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डा श्याम गुप्त का ब्लोग...

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Lucknow, UP, India
एक चिकित्सक, शल्य-चिकित्सक जो हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान व उसकी संस्कृति-सभ्यता के पुनुरुत्थान व समुत्थान को समर्पित है व हिन्दी एवम हिन्दी साहित्य की शुद्धता, सरलता, जन-सम्प्रेषणीयता के साथ कविता को जन-जन के निकट व जन को कविता के निकट लाने को ध्येयबद्ध है क्योंकि साहित्य ही व्यक्ति, समाज, देश राष्ट्र को तथा मानवता को सही राह दिखाने में समर्थ है, आज विश्व के समस्त द्वन्द्वों का मूल कारण मनुष्य का साहित्य से दूर होजाना ही है.... मेरी तेरह पुस्तकें प्रकाशित हैं... काव्य-दूत,काव्य-मुक्तामृत,;काव्य-निर्झरिणी, सृष्टि ( on creation of earth, life and god),प्रेम-महाकाव्य ,on various forms of love as whole. शूर्पणखा काव्य उपन्यास, इन्द्रधनुष उपन्यास एवं अगीत साहित्य दर्पण (-अगीत विधा का छंद-विधान ), ब्रज बांसुरी ( ब्रज भाषा काव्य संग्रह), कुछ शायरी की बात होजाए ( ग़ज़ल, नज़्म, कतए , रुबाई, शेर का संग्रह), अगीत त्रयी ( अगीत विधा के तीन महारथी ), तुम तुम और तुम ( श्रृगार व प्रेम गीत संग्रह ), ईशोपनिषद का काव्यभावानुवाद .. my blogs-- 1.the world of my thoughts श्याम स्मृति... 2.drsbg.wordpres.com, 3.साहित्य श्याम 4.विजानाति-विजानाति-विज्ञान ५ हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान ६ अगीतायन ७ छिद्रान्वेषी ---फेसबुक -डाश्याम गुप्त
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मंगलवार, 10 दिसंबर 2019

किस्से श्याम के ---- किस्सा एक --- प्रेम से प्रथम परिचय----डा श्याम गुप्त

                                   ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...


किस्से श्याम के ----


किस्सा एक --- प्रेम से प्रथम परिचय

      “यार, बड़ी शोध कर रखी है प्रेम पर! कहानी भी लिखी जा सकती है..लिख डालो|” श्रीकांत मेरा महाकाव्य, प्रेमकाव्य-महाकाव्य पढ़कर हंसते हुए कहने लगा

       हाँ, सच कह रहे हो, लिखी हुई है,  मैंने भी हंसकर कहा, लो आज खोल ही देते हैं उस फ़साने को |इसी बात पर आज तुम्हें अपना ही प्रेम से प्रथम परिचय की मजेदार गाथा सुना ही देता हूँ | क्या याद करोगे |

       अरे वाह ! क्या कहने |..श्रीकांत पालथी मार कर बैठ गया |

    प्रेम से मेरा प्रथम-परिचय जब हुआ जब मैं एक बालक था,कक्षा एक का छात्र मैं मुस्कुराकर कहने लगा|

      “क्या,कक्षा एक का छात्र !! “  वेवकूफ बना रहे हो |पता  है कि आपका मिजाज़ लड़कपन से आशिकाना है ...पर कक्षा एक का छात्र..?

