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डा श्याम गुप्त का ब्लोग...

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Lucknow, UP, India
एक चिकित्सक, शल्य-चिकित्सक जो हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान व उसकी संस्कृति-सभ्यता के पुनुरुत्थान व समुत्थान को समर्पित है व हिन्दी एवम हिन्दी साहित्य की शुद्धता, सरलता, जन-सम्प्रेषणीयता के साथ कविता को जन-जन के निकट व जन को कविता के निकट लाने को ध्येयबद्ध है क्योंकि साहित्य ही व्यक्ति, समाज, देश राष्ट्र को तथा मानवता को सही राह दिखाने में समर्थ है, आज विश्व के समस्त द्वन्द्वों का मूल कारण मनुष्य का साहित्य से दूर होजाना ही है.... मेरी तेरह पुस्तकें प्रकाशित हैं... काव्य-दूत,काव्य-मुक्तामृत,;काव्य-निर्झरिणी, सृष्टि ( on creation of earth, life and god),प्रेम-महाकाव्य ,on various forms of love as whole. शूर्पणखा काव्य उपन्यास, इन्द्रधनुष उपन्यास एवं अगीत साहित्य दर्पण (-अगीत विधा का छंद-विधान ), ब्रज बांसुरी ( ब्रज भाषा काव्य संग्रह), कुछ शायरी की बात होजाए ( ग़ज़ल, नज़्म, कतए , रुबाई, शेर का संग्रह), अगीत त्रयी ( अगीत विधा के तीन महारथी ), तुम तुम और तुम ( श्रृगार व प्रेम गीत संग्रह ), ईशोपनिषद का काव्यभावानुवाद .. my blogs-- 1.the world of my thoughts श्याम स्मृति... 2.drsbg.wordpres.com, 3.साहित्य श्याम 4.विजानाति-विजानाति-विज्ञान ५ हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान ६ अगीतायन ७ छिद्रान्वेषी ---फेसबुक -डाश्याम गुप्त

शुक्रवार, 31 मई 2019

भारत देश, राष्ट्र, व कांग्रेस ---- और कांग्रेस की गलतियां --डा श्याम गुप्त..

                             ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...

भारत देश, राष्ट्र, व कांग्रेस ---- और कांग्रेस की गलतियां --

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भारत देश तो १५ अगस्त १९४७ को अंग्रेजों की सत्ता से आजाद होगया था परन्तु भारत राष्ट्र उसी समय पुनः उसी सत्ता का वैचारिक गुलाम होगया था जब भारतीय जनमत द्वारा सर्व मत से सरदार बल्लभ भाई पटेल को अपना राष्ट्रीय नेता चुना परन्तु महात्मा गांधी जी ने उनकी की बजाय पंडित जवाहर लाल नेहरू को प्रधान मंत्री बनाया |

------भारत राष्ट्र उसी समय अभारतीय विचारधारा के पराधीन --- होगया था जब महात्मा गांधी के कहने के बावजूद कांग्रेस पार्टी को उसी समय समाप्त नहीं किया गया |

----- भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी का पतन ----तो उसी समय प्रारंभ होगया था जब इंदिरा कांग्रेस का गठन हुआ --


------वर्त्तमान कांग्रेस पार्टी का पतन---- तो उसी समय प्रारम्भ होगया था जब तमाम वरिष्ठ नेताओं के रहते हुए भी सोनिया गांधी को अध्यक्ष बनाया गया .....


---एवं कांग्रेस के एक मात्र वरिष्ठ व विद्वान् नेता श्री प्रणव मुकर्जी को राष्ट्रपति पद के लिए मनोनीत किया गया ताकि पार्टी व सत्ता हेतु एक विशिष्ट परिवार के लिए रास्ता साफ़ किया जाय ---




 

गुरुवार, 30 मई 2019

देशभक्ति का मूल तत्व ---देश मेरा है का भाव---डा श्याम गुप्त ...

                                  ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...


देशभक्ति का मूल तत्व ---देश मेरा है का भाव
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काशी से नरेंद्र मोदी जी द्वारा एक विशिष्ट बात देश के नागरिकों के लिए भी स्पष्टतया कही गयी ----
-----नागरिक भाव ----देश मेरा है का भाव ---नागरिक कर्तव्य भाव ....जिसके उदाहरण में आपने एक बहुत ही जमीनी स्तर के तथ्य से जनता को रूबरू कराया , जिसे जानता प्रत्येक व्यक्ति है परन्तु ----प्रधान मंत्री के स्तर पर यह कहने की हिम्मत जुटाना बहुत बड़ी बात है ---- बस की सीट से फोम निकालना की गाथा ----
------यहीं से तो प्रारम्भ होता है मेरा देश, मेरा राष्ट्र , मेरी अपनी वस्तु का मेरे स्वयं द्वारा संरक्षण ----हम नहीं करेंगे तो कौन करेगा यह सब --देश भक्ति का मूल भाव यहीं से तो उत्पन्न होता है ----
-----महात्मा गांधी जी द्वारा छोटी सी पेन्सिल के खोजाने पर उसे खोजने की लम्बी कवायद ----इसी भाव को ही तो दर्शाता है ...
-----जो नरेंद्र मोदी एक ही समय में उच्चतम तकनीकी ज्ञान की बात के कथन के साथ एक दम जमीनी स्तर के अनुभव की बात ---दोनों को साथ साथ कह व स्पष्ट कर सकता है ------उसके क्या कहने ---



 

मंगलवार, 28 मई 2019

आज आजाद हुआ भारत ----आज की ग़ज़ल -गज़लोपनिषद ---डा श्याम गुप्त

                ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...

