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डा श्याम गुप्त का ब्लोग...

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Lucknow, UP, India
एक चिकित्सक, शल्य-चिकित्सक जो हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान व उसकी संस्कृति-सभ्यता के पुनुरुत्थान व समुत्थान को समर्पित है व हिन्दी एवम हिन्दी साहित्य की शुद्धता, सरलता, जन-सम्प्रेषणीयता के साथ कविता को जन-जन के निकट व जन को कविता के निकट लाने को ध्येयबद्ध है क्योंकि साहित्य ही व्यक्ति, समाज, देश राष्ट्र को तथा मानवता को सही राह दिखाने में समर्थ है, आज विश्व के समस्त द्वन्द्वों का मूल कारण मनुष्य का साहित्य से दूर होजाना ही है.... मेरी दस पुस्तकें प्रकाशित हैं... काव्य-दूत,काव्य-मुक्तामृत,;काव्य-निर्झरिणी, सृष्टि ( on creation of earth, life and god),प्रेम-महाकाव्य ,on various forms of love as whole. शूर्पणखा काव्य उपन्यास, इन्द्रधनुष उपन्यास एवं अगीत साहित्य दर्पण (-अगीत विधा का छंद-विधान ), ब्रज बांसुरी ( ब्रज भाषा काव्य संग्रह), कुछ शायरी की बात होजाए ( ग़ज़ल, नज़्म, कतए , रुबाई, शेर का संग्रह) my blogs-- 1.the world of my thoughts श्याम स्मृति... 2.drsbg.wordpres.com, 3.साहित्य श्याम 4.विजानाति-विजानाति-विज्ञान ५ हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान ६ अगीतायन ७ छिद्रान्वेषी

मंगलवार, 26 अप्रैल 2011

एक प्रेरक सूत्र--- आत्म-बल...

                                      ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...  

 -----ऋग्वेद -मंडल ४/सू. १६/ २३२७.... में ऋषि का कथन है कि....
                        "  """""""यानि कृत्सेन सरथम वस्यु स्तोये वातस्य हर्योरीशान: |
               ऋज्रा वाजं न गध्यं युयूषांक विहर्य हन्यामपि भूयात  ||"-------  
                 अर्थात---  जब दूरदर्शी कुत्स योग्य अन्न की भाँति ऋजुता-सरलता को अपनाकर पार होने के लिए तत्पर होता है तब उसके रक्षण की कामना से इन्द्रदेव उसीके रथ पर सवार हो जाते हैं |
                 -----कुंठाग्रस्त साधक( या किसी भी कर्म में  रुकावट से आतंकित होकर रुक जाने वाला मानव ) जब अपनी दूरदर्शिता का प्रयोग करके सहज भाव से अपनी कुंठा के कारणों( मार्ग की रुकावटों को स्वयं दूर करने का प्रयत्न ) को दूर करने के लिए संकल्पित होता है( स्वयं उठा खड़ा  होता है, इच्छा शक्ति का प्रयोग करता है  ) तो इन्द्रदेव--अर्थात उसका स्वयम की शक्ति आत्म-संकल्प=आत्मबल = सेल्फ  भी उसका मनोरथ पूर्ण करने के लिए. उसके साथ होजाते हैं,  उसका साथ देने लगते हैं |

4 टिप्‍पणियां:

आशुतोष ने कहा…

सही कहा आप ने गुरुदेव.. हमारा विचार अगर धनात्मक हो तो हमारा अभीष्ट हमे मिल ही जाएगा..आत्म बल से बड़े बड़े युद्ध जीते गए है बड़ी बड़ी क्रांतिय हुई हैं..
आभार

आशुतोष की कलम से....: मैकाले की प्रासंगिकता और भारत की वर्तमान शिक्षा एवं समाज व्यवस्था में मैकाले प्रभाव :

Rakesh Kumar ने कहा…

अति सुन्दर,ज्ञानवर्धक और प्रेरणास्पद विवेचना.
बहुत बहुत आभार इस अनुपम प्रस्तुति के लिए.मन्त्र शब्दार्थ के साथ हो तो और भी अच्छा लगेगा.

ZEAL ने कहा…

Indeed very inspiring post .

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

आत्मबल ही बाधाओं के पार ले जाने में सक्षम है।