....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ.
टप टप टप टप अंग बहै स्वेद धार |
ज्यों उतरि गिरि-श्रृंग जल धार आई है |
बहै घाटी मध्य ,करि विविध प्रदेश पार,
धार सरिता की ज्यों सिन्धु में समाई है |
श्याम खुले केश ढीले-ढाले वस्त्र तिय देह ,
उमंगें उरोज, उर उमंग उमंगाई है |
ताप से तपे हैं तन, ताप तपे तन मन,
निरखि नैन नेह, नेह निर्झर समाई है ||
चुप चुप चकित न चहक रहे खग वृन्द,
सारिका ने शुक से भी चौंच न लड़ाई है |
बाज औ कपोत बैठे एक ही तरु डाल,
मूषक बिडाल भूलि बैठे शत्रुताई है |
नाग मोर एक ठांव , सिंह मृग एक छाँव ,
धरती मनहूँ तपोभूमि सी सुहाई है |
श्याम, गज-ग्राह मिलि बैठे सरिता के कूल,
जेठ की दुपहरी, साधु-भाव जग लाई है ||
हर गली गाँव , हर नगर मग ठांव ,
जन-जन जल, शीतल पेय हैं पिलारहे |
कहीं मिष्ठान्न बटें , कहीं है ठंडाई घुटे ,
मीठे जल की भी कोऊ प्याऊ लगवा रहे |
राह रोकि हाथ जोरि, शीतल जल भेंट करि,
हर तप्त राही को ही ठंडक दिला रहे|
भुवन भाष्कर , धरि मार्तंड रूप ,श्याम,
उंच नीच भाव मनहुं मन के मिटा रहे ||