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डा श्याम गुप्त का ब्लोग...
- shyam gupta
- Lucknow, UP, India
- एक चिकित्सक, शल्य-चिकित्सक जो हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान व उसकी संस्कृति-सभ्यता के पुनुरुत्थान व समुत्थान को समर्पित है व हिन्दी एवम हिन्दी साहित्य की शुद्धता, सरलता, जन-सम्प्रेषणीयता के साथ कविता को जन-जन के निकट व जन को कविता के निकट लाने को ध्येयबद्ध है क्योंकि साहित्य ही व्यक्ति, समाज, देश राष्ट्र को तथा मानवता को सही राह दिखाने में समर्थ है, आज विश्व के समस्त द्वन्द्वों का मूल कारण मनुष्य का साहित्य से दूर होजाना ही है.... मेरी तेरह पुस्तकें प्रकाशित हैं... काव्य-दूत,काव्य-मुक्तामृत,;काव्य-निर्झरिणी, सृष्टि ( on creation of earth, life and god),प्रेम-महाकाव्य ,on various forms of love as whole. शूर्पणखा काव्य उपन्यास, इन्द्रधनुष उपन्यास एवं अगीत साहित्य दर्पण (-अगीत विधा का छंद-विधान ), ब्रज बांसुरी ( ब्रज भाषा काव्य संग्रह), कुछ शायरी की बात होजाए ( ग़ज़ल, नज़्म, कतए , रुबाई, शेर का संग्रह), अगीत त्रयी ( अगीत विधा के तीन महारथी ), तुम तुम और तुम ( श्रृगार व प्रेम गीत संग्रह ), ईशोपनिषद का काव्यभावानुवाद .. my blogs-- 1.the world of my thoughts श्याम स्मृति... 2.drsbg.wordpres.com, 3.साहित्य श्याम 4.विजानाति-विजानाति-विज्ञान ५ हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान ६ अगीतायन ७ छिद्रान्वेषी ---फेसबुक -डाश्याम गुप्त
बुधवार, 27 मई 2015
शनिवार, 9 मई 2015
माँ ---मातृ दिवस पर---डा श्याम गुप्त ..
....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...
माँ
जितने भी पदनाम सात्विक, उनके पीछे मा होता है |
चाहे धर्मात्मा, महात्मा, आत्मा हो अथवा परमात्मा |
जो महान सत्कार्य जगत के, उनके पीछे माँ होती है
|
चाहे हो वह माँ कौशल्या, जीजाबाई या जसुमति माँ
|
पूर्ण शब्द माँ ,पूर्ण ग्रन्थ माँ, शिशु वाणी का
प्रथम शब्द माँ |
जीवन की हर एक सफलता, की पहली सीढी होती माँ |
माँ अनुपम है वह असीम है, क्षमा दया श्रृद्धा का
सागर |
कभी नहीं रीती होपाती, माँ की ममता रूपी गागर |
माँ मानव की प्रथम गुरू है,सभी सृजन का मूलतंत्र
माँ |
विस्मृत ब्रह्मा की स्फुरणा, वाणी रूपी
मूलमन्त्र माँ |
सीमित तुच्छ बुद्धि यह कैसे, कर पाए माँ का
गुणगान |
श्याम करें पद वंदन, माँ ही करती वाणी बुद्धि
प्रदान ||
शुक्रवार, 3 अप्रैल 2015
इनसे कुछ नहीं होगा ....डा श्याम गुप्त
....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...