      ‘हाँ, ठीक सुना, अब वेवकूफ बनते हुए सुनते जाओ, टोको मत |’मैं कहता गया ,‘मेरा दाखिला मेरी बड़ी बहन के साथ कन्या-पाठशाला में ही कराया गया, जो स्वयं कक्षा की छात्रा थी | एक बार जब में कक्षा से बाहर गया तो पायजामे का नाड़ा ही नहीं बाँध पा रहा था, बहन का क्लास-रूम ही पता था | इसी क्षोभ में, मैं आंसू लिए हुए स्कूल के मुख्य द्वार की चौकी पर बैठा काफी देर तक सुबकता रहा |’

      मुझे अभी भी जहां तक स्मृति की गलियों में कदमताल है, याद है कि अचानक ही मेरी बड़ी बहन की सबसे सुन्दर सहेली (जो मुझे बाद में ज्ञात हुआ) वहाँ आई और पूछने लगी, ‘अरे छोटू! क्या हुआ?’ शर्म झिझक से आरक्त-आनन मैं चुप रहा और कुछ भी नहीं बता पाया | उसने स्वयं ही समझते हुए मुस्कुराते हुए पायजामे की गाँठ बांधकर दिखाया कि ‘‘ऐसे बांधी जाती हैवो सुन्दर चेहरा, दैवीय छवि, मोहक मुस्कान कोकिला-वाणी से मुग्ध मैं इतना हतप्रभ था कि रोना क्षोभ भूलकर एकटक देखता ही रह गया और उसी दिन नाड़ा बांधना सीख गया

     मेरी बहन को जब यह घटना ज्ञात हुई तो उसने पूछा,’ फिर किसने बांधा था छोटू ?’

     तुम्हारी सबसे अच्छी और सुन्दर सहेली ने‘, मैंने जबाव दिया | जब उन सबको पता चला कि किसने नाड़ा बांधा था तो सब उसकी तरफ देख देख कर, मुंह दबा-दबा कर हंसने लगीं| वह सुधा सक्सेना थी उस समूह की सबसे सुन्दर लडकी |

     ‘अच्छा छोटू, तो वो तुम्हें अच्छी लगती है, पसंद हैसबने एक साथ पूछा |

     हाँ, मैंने सर हिलाते हुए कहा| और फिर सबका समवेत स्वर में ओहो....के साथ ठहाके से मैं स्वयं कुछ समझते हुए सहम गया |

      ‘आज स्मृतियों में मुस्कुराते हुए मैं सोचता हूँ कि अवश्य ही सब सहेलियाँ इस बात पर काफी समय तक ठिठोली करती रही होंगीं | हाँ कृष्ण-जन्माष्टमी पर मेकेनाइज्ड हिंडोले उसी के घर में सजाये जाते थे जिनमें जेल के फाटक अपने आप खुलना, वासुदेव का कृष्ण को टोकरी में लेकर यमुना में जाना आदि होता था और मेरी खूब खातिरदारी हुआ करती थी |’

           ओहो ........श्रीकांत के मुख से अनायास ही निकला |

                                  



 

सोमवार, 27 फ़रवरी 2017

बात गीतों की----- भाग चार --अंतिम क़िस्त---डा श्याम गुप्त

                                ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...


--------- बात गीतों की----- भाग चार --अंतिम क़िस्त ------




-------------- आज यदि हम किसी पत्रिका या पत्र या अंतरजाल पत्रिकाओं या अंतरजाल पर चिट्ठों ( ब्लोग्स-आदि ) को उठाकर देखें तो विविध रूप में कविताओं आदि के साथ-साथ गीत अपने विविध रूप रंगों यथा - प्राचीन गीत, आधुनिक गीत, वैयक्तिक गीत, राष्ट्रीय गीत, श्रृंगार गीत, प्रगतिवादी गीत, नवगीत, अगीत, प्रचार गीत, लोक शैली के गीत एवं ग़ज़ल गीत, गीतिका आदि में अपनी छटा विखेरता हुआ मिलता है |
-------------------अंतरिक्ष यात्रियों, वैज्ञानिकों द्वारा बादलों की रंगीनी, नक्षत्रों के सौन्दर्य का रागात्मक वर्णन इसी काव्यानंद, गीत-भाव को प्रदर्शित करता है जिसके बिना मानव जीवन अपंग है |
------अर्थात वैज्ञानिक बुद्धिवाद, गद्य का अपरम्पार प्रयोग भी उल्लास के भावनात्मक क्षणों को नहीं रोक पाता जब मानव मन में नभ में छिटके हुए तारों को, खिले हुए पुष्पों देखकर गीतात्मकता का भाव उत्पन्न होता है |
----- उल्लास का वही क्षण उसे पुष्प के तात्विक विवेचन की शक्ति देता है अन्यथा विश्लेष्य, विश्लेषण व विश्लेषक सभी इतने यांत्रिक होजायं कि मानव मन उसे समन्वित ही न कर पाय |
------गीत में भाव, शब्द, तन्मयता आदि विशेषताएं भिन्न भिन्न होते हुए भी एक लय से जुडी रहती हैं | गीत के प्रति आकर्षण के मूल में संभवतया यही सहज सम्प्रेषणीयता है |
------------------------यही कारण है कि अनेक अवरोधों के बाद भी गीत आज तक अपनी चमक दिखा रहा है| गीत का श्रृंगार है-शालीनता और संक्षिप्तता | लय आधारित होना अथवा संगीतमय लोकगीतों का ध्रुवपद पर आधारित होना गीत की विशेषता है जो इसे गीत बनाती है| गीत जो मृत्युंजय है, कालजयी है |

