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डा श्याम गुप्त का ब्लोग...

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Lucknow, UP, India
एक चिकित्सक, शल्य-चिकित्सक जो हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान व उसकी संस्कृति-सभ्यता के पुनुरुत्थान व समुत्थान को समर्पित है व हिन्दी एवम हिन्दी साहित्य की शुद्धता, सरलता, जन-सम्प्रेषणीयता के साथ कविता को जन-जन के निकट व जन को कविता के निकट लाने को ध्येयबद्ध है क्योंकि साहित्य ही व्यक्ति, समाज, देश राष्ट्र को तथा मानवता को सही राह दिखाने में समर्थ है, आज विश्व के समस्त द्वन्द्वों का मूल कारण मनुष्य का साहित्य से दूर होजाना ही है.... मेरी तेरह पुस्तकें प्रकाशित हैं... काव्य-दूत,काव्य-मुक्तामृत,;काव्य-निर्झरिणी, सृष्टि ( on creation of earth, life and god),प्रेम-महाकाव्य ,on various forms of love as whole. शूर्पणखा काव्य उपन्यास, इन्द्रधनुष उपन्यास एवं अगीत साहित्य दर्पण (-अगीत विधा का छंद-विधान ), ब्रज बांसुरी ( ब्रज भाषा काव्य संग्रह), कुछ शायरी की बात होजाए ( ग़ज़ल, नज़्म, कतए , रुबाई, शेर का संग्रह), अगीत त्रयी ( अगीत विधा के तीन महारथी ), तुम तुम और तुम ( श्रृगार व प्रेम गीत संग्रह ), ईशोपनिषद का काव्यभावानुवाद .. my blogs-- 1.the world of my thoughts श्याम स्मृति... 2.drsbg.wordpres.com, 3.साहित्य श्याम 4.विजानाति-विजानाति-विज्ञान ५ हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान ६ अगीतायन ७ छिद्रान्वेषी ---फेसबुक -डाश्याम गुप्त
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बुधवार, 6 फ़रवरी 2019

श्याम स्मृतियाँ----१६ से २०-----डा श्याम गुप्त

                            ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...


श्याम स्मृतियाँ----१६ से २०-----

श्याम स्मृति-१६.परम्परा -आसमाँ और भी हैं...
          परम्पराएं सीडियां है प्रगति की, सदा पालन योग्य, अनुभव व ज्ञान के भण्डार परन्तु सीडियां चढने हेतु होती हैं, आगे बढ़ने हेतु | ज्ञान कोई स्थिर जलतल नहीं अपितु गतिशील समय है, मानवता का प्रगति-पथ है, पथदीप है जो आगे चलना सिखाता है, नवीन राहें दिखाता है | परंपरा के नाम पर रूढ़िवादिता, जड़ता, अप्रगतिशीलता मानवता के प्रति अक्ष्म्य अपराध है |  
           आजकल, सदा से समाज की सर्वोच्च स्तर पर स्थित साहित्य जगत में भी, यह परम्परा के नाम पर रूढ़िवादिता के दर्शन हो रहे हैं | वेद ही अंतिम सत्य है, सिर्फ सनातनी छंदों में ही कविता करें, छंदमुक्त कविता ने कविता की अत्यंत हानि की है आदि कथन प्राय: सुनने को मिलते हैं | परन्तु हम भूल जाते हैं कि  वेद स्वयं नेति-नेति कहते हैं, अर्थात नै इति, यह अंत नहीं है..आसमां और भी हैं |