इनसे कुछ नहीं होगा
-----आदिशक्ति...नारी
सृष्टि का आधार है, परन्तु ‘एकोहं बहुस्यामि’ के सृष्टि-विचार का आधार तो
ब्रह्म...पुरुष ही है |
---मनुस्मृति-पुरुष ही
लिखता है, किसी भी नारी ने कोई महान कालजयी ग्रन्थ की रचना की है?..नहीं|
इसमें पुरुष-प्रधान समाज का घिसा-पिटा गाना गाया जासकता है परन्तु उस समाज में तो
नारी-पुरुष का समान अधिकार था | तभी तो लोपामुद्रा, घोषा, अपाला, यमी, भारती आदि
ऋषिकाओं की उपस्थिति है |
----जब जब भी पुरुष निर्बल,
असहाय होजाता है तब-तब नारी दुर्गा रूप लेकर युद्धरत होती है ..यह अवधारणा
केवल भारत में ही है, अन्य कहीं है भी तो यहीं से गयी हुईं, फ़ैली हुई संस्कृतियों
में व उनकी स्मृतियों/ कथाओं में हैं| परन्तु दुर्गा को बल ब्रह्मा, विष्णु,
शिव व अन्य देवता, अर्थात पुरुष ही, अपनी शक्तियों के रूप में देते हैं तब दुर्गा में शक्ति का अवतरण होता है | उस
प्रचंड शक्ति के काली रूपमें
उद्दाम, असंयमित वेग को पुरुष (महादेव) ही रोकता है, नियमित करता है
|
-----पुरुष-श्री कृष्ण के
गुणों पर नारियां रीझती हैं, विष्णु को पति रूप में पाने हेतु, शिव के लिए भी तप
करती हैं ..परन्तु कोइ एसा केंद्रीय नारी चरित्र नहीं है जिसके गुणों पर संसार भर
के पुरुष रीझ जाएँ | हाँ शारीरिक रूप सौन्दर्य के दीवानों की गाथाएँ अवश्य मिलतीं
हैं |
अतः
निश्चय ही सृष्टि की जनक नारी है परन्तु पुरुष की नियमन व्यवस्था के अनुसार
| अतः आज के परिप्रेक्ष्य में ---
-----वे पुरुष के आचरण
सुधार की बातें करती रहेंगी एवं स्वयं सलमान खान व शाहरुख के पीछे भागती रहेंगीं|
----- वे हीरोइनों के
वस्त्राभूषणों की नक़ल करेंगीं, स्वतंत्र रूप से रात-विरात अकेली स्वच्छंदता का भी
अनुसरण करेंगीं ( जबकि हीरोइनें तो बोडीगार्ड के साथ रहती हैं)| हीरोइनों के पीछे भागने की वजाय सलमान, शाहरुख
के पीछे भागेंगी | ( कुछ विद्वान नारियां हर काल की तरह अपवाद भी होती हैं )
------वे कहेंगीं कि समाज
अपनी सोच बदले | समाज में तो स्त्री-पुरुष दोनों ही होते हैं अकेले पुरुष से कब
समाज बनाता है अतः दोनों को ही सोच बदलनी चाहिए |
-----वे पुरुष को साधू-संत
बनाने को कहेंगीं परन्तु स्वयं डायरेक्टर की इच्छा/आज्ञा पर /पैसे के लिए वस्त्र
उतारती रहेंगीं |
------ वे देह –दर्शना
वस्त्र पहनती रहेंगीं, उनका तर्क है की छोटी-छोटी बालिकाओं से, गाँव में
पूरे वस्त्र पहने महिलाओं से भी वलात्कार होता है अतः वस्त्र कम पहनने से कुछ नहीं
होता अपितु पुरुष व समाज को अपनी मानसिकता बदलनी होगी| वे भूल जाती हैं कि- कम
वस्त्रों, अश्लील चित्रों, सिनेमा, विज्ञापन आदि से जाग्रत उद्दाम वासना से जो भी
व्यक्ति की पहुँच में होगा वही प्रभावित होगा | आप तो बाडीगार्ड, परिवार आदि की
सुरक्षा में हैं, कौन हाथ डालने की हिंम्मत करेगा| चोर किसी प्रधानमन्त्री या
पुलिस वाले के घर चोरी करने थोड़े ही जायेगा, जहां सुरक्षा कम है वहीं दांव लगाएगा
|
------- इनसे कुछ नहीं होगा |
अतः हे पुरुषो ! ब्रह्म रूप बनो,
अपनी ज्ञान, विवेक व सदाचरण रूपी दैविक शक्तियां जाग्रत करो...उदाहरण बनो और अपनी
जाग्रत शक्तियों को प्रदान करो नारी को ताकि वह पुनः दुर्गा का दुष्ट दलन रूप बनकर
समाज में पूज्य बने | और आप सच में ही---“यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र
देवता” के महामंत्र के गान के योग्य बनें |
रविवार, 22 मार्च 2015
नारी, देवी और नवरात्रि..डा श्याम गुप्त ..
....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...

नारी, देवी और नवरात्रि..
