ब्लॉग आर्काइव

डा श्याम गुप्त का ब्लोग...

मेरी फ़ोटो
Lucknow, UP, India
एक चिकित्सक, शल्य-चिकित्सक जो हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान व उसकी संस्कृति-सभ्यता के पुनुरुत्थान व समुत्थान को समर्पित है व हिन्दी एवम हिन्दी साहित्य की शुद्धता, सरलता, जन-सम्प्रेषणीयता के साथ कविता को जन-जन के निकट व जन को कविता के निकट लाने को ध्येयबद्ध है क्योंकि साहित्य ही व्यक्ति, समाज, देश राष्ट्र को तथा मानवता को सही राह दिखाने में समर्थ है, आज विश्व के समस्त द्वन्द्वों का मूल कारण मनुष्य का साहित्य से दूर होजाना ही है.... मेरी तेरह पुस्तकें प्रकाशित हैं... काव्य-दूत,काव्य-मुक्तामृत,;काव्य-निर्झरिणी, सृष्टि ( on creation of earth, life and god),प्रेम-महाकाव्य ,on various forms of love as whole. शूर्पणखा काव्य उपन्यास, इन्द्रधनुष उपन्यास एवं अगीत साहित्य दर्पण (-अगीत विधा का छंद-विधान ), ब्रज बांसुरी ( ब्रज भाषा काव्य संग्रह), कुछ शायरी की बात होजाए ( ग़ज़ल, नज़्म, कतए , रुबाई, शेर का संग्रह), अगीत त्रयी ( अगीत विधा के तीन महारथी ), तुम तुम और तुम ( श्रृगार व प्रेम गीत संग्रह ), ईशोपनिषद का काव्यभावानुवाद .. my blogs-- 1.the world of my thoughts श्याम स्मृति... 2.drsbg.wordpres.com, 3.साहित्य श्याम 4.विजानाति-विजानाति-विज्ञान ५ हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान ६ अगीतायन ७ छिद्रान्वेषी ---फेसबुक -डाश्याम गुप्त
ब्रह्म लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
ब्रह्म लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

गुरुवार, 18 जुलाई 2019

वेदों के महावाक्य---डा श्याम गुप्त

                                          ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ... 