आज आजाद हुआ भारत ----आज की ग़ज़ल -गज़लोपनिषद ---
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******काशी से नरेंद्र भाई मोदी , प्रधान मंत्री भारत सरकार का आह्वान व उद्घोष -----का मूल मन्त्र ---
१. कार्य में पारदर्शिता व परिश्रम का समन्वय डा श्याम  
२.कार्य व कार्यकर्ता , वर्क व वर्कर का एक रूपता भाव
३.सरकार व संगठन का समन्वित रूप व विचार
४.२१ वीं सदी का विज़न ----महान विरासत ---पूजा-पाठ, त्यौहार, शास्त्र व ग्रन्थ के साथ वर्तमान तत्वों का विकास -----अर्थात पुराने को सहेज़कर नवीन की आकांक्षा व वैज्ञानिक विकास के साथ प्रगति ---
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-----आतंक एवं राजनैतिक छुआछूत सहित हर प्रकार की छुआछूत से मुक्ति-----
**********यही तो भारतीयता का मूल भाव है ----
====इसी भाव पर प्रस्तुत है मेरी एक ग़ज़ल-----गज़लोपनिषद----
एक हाथ में गीता हो और एक में त्रिशूल |
यह कर्म-धर्म ही सनातन नियम है अनुकूल |
संभूति च असम्भूति च यस्तदवेदोभय सह ,
सार और असार संग संग नहीं कुछ प्रतिकूल |
ज्ञान व संसार- माया, साथ साथ स्वीकारें ,
यही जीवन व्यवहार है संस्कृति का मूल |
पढ़ें लिखें धन कमायें, परमार्थ हित साथ हो,
ज्ञान दर्शन धर्म श्रृद्धा के खिलाएं फूल |
किसी के भी धन व स्वत्व का नहीं करें हरण ,
चंचला कब हुई किसकी, जाएँ नहीं भूल |
यही सत जीवन का पथ, मुक्ति, ईश्वर प्राप्ति 'श्याम,
जीव ! आनंद परम आनंद के हिंडोले झूल ||


 

सोमवार, 27 मई 2019

श्याम स्मृति २६ से ३० तक------डा श्याम गुप्त

                          ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ..