श्रध्दा, प्रेम, भक्ति, सेवा, समानता की प्रतीक नारी पवित्र, निष्कलंक, सदाचार से सुशोभित, ह्रदय को पवित्र करने वाली, लौकिकता युक्त, कुटिलता से अनभिज्ञ, निष्पाप, उत्तम, यशस्वी, नित्य उत्तम कार्य की इच्छा करने वाली, कर्मण्य और सत्य व्यवहार करने वाली देवी है।
ऋग्वेद में माया को ही आदिशक्ति कहा गया है उसका रूप अत्यंत तेजस्वी और ऊर्जावान है। फिर भी वह परम कारूणिक और कोमल है। जड़-चेतन सभी पर वह निस्पृह और निष्पक्ष भाव से अपनी करूणा बरसाती है। प्राणी मात्र में आशा और शक्ति का संचार करती| नारी को माया रूप ही माना गया है|
देवी सूक्ति में देवी स्वयं कहती है... अहं राष्ट्री संगमती बसना ,अहं रूद्राय धनुरातीमि' .....अर्थात्
'मैं ही राष्ट्र को बांधने और ऐश्वर्य देने वाली शक्ति हूं । मैं ही रूद्र के धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाती हूं। धरती, आकाश में व्याप्त हो मैं ही मानव त्राण के लिए संग्राम करती हूँ।' .....विविध अंश रूपों में यही आदिशक्ति सभी देवताओं की परम-शक्ति कहलाती हैं, जिसके बिना वे सब अपूर्ण हैं, अकेले हैं, अधूरे हैं। देवी भागवत--. में कथन है......’देवीं मायां तु श्रीकामः’ ..नारी समस्त श्रेष्ठ कार्यों की देवी है | ......'समस्त विधाएँ, कलाएँ, ग्राम्य देवियाँ और सभी नारियाँ इसी आदिशक्ति की अंशरूपिणी हैं।
वस्तुतः आर्य संस्कृति में नारी का अतिविशिष्ट स्थान रहा है। आर्य चिंतन में तीन अनादि तत्व हैं - परब्रह्म, माया और जीव। माया, परब्रह्म की आदिशक्ति है एवं जीवन के सभी क्रियाकलाप उसी माया, आदिशक्ति की क्रियाशीलता, कारक शक्ति से होते हैं जिनका भोक्ता जीव है ... ब्रह्म सिर्फ इच्छा करता है दृष्टा है... वह कर्ता नहीं है न भोक्ता ।
हमारी यह यशस्वी संस्कृति स्त्री को कई आकर्षक संबोधन देती है। मां कल्याणी है, वहीं पत्नी गृहलक्ष्मी है। बहन मान्या....बिटिया राजनंदिनी है और नवेली बहू के कुंकुम चरण ऐश्वर्य लक्ष्मी आगमन का प्रतीक है। हर रूप में वह आराध्या है। वैदिक साहित्य में स्त्रियों का एक नाम ‘मना’ है क्योंकि वे पुरुष की सम्माननीया हैं।
पौराणिक आख्यानों के अनुसार....अनादिकाल से सारे नैसर्गिक अधिकार उसे स्वत: ही प्राप्त हैं। कभी मांगने नहीं पड़े हैं। वह सदैव देने वाली है। अपना सर्वस्व देकर भी वह पूर्णत्व के भाव से भर उठती है।
भारतीय स्त्री का हर रूप अनूठा है, अनुपम है, अवर्णनीय है। वह किसी पहचान, परिभाषा, श्लोक, मंत्र या सूत्र में अभिव्यक्त नहीं हो सकती ? साहस, संयम और सौंदर्य जैसे दिव्य-दिव्य गुणों को समयानुरूप इतनी दक्षता से प्रकट करती है कि सारा परिवेश चौंक उठता है। इसीलिये त्योहारों पर्वों के समय उसके रोम-रोम से उल्लास, उमंग प्रस्फुटित होते हैं । मन-धरा से सुगंधित लहरियां उठने लगती हैं। श्रृंगार में, रास-उल्लास में, आचार-विचार और व्यवहार में, रूचियों, प्रकृतियों और प्रवृत्तियों से त्योहार के सजीले रंग सहज ही झलकने लगते हैं।