श्याम स्मृति-१७. शिक्षा क्षेत्र में पतन के कारण ..
                 शिक्षा क्षेत्र में पतन आता जा रहा है, आज शिक्षा एक तप, साधना व परमार्थ न होकर व्यवसाय होगई है, स्कूल-कालेज, संस्थान खोलना अच्छा व लाभ का धंधा माना जा रहा है जो व्यवसायिक कर्म परमार्थ-हित, कर्तव्य माने जाते थे वे प्रोफेशन हो गए हैं | यूं तो हर पतन का कारण मानव का अति-भौतिकता में लिप्तता होता है, शिक्षा में पतन के दो मूल कारण मुझे समझ में आते हैं |
        एक--तमाम विद्यालय, चिकित्सा-विद्यालय, इन्जीनियरिंग व प्रवंधन आदि व्यवायिक संस्थान व्यक्तिगत हाथों में दे दिए गए हैं और उस विषय विशेष के प्रोफेशनल्स से अन्य व्यक्तियों द्वारा चलाये जा रहे हैं जिनमें सिर्फ कमाने-खाने का भाव रहता है |
        दो--- अधिकाँश व्यक्तिगत संस्थाएं, सेवानिवृत्त व्यक्तियों को प्रोफेशनल्स को नियोजित करती हैं क्योंकि कम सेलेरी में ही काम चलजाता है| शिक्षा जैसे कर्म के लिए पूरी ऊर्जा, इच्छा-शक्ति, अनुप्राणित मन, प्राण व ज्ञान चाहिए
        सेवानिवृत्त व्यक्ति थका-थकाया होता है वह बस समय काटने को नियोजन चाहता है, बोनस में कुछ पैसे भी कमा लिए जायं तो बुरा क्या है | आखिर सेवानिवृत्ति तक कितना दम-ख़म, कितना ज्ञान व कितनी कर्म इच्छा-शक्ति बच रहती है? अन्यथा उसे सेवा से निवृत्त किया ही क्यों जाता| इस प्रथा के कारण, जो अभी कुछ वर्षों से ही काफी प्रचलित हुई है मरते दम तक और कमा लिया जाये की लालच पूर्ण इच्छा के साथ, तमाम नव-युवाओं के कमाने के अधिकार का भी हनन होता है और उनके भविष्य की हानि एवं युवा ऊर्जा का प्रयोग में न आना भटकाव का कारण बन सकता है |
        क्या निश्चय ही यह विचार का विषय नहीं है |

श्याम स्मृति-१८. अविश्वास और विश्वास व साहित्य.....
       यह कहा जा रहा है, और सच भी है, कि अब साहित्य का समाज व मानव पर प्रभाव नहीं पड रहा है| उसका मानव आचरण व व्यवहार सुधार पर सत्प्रभाव नहीं पड रहा | हुआ क्या है ?.....
         हुआ सिर्फ इतना है कि कल हम जिन साहित्य, कथाएं, कहानियों गाथाओं, घटनाओं के वर्णन व सुने हुए तथ्यों व पौराणिक कथ्यों-तथ्यों को ज्ञान व अनुभव मान कर विश्वास करते थे, तर्क करते थे और इन तर्क, दर्शन, धर्म को महत्त्व देते थे उन पर बहस, वाद-विवाद भी होते थे | आज हम उन्हें पुराणपंथी, कल्पित, मिथ्या, अवैज्ञानिक कह कर उन पर अविश्वास करते हैं, नकार देते हैं | धर्म, दर्शन ,तर्क व सोचने के लिए किसी के पास समय ही नहीं है | इसे निठल्लों का काम माना जा रहा है|
         अतः समाज पर साहित्य का उचित सद्भावी प्रभाव नहीं होरहा है| साहित्य समाज पर प्रभावी नहीं रहा और न ही समाज में सत्साहित्य का प्रसार होरहा |

श्याम स्मृति-१९. त्रिदेव .
       यदि त्रिदेव या ईश्वर सिर्फ कल्पना ही है तो किसने की इतनी सुन्दर कल्पना और उस कल्पना का शिल्पी क्या त्रिदेव से कम होगा | कहानीकार, कथाकार, साहित्यकार, कवि व उनकी कल्पनाओं को हम जाने क्या क्या उपमाएं देते रहते हैं | तो इस परिकल्पना का अनादर क्यों ?