श्याम स्मृति २६ -सभ्यता-संस्कृति की उन्नति-अवनति एवं देवासुर संग्राम ....
        एसा कुछ नहीं है कि हमने कभी कुछ नहीं बनाया, जैसा कि हमारे कुछ युवा कहते हैं जो पश्चिम से चकाचौन्धित हैं | जब हम यह कहते हैं तो भूल जाते हैं कि मानव इसी भूभाग पर प्रादुर्भूत हुआ, पला, बढ़ा, उन्नत हुआ एवं समस्त संसार में फैला| सारी प्रारम्भिक खोजें हमने ही की हैं | जब पृथ्वी के अन्य महाद्वीपों में जंगल थे, जंगली असभ्य मानुष रहते थे तब हम उन्नत थे | एक समय पश्चात उन्नत, आत्मोन्नत, दर्शन–धर्म-कला युत व्यक्ति व समाज, देश आलसी व असावधान होजाता है | स्वार्थ व छल-छंदों से दूर, परमार्थ उसे सुहाने लगता है सब अपने जैसे सरल, सहज लगते हैं और फिर जंगली-असभ्य, क्रूरकर्मा सभ्यता-संस्कृति उसपर हावी होकर वलात अधिकार कर लेती है | वही हुआ.... क्रूर, अर्धसभ्य, जंगली मुस्लिम-यूरोपियन आक्रान्ताओं द्वारा बलात अधिग्रहण के पश्चात गुलामी के अँधेरे में भारत डूबा रहा | सभ्यता, उन्नति व विकास हेतु शान्ति व स्वाधीनता आवश्यक है |
        देवासुर संग्रामों में बार बार असुरों द्वारा देवों पर विजय व देवलोक पर अधिकार के पश्चात—ब्रह्मा, विष्णु व शिव द्वारा सदैव देवों की सहायता से पूर्व उनके कर्मच्युत होने व विलास डूबे रहने की भर्त्सना की जाती है, उसका यही अर्थ है|  यह बार बार होता है, यह विश्व-क्रम है |
       फिर इस सब अति-भौतिक ताम-झाम की कौन सी एसी अत्यावश्यकता है जो इसके लिए हम उसे ईजाद करें और जबरदस्ती  भोगें भी | सभी को वही दाल, चावल, सब्जी-कपड़ा, जूते चाहिए, जिसके यहाँ जो बनता है वही अपनाए -खाए| आप जब विदेश जाएँ तो जो वहाँ है वह अपनाएं-खाए | बड़े-बड़े लखनवी नबाव भी बड़े खाने-पीने-पहनने के शौक़ीन थे, बर्वाद होगये | कौन रोज रोज ये सब खाता-पहनता है | सिर्फ कभी-कभी  के लिए इतना झंझट, ताम-झाम |
          और यदि आप स्वयं ही विदेशी वस्तुओं, तौर-तरीकों का उपयोग करते रहेंगे तो देशी विकास कैसे होगा ? आप तो क़र्ज़ लेकर घी पीते रहें दूसरे खोज करें, देशी वस्तुओं को बनाने में जुटे रहें, ये कैसे होगा | यदि हमारी पीढ़ी की गलती है कि हमने कुछ नहीं बनाया तो आप उससे सबक लें न कि और आगे जाकर उसी में बहने लगें | युवा सोचें व करें |
श्याम स्मृति-२७. कला, संगीत, काव्य, संस्कृति का धर्म, जाति व भाषा ....
        प्रायः लोग कहते हैं कि कला, संगीत, काव्य, संस्कृति का कोई धर्म, जाति या भाषा नहीं होती ,पर होती है | धर्म, जाति, भाषा स्वयं में संस्कृति का रूप होते हैं | सभ्यता–भौतिक उन्नति, रहन-सहन है- संस्कृति –आत्मिक, आध्यात्मिक, भावनात्मक सम्पूर्ण प्रगति को कहते हैं | संस्कृति व धर्म का भाषा व व्यवहार पर प्रभाव पड़ता है | सभ्यता व संस्कृति को अंग्रेज़ी में ‘कल्चर’ कहा जाता है | अब एक उदाहरण लीजिये--अंग्रेज़ी शब्द ‘सॉरी’ ’आई एम् सॉरी’ का हिन्दी अर्थ है ’दुःख’ अथवा ‘मुझे दुःख है,’ मैं दुखी हूँ’ परन्तु हिन्दी में यहाँ ‘मुझे खेद है‘ या हिन्दुस्तानी में ’मुझे अफसोस’ है कहा जाता है |  अब खेद या अफसोस, दुःख नहीं है |  दुःख जब होता है जब हम जानबूझकर त्रुटि करते हैं, त्रुटि को रोकना हमारे वश में नहीं| अनजाने में हुई त्रुटि के लिए खेद उपयुक्त है |
     यही अंतर है एवं फर्क पड़ता है, भाषा, संस्कृति व धर्म का, गीत, संगीत, काव्य, कला व व्यवहार पर | 
श्याम स्मृति-२८. बंधन ही स्वतन्त्रता है .....
            बंधन क्या है, मुक्ति क्या है, स्वतन्त्रता क्या है ? क्या सांसारिक कर्तव्य, कृतित्व, दायित्व बंधन हैं ? गृहस्थी, पारिवारिक सम्बन्ध, आपसी संवंध या स्त्री-पुरुष के प्रेम व विवाह या दाम्पत्य संवंध बंधन हैं ? क्या इन बंधनों से मुक्त व स्वतंत्र होकर जीवन-संगीत का आनंद लिया जा सकता है | क्या स्त्री-पुरुष आपसी बंधनों से मुक्त होकर जीवन-सुख का वास्तविक आनंद उठा सकते हैं|
       नहीं - जिस प्रकार वीणा के तारों का दोनों छोरों पर बंधन एवं आवश्यक व उपयुक्त कसाव मधुर संगीत के लिए आवश्यक है अन्यथा तारों का कसाव या तनाव अधिक होगा तो टूटने का अवसर रहेगा, तार ढीले होंगे तो संगीत उत्पन्न ही नहीं होगा| उसी प्रकार जीवन है, जीवन व्यवहार, दाम्पत्य जीवन, स्त्री-पुरुष संवंध के संगीतमय व मधुमय होने हेतु दोनों छोरों पर समुचित बंधन एवं समुचित दृड़ता आवश्यक है तभी मानव उन्मुक्त जीवन व्यतीत कर सकता है |
      मुक्ति प्राप्ति की इच्छा या योग व अनुशासन भी तो एक बंधन ही है | योगेश्वर श्रीकृष्ण स्वयं जीवन भर कर्म व पारिवारिक, सांसारिक बंधनों में बंधे रहे, हाँ लिप्त नहीं रहे जो बंधन व मुक्ति दोनों के लिए ही अत्यावश्यक है और योगेश्वर का ही आदेश है गीतामृत रूप में|
    अतः बंधन आवश्यक है, हाँ तारों को दोनों छोरों पर समुचित रूप से कसे हुए होने चाहिए ताकि जीवन पूर्ण स्वतन्त्रता व उन्मुक्तता से जिया जा सके| यही बंधन मानव को अनिर्बन्धित–बंधित करता है, मुक्ति का मार्ग प्रशस्त करता है |    
       शब्द की शक्ति अनंत व रहस्यात्मक भी है। चाहे गद्य हो या पद्य-किसी भी शब्द के विभिन्न रूप व पर्यायवाची शब्दों के कभी समान अर्थ नहीं होते। (जैसा सामान्यतः समझा जाता है। ) यथा--
"
प्रभु ने ये संसार कैसा सजाया."---एक कविता की पंक्ति है । यहाँ सजाया =रचाया =बनाया कुछ भी लिखा जा सकता है । मात्रा, तुक व लय एवं सामान्य अर्थ मैं कोई अन्तर नहीं, कवितांश के पाठ मैं भी कोई अन्तर नहीं पढता। परन्तु काव्य व कथन की गूढता तथा अर्थवत्तात्मक दृष्टि से, भावसंप्रेषण दृष्टि से देखें तो –
१..बनाया = भौतिक बस्तु के कृतित्व का बोध देता है, स्वयं अपने ही हाथों से कृतित्व का बोध-कठोर वर्ण है।
२.रचाया = समस्त सृजन का बोध देता है, विचार से लेकर कृतित्व तक, आवश्यक नहीं कि कृतिकार ने स्वयं ही बनाया हो। किसी अन्य को बोध देकर भी बनवाया हो सकता है।
३.सजाया = भौतिक संरचना की बजाय भाव-सरंचना का भी बोध देता है। बनाने (या स्वयं न बनाने -रचाने ) की बजाय या साथ-साथ, आगे नीति, नियम, व्यवहार, आचरण, साज-सज्जा आदि के साथ बनाने, रचाने, सजाने की कृति व शब्दों की सम्पूर्णता का बोध देता है।
         प्रभु के लिए यद्यपि तीनों का प्रयोग उचित है । परन्तु ब्रह्मा, देवताओं, मानव के संसार के सन्दर्भ मैं बनाया अधिक उचित होगा। सिर्फ़ ब्रह्मा के लिए रचाया भी। अन्य संसारी कृतियों के लिए विशिष्ट सन्दर्भ मैं तीनों शब्द यथा स्थान प्रयोग होने चाहिए । उदाहरित कविता मैं --सजाया-- शब्द उचित प्रतीत होता है।
         एक अन्य शब्द को लें -क्षण एवं पल--दौनों समानार्थी हैं । परन्तु क्षण = बस्तु परक, भौतिक, वास्तविक समय प्रदर्शक तथा कठोर वर्ण है और पल = भावात्मक, स्वप्निल व सौम्य-कोमल वर्ण है । इसीलिये प्रायः पल-छिन शब्द प्रयोग किया जाता है, सुंदर, भावुक स्वप्निल समय काल-खंड के लिए।
श्याम स्मृति ३०. आज की कविता -भावशब्द व कथ्य....
         मीराबाई को राणा जी द्वारा सताए जाने पर परामर्श रूप में तुलसी ने कहा...
जाके प्रिय न राम वैदेही |
ताजिये ताहि कोटि बैरी सम यद्यपि परम सनेही |
        आज का कवि इस सन्दर्भ में परामर्श देता तो क्या कहता.....
‘राजा मस्त पिए बैठा है
करता अत्याचार |
भक्ति में रोड़े अटकाए ,
रानी बैठी मुंह लटकाए ;
त्याग करे यदि राजा का वो-
तभी मिले सुख-चैन ,
करे भक्ति दिन-रैन,
छोड़ कर बैठे सब घर द्वार |

