सदैव शत्रु व दुष्टों की संहारक ...संसार व मानव हेतु कल्याण कारक| नारी का रूप सदैव ही पुरुष व संसार हेतु कल्याणकारी, शुभ कारी ही होता है परन्तु आवश्यकता पडने पर पुरुष, पिता, पुत्र, पति, भ्राता  पर आपत्ति आने पर वही – दुष्ट जनों के लिए दुर्गा रूप, काली रूप रख सकती है.. | यही शक्ति का नारी का काली रूप है |

८-महागौरी –तपस्या से गौर वर्ण प्राप्ति, श्वेत बृषभ आरूढा, श्वेत वस्त्र, डमरू-त्रिशूल धारी, अन्नपूर्णा ---अर्थात नारी पुरुष के लिए त्याग, तपस्या, तप सब कर सकती है...पुरुष की, समस्त  संसार की पालक-पोषक शक्ति है जिसके लिए वह मान करती है, मनाती है, डमरू भी बजाती है और त्रिशूल का भय भी दिखाती है | पुरुष व मानव के हर वय के, जीवन के हर स्तर पर  वही तो अन्नपूर्णा है जो हर प्रकार का धन, वैभव सुख, शान्ति प्राप्ति में सहायक है |
                                

९-सिद्धिदात्री --- कमलासन पर,सुदर्शनचक्र, गदा, कमाल,शंख धारी, सरस्वती रूप श्वेत-वर्ण, महाज्ञान सहित सौम्य भाव , मधुर स्वर | विष्णु के ही अनुरूप संसार के समस्त चक्रीय-व्यवस्थाओं की नियामक.... | अर्थात नारी ही तो पुरुष के, जगत के, संसार के समस्त व्यवस्थाओं की नियामक होती है ...वही तो पुरुष को ज्ञान, कर्म व भक्ति रूपी समस्त सिद्धि-प्रसिद्धियों को प्राप्त करने में सहायक होती है, सम्पूर्ण जीवन तत्व व सम्पूर्ण सिद्धि...मोक्ष में सहायक होती है|
        यदि हम इन नवरात्र में नारी के हर वय-रूप की उपेक्षा, उस पर अन्याय, अनाचार, अत्याचार के विरुद्ध अपने सोच, विचार, समर्थन व यथासंभव कदम उठाने हेतु व प्रयत्न करने का निश्चय करें, यही देवी की सच्ची आराधना होगी |

                                        चित्र- दीपिका एवं  गूगल साभार...     

गुरुवार, 18 अक्टूबर 2012

सच का सामना ---वाह ! वाह ! क्या बात है जी .... डा श्याम गुप्त

                                                 ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ..

                      सच  का सामना ---वाह ! वाह ! क्या बात है जी ..... क्या अखबार, समाचार, फोटो, बकवास  किताबें  बेचने का अच्छा नया नुस्खा है ....
               पहले तो अनाचर, दुराचार,अतिचार, भ्रष्टाचार, बलात्कार , असत्य वादन ...सब करो ...मजे लूटो ...चुप रहो .....जब बात खुले, खुलने लगे, खुलती लगे तो सच का सामना करो ...... चटपटी ख़बरें - चित्र बेचने के लिए....पुस्तकें प्रकाशित करके बेचने  के लिए ....मीडिया व मूर्ख जनता में हीरो बनने के लिए |  चोरी पकड़ी जाय तो मैं तो बताने वाला ही था ...ढीठ बालमन, बालपन के झूठ की भांति |
              
              सच क्या है ...सच का सामना क्या  व क्यों ? ये क्या होता है ? ...सच पर तो चलना होता है |  जो अमूल्य ..जीवन तथ्य है, जीवन का व्यवहार है उस पर चलना, उसके अनुसार आचरण करना, सत्याचरण  ...सत्य है...... न कि सामना करना.... यदि सत्य पर चलेंगे तो झूठ के खुलासा व सत्य का सामना करने की नौबत ही नहीं आयेगी, न आनी चाहिए ....क्यों आनी चाहिए ? |
             सत्य तो वह होता है जो कृष्ण के निभाया ....जो राम का आचरण है | सीना ठोक कर  रास-रचाना, सीना ठोक कर छोडना, सीना ठोक  कर जग जाहिर १६ रानियाँ |.... सीना ठोक कर सीता की अग्नि परिक्षा, सीना ठोकर त्याग ...... न झूठ,  न कदाचरण ....न भेद खुलने का डर , न सच का सामना |
                     क्या इस झूठ के खुलासा, सच का सामना से समाज को कोई हित होने वाला है ....चटखारे लेने वालों व किताबें , अखबार बेचने वालो व स्वयं सामना करने वालों का अपना स्वार्थ ही  सधता है |---बाजारू स्वार्थ .....