श्याम स्मृति-२०. यदि पति माना हैं तो ...
             यदि पति माना है तो पति-सेवा धर्म निभाना पत्नी का कर्तव्य है चाहे वह लूला हो, लंगडा हो, अंधा-कोडी हो | जैसा अनुसूया सीता से कहती हैं | शैव्या के कोढी पति व अंधे च्यवन ऋषि की पत्नी राजा शर्याति की राजकुमारी सुकन्या की पतिसेवा की कथाएं प्रसिद्द हैं | सीता भी राम को जंगल में छोड़कर नहीं भागी | परन्तु गंगा, उर्वशी जैसी तमाम बुद्धिमती स्त्रियों ने विवाह संस्था को नहीं माना, किसी को पति नहीं माना | वैदिक काल में सरस्वती ने भी नहीं |
          इसीलिये तो शादी में गुण मिलाये जाते हैं, जन्म पत्री देखी जाती है सारा परिवार, कुटुम्ब, खानदान सम्मिलित होता है | तब किसी को पति स्वीकारा जाता है | आजकल लड़की भी देखती है बात करती है |

          पुरुष ब्रह्म है नारी प्रकृति, वह शक्ति है ब्रह्म की | ब्रह्म उसके द्वारा ही कार्य करता है परन्तु फिर भी प्रकृति स्वतंत्र नहीं है, ब्रह्म की इच्छा से ही कार्य करती है | अतः नारी इच्छानुसार ही चले वही उचित रहता है | यदि पति माना है तो निभाना ही चाहिए चाहे कैसा भी होइसीलिये तो पति की उम्र अधिक रखी गयी है ताकि अनुभव-ज्ञान के आधार पर नारी आदर करे पुरुष का और अनुभवी पुरुष सदा मान रखे अपने साथी का, बड़ों द्वारा छोटों के समादर करने वाले भावानुशासन के अनुसार |   


 

मंगलवार, 8 जून 2010

डॉ श्याम गुप्त की कहानी...बारात कौन लाये ..