         भाव, तथ्य व अर्थार्थ वही है ..परन्तु भाषा व कथ्य–शिल्प...जिसे लट्ठमार भी कहा जा सकता है | यह असाहित्यिकता है | सत्य है कि यह आज के समाज की हताशा, निराशा, कटुता, कठिनाइयां, सामयिक परिस्थितयां काव्य में झलकती हैं, पर ये सारी परिस्थितियाँ तो समाज में सदा ही रहती हैं, इनको परिलक्षित कविता भी कही जाती है किन्तु यदि कवि ही अपनी भाषा व कथ्य भाव पर सौम्य, साहित्यिक, सत्यं शिवं सुन्दरं दृष्टि नही रखेगा तो सामान्य जन क्या व्यवहार करेगा | फिर वह कविता ही क्या जिसमें भाव, कथ्य व शिल्प सौन्दर्य न हो |

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मंगलवार, 21 मई 2019

पीर ज़माने की ----ग़ज़ल संग्रह -------समीक्षा---प्रेम शंकर शास्त्री बेताव --- --डा श्याम गुप्त

.                         ...कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...

पीर ज़माने की ----ग़ज़ल संग्रह -------समीक्षा ---
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.                          अभिमत                                 
    “पीर ज़माने की “ ग़ज़ल संग्रह
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    महाकवि डा. श्याम गुप्त जी हिन्दी साहित्य के दैदीप्यमान सितारे हैं | आप भारतीय रेलवे में शल्य चिकित्सक के रूप में कार्य करते हुए भी साहित्य एवं समाज की सेवा में लगे रहे | यद्यपि आप उत्तर रेलवे चिकित्सालय लखनऊ से वरिष्ठ चिकित्सा अधीक्षक के पद से सेवानिवृत्त हो चुके हैं, परन्तु आपकी लेखनी साहित्य सृजन में लगातार चल रही है | आपने कविता, गीत, अगीत, गद्य-पद्य, निबंध, कथा-कहानी, उपन्यास, आलेख, समीक्षा, खंडकाव्य, महाकाव्य जैसी विधाओं पर अपनी लेखनी चलाकर साहित्य में एक अविस्मरणीय स्थान प्राप्त किया है| मुझे महाकवि द्वारा रचित ‘पीर ज़माने की’ ग़ज़ल संग्रह पढ़ने का सुअवसर प्राप्त हुआ, आप ग़ज़ल विधा के मर्मज्ञ साहित्यकार हैं क्योंकि ग़ज़ल को परिभाषित करने में कोई भी कसर नहीं छोडी है| ‘बात ग़ज़ल की’ शीर्षक में आपने ग़ज़ल के विभिन्न आयामों को भिन्न-भिन्न गज़लकारों के उदहारण देकर ही नहीं समझाया है वरन स्वतः भी अपने उदाहरण प्रस्तुत किये हैं | यदि आपकी तुलना पंडित राज जगन्नाथ जी से की जाय तो अतिशयोक्ति न होगी क्योंकि उन्होंने भी अपने काव्य में परिभाषा व उदाहरण        स्वयं प्रस्तुत किये हैं और कहा है ---
‘निर्माय नूतन मुदाहरणानुरूपं काव्यंयात्र निहितं न परश्च किंचिद् |
किं सेव्यते सुमनसा मनाsपि गन्धः कस्तूरिका जननं शक्ति भृता मृगेण ||
      पंडित राज जगन्नाथ जी कहते हैं कि मैंने काव्य के अनुरूप उदाहरण स्वयं निर्मित किये हैं, कहीं पर भी मैंने दूसरे के उदाहरण प्रस्तुत नहीं किये है, क्या कस्तूरी का सेवन करने वाला मृग कभी फूलों की सुगंध को धारण करेगा | डा श्याम गुप्त जी ने वैसे ही ग़ज़ल संग्रह को सार्थक बनाने में कोई कोर कसर नहीं छोडी है |
      कवि को व्यक्ति, समाज व राष्ट्र की पीर की अनुभूति अन्तस्थल से हुई है इसलिए पीर ज़माने के शीर्षक में वे लिखते है ---
‘वो दिल तो कोई दिल ही नहीं जिसमें,
भावों की नहीं बजती शहनाई है |

इस सूरतो-रंग का क्या फ़ायदा, श्याम
जो मन नहीं पीर ज़माने की समाई है |’
           कवि को प्रभु राम पर पूरा भरोसा है तथा देश की गंदी राजनीति से आपका मन व्यथित है इसलिए दलदल शीर्षक में वे लिखते हैं---
इतना है दलदल कोई कहाँ बैठे खड़ा हो,
कीचड़ से लथपथ हो गये क्या काम करेंगे |

दलदल से बाहर कैसे आयें सोच रहे श्याम,
सारा ही इंतज़ाम अब तो राम करेंगे ||
२.
     आपने हर एक की खुशी बताकर अपनी खुशी का इज़हार करते हुए लेखनी चलाई है ---
‘कोई सब को हंसकर खुश,
कोई सब को रुला कर खुश |

कोई सब कुछ पाकर खुश,
श्याम तो खुशी लुटा कर खुश |
      कवि ने अधिकार व कर्तव्यों की व्याख्या करते हुए बाबा साहब डा.भीमराव अम्बेडकर जी के भारतीय संविधान को ही ‘हक़ है’ शीर्षक में उतारा है –
सिर्फ हक़ की ही बात न करे कोई श्याम,
अपने दायित्व निभाएं, मिलता तभी तो हक़ है |
    आपने किसी की परवाह किये बिना स्वयं मस्त रहने की भी सलाह दी है, तभी ‘ठेंगे से’ शीर्षक में लिखते हैं—
आल्हा ध्रुपद धमाल गए,
मस्त मस्त धुन गायेंगे |

