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डा श्याम गुप्त का ब्लोग...

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Lucknow, UP, India
एक चिकित्सक, शल्य-चिकित्सक जो हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान व उसकी संस्कृति-सभ्यता के पुनुरुत्थान व समुत्थान को समर्पित है व हिन्दी एवम हिन्दी साहित्य की शुद्धता, सरलता, जन-सम्प्रेषणीयता के साथ कविता को जन-जन के निकट व जन को कविता के निकट लाने को ध्येयबद्ध है क्योंकि साहित्य ही व्यक्ति, समाज, देश राष्ट्र को तथा मानवता को सही राह दिखाने में समर्थ है, आज विश्व के समस्त द्वन्द्वों का मूल कारण मनुष्य का साहित्य से दूर होजाना ही है.... मेरी दस पुस्तकें प्रकाशित हैं... काव्य-दूत,काव्य-मुक्तामृत,;काव्य-निर्झरिणी, सृष्टि ( on creation of earth, life and god),प्रेम-महाकाव्य ,on various forms of love as whole. शूर्पणखा काव्य उपन्यास, इन्द्रधनुष उपन्यास एवं अगीत साहित्य दर्पण (-अगीत विधा का छंद-विधान ), ब्रज बांसुरी ( ब्रज भाषा काव्य संग्रह), कुछ शायरी की बात होजाए ( ग़ज़ल, नज़्म, कतए , रुबाई, शेर का संग्रह) my blogs-- 1.the world of my thoughts श्याम स्मृति... 2.drsbg.wordpres.com, 3.साहित्य श्याम 4.विजानाति-विजानाति-विज्ञान ५ हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान ६ अगीतायन ७ छिद्रान्वेषी

शुक्रवार, 17 जुलाई 2009

अकाल व सूखा की स्थिति ---

आज सूखा अकाल की स्थिति है , इस विषय पर उसकेव्यवहारिक कारण निवारण पर एक सामाजिक शास्त्रीय पक्ष प्रस्तुत है , जो आज के परिप्रेक्ष्य में भी समीचीन है ---विवेचनार्थ --लक्ष्मण जब भगवान राम से अयोध्या के प्रबंधन की चिंता के साथ ,शासकों के गुणावगुण जानने की इक्षा करते हैं तो ,वे सीताजी द्वारा उनकी चिंता दूर कराते है----
समय विनती कर लक्ष्मण ,
बोले रघुबर से ,हे भ्राता !
शंका एक निवारण करदें ;
पिता हमारे राजा दशरथ ,
थे सम्राट चक्रवर्ती
वे,
वेद विधान नीति पारंगत

वह सब भार भरत पर है अब,
कैसे वे कर रहे व्यवस्था ?
क्या व्यवहार सुधी नृप के हों ,
दुष्ट नृपों के विचार कैसे ;
राघव भेद सहित समझाएं ,
हर्षे रघुपति वाणी सुनकर



राज्यश्री धरती माँ सम है ,
बोले राम सभी के उत्तर ;
कहें जानकी यही उचित है
सिय बोलीं ,योग्य भूप पाकर ,
माता धरती हर्षित होतीं ;
उर्वरा शक्ति करतीं ,प्रकटित |


धन -धान्य श्री पुष्पित होकर ,
प्रकृति भी मुस्काने लगती ;
बर्षा बसंत सब ऋतुएँ भी ,
हैं उचित समय आतीं जातीं
सब प्रजा सुखी सम्पन्न हुई ,

राजा की जय गाती रहती

भूप, जो प्रजा के पालन में ,
पिता समान भाव दिखलाता ;
सबमें निज सुख दुःख भाव किए ,
विविध विधान धर्म अपनाता ;
लघुतम से लघुतम प्राणी का ,
न्याय धर्म युत रखता ध्यान॥


प्रजा स्वयं भी प्रेम भाव की ,
सुर-सरिता में बहती रहती ,
सब परमार्थ भाव रत रहते।
नारी का अपमान होता,

चोरी ठगी अधर्म भाव का,
सपने में भी ध्यान
आता

अश्लील साहित्य कर्म का ,
लेश मात्र भी जिक्र होता ;
नारि- पुरूष सब उचित आचरण ,
सात्विक कर्म धर्म अपनाते ;
जन, निर्भय आनंदित रहता॥


देश की रक्षा ,संस्कृति रक्षण ,
तथा प्रजा के व्यापक हित में ,
अधर्मियों से,विधर्मियों से,
अन्यायी लोलुप जन जो हों ;
कभी नहीं समझौता करता
वही नृपति अच्छा शासक है


पर जो शासक ,निज सुख के हित,
अत्याचार प्रजा पर करता ;
अधर्म मय, अन्याय कर्म से ;
अपराधों को प्रश्रय देता
अप विचार अप कर्म भाव में ,
जन-जन पाप लिप्त होजाता॥


हिंसा चोरी अनृत भावना ,
नर-नारी को भाने लगती;
अश्लील कृत्यों से नारी ,
अपने को कृत कृत्य समझती
लूट ,अपहरण बलात्कार के,
विविध रूप अपनाए जाते॥


अति भौतिक सुख लिप्त हुए नर,
मद्य - पान आदिक विषयों रत ;
कपट झूठ छल और दुष्टता ,
के भावों को प्रश्रय देते ;
भ्रष्टाचार , आतंकबाद में ,

राष्ट्र, समाज लिप्त होजाता

पाप अधर्म -नीति कृत्यों से ,
प्रकृति माता विचलित होती;
अनावृष्टि ,अतिवृष्टि आदि से ,
धरती की उर्वरता घटती,
कमी धान्य-धन की होने से ,
बनती है अकाल की स्थिति

नीतिवान धर्मग्य भरत हैं ,
साथ सभी को लेकर चलते ;
रक्षा-हित तत्पर हैं ,शत्रुहन ,
प्रजा सुखी ,संतृप्त रहेगी ;
सुखद समर्थ प्रवंधन होगा,
चिंता की कुछ बात नहीं है -----
शूर्पनखा ,काव्य-उपन्यास से

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