बारात कौन लाये
( डा श्याम गुप्त )
क्यों पापा ! वह स्वयं बारात लेकर क्यों नहीं जा सकती ? वह स्वयं यहाँ आकर क्यों नहीं रह सकता ? सोचिये , मेरे जाने के बाद आप लोगों का ख्याल कौन रखेगा ? शालू एक साँस में ही सबकुछ कह गयी।
'हाँ बेटा, यह हो सकता है। परन्तु यदि वह लड़का भी परिवार की इकलौती संतान हो तो ?' 'शाश्वत चले आ रहे मुद्दों पर यूंही भावावेश में, या कुछ नया करें , लीक पर क्यों चलें ? की भावना में बहकर , बिना सोचे समझे चलना ठीक नहीं होता; अपितु विशद- विवेचना, हानि-लाभ व दूरगामी प्रभावों,परिणामों पर विचार करके ही निर्णय लेना चाहिए। '
" मुख्य मुद्दा यह नहीं है कि कौन किसके घर रहने जाए, कौन बरात लाये । यदि पति-पत्नी, सुहृद, युक्ति-युक्त विचार वाले, उचित-अनुचित ज्ञान वाले हैं तो दोनों ही स्थितियों में वे एक दूसरे के परिवार वालों , माँ -बाप का सम्मान करंगे और परिवार जुड़ेंगे। समस्याएं नहीं रहेंगीं । शाश्वत बात वही है कि व्यक्ति मात्र को अच्छा ,न्याय एवं सत्य कानिर्वाह करने वाला होना चाहिए। " शालू के पिता पुनः कहने लगे, ' नियम, व्यक्ति सामाजिक सुरक्षा के लिए होते हैं कि व्यक्ति नियम के लिए '
" और प्रथाएंपरिपाटी ", शालू ने पूछा।
सतीश जी ने बताया, 'बेटा !, परिपाटी, नीति, नियम,क़ानून, प्रथाएं, आस्थाएं आदि व्यक्ति मात्र के सुख-सुविधा के लिए होते हैं , किसी व्यक्ति विशेष या समूह, जाति, वर्ग या धर्म विशेष के लिए नहीं। यही मानवता, सामाजिकता, सार्वभौमिकता व धर्म है। अन्यथा आज जैसी सामाजिक विभ्रम की स्थिति उत्पन्न होती है जिसके चलते यह प्रश्न खडा हुआ है । '
परन्तु, पापा! यदि नवीन व्यवस्था को अपना कर देखें तो क्या हानि है ?
'कुछ नहीं ' , सतीश जी बोले ,' अन्यथा समाज आगे कैसे बढेगा ? परन्तु बेटी ! पहले इतिहास को भी तो देख लेना चाहिए। इतिहास भी तो नव प्रयोग ही है इस देश में स्त्री- सत्तामक समाज का इतिहास रहा है। आज भी प्राचीन कबीलों में वह समाज है , जिसमें पति, पत्नी के घर जाकर रहता है । परन्तु उस व्यवस्था में पति को घर में स्थित पत्नी को सक्रिय भूमिका निभानी पड़ती है; अर्थात दूसरे घर-परिवार से आने वाले प्राणी (पति या पत्नी) को घर में रहकर कार्यकर्ता की भूमिका निभानी होगी जबतक वह नई परिस्थितियों से तदाकार नहीं होजाता। घर वालों को भी चाहिए कि वे उस पर पूर्ण विश्वास व्यक्त करें , अपना समझें व सबकुछ उसके संज्ञान में लाकर कार्य करें ताकि वह शीघ्रातिशीघ्र घर का अंग बन सके। '
'पर मैं तो सभी कार्य कर सकती हूँ, इसीलिये तो आपने पढ़ाया है, लिखाया है। और आजकल तो शिक्षा के प्रचार-प्रसार से सभी घरों में लगभग सामान परिस्थितियाँ होतीं हैं। ', शालू बोली।