बुधवार, 17 अक्टूबर 2012

डा श्याम गुप्त का गीत ----नव गीत पुराने कलशों में----

                                          ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...

नव  गीत पुराने कलशों में ....

नव गीत पुराने कलशों में ,
मैं भर कर के ले आया हूँ |
ज्यों विविध व्यंजन नवयुग के,
पत्तल-दौनों में लाया हूँ  |

हैं भाव नए गीतों के पर,
हैं शब्द-छंद प्राचीन विविध |
जैसे हो शुद्ध संग्रहित मधु ,
नव बोतल में भर लाया हूँ |

हो क्रान्ति नव विचारों की , हाँ -
सत्-शुचि अनुभव से अभिसिंचित |
कह  सकें कि युग मंथित स्वर के,
शुचि भाव संजो कर लाया हूँ |

नव पीढ़ी अन्वित नवोन्मेष ,
स्फूर्त व नूतन भाव-तथ्य |
भावित पूर्वजों के अनुभव से,
मज्जित, सज्जित कर लाया हूँ |

युगबोध निमज्जित नहीं रहे ,
कैसी कविता , कैसी गाथा  |
संचित  वे भूत-भविष्य भाव,
हित वर्तमान के लाया हूँ |

नवयुग की आशाओं से युत,
निज संस्कृति के संस्कार सहित |
पग रखें प्रगति के पथ पर हम,
आशा भविष्य की लाया हूँ ||


अगीत साहित्य दर्पण अध्याय-६ ..अगीत का कला पक्ष भाग दो ...डा श्याम गुप्त

                               ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...

                                      अगीत का कला पक्ष  -भाग दो
पिछली पोस्ट से आगे ......अलंकार ......
               मुख्यतया अंग्रेज़ी साहित्य के अलंकार -----मानवीकरण व ध्वन्यात्मक  अलंकार भी देखें .......

" असफलता आज थक गयी है ,
गुजरे हैं हद से कुछ लोग ,
उनकी पहचान क्या करें ?
अमृत पीना बेकार,
प्राणों की चाह है अधूरी ,
विह्वलता  और बढ़ गयी है |"                        ------डा सत्य ( मानवीकरण )

" नदिया मुस्कुराई 
कल कल कल खिलखिलाई ,
फिर लहर लहर लहराई |"                            ----- डा श्याम गुप्त -प्रेम काव्य से-(ध्वन्यात्मक )

                पुनुरुक्ति  प्रकाश व वीप्सा अलंकार ------
" श्रम से जमीन का नाता जोड़ें ,
श्रम जीवन का मूलाधार ,
श्रम से कभे न मानो हार ;
श्रम ही श्रमिकों की मर्यादा,
श्रम के रथ को फिर से मोड़ें | "                            ------ डा सत्य ( पुनुरुक्ति प्रकाश )

" एक रबड़ ,
खिंची खिंची खिंची -
और टूट गयी ;
ज़िन्दगी रबड़ नहीं ,
तो और क्या है ? "                                            -----राजेश कुमार द्विवेदी ( वीप्सा )

                       अन्योक्ति, स्मरण, वक्रोक्ति, लोकोक्ति, असंगति व अप्रस्तुत अलंकार ------
" बालू से सागर के तट पर ,
खूब घरोंदे गए उकेरे |
वक्त की ऊंची लहर उठी जब,
सब कुछ आकर बहा ले गयी |
छोड़ गयी कुछ घोंघे सीपी,
सजा लिए हमने दामन में || "                       ----- प्रेम काव्य से ( अन्योक्ति )

" अजब खेल हैं,  मेरे बंधु !
गड्ढे तुम खोदते हो ,
गिरता मैं हूँ ;
करते तुम हो-
भरता मैं हूँ |
फिर भी न जाने कौन सी डोर ,
खींच लेजाती है तुम्हारे पास ,
मेरे अस्तित्व को;
साँसें तुम्हारी निकलती हैं,
मरता मैं हूँ | "                                              ------ मंगल दत्त द्विवेदी 'सरस' ( असंगति)

" घिर गए हैं नील नभ में घन,
तडपने  लग गए तन मन ;
किसी  की याद  आई है,
महक महुए से आयी है | "                             ---- डा श्रीकृष्ण सिंह 'अखिलेश' ( स्मरण )

" आँख मूद कर हुक्म बजाना,
सच  की बात न मुंह पर लाना ;
पड जाएगा कष्ट उठाना | "                          ---- डा श्याम गुप्त ( वक्रोक्ति )