---------------------जहां तक पारंपरिक गीतों में एवं श्रृंगार व प्रेम की बात है| गीतों के मूल में पराविद्या की अपार्थिवता, वेदान्त के अद्वैत, लौकिक प्रेम की तीब्रता, कबीर का सांकेतिक द्वैत दाम्पत्य सूत्रभाव एवं निराला का स्नेह का सम्बन्ध समायोजित रहता है |
-------------- आदि-सृष्टि की रचना भी तो उस परमतत्व के आदि-प्रेम भाव, आदि-इच्छा, ईषत इच्छा का सौन्दर्यमय श्रृंगारसिक्त प्राकट्य से उद्भूत प्रकृति-गीत ही है| प्रेम से ही तो पृथ्वी पर जीवन-स्पंदन है, जीवन-क्रंदन है | प्रेम ही वह तत्व है जिससे मानव दिव्य होजाता है| इस दिव्यता का सरित-प्रवाह लोक से होकर ही जाता है जो सहज, सरल एवं ऋजु जीवन मार्ग है, छल कपट अहं का त्याग एवं सरल ह्रदय युत | घनानंद के शब्दों में ---
अति सूधो सनेह कौ मारग है, जहां नैकु सयानप बांक नहीं |
जहां सांचे चलें तजि आपुनपौ, झिझकें कपटी जो निसाँक नहीं ||

-------------------प्रेम व श्रृंगार जीवन का उत्स है सम्पूर्णता है जीवन का संगीत है, जीवन का जीवन है जिसकी आराधना हर गीतकार करता है|
----- प्रीति-स्मृतियाँ कोमलतम व सुन्दरतम अनुभूतियां होती हैं, चाहे बालमन की हों या कैशोर्य की या युवा मन की, सखा-सखी या प्रेमी-प्रेमिका या साथी-संगिनी की|
-----कवि मन तो कभी वृद्ध होता ही नहीं | स्मृतियाँ चाहे पल भर के संयोग की मिलन की हों या विरह की या सतत सान्निध्य की, कवि उनमे विविध विम्ब, कल्पनाएँ उकेर कर रंग भरता है, उन्हें घटनाक्रम देता है|
-------------------गीतों में प्रेम या श्रृंगार, मांसल-सौन्दर्य की व्याख्या नहीं अपितु आत्मिक सौदर्य के निर्मल सरोवर में खिलते हुए शतदल की शोभा को निरखते-परखते-सराहते काव्यानंद रूपी आत्मानंद से परमात्मानंद तक की यात्रा होती है, सत्य-शिव-सुन्दर रूप में काव्य-सृजन का पथ होता है |
------अतःगीतों में मर्यादित श्रृंगार ही श्रृंगार है अन्यथा वह अश्लीलता बन जाता है | प्रेम व श्रृंगारिक रचना सरल, सरस व अर्थ गाम्भीर्य के साथ गहन तत्वार्थ लिए हुए, क्लिष्ट शब्दों-भावों से दूर अभिधात्मक होनी चाहिए|
----- श्रृंगार गीत रचना नारी रूप-सौन्दर्य की भाँति है अर्थात शब्दावली, तथ्य, कथ्य इस प्रकार होने चाहिए कि श्रृंगार का आनंद भी मिले एवं खुलापन भी न रहे| ....यथा महाकवि बिहारी दास के शब्दों में ---
“कवि आखर अरु तिय सेकून, अध उघरे सुख देत,
अधिक ढके तो सुख नहीं, उघरे महा अहेत | “