---वेदों के महावाक्य --- 
========== =======
वेदों की चार घोषणाएं हैं ----- जो भारतीय दर्शन , जीवन व व्यवहार का मूल हैं --
ऋग्वेद का कथन है ‘प्रज्ञानाम ब्रह्म’ अर्थात् ब्रह्म परम चेतना है |
यजुर्वेद का सार है ‘अहम् ब्रह्मास्मि’ अर्थात् मैं ब्रह्म हूं।
सामवेद का कथन है ‘तत्वमसि’ अर्थात् वह तुम हो। )
अथर्ववेद का सारतत्व कहता है ‘अयम आत्म ब्रह्म’ अर्थात् यह आत्मा ब्रह्म है।
---- ये सारे महान कथन भिन्न-भिन्न हैं और भिन्न-भिन्न प्रकार से उनकी व्याख्या की गई है, किंतु वे सब एक ही दिव्य तात्विकता से ओत प्रोत हैं, जो भारतीय संस्कृति की मनीषा है |
\
प्रथम उद्घोषणा है, #प्रज्ञानाम #ब्रह्म, प्रज्ञान क्या होता है? क्या वह केवल बुद्धि और चातुर्य है? प्रज्ञान शरीर में, मन में, बुद्धि में, अहम में, सब में विद्यमान होता है। #प्रज्ञान जड़ और चेतन दोनों में रहता है। उसे हम निरंतर संपूर्ण चेतना कहते हैं। #चेतना क्या होती है? चेतना का अर्थ है जानना। क्या जानना? थोड़ा कुछ या टुकड़े टुकड़े में जानने को चेतना नहीं कहते हैं। यह संपूर्ण ज्ञान होता है।
------यह उस दिव्य तत्व जो जड़ और चेतना दोनों में निहित है, उसका ज्ञान होना ही संपूर्ण चेतना है।
-------वास्तव में प्रज्ञान और ब्रह्म एक दूसरे के पर्यायवाची हैं, वे दो अलग वस्तुएं नहीं हैं। ब्रह्म क्या है? #ब्रह्म वही है जो सर्वव्यापी हैं, यह वृहद तत्व का सिद्धांत है। संपूर्ण सृष्टि ही वृहद है या शक्तिशाली विशाल सूत्र है। इस संपूर्ण ब्रह्मांड में ब्रह्म व्याप्त है। सरल भाषा में ब्रह्म का अर्थ होता है, सर्वत्र फैला हुआ। वह चारों ओर व्याप्त है, एक सद्गुरु भी इन गुणों से युक्त होता है|
\
द्वितीय उद्घोषणा --- ‘#अहम् #ब्रह्मास्मि।’ अहम् का अर्थ केवल ‘मैं’ नहीं होता अपितु #अहम् का अन्य अर्थ होता है #आत्मा। अहम् ही आत्मा का स्वरूप होता है जो चेतना के चारों ओर उपस्थित होती है, वह मनुष्य में आत्मा के रूप में स्थापित की गई है। यह आत्मा सबके अंदर साक्षी रूप में अवस्थित होती है। आत्मा, चेतना और ब्रह्म ये सब भिन्न नहीं हैं। अहम् ब्रह्मास्मि का अर्थ है- मेरे अंदर भी आत्मा या मेरे अंदर का== ‘मैं’ ही सनातन साक्षी है, वही ब्रह्म है।==
\
तृतीय उदघोषणा है- ‘#तत्वमसि।’ यह सामवेद का सार है। तत् का अर्थ है ‘वह’ और त्वम् का अर्थात् ‘तू, तुम’, असि का अर्थ है ‘हो।’ जब तक मैं और तुम का भेद होता है तब तक मैं और तुम दो अलग-अलग रहते हैं, पर जब मैं और तुम इकट्ठे हो जाते हैं तब ‘#हम’ बन जाते हैं, दोनों मिलकर एक अस्तित्व बन जाता है। जहां दुविधा है वहां ‘तुम’ है और जहां उपाधि (द्वैत का भाव ) नहीं है वहां ‘तत् है। एक जीव है, दूसरा देव है। सामवेद में यह बहुत स्पष्ट ढंग से समझाया गया है कि जीव और देव दोनों एक ही हैं।
\
चतुर्थ घोषणा ‘#अयम् #आत्म #ब्रह्म’ यह चौथा कथन है। इसमें तीन शब्द हैं- अयम्, आत्म तथा ब्रह्म। परंतु वे तीन नहीं हैं। पहला वह जो आप स्वयं समझते हैं, एक वह जो और अन्य लोग आपको समझते हैं और एक वह जो वास्तव में तुम हो, जिससे अभिप्राय है शरीर, मन (चित्त) और आत्मा। हम अपने शरीर से काम करते हैं, मन से विचार करते हैं और इन दोनों की साक्षी रूप में हमारी आत्मा होती है। जागृत अवस्था में आप व्यक्तिगत रूप से पूरा विश्व होते हैं, स्वप्नावस्था में तेजस और निद्रावस्था में प्रज्ञा स्वरूप। प्रज्ञानाम ब्रह्म अर्थात् ब्रह्म ही परम चेतना होती है। प्रज्ञान ही आत्मा होती है।
\
ये वेद उद्घोषणायें महावाक्यों के रूप में –#उपनिषदों के अंतर्गत वर्णित हैं--जो -==उपनिषदों का निर्देश स्वरूप में लघु है, परन्तु बहुत गहन == विचार समाये हुए है।
-----प्रमुख उपनिषदों में से इन वाक्यो को #महावाक्य माना है – उपनिषदों में जो ये चार महत्वपूर्ण वाक्य हैं , जो आत्मा (स्वयं) और ब्रह्म के संबंधों पर आधारित हैं। इन्हें ही महावाक्य कहा जाता है। ये चारों वाक्य ब्रह्म के स्वरूप को अलग-अलग तरीके से पेश करते हैं। इनमें यह भी बताने की कोशिश की गई है कि ==आत्मा और ब्रह्म के बीच कोई अंतर नहीं ==है। इन चारों महावाक्यों की चर्चा वेदों की उत्पत्ति के क्रम में है।