" ओ मानवता के दुश्मन !
थोड़े से दहेज के लिए,
जलादी प्यारी सी दुल्हन;
ठहर ! तुझे पछताना पडेगा,
ऊँट को पहाड़ के नीचे 
आना पडेगा | "                                         ----- विजय कुमारी मौर्या ( लोकोक्ति )

" मन के अंधियारे पटल पर ,
तुम्हारी छवि,
ज्योति-किरण सी लहराई;
एक नई कविता,
पुष्पित हो आई | "                                  ------ डा श्याम गुप्त ( अप्रस्तुत )


( ब) काव्य  के गुण और अगीत ----
               आचार्य मम्मट के अनुसार काव्य के गुण उसके अपरिहार्य तत्व हैं |अलन्कारादि  युक्त होने पर भी गुणों से हीन  काव्य आनंददायी  नहीं होता |   ये काव्य की आतंरिक शोभाकारक हैं |  काव्य के उत्कर्ष में मुख्य तत्व होते हैं | यद्यपि काव्याचार्यों के विभिन्न मत हैं परन्तु मूल रूप में काव्य के समस्त गुणों का मुख्यतः तीन गुणों में समावेश करके वर्णन किया जाता है | ये हैं---माधुर्य, ओज व प्रसाद ---ये गुण चित्त की वृत्तियों को को विषय-भावानुसार प्रकट व प्रदीप्त करते हैं |  माधुर्य --- का सम्बन्ध आह्लाद से है जिसमें अंतःकरण आनंद से द्रवित हो जाता है | ओज -- से चित्त दीप्त, प्रदीप्त व सम्पूर्ण होकर जोश, आवेग व ज्ञान के प्रकाश से भर उठता है | प्रसाद गुण --का सम्बन्ध व्याकपत्व, विकासमानता व प्रफुल्लता से है | अर्थात जो श्रवण मात्र से ही अपना अर्थ प्रकट कर दे | आचार्य विश्वनाथ के अनुसार --" स प्रसाद: समस्तेषु रसेषु रचनाषु च "..अर्थात प्रसाद गुण समस्त रसों व रचनाओं का सहज सामान्य व आवश्यक गुण है |
                       अगीत काव्य मुख्यतया: प्रसाद गुण द्वारा सहज भव-संप्रेषणीयता युक्त विधा है , परन्तु सामाजिक सरोकारों से युक्त होने के कारण तीनों ही गुण प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं | कुछ उदाहरण प्रस्तुत हैं-----माधुर्य गुण युक्त कुछ अगीत देखिये ------

" सपने में मिलने तुम आये,
धीरे  से तन छुआ,
आँखें भर आईं , दी  दुआ;
मौन  स्तब्ध साक्षात हुआ , 
सहसा विश्वास जमा -
मन को तुम आज बहुत भाये | "                        ------ डा सत्य 

" विविध रंगकी सुमन वल्लरी ,
विविध रंग की सुमनावालियाँ ;
एवं नव पल्लव लड़ियों से,
सीता ने विधि भांति सजाया |
हर्षित होकर लक्ष्मण बोले,
'करें पदार्पण स्वागत है प्रभु ! "                       ---- शूर्पणखा खंड काव्य से (डा श्याम गुप्त )

               ओज --अर्थात नवीन उद्बोधन, नवोन्मेष, उत्साह , ओज से पाठक का मन ज्ञानवान, स्फूर्त व दीप्त होजाय | वाणी, मन , शरीर , अंतस, बुद्धि व ज्ञान से व्यक्ति प्रदीप्त हो उठे ----- 
" रक्त बीज भस्मासुर ,
रावण अनेक यहाँ ;
शकुनी दुर्योधन-
कंस द्वार द्वार पर ;
चाहिए एक और -
नीलकंठ आज फिर | "                      -----श्रीकृष्ण द्विवेदी 'द्विजेश'

" नव युग का मिलकर
 निर्माण करें ,
मानव का मानव से प्रेम हो ,
जीवन में नव बहार आये | 
सारा संसार एक हो,
शान्ति औए सुख में-
 यह राष्ट्र लहलहाए "                                ----डा सत्य 

                 प्रसाद गुण के कुछ उदाहरण देखें | सीधी सीधी बात मन के अंदर तक विस्तार करती हुई, अर्थ- प्रतीति देती है----

" तुमे मिलने आऊँगा,
 बार बार आऊँगा |
 चाहो तो ठुकरादो, 
चाहो  तो प्यार करो |
भाव बहुत गहरे हैं,
इनको दुलरालो | "                                 --- डा सत्य 

" संकल्प ले चुके हम,
पोलियो मुक्त जीवन का,
धर्म और आतंक के ,
विष से मुक्ति का,
संकल्प भी तो लें हम | "                       ---जगत नारायण पांडे 