---------------- उषा का युवती रूप सौन्दर्य, अगस्त्य–लोपामुद्रा, यम-यमी, उर्वशी-पुरुरवा के वैदिक गीतों से वाल्मीकि एवं कालिदास से होते हुए विद्यापति, केशव, विहारी दास, रहीम, तुलसी, सूर, मीरा, महादेवी वर्मा, जयशंकर प्रसाद आदि से गुजरते हुये आधुनिक हिन्दी गीत में प्रेम के संयोग व वियोग के सभी भावों–पक्षों के गीतों एवं श्रृंगार रचनाओं-गीतों की लम्बी परम्परा है | ऋग्वेद में ऋषि वामदेव का कथ्य श्रृंगार का अनुपम उदाहरण है –
“कन्येव तन्वा शाश्दानां ऐषि देवि देवप्रिय क्षमांणम |
संस्मयमाना युवतिः पुरस्तादार्विवक्षांसि कृणुते विभाति |

---- वह (उषा देवि) कमनीय कन्या के समान सज्जित वेश में देवों के प्रिय देव, अभिमत फलदाता सूर्य के निकट जाती है और यह मंद मंद मुस्कुराती हुई युवती उसके समक्ष अपने वक्ष प्रदेश को अनावृत्त कर देती है |

---------------- प्रेम के दो अक्षर अथवा कबीर की भाषा में ढाई आखर अपने अन्दर से असीम प्रभा उद्भासित करते हैं और श्रृंगार उस प्रभा की लौकिक अभिव्यक्ति है जो सर्वाधिक प्रभावी ढंग से गीतों में उद्भूत होती है | प्रेमगीत- जिसे हर अणु, जड़, जंगम या जीव, हर मानव ह्रदय गुनुगुनाता है | बस कवि उन्हें कागज़ पर उतारने का प्रयत्न करता है |
                                            -------इति-------- बात गीतों की -----



 

सोमवार, 20 फ़रवरी 2017

वह यहीं है---डा श्याम गुप्त ----

....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...



वह यहीं है ...ग़ज़ल...


वो कहते हैं कि ईश्वर कहीं नहीं है |
मैं कहता हूँ खोजने में कमी कहीं है |

उनका कहना है, वह बस कल्पना ही है,
है हर कहीं, जग उसकी अल्पना ही है |

उसने कहा किसी ने पाया भला कभी,
मैंने कहा, है, तू ढूंढ पाया नहीं है |

जग की गज़ब कारीगरी क्यों देखता नहीं,
जिसकी है बाजीगरी, बस वह वही है |

सदियों से ज्ञानी, विज्ञजन, तत्वज्ञ, साधु-संत,
क्यों खोज में लगे हैं, उसकी, जो नहीं है |