बाह्य श्रृंगार से आंतरिक कलात्मकता मुखरित होने लगती है, चेहरे पर लावण्य-तेज चमक उठता है। शील, शक्ति और शौर्य का विलक्षण संगम है भारतीय नारी। ......स्वर्ण यदि सुन्दर होता तो स्वयं शो-रूम में ही खिल उठता पर वह खिलता है नारी के कंगनों में.... मेहंदी की आकृतियां ही सुंदर होती तो पन्नों पर खिल उठती परन्तु नारी की गुलाबी नर्म हथेलियां ही उसे भव्यता प्रदान करती हैं|
इसी शील, शक्ति व शौर्य युत सौन्दर्य को देवी रूप कहा गया है, पूजा गया है विरुदावलियाँ गाई गयीं हैं..जो नवरात्रों में अपनी पूर्णता-सम्पूर्णता के साथ दृश्यमान होता है| नवरात्रि में वे नौ शक्तियों –विविध रूपों में थिरक उठती हैं। ये शक्तियां अलौकिक प्रतीत होती हैं। परंतु वास्तविक दृष्टि में वे इसी संसार की लौकिक सत्ता हैं। यथा ...व्यंजन परोसती अन्नपूर्णा, श्रृंगारित स्वरूप में वैभवलक्ष्मी, बौद्धिक परामर्शदात्री सरस्वती और मधुर संगीत की स्वरलहरी उच्चारती वीणापाणि के रूप में। शौर्य दर्शाती दुर्गा भी वही, उल्लासमयी थिरकनें रचती, रोम-रोम से पुलकित अम्बा भी वही है। आवश्यकतानुसार दुष्टता–विनाशक काली भी वही है |
यूं तो देवी पूजा विश्व के सभी देशों में अपनी अपनी संस्कृति, संस्कार के अनुसार होती है ...यथा चीन में कात्यायिनी का नील सरस्वती ( तारा देवी ) रूप पूजा जाता है ...यूनान में प्रतिशोध की देवी नेमिशस एवं शक्ति की देवी डायना व श्वेतवर्णी यूरोपा व वेल्स की उर्वशी ...रोम में कुमारियों की देवी वेस्ता एवं कोरिया में सूर्यादेवी, मिस्र में आइसिस, फ्रांस में पुष्पों की देवी फ्लोरा ,इटली में सौन्दर्य की देवी फेमिना, अफ्रीका की कुशोदा एवं अमेरिका की पातालेश्वरी ..जो शायद अहिरावण द्वारा पूजित पाताल-देवी है जिसको वह राम-लक्ष्मण की वाली देने चाहता था परन्तु हनुमान द्वारा असफल कर दिया गया |
ऐसी सृष्टि की सबसे सुंदर रचना हमारे बीच है, जिसमें है आकाश के समान अनंत, अपार, असीम....शून्य से शिखर तक पहुंचने की अशेष शक्ति ...पर नहीं पहचान पाते हम? एक मुट्ठी आकाश भी नहीं दे पाते ....
नारी, देवी और नवरात्रि..
ऋग्वेद 1/79/1 में ऋषि उद्धोष करता हैं ---
शुचिभ्राजा,
उपसो नवेदा यशस्वतीर
पस्युतो न सत्या:। श्रध्दा, प्रेम, भक्ति, सेवा, समानता की प्रतीक नारी पवित्र, निष्कलंक, सदाचार से सुशोभित, ह्रदय को पवित्र करने वाली, लौकिकता युक्त, कुटिलता से अनभिज्ञ, निष्पाप, उत्तम, यशस्वी, नित्य उत्तम कार्य की इच्छा करने वाली, कर्मण्य और सत्य व्यवहार करने वाली देवी है।
ऋग्वेद में माया को ही आदिशक्ति कहा गया है उसका रूप अत्यंत तेजस्वी और ऊर्जावान है। फिर भी वह परम कारूणिक और कोमल है। जड़-चेतन सभी पर वह निस्पृह और निष्पक्ष भाव से अपनी करूणा बरसाती है। प्राणी मात्र में आशा और शक्ति का संचार करती| नारी को माया रूप ही माना गया है|
देवी सूक्ति में देवी स्वयं कहती है... अहं राष्ट्री संगमती बसना ,अहं रूद्राय धनुरातीमि' .....अर्थात्