श्याम जलें तो ठेंगे से,
हम तो मज़े उड़ायेंगे ||   
          इस तरह देखा जाये तो ‘पीर ज़माने की’ ग़ज़ल संग्रह की हर ग़ज़ल अपने में लाज़बाव है और समाज को बहुत कुछ सन्देश भी देती है | वास्तव में यह कृति पठनीय होने के साथ साथ संदेशपरक और अनुकरणीय है | मैं ऐसे गज़लकार को साधुवाद एवं मुबारकबाद देता हूँ और ईश्वर से प्रार्थना करता हूँ कि उनकी लेखनी समाज के हित में लगातार चलती रहे और आप साहित्याकाश में में चन्द्रमा की तरह अपनी आभा को संसार में बिखेरते रहें |

                                     प्रेम शंकर शास्त्री ‘बेताब’
                                              कवि/प्रवक्ता
                          महाराजा अग्रसेन इंटर कालिज, मोतीनगर ,लखनऊ

                                      मोब.९६२१७५९२८५ 
 

शनिवार, 20 अप्रैल 2019

पवन पुत्र हनुमान वानर नहीं मानव थे … डा श्याम गुप्त

                           ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...


पवन पुत्र हनुमान वानर नही मानव थे … डा श्याम गुप्त 
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जगह-जगह मन्दिरों में स्थापित हनुमान जी की मूर्तियों को देख कर अधिकाँश हिन्दू और सभी विधर्मियों की आम धारणा है कि भगवान के रूप में प्रतिस्थापित हनुमान बानर थे |
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इस धारणा की स्थापना तुलसी की ’राम चरित-मानस’ के अर्थों का अनर्थ निकालने और जनमानस के समक्ष उसी रूप में प्रस्तुत कर कुछ अल्पबुद्धि और अल्प ज्ञानी पंडितों व जनों का हाथ रहा है | महाकवि तुलसीदास ने बाल्मीकि रामायण के इतिहास पुरूष राम को विष्णु के अवतार मर्यादा पुरूषोत्तम भगवान राम के रूप में प्रस्तुत किया तथा कुछ मुख्य पात्रों को भी देवस्वरूप प्रस्तुत किया है | इनमें सबसे अधिक प्रमुखता वीरवर हनुमान के पात्र को प्रदान करते पवनपुत्र बताया गया है |
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सम्भवतः यह उनकी तीव्रतम चाल (गति) के लिये अलंकारिक विशेषण हो किन्तु अर्थ का अनर्थ कर आज लगभग सभी अन्धभक्त उन्हें बन्दर ही मानते हैं और उनके वंशज मानकर बन्दरों के प्रति श्रद्धा भाव रखते है---
१. जब लंका में सीता को खोज लेने के पश्चात जब हनुमान उन्हें अपनी पीठ पर बैठा कर ले जाने का प्रस्ताव करते हैं तो सीता पर पुरूष स्पर्श के महापाप की भागी होने के स्थान पर उस नर्क में ही रहना ज्यादा उचित समझती हैं |
२. रामायण में राक्षसों के बाद बानर जाति का सवसे अधिक उल्लेख – हुआ है | वह वस्तुतः दक्षिण भारत की एक अनार्य जाति ही थी किन्तु इस जाति ने आर्यों(राम) के विरोध के स्थान पर राक्षसों से आर्यों के युद्ध में राम का साथ दिया अपितु उन्होंने पूर्व से ही आर्य संस्कृति के तमाम आचरण स्वीकार कर रखे थे | बाली से रावण का युद्ध और बाली तथा सुग्रीव के क्रिया कलाप तथा तत्कालीन बानर राज्य की बाल्मीकि द्वारा प्रदर्शित परिस्थितियों से यह स्पष्ट हो जाता है |
३.वास्तविकता यह है कि विंध्यपर्वत के दक्षिण में घने वनों में निवास करने वाली जनजाति थी | वे बनचर थे इस लिये वानर कहे गये या फिर उनकी मुखाकृति वानरों से मिलती जुलती थी अथवा अपने चंचल स्वभाव के कारण इन्हें वानर कहा गया या फिर इनके पीछे लगी पूंछ के कारण ये बानर कहलाए |
--- जैसे बाल्मीकि रामायण में रावण को जगह-जगह दशानन, दशकन्धर, दशमुख और दशग्रीव आदि पर्यायों से सम्बोधित किया गया है | इसका शाब्दिक अर्थ दस मुख या दस सिर मानकर रावण को दस सिरों वाला अजूबा मानलिया गया | जबकि बाल्मीकि द्वारा प्रयुक्त इन विशेषणों का तात्पर्य- ”द्शसु दिक्षु आननं (मुखाज्ञा) यस्य सः दशाननः’ अर्थात रावण का आदेश दसों दिशाओं में व्याप्त था | इसी लिये वह दशानन या दशमुख कहलाता था |
---- अथवा कवि ने पक्षीराज जटायु के मुख से ही कहलाया है कि वह दशरथ का मित्र है | रामायण में घटे प्रसंगो और घटनाओं से ही स्पष्ट हो जाता है कि जटायु गिद्ध नहीं मनुष्य था | कवि ने आर्यों के आदरसूचक – शब्द आर्य का कई बार जटायू के लिये प्रयोग किया है | रामायण में जगह-जगह जटायू के लिये पक्षी शब्द का प्रयोग भी किया गया है | उल्लिखित है -”ये वै विद्वांसस्ते पक्षिणो ये विद्वांसस्ते पक्षा” (ताक्ष्य ब्राहमण १४/१/१३)---अर्थात जो जो विद्वान हैं वे पक्षी और जो अविद्वान (मूर्ख) हैं वे पक्ष-रहित हैं | अतः जटायु के लिये पक्षी का सम्बोधन सर्वथा उचित है | 