तत्वों के अंतर में, तारों के पार भी,
जो खोजते साइंसदां, क्या वही नहीं है |

मन में यदि बसाए, परमार्थ प्रीति -भाषा,
स्वारथ को भूलकर, तू देख, तू वही है |

तू ढूँढता फिरे है, जाने कहाँ कहाँ,
बस ढूंढ श्याम' दिल में,वह यहीं है यहीं है ||


पद---

मैं तो खोजि खोजि कें हारो |
ब्रह्म हू जान्यो, पुरानन खोजो, गीता बचन उचारो |
ज्ञान वार्ता, धरम-करम औ भक्ति-प्रीति मन धारो |
कथा रमायन, वेद-उपनिषद् ढूँढो अग-जग सारो |
पोथी पढ़ि पढ़ि भजन -कीरतन रत अति भयो सुखारो |
किधों रहै कित उठै औ बैठे कौन सो ठांव तिहारो |
कबहुं न काहू कतहु न पायो प्रभु का रूप संवारो |
थकि हारो अति आरत , राधे राधे नाम पुकारो |
कुञ्ज-कुटीर में लुकौ राधिका पाँव पलोटतु प्यारो |
सो लीला छवि निरखि श्याम' तन मन अति भयो सुखारो ||



 

शनिवार, 20 अक्टूबर 2012

प्रेम से प्रथम परिचय ..डा श्याम गुप्त की कहानी ....

                                 ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...

