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डा श्याम गुप्त का ब्लोग...

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Lucknow, UP, India
एक चिकित्सक, शल्य-चिकित्सक जो हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान व उसकी संस्कृति-सभ्यता के पुनुरुत्थान व समुत्थान को समर्पित है व हिन्दी एवम हिन्दी साहित्य की शुद्धता, सरलता, जन-सम्प्रेषणीयता के साथ कविता को जन-जन के निकट व जन को कविता के निकट लाने को ध्येयबद्ध है क्योंकि साहित्य ही व्यक्ति, समाज, देश राष्ट्र को तथा मानवता को सही राह दिखाने में समर्थ है, आज विश्व के समस्त द्वन्द्वों का मूल कारण मनुष्य का साहित्य से दूर होजाना ही है.... मेरी दस पुस्तकें प्रकाशित हैं... काव्य-दूत,काव्य-मुक्तामृत,;काव्य-निर्झरिणी, सृष्टि ( on creation of earth, life and god),प्रेम-महाकाव्य ,on various forms of love as whole. शूर्पणखा काव्य उपन्यास, इन्द्रधनुष उपन्यास एवं अगीत साहित्य दर्पण (-अगीत विधा का छंद-विधान ), ब्रज बांसुरी ( ब्रज भाषा काव्य संग्रह), कुछ शायरी की बात होजाए ( ग़ज़ल, नज़्म, कतए , रुबाई, शेर का संग्रह) my blogs-- 1.the world of my thoughts श्याम स्मृति... 2.drsbg.wordpres.com, 3.साहित्य श्याम 4.विजानाति-विजानाति-विज्ञान ५ हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान ६ अगीतायन ७ छिद्रान्वेषी

शुक्रवार, 16 मार्च 2012

हाउस वाइफ......डा श्याम गुप्त का आलेख ....

                                   ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...        

----क्या आपकी पत्नी भी कहीं काम करती हैं ......अरे नहीं , वे तो हाउस वाइफ हैं।
----क्या आप भी कहीं काम करते हैं ......नहीं मैं तो घरेलू स्त्री ..हाउस वाइफ हूँ ।
---- क्या  आप भी हाउस वाइफ हैं   ....... अरे नहीं  मैं तो बैंक में अफसर हूँ ।
              अर्धांगिनी,  घर की लक्ष्मी, मालकिन, महारानी,  "बिनु घरनी घर भूत का डेरा.... " आदि उपाधि धारी, दिन भर घर-आंगन सुधारने-बुहारने  में हड्डी-मांस गलाने वाली  या  झाडू लगवाने, खाना बनवाने, धोबी का हिसाब, किफायत से मार्केटिंग  करने, दिन भर  घर-द्वार की कुंडी-दरवाज़ा खोलने-बंद करने में   रक्त-सुखाने वाली,  बच्चे पैदा करके- पालन-पोषण में शरीर को होम करने वाली, रूखा-सूखा खाकर संतुष्ट रहकर......आगे आप ही सोचिये ......यह ऐसा सर्वश्रेष्ठ व कठिनतम श्रम करने वाली "हाउस वाइफ" की सुन्दर-असुंदर तस्वीर है.......।
               कैश व काइंड... तो भ्रष्टाचार व रिश्वत में भी खूब चलता है.......परन्तु जब महिला-श्रम  की बात होती है तो बस कैश की ही बात की जाती है ....श्रम उसे  ही कहते हैं जिसमें कैश मिलता है...धन मिलता है...तनखा- पे-पर्क्स मिलते हैं ...तब हम  मैन-काइंड  के लिए...काइंड पर श्रम करती ..."हाउस वाइफ"... को भूल जाते हैं .जिसका मूल्य यह मनुष्य, मानव, समाज, विश्व इतिहास, भूत-भविष्य-वर्तमान...पूरे जीवन में व इतिहास में नहीं चुका सकता।
           आखिर कब तक घरेलू महिला, हाउस-वाइफ गयी-गुज़री, "घर की मुर्गी दाल बराबर" बनी रहेगी ? क्या हाउस वाइफ का श्रम.. श्रम नहीं ?....क्या नौकरी करती महिला 'हाउस वाइफ. नहीं  तो क्या.....।                    

6 टिप्‍पणियां:

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

बाहर की नौकरी से भी अधिक कठिन है यह कार्य।

mridula pradhan ने कहा…

bahut sahi prashn uthaya hai.....

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

बहुत अच्छी प्रस्तुति!
इस प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार के चर्चा मंच पर भी होगी!
सूचनार्थ!

Dr. shyam gupta ने कहा…

धन्यवाद पान्डे जी....म्रिदुला जी एवं शास्त्री जी.....आभार..

वाणी गीत ने कहा…

गृहिणियों के श्रम का हिसाब लगाना और उसे मूल्य से आंकना संभव ही नहीं है !

वन्दना ने कहा…

इस प्रश्न का उत्तर कोई नही दे सकता ।