हाँ, ठीक है, सतीश जी सोचते हुए बोले, 'आज स्त्री पहले की भांति घर में सीमित न रहकर, पुरुष के कंधे से कंधा मिलाकर चलना चाहती है ; ताकि उसकी अज्ञानता लाचारी से उस पर अत्याचार नहो कर्तव्यों व अधिकारों की अज्ञानता ही तो अत्याचार, अनाचार व अन्याय की जड़ होती है ; जिसका प्रतिकार त्रेता युग में राम-सीता व द्वापर में, राधा-कृष्ण ने किया था। आज पुनः वही स्थिति है, और प्रतिकार करना ही होगा, क्योंकि शिक्षा के तमाम प्रचार-प्रसार के उपरांत भी हमारे समाज में कुरीतियाँ व अनीतियाँ पैर पसारे पडीं हैं। परन्तु इसका अर्थ यह नहीं कि स्त्री-पुरुष एक दूसरे के अधिकारों को चुनौती दें । आपकी स्वतन्त्रता तभी तक है जब तक आप दूसरों कीस्वतन्त्रता अधिकारों का हनन नहीं करते। '
' क्या इसमें पुरुष का अहं आड़े नहीं आयेगा ' शालू ने प्रश्न किया।
'अवश्य', पुरुष का यह संस्कारगत अहं ही तो है जो सदियों की रूढ़ियों व प्रथाओं से उत्पन्न हुआ है और समस्याएं उत्पन्न करता है । यह अहं स्त्रियों में भी होता है । हाँ मूलतः यह प्रथाओं आदि अयुक्तिपूर्ण विश्लेषण से होता है। परन्तु उत्तम चरित्र-संस्कार युत स्त्री-पुरुष इस अहं को समुचित ज्ञान , वस्तुस्थिति व युक्ति-युक्त विचार भाव से शमन करते रहते हैं। '
' ये क्या व्यर्थ के प्रशन -उत्तर सिखाये समझाये जारहे हैं लड़की को । बेटियाँ तो सदा ही पति के घर जाती हैं ।'. सतीश जी की पत्नी अनुराधा ने व्यवधान डालते हुए कहा ।
सतीश जी हंसते हुए बोले। 'तुम भी सुनलो , वास्तव में प्रारंभिक अवस्था में तो ये प्रश्न थे ही नहीं। जब समाज विकसित हु, अर्थव्यवस्था अन्योन्याश्रित हुई , घर से दूर जाकर कार्य करना आवश्यक हुआ तो संतान-परिवार की सुरक्षा-पालन हेतु एक प्राणी को घर पर रहना अनिवार्य लगा । चूंकि स्त्री प्राकृतिक रूप से कम बलशाली व संतानोत्पत्ति के समय अक्रियाशील होती है अतः उसने स्वेछा से घर का कार्य संभालने का निर्णय लिया और पत्नी बनकर पतिगृह आकर रहने लगी, और परिवार बना । जब मानव घुमंतू स्वभाव छोड़कर स्थिर हुआ तो परिवार, दाम्पत्य, राजनीति, संपत्ति, स्वामित्व के प्रश्न उठने लगे । तब संतान व स्त्री को पिता व पति की अनुगामी बनाकर पितृ-सत्तात्मक समाज की रचना हुई, जिसमें पुत्र पिता की संपत्ति में व स्त्री किसी की पत्नी बनकर पति की संपत्ति के भोग की अधिकारी बनती है , और व्यवस्था सुचारू रूप से चलती रहती है । चक्रीय व्यवस्थानुसार सभी लड़कियां किसी न किसी संपत्ति की अधिकारिणी रहतीं हैं। तब समाज के व्यापक हित में 'कन्यादान' 'पाणिग्रहण ' आदि संस्कारों की प्रामाणिक व्यवस्था स्थापित हुई। '
परन्तु पापा !, 'फिर ये दहेज़ स्त्री प्रतारणा जैसी कुप्रथाओं से आज यह सामाजिक अशांति क्यों है ? उसका क्या किया जाय ?'
' अशांति व अव्यवस्था तभी उत्पन्न होती है', सतीश जी ने कहा, 'जब परिवार, व्यक्ति , समूह विशेष या
समाज ; लालच, लोभ , मोह व अज्ञानता के वशीभूत होकर विकृत व्यवहार करते हैं ; अथवा अज्ञान या स्वार्थ वश वस्तु स्थिति को पूर्ण रूप से जाने बिना व्यवस्थाओं पर प्रश्न चिन्ह लगाया जाता है। वस्तुतः सत्य तो यही है कि मनुष्य मात्र को ही सच्चरित्र , सत्यपर चलने वाला, युक्ति-युक्त व्यवहार वाला व दूसरों का आदर करने वाला होना चाहिए ।
अतः बेटी !, व्यक्ति समाज के भूत, भविष्य वर्त्तमान पर विशद विमर्श करके जो उचित लगे वही करोइसके लिए सोचो, विचारों, चिंतन -मनन करो तभी निर्णय लोदुविधाओं में परामर्श के लिए हम हैं ही