 
                          प्रेम से प्रथम परिचय
         श्रीकांत पढते-पढते कहने लगा, ‘वाह! क्या बात है, अति सुन्दर |’
         क्या सुन्दर है भई, क्या पढ रहे हो ? हरीश ने  पूछा |
         “लव्स लेवर्स लौस्ट “
         ओह ! शेक्सपीयर का प्रसिद्द पर विवादास्पद शीर्षक व विषय वाला नाटक | बहुत पहले पढ़ा था | क्या डिटेल कथा है, फिर सुनते हैं ? हरीश कहने लगा | 
        हाँ, कथा यूँ है कि ...”महिलाओं से दूरी रखने वाले राजा व उसके मित्रगण जब महिलाओं के संपर्क में आते हैं तो वे राजकुमारी व सखियों से प्रेम करने लगते हैं | अंत में अन्य राज्य में सिंहासन की वारिस बनने पर जब राजकुमारी को जाना होता है तो राजा व मित्रगण तो अपने प्रेम को स्वीकारते हैं व वायदे निभाने की बात करते हैं परन्तु राजकुमारी को उस प्रेम पर पूर्ण विश्वास नहीं है अतः वह उन्हें एक वर्ष इंतज़ार को कहती है |”  श्रीकांत ने बताया |
      “यह ऋग्वेद की प्रथम कथा ‘पुरुरवा-उर्वशी’, शायद विश्व की प्रथम प्रेम-कथा, से मेल खाती है| जिसमें उर्वशी भी इसी भान्ति पलायन कर जाती है | स्त्रियाँ स्वभावतः शंकालु व अविश्वासी होती हैं |” हरीश कहने लगा,  “इसी प्रकार टेनीसन की कविता “द प्रिंसेस” है जिसमें ठुकराई हुई राजकुमारी पुरुषों से नफ़रत करती है और सिर्फ महिलाओं की यूनिवर्सिटी स्थापित करती है | परन्तु क्रमिक घटनाओं के फलस्वरूप राजकुमार के संपर्क में आने पर अंतत उससे प्रेम करने लगती है | वास्तव में दोनों ही कृतियाँ तत्कालीन इंग्लेंड में स्त्रियों की स्वतंत्रता व अधिकारों का समर्थन करती हैं |” 
       क्यों, क्या इंग्लेंड में १६-१७ वीं शताब्दी में स्त्रियों को स्वतन्त्रता नहीं थी? श्रीकांत पूछने लगा |
      ‘ हाँ, निश्चय ही, हरीश ने कहा, जबकि हमारे यहाँ तो हज़ारों वर्ष पहले भी सती, पार्वती, उर्वशी, घोषा, गार्गी, राधा आदि स्त्रियों को पूर्ण स्वतन्त्रता प्राप्त थी; यद्यपि यह स्व-आचरण नियमित स्वाधीनता थी | हाँ लंबे पराधीनता काल में विधर्मी प्रभाव जनित उच्छृंखलता-वश महिलाओं की स्थिति अवश्य कमजोर होगई थी |”
      ‘इस नाटक का शीर्षक ही विचित्र व असंगत है | जिसकी योरपीय समाज व साहित्य में भी काफी छीछालेदर हुई थी | हरीश पुनः कहने लगा |, “ भई, प्रेम न तो ‘लेबर’ होता है न कभी ‘लौस्ट’ होता है|  “लव इस नैवर लौस्ट”... प्रेम तो ‘इटरनल’...सर्वव्यापी, सदा- सर्वदा उपस्थित है, जीवित है, सर्वत्र विराजमान, कण कण में व्याप्त सृष्टि का मूल भाव तत्व है| एक छोर पर वेदान्ती का प्रेम ब्रह्म है तो दूसरे छोर पर संसारी मानव का प्रेम अपना प्रेमी-प्रेमिका | आस्तिक ईश्वर से प्रेम करता है तो नास्तिक अपने सहज, प्राकृतिक सिद्धांत से | भौतिक विज्ञानी का प्रेम ‘परमाणु’ है तो दार्शनिक का अध्यात्म | अमीर को पैसे से प्रेम है तो खिलाड़ी को अपने खेल-प्रेम का जुनून |  पंडित जन ‘ज्ञान’ को ही प्रेम करते हैं तो भक्त पाहन-मूर्ति को जिसे वह पूजता है|  यह शिव-शक्ति, माया-ब्रह्म, प्रकृति-पुरुष के जो द्वैत हैं वे ब्रह्माण्ड के तीन मूल तत्वों –त्रिगुण --–सत्, तम, रज ..के चहुँ ओर परिक्रमित रहते हैं | इन तत्वों के मध्य एक आकर्षण शक्ति है जो सृष्ट-सृजन की क्रियाविधि का प्रारंभन करती है; मूल तत्त्व के अद्वैत अर्थात अक्रियाशीलता को द्वैत अर्थात क्रियाशीलता में परिवर्तित करती है | इसी के पश्चात ब्रह्म-माया, शिव-शक्ति, पुरुष-प्रकृति के सृजन सम्बंधित, सम्बन्ध विकसित होते हैं| यही प्रेम है जो सर्वव्यापी, अपरिमापी तथा कभी विनष्ट न होने वाला है ..न सृष्टि में, न स्थिति में न प्रलय में | “