---स्वतंत्र भारत में भारतीय तैराक मिहिर सेन द्वारा सातों समुद्रों में तैराकी व सर्वप्रथम इंग्लिश चैनल एव भारत श्रीलंका के मध्य धनुषकोडी सागर को पार करने पर उन्हें जलसुत हनुमान कहा गया |
४. वानरों का अपना आर्यों से मिलता जुलता राजनैतिक संगठन था इसका वर्णन बाल्मीकि ने उल्लेख कपि राज्य के रूप में किया गया है | अतः वानरों की एक सुसंगठित शासन व्यवस्था थी एक प्रसंग में तो बाली के पुत्र अंगद ने सुग्रीव से प्रथक वानर राज्य गठन का विचार तक कर लिया था |
--- विभिन्न स्थानों पर बाल्मीकि ने वानर नर नारियों की मद्यप्रियता का भी उल्लेख किया है | वानरों के सुन्दर वस्त्राभूषणों का भी हृदयग्राही वर्णन स्थान-स्थान पर आता है | सुग्रीव के राजप्रसाद की रमणियां”-भूषणोत्तम भूषिताः (०४/३३/२३)थीं |
----वानर पुष्प,गंध,प्रसाधन और अंगराग के प्रति आग्रही थे| किष्किंधा का वायुमण्डल चंदन, अगरु और कमलों की मधुर गंध से सुवासित रहता था--- (चन्दनागुरु- पद्मानां गन्धैः सुरभिगन्धिताम्(०४/३३/०७)|
----सुग्रीव का राज्याभिषेक जो बाल्मीकि जी ने वर्णित किया है शास्त्रीय विधिसम्मत परम्परागत प्रणाली के अधीन ही सम्पन्न हुआ था अर्थात वानर आर्य परम्पराओं और रीति – रिवाजों का पालन करते थे अर्थात आर्य परम्पराओं के हामी थे |
------बाली का आर्य रीति से अन्तिम संस्कार और सुग्रीव का आर्य मंत्रों और रीति से राज्याभिषेक भी सिद्ध करता है कि चाहे वानर आर्येतर जाति हों थे उनके अनुपालनकर्ता मानव थे बन्दर – नहीं |
५. बाल्मीकि रामायण के अनुसार वानरों की जाति पर्याप्त सु-संस्कृत और सुशिक्षित जनजाति थी | सुग्रीव के सचिव वीरवर हनुमान बाल्मीकि रामायण के सर्वप्रमुख उल्लिखित वानर हैं | जिन्होंने अपनी विद्वतता से मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम को सबसे अधिक प्रभावित किया और उनके प्रियों में सर्वोच्च स्थान भी प्राप्त करने में सफल रहे |
---- वह वाकचातुर्यपूर्ण व कुशल (०४/०३/२४) तो थे ही व्याकरण, व्युत्पत्ति और अलंकारों के सिद्धहस्त भी थे | उनसे बात करके श्रीराम ने यह अनुमान लगा लिया कि- जिसे ऋग्वेद की शिक्षा न मिली हो, जिसने यजुर्वेद का अभ्यास न किया हो तथा जो सामवेद का विद्वान न हो वह इस प्रकार की सुन्दर भाषा का प्रयोग नहीं कर सकता ----
नानृग्वेदविनीतस्य नायजुर्वेदधारिणः| नासामवेद्विदुषः शक्य मेवं विभाषितुम् || नूनं व्याकरणं कृत्स्नमनेन बहुधा श्रुतम् | बहु व्याहरतानेन न किंचिदपशव्दितम् || ०४/०३/२८-९ ------हनुमान उन आदर्श सचिवों में सर्वश्रेष्ठ थे जो मात्र वाणी प्रयोग से ही अपना प्रयोजन प्राप्त कर सकते थे |
६. एक कथा के अनुसार वानर मूलतः विद्याधर जाति के थे जो सामवेद के ज्ञाता व गाने बजाने वाले गन्धर्व वंशी होते हैं | कथा के अनुसार विद्याधर वंशी श्रीकंठ के पुत्र अमरप्रभ का विवाह राक्षसवंशी लंकानरेश की कन्या से हुआ| उसके विवाह अवसर पर किसी ने वानरों के चित्र बनवाये | वानरों के चित्र देखकर वह कन्या डरकर मूर्छित हो गयी| अतः अमरप्रभ वानर के चित्र बनाने वाले तथा वानर समूह को मारने के लिए तैयार हुआ | तभी मंत्रियों ने उसे समझाया कि श्रीकंठ के समय से लेकर ये वानर तुम्हारे कुल देवता रहे है, इन ही के प्रसाद से तुम युद्ध में जीतते हो | यह जानकर अमरप्रभ ने वानरों को पताकाओं, ध्वजाओ तथा छत्रों पर पवित्र कुल के चिन्ह के रूप में चित्रित करवाया | तभी से श्रीकंठ का वंश वानर वंश के नाम से विख्यात हुआ | आगे इस वंश में उत्पन्न हुए सभी राजा वानर वंशी कहलाये | हनुमान स्वयं अच्छे #वीणावादक थे |
७. हनुमान नाम एक द्रविड़ शब्द 'आणमन्दि` से निकला है, जिसका अर्थ 'नर-कपि` होता है। ऋगवेद में भी 'वृषाकपि` का नाम आया हैं अतः वानरों और राक्षसों के विषय में भी अब यह अनुमान, प्राय: ग्राह्य हो चला है कि ये लोग प्राचीन विन्ध्य प्रदेश और दक्षिण भारत की आदिवासी आर्येतर जातियों के सदस्य थे; या तो उनके मुख वानरों के समान थे, जिससे उनका नाम वानर पड़ गया अथवा उनकी ध्वजाओं पर वानरों और भालुओं के निशान रहे होंगे।
८. हनुमान को #रुद्रावतार भी कहा जाता है | निश्चय ही शिव-विष्णु प्रथम मानव महासमन्वय से बनी सनातन वैदिक सभ्यता के उपरांत शिव के उत्तर भारत प्रयाण करने पर उनके कुल/ कबीले के लोग यहीं रहे, वे ही वानर व राक्षस, भालू, जटायु, पक्षी, सर्प, नाग आदि विभिन्न नामों से यहीं बने रहे | वह समय विभिन्न मानव स्वरूपों, समूहों, कुलों में समन्वय का युग था तथा उनकी सभ्यता संस्कृतियाँ का आपसी समन्वय के साथ सनातन वैदिक संस्कृति के सब पर छा जाने का काल था | अतः सभी वर्गों में आर्य सभ्यता की छाप पाई जाती है |
