....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...
१-
कालिन्दी का तीर औ, वंशी-धुन की टेर ,
गोप- गोपिका मंडली, नगर लगाती फेर |
नगर लगाती फेर, सभी को यह समझाती,
ग्राम-नगर की सभी गन्दगी, जल में जाती |
विष सम काला दूषित जल है यहाँ नदी का ,
बना सहसफ़ण नाग, कालिया कालिंदी का ||
२-
यमुना-तट पर श्याम ने, वंशी दई बजाय,
चहुँदिशि मोहिनि फेर कर,सबको लिया बुलाय |
सबको लिया बुलाय, प्रदूषित यमुना भारी ,
सभी करें श्रमदान , स्वच्छ हो नदिया सारी |
तोड़ किया विष हीन, प्रदूषण नाग का नथुना ,
फण फण नाचे श्याम,झरर झर झूमी यमुना ||