-----प्रज्ञानं ब्रह्म - "वह प्रज्ञानं ही ब्रह्म है" ( ऐतरेय उपनिषद १/२ - ऋग्वेद) प्रज्ञा रूप उपाधिवाला आत्मा ब्रह्म है...[ Consciousness is Brahman ]
-----अहं ब्रह्मास्मि - "मैं ब्रह्म हूँ " ( बृहदारण्यक उपनिषद १/४/१० - यजुर्वेद) [ I am Brahman....]
-----तत्वमसि - "वह (ब्रह्म) तू ही है" ( छान्दोग्य उपनिषद ६/८/७- सामवेद ) तत्वमसि [तत त्वम असि] - वह पूर्ण ब्रह्म तू है... जो जीव आप में है, वही मुझमें है। [You are That....]
------अयम् आत्मा ब्रह्म - "यह आत्मा ही ब्रह्म है" ( माण्डूक्य उपनिषद १/२ - अथर्ववेद ) यह सर्वानुभाव सिद्ध अपरोक्ष आत्मा ब्रह्म है...[This Self (Aatma) is Brahman...]
-----उपनिषदों में एक पांचवां महावाक्य है -- #सर्वं #खल्विदं #ब्रह्म् - "सर्वत्र ब्रह्म ही है", यह समस्त संसार ब्रह्म ही है ( छान्दोग्य उपनिषद ३/१४/१- सामवेद ) यह उपरोक्त चार उद्घोषणाओं /महावाक्यों का सार रूप ही है |
\
-----पहला महावाक्य ऋग्वेद के #ऐतरेय उपनिषद में उद्धृत किया गया है , जिसे ' #लक्षणा#वाक्य ' भी कहा गया है। इसका संबंध ब्रह्म की चैतन्यता से है, क्योंकि इसमें ब्रह्म को चैतन्य रूप में रखा गया है।
-----दूसरा महावाक्य यजुर्वेद के #वृहदारण्यक उपनिषद से लिया गया है। इसकी खासियत यह है कि इसमें यह जताने की कोशिश की गई है कि हम सभी ब्रह्म (अहं ब्रह्मास्मि) हैं। इसे ' #अनुभव #वाक्य ' भी कहते हैं और इसके मूल स्वरूप को सिर्फ अनुभव के जरिए हासिल किया जा सकता है।
------तीसरा महावाक्य सामवेद के #छांदोग्य उपनिषद से लिया गया है। इस महावाक्य ' तत त्वम असि ' का मतलब यह है कि सिर्फ मैं ही ब्रह्म नहीं हूं , आप भी ब्रह्म है , बल्कि विश्व की हर वस्तु ही ब्रह्म है। इसे #उपदेश #वाक्य भी कहा जाता है। यह उपदेश वाक्य इसलिए भी कहा जाता है , क्योंकि इसके जरिए गुरु अपने शिष्यों में अहंकार को रोकते हैं। साथ ही , वह दूसरों के प्रति आदर की भावना को भी पैदा करते हैं।
------चौथा महावाक्य #मुंडक उपनिषद से लिया गया है। ' अयामात्मा ब्रह्म ' महावाक्य के जरिए यह जताने की कोशिश हुई है कि आत्मा ही ब्रह्म है। यह अद्वैतवाद के सिद्धांत को प्रतिपादित करता है और परम सत्य के बड़े स्वरूप की जानकारी देता है, इसलिए इसे ' #अनुसंधान #वाक्य ' भी कहा जाता है।
\
ब्रह्म का स्वरूप ---
****************
वेदांत में #सच को ' ब्रह्म ' के रूप में स्वीकार किया गया है। इस ब्रह्म के पास ही वह #माया नामक शक्ति है, जिसके कारण एक सत्य तक पहुंचने के कई रास्ते दिखते हैं।
-----जो कई रास्ते या ब्रह्म के कई रूप दिखते हैं , वह दरअसल माया नामक शक्ति का परिणाम है। ब्रह्म एक है और जो विभिन्नता दिखती है , वह ब्रह्म के ही अलग-अलग रूप हैं।
------हर रूप की अलग विशेषता हो सकती है , उनके नाम भी अलग-अलग हो सकते हैं, पर सार-तत्व एक ही है और मूल भी एक ही और सिर्फ एक ही है। हमारा रूप व नाम दूसरे से अलग हो सकता है और इस तरह अनंत लोगों का रूप सामने आ सकता है।
---------इस अद्वैत के सिद्धांत के मुख्य चार बिंदु हैं-
**ब्रह्म का अस्तित्व है ,
**ब्रह्म एक है ,
**आप ब्रह्म हैं और
** मैं भी ब्रह्म हूं।
--------इसमें ब्रह्म को भगवान या चैतन्य का भी नाम दिया जा सकता है।
\
मोक्ष या मुक्ति का स्वरुप ------
****************************
ब्रह्म की इस अनंतता को पहचानना और अद्वैत के रहस्य को समझना ही मानव जीवन का वास्तविक उद्देश्य है | पूर्ण मुक्ति या मोक्ष तक पहुंचने का यही एकमात्र मार्ग है।
-------आध्यात्मिक जीवन के तीन प्रमुख चरण माने जाते हैं -
**द्वैत,
**विशिष्टताद्वैत और
**अद्वैत।
----------हर व्यक्ति जीवन के इन तीन चरणों से होकर गुजरता है।
----#द्वैत रूपी प्रथम चरण में व्यक्ति और भगवान दोनों का अलग-अलग अस्तित्व रहता है।
-----#दूसरे चरण में व्यक्ति खुद का भगवान से तादाम्य अनुभव करने लगता है परन्तु दो अलग अलग अस्तित्व की उपस्थिति का आभास रहता है |
-----#अद्वैत रूपी अंतिम चरण में व्यक्ति को एक ईश्वर से एकत्व अर्थात ब्रह्म व आत्मा के एकत्व का आभास होता है। उसे यह ज्ञात होता है कि मेरा या तेरा जैसे शब्दों का कोई अस्तित्व नहीं। ब्रह्म और आत्मा एक ही हैं । यही वह महादशा होती है ---जब मैं था तब हरि नहीं अब हरि हैं मैं नाहिं----यही #मोक्ष है |

