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डा श्याम गुप्त का ब्लोग...

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Lucknow, UP, India
एक चिकित्सक, शल्य-चिकित्सक जो हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान व उसकी संस्कृति-सभ्यता के पुनुरुत्थान व समुत्थान को समर्पित है व हिन्दी एवम हिन्दी साहित्य की शुद्धता, सरलता, जन-सम्प्रेषणीयता के साथ कविता को जन-जन के निकट व जन को कविता के निकट लाने को ध्येयबद्ध है क्योंकि साहित्य ही व्यक्ति, समाज, देश राष्ट्र को तथा मानवता को सही राह दिखाने में समर्थ है, आज विश्व के समस्त द्वन्द्वों का मूल कारण मनुष्य का साहित्य से दूर होजाना ही है.... मेरी दस पुस्तकें प्रकाशित हैं... काव्य-दूत,काव्य-मुक्तामृत,;काव्य-निर्झरिणी, सृष्टि ( on creation of earth, life and god),प्रेम-महाकाव्य ,on various forms of love as whole. शूर्पणखा काव्य उपन्यास, इन्द्रधनुष उपन्यास एवं अगीत साहित्य दर्पण (-अगीत विधा का छंद-विधान ), ब्रज बांसुरी ( ब्रज भाषा काव्य संग्रह), कुछ शायरी की बात होजाए ( ग़ज़ल, नज़्म, कतए , रुबाई, शेर का संग्रह) my blogs-- 1.the world of my thoughts श्याम स्मृति... 2.drsbg.wordpres.com, 3.साहित्य श्याम 4.विजानाति-विजानाति-विज्ञान ५ हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान ६ अगीतायन ७ छिद्रान्वेषी

रविवार, 5 जून 2011

श्याम लीला -६... होली..... डा श्याम गुप्त...

                                                                            ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...
होली सब क्यों खेलते, अपने अपने धाम ,
साथ साथ खेलें अगर,  होली सारा गाँव  |
होली सारा गाँव,ख़त्म हो तना-तनी सब,
गली डगर चौपाल, हर जगह होली हो अब |
निकले राधा -श्याम, ग्वाल, गोपी मिल टोली ,
गली गली और गाँव गाँव में खेलें  होली ||

होली की इस धूम में मचें विविधि हुड़दंग ,
केसर और अबीर संग,उडें चहुँ तरफ रंग |
उड़ें चहुँ तरफ रंग, मगन सब ही नर नारी ,
बढे  एकता-भाव,  वर्ग समरसता  भारी |
बिनु खेले नहिं रहें, बनें  सब ही हमजोली ,
जन जन प्रीति बढ़ाय, सभी मिलि खेलें होली ||


5 टिप्‍पणियां:

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

होली खेलें कृष्ण कन्हैया।

अरुण कुमार निगम (mitanigoth2.blogspot.com) ने कहा…

होली की कुण्डलियाँ बेहतरीन हैं.कुंडलियों के विधान का विशेष ख्याल रखा गया.जैसे आदि एवं अंत का एक ही होना,दूसरी पंक्ति का अंतिम वाक्यांश का तीसरी पंक्ति का प्रथम वाक्यांश होना.मजा आ गया.मेरी कविताओं वाले ब्लॉग http://mithnigoth.blogspot.com में जरुर पधारें.

Dr. shyam gupta ने कहा…

धन्यवाद पांडे जी..
धन्यवाद निगम जी ....कुंडलियों के लिए यह विधान एक आदर्श स्थिति तो है पर आवश्यक नहीं, अंतिम पंक्ति के अन्त्यानुप्रास का पांचवी पंक्ति से तादाम्य भी हो सकता है.. यथा काका हाथरसी की यह कुंडली...
"मम्मी जी ने बनाए, हलुआ-पूड़ी आज,
आ धमके घर अचानक,पंडित श्री गजराज.
पंडित श्री गजराज, सजाई भोजन थाली,
तीन मिनट में तीन थालियाँ कर दीं खाली.
मारी एक डकार, भयंकर सुर था ऐसा,
हार्न दे रहा हो, मोटर का ठेला जैसा ."

veerubhai ने कहा…

भाव रस गीत है यह होली प्रीत .राष्ट्रीय एकता का प्रतीक भी -आज ब्रज में होरी रे रसिया ,होरी रे होरी बरजोरी रे रसिया ,कौन गाँव को किसान कन्हैया ,कौन गाम की गौरी रे रसिया ...वाह आनंद रस बरसाया आपके भाव गीत ने ।
सह्भाविक :वीरेंद्र शर्मा (वीरुभाई )

Dr. shyam gupta ने कहा…

बहुत बहुत धन्यवाद बीरू भाई जी...आभार...