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डा श्याम गुप्त का ब्लोग...

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Lucknow, UP, India
एक चिकित्सक, शल्य-चिकित्सक जो हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान व उसकी संस्कृति-सभ्यता के पुनुरुत्थान व समुत्थान को समर्पित है व हिन्दी एवम हिन्दी साहित्य की शुद्धता, सरलता, जन-सम्प्रेषणीयता के साथ कविता को जन-जन के निकट व जन को कविता के निकट लाने को ध्येयबद्ध है क्योंकि साहित्य ही व्यक्ति, समाज, देश राष्ट्र को तथा मानवता को सही राह दिखाने में समर्थ है, आज विश्व के समस्त द्वन्द्वों का मूल कारण मनुष्य का साहित्य से दूर होजाना ही है.... मेरी दस पुस्तकें प्रकाशित हैं... काव्य-दूत,काव्य-मुक्तामृत,;काव्य-निर्झरिणी, सृष्टि ( on creation of earth, life and god),प्रेम-महाकाव्य ,on various forms of love as whole. शूर्पणखा काव्य उपन्यास, इन्द्रधनुष उपन्यास एवं अगीत साहित्य दर्पण (-अगीत विधा का छंद-विधान ), ब्रज बांसुरी ( ब्रज भाषा काव्य संग्रह), कुछ शायरी की बात होजाए ( ग़ज़ल, नज़्म, कतए , रुबाई, शेर का संग्रह) my blogs-- 1.the world of my thoughts श्याम स्मृति... 2.drsbg.wordpres.com, 3.साहित्य श्याम 4.विजानाति-विजानाति-विज्ञान ५ हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान ६ अगीतायन ७ छिद्रान्वेषी

रविवार, 12 जुलाई 2009

गीत-- वे दो पल.....

राह में दो पल साथ तुम्हारे,बीते उनको ढूंढ रहा हूं।
पल में सारा जीवन जीकर,फ़िर वो जीवन ढूंढ रहा हूं।

उन दो पल के साथ ने मेरा,सारा जीवन बदल दिया था।
नाम पता कुछ पास नहींपर,हर पल तुमको ढूंढ रहा हूं।

तेरी चपल सुहानी बातें, मेरे मन की रीति बन गईं ।
तेरे सुमधुर स्वर की सरगम,जीवन का सन्गीत बन गई।

तुम दो पल जो साथ चल लिये,जीवन की इस कठिन डगर में।
मूक साक्षी बनीं जो राहें, उन राहों को ढूंढ रहा हूं।

पल दो पल में जाने कितनीं जीवन जग की बात होगईं
हम तो चुप चुप ही बैठे थे, बात बात में बात होगईं।

कैसे पहचानूंगा तुमको,मुलाकात यदि कभी होगई ।
तिरछी चितवन और तेरा मुस्काता आनन ढूंढ रहा हूं।

मेरे गीतों को सुनकर, तेरा वो वंदन ढूंढ रहा हूं ।
चलते चलते तेरा वो प्यारा अभिनन्दन ढूंढ रहा हूं।



3 टिप्‍पणियां:

Babli ने कहा…

वाह बहुत बढ़िया! इस लाजवाब और बेहतरीन रचना के लिए ढेर सारी बधाइयाँ!

prajatantra ने कहा…

एक अच्छा blog है जो व्यक्तिके विचारों को उन्नतिकी ओर प्रेरित करता है.

Dr. shyam gupta ने कहा…

धन्यवाद, बबली एवम प्रज़ातन्त्र ।