'मैं ही राष्ट्र को बांधने और ऐश्वर्य देने वाली शक्ति हूं । मैं ही रूद्र के धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाती हूं। धरती, आकाश में व्याप्त हो मैं ही मानव त्राण के लिए संग्राम करती हूँ।' .....विविध अंश रूपों में यही आदिशक्ति सभी देवताओं की परम-शक्ति कहलाती हैं, जिसके बिना वे सब अपूर्ण हैं, अकेले हैं, अधूरे हैं। देवी भागवत--. में कथन है......’देवीं मायां तु श्रीकामः’ ..नारी समस्त श्रेष्ठ कार्यों की देवी है | ......'समस्त विधाएँ, कलाएँ, ग्राम्य देवियाँ और सभी नारियाँ इसी आदिशक्ति की अंशरूपिणी हैं।
वस्तुतः आर्य संस्कृति में नारी का अतिविशिष्ट स्थान रहा है। आर्य चिंतन में तीन अनादि तत्व हैं - परब्रह्म, माया और जीव। माया, परब्रह्म की आदिशक्ति है एवं जीवन के सभी क्रियाकलाप उसी माया, आदिशक्ति की क्रियाशीलता, कारक शक्ति से होते हैं जिनका भोक्ता जीव है ... ब्रह्म सिर्फ इच्छा करता है दृष्टा है... वह कर्ता नहीं है न भोक्ता ।
हमारी यह यशस्वी संस्कृति स्त्री को कई आकर्षक संबोधन देती है। मां कल्याणी है, वहीं पत्नी गृहलक्ष्मी है। बहन मान्या....बिटिया राजनंदिनी है और नवेली बहू के कुंकुम चरण ऐश्वर्य लक्ष्मी आगमन का प्रतीक है। हर रूप में वह आराध्या है। वैदिक साहित्य में स्त्रियों का एक नाम ‘मना’ है क्योंकि वे पुरुष की सम्माननीया हैं।
पौराणिक आख्यानों के अनुसार....अनादिकाल से सारे नैसर्गिक अधिकार उसे स्वत: ही प्राप्त हैं। कभी मांगने नहीं पड़े हैं। वह सदैव देने वाली है। अपना सर्वस्व देकर भी वह पूर्णत्व के भाव से भर उठती है।
भारतीय स्त्री का हर रूप अनूठा है, अनुपम है, अवर्णनीय है। वह किसी पहचान, परिभाषा, श्लोक, मंत्र या सूत्र में अभिव्यक्त नहीं हो सकती ? साहस, संयम और सौंदर्य जैसे दिव्य-दिव्य गुणों को समयानुरूप इतनी दक्षता से प्रकट करती है कि सारा परिवेश चौंक उठता है। इसीलिये त्योहारों पर्वों के समय उसके रोम-रोम से उल्लास, उमंग प्रस्फुटित होते हैं । मन-धरा से सुगंधित लहरियां उठने लगती हैं। श्रृंगार में, रास-उल्लास में, आचार-विचार और व्यवहार में, रूचियों, प्रकृतियों और प्रवृत्तियों से त्योहार के सजीले रंग सहज ही झलकने लगते हैं।
बाह्य श्रृंगार से आंतरिक कलात्मकता मुखरित होने लगती है, चेहरे पर लावण्य-तेज चमक उठता है। शील, शक्ति और शौर्य का विलक्षण संगम है भारतीय नारी। ......स्वर्ण यदि सुन्दर होता तो स्वयं शो-रूम में ही खिल उठता पर वह खिलता है नारी के कंगनों में.... मेहंदी की आकृतियां ही सुंदर होती तो पन्नों पर खिल उठती परन्तु नारी की गुलाबी नर्म हथेलियां ही उसे भव्यता प्रदान करती हैं|