उपनिषदों में अन्य महावाक्य --
**********************
चार महावाक्यों के अलावा उपनिषदों में कुछ अन्य महत्वपूर्ण महावाक्य भी हैं, इन्हें #उक्तियाँ व #महासूत्र भी कहा जा सकता है –
-----'#सर्वम् #खल्विदम #ब्रह्म ' यह सारा संसार ब्रह्म हैं। सब ब्रह्म में स्थित हैं सब में ब्रह्म उपस्थित है |
-----=='ब्रह्म सत्यं जगत मिथ्या ' ==ब्रह्म ही सत्य है, जगत यानी यह दुनिया मिथ्या है, आभासी है माया के कारण विविध रूप दिखाई देते हैं ।
------==='वसुधैव कुटुंबकम' -====का अर्थ है, पूरी दुनिया ही मेरा परिवार है। सभी धर्म में इस प्रकार की बात कही गई है। वसुधैव कुटुंबकम की धारणा हमें उस प्यार की शिक्षा देती है, जो हर जीव, हर आत्मा में विद्यमान है।
------==अतिथि देवो भव=== (अतिथि देवता समान होते हैं) को वही महत्व दिया गया है जो #मातृ देवो भव और #पितृ देवो भव को मिला है।
------==सत्यं शिवं सुन्दरम् ==--- ब्रह्म सत्य की व्याख्या करता है और इसकी प्राप्ति का मार्ग भी बतलाता है। इस उक्ति में जीवन के तीन पक्ष बताए गए हैं: सत्य, शिव और सुंदर। यहां शिव चेतना और सुंदर आंतरिक आह्लाद का प्रतीक है। इस उक्ति को दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि सत्य ही शिव है और सत्य ही सुंदर है। इस उक्ति में मुख्य रूप से सत्य के महत्व को दर्शाया गया है। सत्य के मार्ग पर चल कर ही आप शिव और आंतरिक प्रसन्नता को प्राप्त करते हैं, वही वास्तविक सौन्दर्य भी है| सत्य ही हमारे मस्तिष्क, भाषा और कृत्यों में एकरूपता या मेल स्थापित करता है। धर्म के तीन पक्ष भी सत्य, शिव और सुंदर ही हैं। यह भारतीय संस्कृति के प्रत्येक भाव, व्यवहार व कृतित्व का संतुलन व मूल तत्व है | जो सत्य होगा वही शिव भी होगा एवं वही सुन्दर भी | किसी भी तत्व, भाव व कृतित्व व व्यवहार में सुन्दर तत्व सबसे अंत में है ----अर्थात सत्य के बिना, कल्याणकारी रूप के बिना सौन्दर्य का कोई अर्थ नहीं |
------==सत्, चित्त और आनंद ==- यहां चित्त चेतना और आनंद सुंदर या आंतरिक प्रसन्नता का द्योतक है। ब्रह्म सच्चिदानंद है, अर्थात आत्मा भी सच्चिदानंद है, यदि वह सत्य में स्थित चित है तभी आनंद स्थिति में है, तभी ब्रह्म से तादाम्य में है |




 

मंगलवार, 20 मार्च 2018

भारतीय धर्म, दर्शन राष्ट्र -संस्कृति के विरुद्ध उठती नवीन आवाजें व उनका यथातथ्य निराकरण ---पोस्ट--षष्ठ --डा श्याम गुप्त

                              ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ..