        “वाह ! क्या प्रेम गाथा है | वैसे वास्तविक सांसारिक भाव में तो प्रेम दो विपरीत-लिंगी के मध्य आकर्षण को कहते हैं | और सही में तो यह ‘पालने’ में ही प्रस्फुटित  होजाता है जैसा सिगमंड फ्रायड व अन्य मनो-दार्शनिक कहते हैं कि पुत्र माँ को अधिक चाहता है, पुत्री, पिता को, भाई-बहन के मध्य भी यही स्वाभाविक आकर्षण रहता है इसी सर्व-व्यापी फेक्टर- गुण, विपरीत लिंगी आकर्षण, के कारण |” श्रीकांत ने भी जोड़ा |
         “ हाँ सही कहा, इस प्रकार माँ व संतान का प्रेम सर्वप्रथम भाव है जो जीव, आत्म-तत्व अनुभव करता है गर्भ से बाहर आकर, अपितु गर्भ के अंदर भी | यह वात्सल्य है | और आगे चलें तो एच्छिक व स्वाभाविक प्रेम दो अनजान विपरीत लिंगी, स्त्री तत्व—पुरुष तत्व, के मध्य आकर्षण होता है| यही वास्तविक प्रेम है जिसे सांसारिक मानव व्यवहार में जाना व समझा जाता है | यह अनजान-प्रेम...  ‘काफ-लव’ भी होसकता है...एक तरफा भी, अव्यक्त प्रेम भी या एक प्रेम-कहानी |”  हरीश ने और अधिक स्पष्ट करते हुए कहा |
         “यार, बड़ी शोध कर रखी है प्रेम पर ! कहानी भी लिखी जा सकती है..लिख डालो|” श्रीकांत हंसते हुए कहने लगा |  
         हाँ, सच कह रहे हो, हरीश भी हंसकर कहने लगा, “लो आज खोल ही देते हैं उस फ़साने को |” इसी बात पर आज तुम्हें अपना ही प्रेम से प्रथम परिचय की मजेदार गाथा सुना ही देता हूँ | क्या याद करोगे | कहानी समझकर ही सुनना |”
         अरे वाह ! क्या कहने |..श्रीकांत पालथी मार कर बैठ गया |
         “प्रेम से मेरा प्रथम परिचय जब हुआ जब मैं एक बालक था, कक्षा एक का छात्र “हरीश मुस्कुराकर कहने लगा,
        “ क्या, कक्षा एक का छात्र !..! “  वेवकूफ बना रहे हो |
         ‘हाँ, ठीक सुना, अब वेवकूफ बनते हुए सुनते जाओ, टोको मत |’ हरीश बोला, ‘मेरा दाखिला मेरी बड़ी बहन के साथ कन्या पाठशाला में ही कराया गया, जो स्वयं कक्षा ८ की छात्रा थी | एक बार जब में कक्षा से बाहर गया तो पायजामे का नाड़ा ही नहीं बाँध पा रहा था, न बहन का क्लास-रूम ही पता था | इसी क्षोभ में मैं आंसू लिए हुए स्कूल के मुख्य द्वार की चौकी पर बैठा काफी देर तक सुबकता रहा |’
        मुझे अभी भी जहां तक स्मृति की गलियों में कदमताल है, याद है कि अचानक ही मेरी बड़ी बहन की सबसे सुन्दर सहेली ( जो मुझे बाद में ज्ञात हुआ ) वहाँ आई और पूछने लगी, ‘अरे छोटू! क्या हुआ?’  शर्म व झिझक से आरक्त-आनन मैं चुप रहा और कुछ भी नहीं बता पाया | उसने स्वयं ही समझते हुए मुस्कुराते हुए पायजामे की गाँठ बांधकर दिखाया कि ‘‘ऐसे बांधी जाती है |” वो सुन्दर चेहरा, दैवीय छवि, मोहक मुस्कान व कोकिला-वाणी से मुग्ध मैं इतना हतप्रभ था कि रोना व क्षोभ भूलकर एकटक देखता ही रह गया और उसी दिन नाड़ा बांधना सीख गया | 
      मेरी बहन को जब यह घटना ज्ञात हुई तो उसने पूछ ,’फिर किसने बांधा था छोटू ?’
      तुम्हारी सबसे अच्छी और सुन्दर सहेली ने ‘, मैंने जबाव दिया | जब उन सबको पता चला कि किसने नाड़ा बांधा था तो सब उसकी तरफ देख देख कर, मुंह दबा-दबा कर हंसने लगीं | वह सुधा सक्सेना थी उस समूह की सबसे सुन्दर लडकी |
       ‘अच्छा छोटू, तो वो तुम्हें अच्छी लगती है, पसंद है |’ सबने एक साथ पूछा |
        हाँ, मैंने सर हिलाते हुए कहा | और फिर सबका समवेत स्वर में ओहो.... के साथ ठहाके से मैं स्वयं कुछ न समझते हुए सहम गया |
      ‘आज स्मृतियों में मुस्कुराते हुए मैं सोचता हूँ’, हरीश कहने लगा, ‘ कि अवश्य ही सब सहेलियाँ इस बात पर काफी समय तक ठिठोली करती रही होंगीं | हाँ कृष्ण-जन्माष्टमी पर मेकेनाइज्ड हिंडोले उसी के घर में सजाये जाते थे जिनमें जेल के फाटक अपने आप खुलना, वासुदेव का कृष्ण को टोकरी में लेकर यमुना में जाना आदि होता था और मेरी खूब खातिरदारी हुआ करती थी |’