९.#अहिल्या हनुमान जी की नानी थीं और गौतम ऋषि उनके नाना थे| हनुमान की माता अंजनी गौतम की पुत्री थीं |
=====अतः हनुमान एक पूर्णमानव, बल, शूरता, शास्त्रज्ञान पारंगत, उदारता, पराक्रम, दक्षता, तेज, क्षमा, धैर्य, स्थिरता, विनय आदि उत्तमोत्तम गुणसम्पन्न (एते चान्ये च बहवो गुणास्त्वय्येव शोभनाः०६/११३/२६) पूर्ण मानव थे अर्ध मानव या बन्दर नहीं थे | 
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इस जाति को मानव मानने के विरुद्ध सबसे बड़ा कारण पूंछ का होना है -----
------“बाल्मीकि रामायण में इस जाति के लिए वानर शब्द के साथ इसके पर्याय स्वरूप- #वनगोचर, #वनकोविद, #वनचारी और वनौकस शब्दों का भी प्रयोग किया गया है | इससे स्पष्ट होता है कि वानर शब्द, बन्दर का सूचक न होकर वनवासी का द्योतक है | वानरों के लिये – हरि शब्द भी कई बार आया है |
-----#प्लवंग शब्द जो दौड़ने की क्षमता का व्यंजक है बार बार प्रयुक्त हुआ है |जो वानरों की कूदने दौड़ने की प्रवृत्ति को सूचित करने के लिये उपयुक्त भी है | हनुमान उस युग के एक अत्यन्त शीघ्रगामी दौड़ाक .
या धावक थे | इसीलिये उनकी सेवाओं की कई बार आवश्यकता पड़ी थी | इसीलिये उन्हें पवन पुत्र कहा गया | ====जैसे इंग्लिश चैनल पार करने वाले भारतीय को #जलसुत हनुमान कहा गया |
------#कपि शब्द भी प्रयोग हुआ है, जो सामान्यतः बन्दर के अर्थ में प्रयुक्त होता है | क्योंकि रामायण में वानरों को पूंछ युक्त प्राणी बताया गया है इसलिये वे कपयः थे | वस्तुतः यह पूंछ वानरों की एक विशिष्ट जातीय निशानी थी जो संभवतः बाहर से लगाई जाती होगी | तभी तो हनुमान की पूंछ जलाए जाने पर भी उन्हें कोई शारिरिक कष्ट नहीं हुआ |
-----विज्ञान मानवशास्त्र=== के अनुसार वानर व कपि विभिन्न जाति हैं कपि विशालकाय कपि-मानव हैं जो वानरों से भिन्न है एवं विकास में मानवों के अधिक नज़दीक | हो सकता है दक्षिण के वनों में रहने वाली यह जाति #नियंडर्थल, डोनोवन, #देनीसोवियन या #होमोइरेक्टस अर्थात पूर्ण विक्सित मानव (#होमोसेपियंस ) से विकास में एक स्तर नीचे के मानव हों
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रावण ने #पूंछ को कपियों का सर्वाधिक प्रिय भूषण बताया था- कपि की ममता पूंछ पर सबन कहा समुझाइ—तथा ’कपीनां किल लांगूलमिष्टं भवति भूषणम् (०५/५३/०३)
-----यथा पूर्वोत्तर राज्यों में अभी भी ऐसी कई जातियां हैं जो अपने सर पर जंगली पशुओं के दो सीग धारण करके अपनी शक्ति और वीरता का परिचय हर उत्सव के समय देते हैं पर उन्हें जंगली भैंसा या बैल नहीं माना जाता | मध्य प्रदेश की मुण्डा जनजाति में भी यही परिपाटी है | शायद शक्ति प्रदर्शन के साथ ही यह सर की सुरक्षा का एक सरल उपाय होता हो |
---- भारत ही नहीं अपितु विश्वभर की विभिन्न कबीलाई, जन जातियों , आदिवासियों में विभिन्न प्रकार के प्रतीक रूपी टोपियाँ, चेहरे पर रंग की चित्रकारी, जानवरों के सिरों के सिरत्राण आदि पहनने का रिवाज़ था जो उनकी व कबीले/ कुल की विशिष्ट पहचान होती थी |-
------नीचे चित्र ३,४,५ ----
---महाराणा प्रताप ने हाथियों से अपने घोड़ों की सुरक्षा हेतु उनके मुंह पर नकली हाथी की सूंड लगवा दी थी ताकि हाथियों को वे अपने ही स्वरुप प्रतीत हों |
-----हो सकता है वानर वीर भी अपने पृष्ट भाग क़ी सुरक्षा हेतु बानर की पूंछ के समान धातु या फिर लकड़ी अथवा किसी अन्य हल्की वस्तु से बनी दोहरी वानर पूंछ को पीछे से जिधर आंखें या कोई इन्द्रिय सजग नहीं होती होतीं की ओर से हमला बचाने के लिये लगाया जाता हो | ====क्योंकि बाली, सुग्रीव या अंगद की पूंछ का कहीं पर भी कोई जिक्र नही आता है |
----बाल्मीकि रामायण में किसी भी जगह या प्रसंग में ====वानरों की स्त्रियों के पूंछ होने का उल्लेख या आभास तक नहीं है वे सभी मानव स्त्रियाँ ही प्रदर्शित की गयीं हैं न कि वानरी रूप || 
----बंगाल के कवि मातृगुप्त हनुमान के अवतार माने जाते थे, और वे अपने पीछे एक पूंछ लगाए रहते थे (बंगाली रामायण पृष्ट्-२५,) भारत के एक राजपरिवार में राज्याभिषेक के समय पूंछ धारण कर राज्यारोहण का रिवाज था |
------ वीर विनायक दामोदर साबरकर ने अपने अण्डमान संसमरण में लिखा है कि वहां पूंछ लगाने वाली एक जनजाति रहती है (महाराष्ट्रीय कृत रामायण-समालोचना)|