इसी शील, शक्ति व शौर्य युत सौन्दर्य को देवी रूप कहा गया है, पूजा गया है विरुदावलियाँ गाई गयीं हैं..जो नवरात्रों में अपनी पूर्णता-सम्पूर्णता के साथ दृश्यमान होता है| नवरात्रि में वे नौ शक्तियों –विविध रूपों में थिरक उठती हैं। ये शक्तियां अलौकिक प्रतीत होती हैं। परंतु वास्तविक दृष्टि में वे इसी संसार की लौकिक सत्ता हैं। यथा ...व्यंजन परोसती अन्नपूर्णा, श्रृंगारित स्वरूप में वैभवलक्ष्मी, बौद्धिक परामर्शदात्री सरस्वती और मधुर संगीत की स्वरलहरी उच्चारती वीणापाणि के रूप में। शौर्य दर्शाती दुर्गा भी वही, उल्लासमयी थिरकनें रचती, रोम-रोम से पुलकित अम्बा भी वही है। आवश्यकतानुसार दुष्टता–विनाशक काली भी वही है |
यूं तो देवी पूजा विश्व के सभी देशों में अपनी अपनी संस्कृति, संस्कार के अनुसार होती है ...यथा चीन में कात्यायिनी का नील सरस्वती ( तारा देवी ) रूप पूजा जाता है ...यूनान में प्रतिशोध की देवी नेमिशस एवं शक्ति की देवी डायना व श्वेतवर्णी यूरोपा व वेल्स की उर्वशी ...रोम में कुमारियों की देवी वेस्ता एवं कोरिया में सूर्यादेवी, मिस्र में आइसिस, फ्रांस में पुष्पों की देवी फ्लोरा ,इटली में सौन्दर्य की देवी फेमिना, अफ्रीका की कुशोदा एवं अमेरिका की पातालेश्वरी ..जो शायद अहिरावण द्वारा पूजित पाताल-देवी है जिसको वह राम-लक्ष्मण की वाली देने चाहता था परन्तु हनुमान द्वारा असफल कर दिया गया |
नारी को सदा ही
आदि-शक्ति का रूप माना जाता है | संसार की उत्पत्ति, स्थिति, संसार चक्र की
व्यवस्था, व लय....सभी आदि-शक्ति का ही कृतित्व होता है | इसी प्रकार समस्त संसार
व जीवन-जगत एवं पुरुष जीवन – नारी के ही चारों ओर परिक्रमित होता है | आदि-शक्ति
या देवी के ये नौ रूप एवं नौ -दिवस ---वस्तुतः नारी के विभिन्न रूपों व कृतित्वों के प्रतीक
ही हैं |
ऐसी सृष्टि की सबसे सुंदर रचना हमारे बीच है, जिसमें है आकाश के समान अनंत, अपार, असीम....शून्य से शिखर तक पहुंचने की अशेष शक्ति ...पर नहीं पहचान पाते हम? एक मुट्ठी आकाश भी नहीं दे पाते ....
शक्ति-उपनिषद का श्लोक
है.....
“ स वै नैव
रेमे तस्मादेकाकी न रमते स द्वितीयमैच्छत। सहैता वाना स। यथा स्त्रीन्पुन्मासो
संपरिस्वक्तौ स। इयमेवात्मानं द्वेधा पातपत्तनः पतिश्च पत्नी चा भवताम।“
---- अकेला ब्रह्म रमण न कर सका, उसने अपने
संयुक्त भाव-रूप को विभाज़ित
किया और दोनों पति-पत्नी भाव को
प्राप्त हुए।
ऋग्वेद ८/३१/६६७५ में कथन
है—
“या दमती समनस
सुनूत अ च धावतः । देवासो नित्य यशिरा ॥“- जो दम्पति समान विचारों से
युक्त होकर सोम अभुषुत ( जीवन व्यतीत) करते हैं, और प्रतिदिन
देवों को दुग्ध मिश्रित सोम ( नियमानुकूल नित्यकर्म) अर्पित करते है, वे सुदम्पति
हैं।
.....’अग्निपुराण‘ में उल्लेख है.....
’’नरत्वं दुलर्भं लोक, लोके विद्या सुदुर्लभा, कवित्वं दुलर्भं तत्र, शक्तिस्तत्र दुलर्भा।‘‘
आइये इस नवरात्रि पर प्रार्थना करें महादेवी आदिशक्ति से कि हर नारी
में स्फुरित हों ऐसे सुंदर भाव कि छू सके वह समूचा आसमान और नाप सके सारी धरती अपने
सुदृढ़ कदमों से, भर सके पुरुष के ह्रदय में ज्योतित भाव संस्कृति, समाज, संस्कार
रक्षण के ...और पुरुष में नारी की प्रति कृतज्ञता, सौम्यता, सौहार्द, समानता,
सम्मान के आदर्श भाव जागृत हों |
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