भारतीय धर्म, दर्शन राष्ट्र -संस्कृति के विरुद्ध उठती नवीन आवाजें व उनका यथातथ्य निराकरण ---पोस्ट--षष्ठ --डा श्याम गुप्त
----पूर्वा पर ----
          आजकल हमारे देश में गोंड आदिवासी दर्शन और बहुजन संस्कृति व महिषासुर के नाम पर एक नवीन विरोधी विचारधारा प्रश्रय पा रही है जिसे महिषासुर विमर्श का नाम दिया जारहा है | जिसमें जहां सारे भारत में समन्वित समाज की स्थापना के साथ धर्मों व प्राचीन जातियों आदि का अस्तित्व नहीं के बरावर रह गया था, अब असुर, नाग, गोंड आदि विभिन्न जातियों वर्णों को उठाया जा रहा है |
          भ्रामक विदेशी ग्रंथों आलेखों में आर्यों को भारत से बाहर से आने वाला विदेशी बताये जाने के भारत में फूट डालने वाले षडयन्त्र से भावित-प्रभावित वर्ग द्वारा इंद्र, आदि देवों को आर्य एवं शिव व अन्य तथाकथित असुर व नाग, गोंड आदि जातियों भारत की मूल आदिवासी बताया जा रहा है | वे स्वयं को हिन्दू धर्म में मानने से भी इनकार करने लगे हैं |
          विभन्न आलेखों, कथनों, प्रकाशित पुस्तकों में उठाये गए भ्रामक प्रश्नों व विचारों, कथनों का हम एक एक करके उचित समाधान प्रस्तुत करेंगे जो ४० कथनों-समाधानों एवं उपसंहार के रूप में प्रस्तुत किया जाएगा, विभिन्न क्रमिक ११ आलेख-पोस्टों द्वारा |
             -------पोस्ट छह---- कथन २२ से २६ तक---
 \

   कथन २२---     यहाँ यह देखना बहुत ही महत्वपूर्ण है कि ब्राह्मण परम्परा जो कि आर्यों की परम्परा है वह अपने आरंभिक संघर्ष में सर्वप्रथम कोयवंशी गोंडों के खिलाफ और बाद में फिर असुरों के खिलाफ कुछ ख़ास तरह के कुटिलतापूर्ण षड्यंत्र और समाज मनोवैज्ञानिक हथकंडे इस्तेमाल कर रही है। ठीक यही हथकंडे और षड्यंत्र ब्राह्मणवादी धर्म को उंचा दिखाने के लिए और उसे प्रतिष्ठित करने के लिए बाद में बुद्ध, बौद्ध धर्म और कबीर व रविदास के खिलाफ भी इस्तेमाल कर रही है। और चूँकि इतिहास और मिथक को ब्राह्मण परम्परा ने सहेजा और आकार दिया है इसलिए उन्होंने शत्रुओं को उनके उद्विकास (क्रमविकास या एवोल्यूशन) की अवस्था के अनुसार कई श्रेणियों में बाँट दिया है जिन्हें असुर और बौद्ध या अछूत कहा जा सकता है। लेकिन स्वयं को अलग अलग श्रेणियों में न रखकर आर्य ब्राह्मण ही घोषित किया है।लेकिन असल में डॉ. आम्बेडकर के विश्लेषण में ये असुर अछूत और बौद्ध अंत में क्षत्रिय ही साबित होते हैं। और देबीप्रसाद चट्टोपाध्याय और स्वामी अछूतानन्द सहित भदंत बोधानन्द महास्थविर के अध्ययन में ये सब मूलनिवासी साबित होते हैं|
 समाधान २२ --गोंडों,  असुरों और बौद्धों को एक ही दर्शन कैसे हो सकता जबकि सभी में युगों का कालान्तर है | पहले ही कहा जाचुका है ब्राहमण परम्परा आर्यों की नहीं है आर्य सभी वर्गों के लोग थे क्षत्री, ब्राह्मण, शूद्र व वैश्य, वस्तुतः ब्राह्मण कोइ परम्परा ही नहीं है अपितु वे सब आर्य ही हैं, सनातन धर्मी | 
----गलत व अज्ञानी है ये सभी तथाकथित स्वयंभू दार्शनिक एवं विदेशी षडयंत्र के प्रभाव में भ्रमित हैं | बौद्ध, जैन, आदि लोग स्वयं ब्राह्मण व वैदिक परम्परा के विरोध में उठे व मुखर हुए थे न कि वैदिक परम्पराओं ने उनका विरोध किया | कबीर, रविदास तो स्वयं वैदिक परम्पराओं का अनुसरण करते थे वे केवल समाज में आयी हुई कुरीतियों का निराकरण करने हेतु तत्पर थे न की ब्राह्मण-शूद्र, असुर ,बौद्ध आदि के साथ थे | प्रखर आर्य व वैदिक रचयिता वेद व्यास ब्राह्मण नहीं शूद्र थे, श्रीकृष्ण जीवन भर निम्न जाति ग्वाला ही कहे जाते रहे | मूर्ख है ये लेखक एवं तथाकथित शोध करने वाले जिन्हें यह भी ज्ञान नहीं कि ..रावण असुर, राक्षस था परन्तु ब्राह्मण था, राम क्षत्रिय थे, उनके मन्त्रकार गुरु ब्राह्मण  ...बौद्ध धर्म के प्रवर्तक छत्रिय थे न असुर या अछूत एवं उसमें सभी वर्णों के लोग हैं |  
कथन-२३--हालाँकि डॉ. अंबेडकर आर्य आक्रमण थ्योरी में भरोसा नहीं रखते लेकिन फिर भी स्थानीय स्तर पर भारत में उंच नीच के निर्माण का जो षड्यंत्र चलाया गया है उसके सम्बन्ध में उनका विश्लेषण हमारे लिए बहुत उपयोगी है। डॉ. अम्बेडकर के बतलाये अनुसार अगर आर्य अन्य देश से न भी आये हों तो भी उनका अपना विश्लेषण ब्राह्मण श्रमण या ब्राह्मण क्षत्रिय संघर्ष को अपनी पूरी नग्नता में उजागर करता है। इसी को अगर प्राचीन भारतीय भौतिकवाद के विश्लेषण के साथ रखा जाए तो ये संघर्ष देव-असुर संग्राम को भी ब्राह्मण-क्षत्रिय संग्राम की तरह निरुपित कर सकता है। यह तर्क और यह तरीका बहुत ही महत्वपूर्ण है। इसका ठीक इस्तेमाल करते हुए हम देख पाते हैं कि एक आततायी संस्कृति के प्रतिनिधियों ने मूलनिवासी संस्कृति को एक जैसे तरीकों और षड्यंत्रों से कमजोर कर परास्त किया है। यह तरीका क्या था? वह समाज मनोवैज्ञानिक, धार्मिक-दार्शनिक उपाय क्या था? इसका उत्तर असुरों, बौद्धों कबीर और रविदास के खिलाफ रची गयी मिथकीय कथाओं में मिलता है।
 समाधान २३--- अर्थात आंबेडकर के अनुसार आर्य बाहरी नहीं थे कोइ आताताये अन्कृति थी ही नहीं तो फिर यह सारा का सारा विरोध कहीं ठहरता ही नहीं | केवल विदेशी षडयंत्रों के प्रभाव में  अपनी राजनीति चमकाने हेतु यह सारा ताम झाम उठाया जा रहा है | हमें सावधान रहना चाहए | हमारी एकता को तोड़ने का षडयंत्र है | और भितरघात में हम भारतीय सदा से ही माहिर हैं |


