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डा श्याम गुप्त का ब्लोग...

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Lucknow, UP, India
एक चिकित्सक, शल्य-चिकित्सक जो हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान व उसकी संस्कृति-सभ्यता के पुनुरुत्थान व समुत्थान को समर्पित है व हिन्दी एवम हिन्दी साहित्य की शुद्धता, सरलता, जन-सम्प्रेषणीयता के साथ कविता को जन-जन के निकट व जन को कविता के निकट लाने को ध्येयबद्ध है क्योंकि साहित्य ही व्यक्ति, समाज, देश राष्ट्र को तथा मानवता को सही राह दिखाने में समर्थ है, आज विश्व के समस्त द्वन्द्वों का मूल कारण मनुष्य का साहित्य से दूर होजाना ही है.... मेरी दस पुस्तकें प्रकाशित हैं... काव्य-दूत,काव्य-मुक्तामृत,;काव्य-निर्झरिणी, सृष्टि ( on creation of earth, life and god),प्रेम-महाकाव्य ,on various forms of love as whole. शूर्पणखा काव्य उपन्यास, इन्द्रधनुष उपन्यास एवं अगीत साहित्य दर्पण (-अगीत विधा का छंद-विधान ), ब्रज बांसुरी ( ब्रज भाषा काव्य संग्रह), कुछ शायरी की बात होजाए ( ग़ज़ल, नज़्म, कतए , रुबाई, शेर का संग्रह) my blogs-- 1.the world of my thoughts श्याम स्मृति... 2.drsbg.wordpres.com, 3.साहित्य श्याम 4.विजानाति-विजानाति-विज्ञान ५ हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान ६ अगीतायन ७ छिद्रान्वेषी

मंगलवार, 8 मई 2012

डा श्याम गुप्त की गज़ल.....

                                 ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...     

सर  हमारा, आपके कांधों  पै  था।
ख्याल सारा, आपकी बातों पे था ।

क्या नज़ारा था,  कि  हम थे आपके ,
क्या गुमां उन प्यार की रातों  पै  था।

क्या बतायें, क्या कहैं, कैसे कहैं,
क्या नशा उन दिल के ज़ज़्वातों पै था ।

हम तो उस पल, होगये थे आपके,
इक यकीं बस, आपके वादों पै था ।

आप जो भूले, नहीं था गम कोई,
हमको अरमां आपकी यादों पै था  ।

कैसे टूटा  श्याम’ टुकडे होगया ,
दिल हमारा, आपके हाथों पै था ॥


6 टिप्‍पणियां:

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

वाह, बहुत खूब..

नीरज गोस्वामी ने कहा…

Kya Kahne hain...

Dr. shyam gupta ने कहा…

धन्यवाद नीरज जी व पान्डे जी....

Dr. shyam gupta ने कहा…

डॉ टी एस दराल has left a new comment on your post "डा श्याम गुप्त की गज़ल.....":

वाह ! बहुत बढ़िया ग़ज़ल लिखी है डॉक्टर साहब .
बस पै की जगह पे कर लें तो एकदम सही लगेगी .

Dr. shyam gupta ने कहा…

धन्यवाद --डा दराल... सही कहा उर्दू में पे ही लिखा कहा जाता है या फ़िर पर....मुझे लगता है हिन्दी में पे अशिष्ट सा लगता है...

veerubhai ने कहा…

आप जो भूले, नहीं था गम कोई,
हमको अरमां आपकी यादों पै था ।
बढ़िया ग़ज़ल प्रगाढ़ अनुभूतियों से संसिक्त रागात्मकता को सहेजती सी .बधाई .
.कृपया यहाँ भी पधारें -
बुधवार, 9 मई 2012
शरीर की कैद में छटपटाता मनो -भौतिक शरीर
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रहिमन पानी राखिये
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