(स्) अभिधा, लक्षणा, व्यंजना ----- 

                    कथ्य की  तीन शक्तियाँ, कथ्यानुसार अर्थ-प्रतीति व भाव उत्पन्न करती हैं | कवि अपनी कल्पना शक्ति से कथ्य में विशिष्ट लक्षणा, शब्द व अर्थगत लाक्षणिकता उत्पन्न कर सकता है जो अर्थ-प्रतीति को रूपकों आदि द्वारा लाक्षणिकता देकर कथ्य-सौंदर्य प्रकट करता है ( लक्षणा ) अथवा दूरस्थ  भाव या अन्य विशिष्ट व्यंजनात्मक भाव देकर कथ्य में दूरस्थ सन्देश, छद्म-सन्देश या कूट-सन्देश या अन्योक्तियों द्वारा विशिष्ट अर्थ-प्रतीति से शब्द या भाव व्यंजना उत्पन्न करके कथ्य सौंदर्य बढाता है (व्यंजना ); अथवा वह सीधे सीधे शब्दों में अर्थ्वात्तात्मक भाव-कथ्य का वर्णन कर सकता है ताकि विषय की क्लिष्टता , अर्थ-प्रतीति में बाधक न बने और सामान्य से सामान्य जन में भी भाव-सम्प्रेषण किया जा सके (अभिधा ) |
                          यद्यपि अगीत मुख्यतया अभिधेयता को ग्रहण करता है तथापि विविध विषय-बोध के कारण व अगीत कवियों के भी प्रथमतः गीति व छंद विधा निपुण होने के कारण लक्षणाये  व व्यंजनाएं भी पर्याप्त मात्रा में सहज ढंग से पाई जाती हैं | यह प्रस्तुत उदाहरणों से और भी स्पष्ट होजाता है --

                       लक्षणात्मक अगीत ---- 

" शरद पूर्णिमा सुछवि बिखेरे ,
पुष्पधन्वा शर संधाने,
युवा मन पर किये निशाना;
सब  ओर छागई प्रणय गंध 
कामिनी के पुलके अंग् अंग् ,
नयन वाण आकर हैं घेरे | "                       ---- सोहन लाल सुबुद्ध ( अर्थ लक्षणा )

" स्वप्नों के पंखों पर,
 चढ कर आती है ;
नींद-
सच्ची साम्यवादी है | "                             --- डा श्याम गुप्त ( शब्द लक्षणा )

" निजी स्वार्थ के कारण मानव ,
अति दोहन कर रहा प्रकृति का | 
प्रतिदिन एक ही स्वर्ण अंड से ,
उसका लालच नहीं सिमटता |
चीर कलेजा एक साथ ही ,
पाना  चाहे स्वर्ण खजाना | "                     ---- सृष्टि महाकाव्य से     


                      व्यंजनात्मक  अगीतों के उदाहरण प्रस्तुत हैं.-----

" तुमने तो मोम का ,
पिघलना ही देखा है |
पिघलने के भीतर का,
ताप नहीं देखा |"                             -----डा सरोजिनी अग्रवाल 

" गीदड़ों के शोर में,
मन्त्रों की वाणी ,
दब गयी है ;
भीड़ की चीखों में,
मधुरिम्  स्वर,
नहीं मिलते | "                               ----डा मिथिलेश दीक्षित 


                     अभिधात्मक अगीतों के निम्न उदाहरण पर्याप्त होंगे -----

" कुछ नेताओं का,
वजूद कैसा;
स्वयं के लिए ही जीते ;
सत्य तुम बिलकुल रीते | "                       ---- क्षमा पूर्णा पाठक 

" मेरी मां ने मुझे पढ़ाया ,
मां न चाहती क्या पढ़ पाता ;
आजीवन  पछताता रहता |
मेरे हिस्से का श्रम करके,
उसने ही स्कूल पठाया ,
मुझको रचनाकार बनाया | "                    --- सोहन लाल सुबुद्ध 

" नीम ,
 जिसमें गुण है असीम ;
मानव हितकारी ,
हरता अनेक बीमारी ;
द्वार की शोभा है नीम ,
पारिवारिक हकीम है नीम | "                       ----- सुरेन्द्र कुमार वर्मा ( मेरे अगीत छंद से )

" गीत मेरे तुमने जो गाये,
मेरे मन  की पीर अजानी ,   
छलक उठी आंसू भर आये |
सोच रहा बस जीता जाऊं ,
गम् के आंसू पीता जाऊं | 
गाता रहूँ गीत बस तेरे ,
बिसरादूं सारे जग के गम्  | "                     --- प्रेम काव्य से ( डा श्याम गुप्त )                      



                                                         ---- इति ---
                                                    अगीत साहित्य दर्पण