कथन २४----गोंडी पुनेम दर्शन और ब्राह्मणी धर्म----- असुर जो कि लोकायतिक हैं, और जो चार महाभूत वाले इस लोकवादी दर्शन को मानते थे उन्हें उनके दर्शन सहित निन्दित ठहराया गया है। ये दर्शन और ये समाज आत्मा या परमात्मा को नहीं बल्कि प्रकृति को मानता था।
    आज भी आदिवासी/मूलनिवासी समाज में आत्मा और परमात्मा की परलोकवादी धारणा की बजाय प्रकृति की शक्तियों को अधिक महत्त्व दिया जाता है। असुरों की भाँति एक अन्य बहुत ही महत्वपूर्ण जनजातीय समुदाय है जिन्हें गोंड कहा जाता है। गोंड एक समय में बहुत शक्तिशाली राज्य व्यवस्था के संस्थापक रहे हैं और दलपतशाह जैसे महान गोंडी राजाओं ने बहुत विस्तृत भूभाग पर शासन किया है। आज भी उनके नाम पर मध्यप्रदेश के बालाघाट सहित अन्य अनेक जिलों में उनके व अन्य गोंड राजाओं के किलों, मंदिरों और अन्य भवनों के खंडहर मौजूद हैं। पुरातात्विक खोजें अब यह सिद्ध कर रही हैं कि भारत के प्रत्येक राज्य में प्राचीन मंदिरों और किलों के खंडहरों में गोंडी राज चिन्ह (हाथी पर बैठा शेर) पाया जाता रहा है। इससे आभास होता है कि गोंडी संस्कृति संभवतः पूरे भारत में फली-फूली होगी और बाद में आर्य या ब्राह्मणी षड्यंत्रों से उसी तरह नष्ट की गयी जिस तरह कि बाद में महिषासुर, रावण, बुद्ध, कबीर और उनके संप्रदायों को नष्ट किया गया।
समाधान -२४..क्या दलपत शाह, गोंडों के मौजूद किले व मंदिर व राज चिन्ह, या सुप्रसिद्ध गोंड रानी दुर्गावती आदि महिषासुर, रावण, बुद्ध कबीर सभी से प्राचीन हैं |  वस्तुतः ये लोग इतिहास व पुराणों से बिलकुल अनभिज्ञ है |
     सभी जानते हैं कि इन सभी गोंड राजाओं रानियों को भारत के वीरों में गिना जाता है, वे भारतीय थे न की केवल गोंड | गोंड जाति, जन जाति भारत की एक प्रसिद्द प्राचीन वंश है | शायद प्राचीनतम जिसके नाम पर आदि-कालिक पृथ्वी के दक्षिणी भूभाग का नाम गोंडवाना लेंड रखा गया जहां मानव का उद्भव हुआ |
      यह प्राचीन गोंड संस्कृति आदि मानव से लेकर ...वनांचल की संस्कृति थी जिसने पूर्व हरप्पा सभ्यता का निर्माण किया एवं सुमेरु लोक ( ब्रह्म लोक ), सरस्वती क्षेत्र , कैलाश-मानसरोवर क्षेत्र की सरस्वती सभ्यता के मानवों से( जो आदि-मानव काल में ही भारतीय भूखंड व सुमेरु पर्वतीय भूखंड के मध्य फैले टेथिस सागर(दिति सागर ) को पार करके सरस्वती –मानसरोवर क्षेत्र में पहुंचकर उन्नत मानव होचुके थे )  तादाम्य करके एक उच्च संस्कृति वैदिक संस्कृति को जन्म दिया | यह शंभू शिव एवं ब्रह्मा, विष्णु, इंद्र द्वारा मानव समन्वय का प्रथम प्रयास था जिसके मूल विचारक व कर्ता शंभू सेक या शिव थे | इसीलिये वे महादेव कहलाये एवं विश्व की प्रत्येक संस्कृति में पूज्य हुए | क्योंकि यही मानव एवं संस्कृति समस्त विश्व में फ़ैली | आज भी यही मानव सारे विश्व में रहते हैं |