-----कहा जाता है कि महर्षि ===वाल्मीकि पहले रामायण हनुमानजी ने लिखी थी==== हनुमान जी ने इसे एक शिला पर लिखा था। और 'हनुमन्नाटक' के नाम से प्रसिद्ध है। जब महर्षि वाल्मीकि जी को ज्ञात हुआ तो वे निराश होगये कि अब उनकी रामायण को कौन पूछेगा| जब हनुमान जी को यह बात ज्ञात हुई तो वे प्रकट हुए और अपनी रामायण समुद्र में फैंक दी और आशीर्वाद दिया कि आपकी रामायण ही विश्व प्रसिद्द होगी |
#हनुमन्नाटक रामायण के अंतिम खंड में लिखा है-
'रचितमनिलपुत्रेणाथ वाल्मीकिनाब्धौ
निहितममृतबुद्धया प्राड् महानाटकं यत्।।
सुमतिनृपतिभेजेनोद्धृतं तत्क्रमेण
ग्रथितमवतु विश्वं मिश्रदामोदरेण।।'
अर्थात : इसको पवनकुमार ने रचा और शिलाओं पर लिखा था, परंतु वाल्मीकि ने जब अपनी रामायण रची तो तब यह समझकर कि इस रामायण को कौन पढ़ेगा, श्री हनुमानजी से प्रार्थना करके उनकी आज्ञा से इस महानाटक को समुद्र में स्थापित करा दिया, परंतु विद्वानों से किंवदंती को सुनकर राजा भोज ने इसे समुद्र से निकलवाया और जो कुछ भी मिला उसको उनकी सभा के विद्वान दामोदर मिश्र ने संगतिपूर्वक संग्रहीत किया। -------रामायण लिखने वाला कोइ वानर नहीं होसकता ज्ञानी विद्वान् नर ही होसकता है |
-----भगवान शिव का वाहन #नंदी कोइ बैल नहीं है अपितु कर्नाटक के उस क्षेत्र के निवासी हैं जहां दीर्घकाय बिसन नामक बैल पाए जाते हैं |
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अतः स्पष्ट है कि वानर नामक जनजाति जिसके तत्कालीन प्रमुख सदस्य वीरवर हनुमान थे एक पूर्ण मानव जाति थी, बन्दर प्रजाति नहीं | हां उनकी अत्यधिक चपलता,निरंकुश और रूखा स्वभाव,चेहरे की (संभवतः पीला रंग और मंगोलायड मुखाकृति जो थोडी बन्दरों से मिलती होती है) बनावट के कारण ही तथा अनियमित यौन उच्छृंखलता,वनों,पहाड़ों में निवास,नखों और दांतों का शस्त्र रुप में प्रयोग और क्रोध या हर्ष में किलकारियां मारने की आदत के कारण उन्हें एक अलग पहचान देने के लिये ही आर्यों ने उनके लिये कपि या शाखामृग विशेषण का प्रयोग किया गया हो और जो आदतों पर सटीक बैठ जाने के कारण आमतौर से प्रयोग होने लगा हो | उस काल में मानव बृक्ष को छोड़कर शैलाश्रयों में रहना प्रारम्भ कर रहा था |
---------हो सकता है भारतीय दक्षिण के वनों में रहने वाली यह जाति कपि मानव से विक्सित नियंडर्थल, डोनोवांस या होमोइरेक्टस अर्थात पूर्ण विक्सित मानव (होमो-सेपियंस) से विकास में एक स्तर नीचे के
मानव हों परन्तु पूर्ण मानवों के साथ रहने पर ( जैसा हनुमान-राम का बचपन में मिलन की कथा ) जो उत्तर भारतीय मानवों, आर्यों के आचार व्यवहार अपनाते जा रहे थे, धीरे धीरे सामान्य मानव में विलीन होगये |
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मन्मथ राय ने वानरों को भारत के मूल निवासी’व्रात्य’माना है | के.एस.रामास्वामी शास्त्री ने – वानरों को आर्य जाति माना है | जो दक्षिण में बस जाने के कारण आर्य समाज से दूर होकर जंगलों में सिमट गई और फिर आर्य संस्कृति के पुनः निकट आने पर उसी में विलीन हो गई|
----- व्हीलर और गोरेशियो आदि अन्य विद्वान दक्षिण भारत की -पहाड़ियों पर निवास करने वाली अनार्य जाति मानते हैं जो आर्यों के सन्निकट आ- कर उन्हीं की संस्कृति में समाहित हो गई |
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यह जनजाति या जाति चाहे आर्य रही हो या अनार्य थी एक विकसित आर्य संस्क़ृति के निकट, ललित कलाओं के साथ चिकित्सा, युद्ध कला,रुप परिवर्तन कला और अभियन्त्रण ( अविश्वसनीय लम्बे- लम्बे पुल बनाने की कला सहित),गुप्तचरी और मायावी शक्तियों के प्रयोग में बहुत चतुर मानव जाति | कोई पशुजाति नही थी | इसके तत्कालीन सिरमौर वीर वर हनुमान एक श्रेष्ठ मानव थे बन्दर नहीं |
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---चित्र-१ –वाएं से न.४ के पश्चात महिलाओं की शक्ल महिला जैसी ही है परन्तु पुरुष की शक्ल वानर से मिलती-जुलती है |
चित्र-२…होमो क्रम में अंतिम होमो सेपियंस से पूर्व बिग साइज़ व लघु साइज़ पूर्व रूप मानव –ये सभी साथ साथ रहते थे विभिन्न अंचलों में | जैसे आज भी कुल/ खानदान / क्षेत्र के अनुसार विभिन्न शक्लों के व्यक्ति साथ साथ पाए जाते हैं |
चित्र ३,४,५---विभिन्न शिर-त्राण --
चित्र ६-सामवेद ज्ञाता हनुमान
चित्र-७- हनुमान पत्नी सुवर्चला के साथ

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