कथन २५--डॉ. कंगाली के अध्ययन से इस मान्यता को न केवल बल मिलता है बल्कि एक अर्थ में उनकी महान खोज इस बात को स्थापित ही कर देती है कि गोंडी पुनेम दर्शन या संस्कृति पहली अखिल भारतीय संस्कृति रही है। उनका अध्ययन स्पष्ट करता है कि किस तरह ब्राह्मणी धर्म ने गोंडी धर्म और संस्कृति को बुद्ध के उदय के बहुत पहले ही आत्मसात करके मूल गोंडी समुदायों को षड्यंत्रपूर्वक समाज व राज्य व्यवस्था में निचले पायदानों पर धकेलकर जंगलों में ही सीमित कर दिया था। यह देखना उपयोगी है कि लोकयातिकों और मूल सांख्य सहित तंत्र के समान ही गोंडी दर्शन भी इश्वर को नही मानता, बल्कि प्रकृति की शक्तियों को मानता है सृष्टि सृजन या सृष्टिकर्ता में वे विश्वास नहीं करते उनके लिए यह प्रकृति ही सब कुछ है जो न कभी पैदा हुई न कभी समाप्त होगी।
समाधान २५---निश्चय ही गोंडी संस्कृति सर्वप्रथम अखिल भारतीय संस्कृति रही होगी जो बनांचल संस्कृति थी | जैसा बिंदु २४ में स्पष्ट किया जा चुका है | सांख्य आदि दर्शन वैज्ञानिक, अध्यात्म, व मानव–मनोविज्ञान, समाज विज्ञान के क्रमिक विकास की एक निम्न सौपान है जो भारतीय षड्दर्शन ( जिसमें आस्तिक व नास्तिक दर्शनों का क्रमिक विकास है ) का अंग है बौद्ध, जैन, लोकायत आदि भारतीय नास्तिक दर्शन के अंग हैं जो मानव व वैश्विक समाज-धर्म के क्रमिक बौद्धिक विकास के द्योतक हैं...  |
 कथन २६--मध्यप्रदेश के मंडला और बालाघाट जिलों के शिक्षित गोंड आज भी गर्व से कहते हैं कि भगवान् शब्द उनका दिया हुआ है जिसमे भ – भूमि, ग – गगन, व – वायु अ –अग्नि और न – नीर है।
     यह अर्थ असल में इस लोक के समर्थन में है,  इसमें कोई  अतिभौतिक या पारलौकिक तत्व शामिल नहीं है और यह अर्थ सृष्टिकर्ता या परमात्मा की सत्ता की बजाय प्रकृति की शक्तियों को महत्व देता है। सृष्टिकर्ता या सर्जक इश्वर को नकारने वाला यही सूत्र श्रमणों अर्थात बौद्धों और जैनों में भी है। असल में गहराई से देखें तो किसी पारलौकिक या अतिभौतिक तत्व के आधार पर ही ब्राह्मणों या आर्यों ने परलोक आत्मा और परमात्मा को आकार दिया है, इसीलिये हम देखते हैं कि बहुत बाद में आगे चलकर प्रथम गोंडी दार्शनिक कुपार लिंगों की ही तरह बुद्ध ने पारलौकिक तत्व की संभावना को ही मिटा डाला।–

समाधान २६  ---यही तो भारतीय वैदिक दर्शन के पंचतत्व हैं---क्षिति जल पावक गगन समीरा हैं | यही तो सांस्कृतिक समन्वय है | भगवान् शब्द, मनुष्यों के लिए भी प्रयोग होता है, बहुत बाद का है, यह प्रकृति या परमतत्व का समानार्थी नहीं है | गोंड शब्द को भी वे अपनी विशिष्ट शैली में भगवान् शब्द का ही अन्य रूप मानते हैं। अंग्रेज़ी का गॉड शब्द गौंड से ही आया है ?
   पर पारलौकिक संभावना मिती कहाँ, स्वयं बौद्ध दुनिया से मिट गए, आज बौद्ध धर्म दो एक देशों में सिमट कर रह गया है | जैन भी लघु रूप में है | वस्तुतः भौतिक,  अधिभौतिक तत्व अर्ध विक्सित सभ्यता का है,  बुद्धि-ज्ञान के आगे विकास में पारलौकिक व अधि-आत्मिक तत्व का विकास हुआ, केवल दिखने वाले प्रत्यक्ष भौतिक सुन्दरम के आगे शिव एवं सत्य का प्रादुर्भाव हुआ | और इन तीनों के समन्वित तत्व का नाम ईश्वर हुआ,  ब्रह्म,  परमात्मा  | भगवान्,  मनुष्यों के लिए भी प्रयोग होता है बहुत बाद का है, ईश्वर का समानार्थी नहीं |


-----------क्रमश --पोस्ट सात--आगे
चित्र गूगल===
१,२अ ब--ब्रह्म-ईश्वर ...३, त्रिदेव,,,,४,५,६,७,८,...भगवान गणेश, परशुराम, कृष्ण,वरुणदेव , हनुमान ....

Comments

.

रविवार, 16 जुलाई 2017

ईशोपनिषद के षष्ठ मन्त्र-का काव्य भावानुवाद ---डा श्याम गुप्त....

                     ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...



ईशोपनिषद के षष्ठ मन्त्र- यस्तु सर्वाणि भूतानि आत्मन्येवा नुपश्यति |
                      सर्व भूतेषु चात्मानं ततो न विजुगुप्सते || ---का काव्य भावानुवाद ...

कुंजिका- यस्तु= जो कोई भी...सर्वाणि = सम्पूर्ण ...भूतानि= चराचर जगत को...आत्मनि एव = आत्मा या परमात्मा में ही ...अनुपश्यति =देखता है ...च सर्वभूतेषु = और सभी चराचर जगत में ...आत्मानं= आत्मा या परमात्मा को ...ततो=इससे वह ...न विजुगुप्सते=भ्रमित नहीं होता, घृणा नहीं करता, निन्दित नहीं होता |

मूलार्थ- जो समस्त विश्व को स्वयं में ही व परमात्मा में ही स्थित देखता है एवं स्वयं व परमात्मा को ही समस्त विश्व में स्थित देखता है वह अपने कर्मों के हेतु भ्रमित नहीं होता न किसी से घृणा करता है अतः संसार में निंदा का पात्र नहीं होता |


सारे जग को अपने जैसा,
अपने को सारे जग जैसा |
जिसने देखा समझा माना,
कब घृणा किसी से कर पाया |

सब भूत जीव जड़ जंगम में,
वह आत्मतत्व उपस्थित है |
उस आत्मतत्व में ही सब कुछ,
यह सकल चराचर स्थित है |

जो जान गया, वह ब्रह्म स्वयं,
कण-कण, पत्ते पत्ते में है |
जग का कण-कण, यह सकल सृष्टि,
अंतर में उसी ब्रह्म के है |

‘मुझ में संसार समाया है’,
यह समझ, आत्मरत होकर भी |
‘मैं व्याप्त सकल जग में असीम’,
परमार्थ भाव युत होजाता |           

वह भ्रमित नहीं होपाता है,
स्पष्ट दृष्टि पाजायेगा |
सांसारिक भ्रम, उलझन, माया,
में उलझ नहीं रह जाएगा |

वह ब्रह्म ह्रदय में स्थित हो,
शुचि प्रेम सुधारस बरसाता |
सब को ही ब्रह्म समझलें यदि,
सब विश्व प्रेममय होजाता |

नर आत्मतत्व को सुगठित कर,
परमार्थ तत्व लय  होजाए |
मैं ही वह तत्व सनातन हूँ,
यूं भक्तिमार्ग दृढ होजाये |

भक्तिमार्ग पर चलता प्राणी,
कर्मयोग पथ पाजाता है |
उस परम अर्थ को प्राप्त हुआ,
परमार्थ राह अपनाता है |