रविवार, 17 जनवरी 2010

कार्य रत पति-पत्नी और दाम्पत्य जीवन ...डा श्याम गुप्त का आलेख

यदि पति-पत्नी दोनों ही अपने-अपने व्यबसाय या सर्विस में अति व्यस्त रहते हैं तो दाम्पत्य जीवन में एकरसता आये एवं परिवार पर दुष्प्रभाव पड़े, इसके लिए दम्पति को निम्न बातें ध्यान रखना चाहिए |
१- परस्पर विश्वास --एक दूसरे के सहकर्मियों पर संदेह व उनके बारे में अभद्र सोच मन में न लायें। सिर्फ सुनी हुई बातों पर विश्वास न करें,किसी विषय पर संदेह हो तो विवाद की बजाय आपसी बातचीत से हल करें ।
२-संवाद हीनता न रखें - छोटी -छोटी बातों पर परस्पर मतभेद व झगड़े होने पर तुरंत ही एक दूसरे को पहल करके मनाने का प्रयास करें , प्रेमी-प्रेमिका वत व्यवहार करें । अहं को आड़े न आने दें । अधिक समय तक संवाद हीनता गंभीर मतभेद उत्पन्न कर सकती है।
३-एक दूसरे को जानें, ख्याल रखें व हाथ बटाएं -- एक दूसरे की छोटी छोटी रुचियाँ ,तौर तरीकों को अवश्य याद रखें ,एक दूसरे का पूरा ख्याल रखें , समय मिलते ही उसए कार्य में भी हाथ बटाएं, ताकि एक दूसरे की अनुपस्थिति में दूसरे को साथी की कमी अनुभव हो यथा प्रेम बढ़ता ही रहे।
४-चिंता का कारण जानें -यदि साथी चिंतित प्रतीत हो तो उसकी चिंता का कारण पूछ कर यथा संभव सहायता व मानसिक संबल प्रदान करें।
-उपहार दें -शास्त्रों का कथन है, --देना -लेना, खाना-खिलाना, गुह्य बातें कहना-सुनना ; ये प्रेम के छः लक्षण हैं।
अतः उपहारों का आदान प्रदान का अवसर निकालते रहना भी। छोटा सा उपहार भी कीमती होता है ,उपहार की कीमत नहीं भावना देखी जाती है | समय समय पर एक दूसरे की मनपसंद डिश घर में बनाएं या बाहर लंच-डिनर पर जाएँ । प्रति दिन कम से कम एक बार चाय , लंच , नाश्ता या डिनर या सोने से पहले विविध विषयों पर वार्तालाप अवश्य करें। इससे संवाद हीनता नहीं रहेगी। परयह एक दूसरे के मन पसंद विषय या रुचियों पर समय निकाल कर बात करते रहें।
.प्रशंसा करें- समय समय पर एक दूसरे की प्रशंसा अवश्य करें । छोटी-छोटी सफलताओं या कार्यों पर प्रशंसा करें। दिन में एक बार एक दूसरे के रूप गुण की प्रशंसा से कार्य क्षमता व आत्मविश्वास बढ़ता है, ह्रदय प्रसन्न रहने से आपस में प्रेम की वृद्धि होती है।
स्पर्श --समय समय पर एक दूसरे को स्पर्श करने का मौक़ा ढूढते रहना चाहिए , इससे प्रेम की भावानुभूति तीब्र होती है।
.अपने स्वास्थ्य सौन्दर्य का ध्यान रखें --प्रौढ़ होजाने पर या संतान के दायित्व में प्राय : पति -पत्नी एक दूसरे को कम समय देपाते हैं,इस वज़ह से वे स्वयं की देखरेख व बनने संवरने की आवश्यकता नहीं समझते जो दाम्पत्य जीवन के लिए अत्यंत हानिकारक है। पति-पत्नी दोनों ही एक दूसरे को स्मार्ट देखना चाहते हैं , अतः सलीके से पहनना, ओढ़ना , श्रृंगार व स्वास्थ्य का उचित ध्यान रखना न भूलें।
- प्रेमी-प्रेमिका बनें --प्राय: दाम्पत्य झगड़ों का कारण एक दूसरे पर अधिकार जताना , आपस की व्यक्तिगत रुचियों को नज़र अंदाज़ करना होता है। सुखी दाम्पत्य के लिए , तानाशाह की तरह' खाना खालो' या 'अभी तक चाय नहीं बनी?' की बजाय प्रेमी प्रेमिका की भांति, ' चलिए खाना खा लेते हैं' तथा ' चलो आज हम चाय पिलाते हैं' कहें तो बहुत सी समस्याएं हल होजातीं हैं । वैसे भी कभी-कभी किचेन में जाकर साथ साथ काम करने से मादक स्पर्श व संवाद के स्थिति व एक दूसरे का काम करने की सुखद अनुभूति के दुर्लभ क्षण प्राप्त होते हैं।
१०- समर्पण भाव --समर्पण व एक दूसरे के प्रति प्रतिवद्धता , दाम्पत्य जीवन की सबसे सुखद अनुभूति है। स्थायित्व के लिए यह भाव अति-महत्व पूर्ण है।
११-निजी स्वतन्त्रता एवं आवश्यक आपसी दूरियां --पति -पत्नी को एक दूसरे की हौबी ,रुचियाँ व इच्छाओं को पूरा करने की पूर्ण स्वतन्त्रता देना चाहिए एवं एक दूसरे के कार्यों में बिना कारण दखल नहीं देना चाहिए । कभी-कभी एक दूसरे से दूरियां भी साथी की अनुपस्थिति से उसकी महत्ता का आभास करातीं हैं। भारत में इसीलिये स्त्रियों को समय समय पर विभिन्न त्योहारों ,पर्वों पर पिता के घर जाने की रीति बनाई गयी है। तीज, सावन,रक्षाबंधन,आदि पर्वों पर प्राय: स्त्रियाँ अकेली पिता के घर, प्रौढा या वृद्धा होने तक भी , रहती हैं । यह आवश्यक व्यक्तिगत दूरी , "पर्सनल स्पेसिंग " ही है। स्पेसिंग का यह अर्थ नहीं कि पति-पत्नी अपने अपने दोस्तों के साथ अकेले घूमते फिरते रहें, या विपरीत लिंगी दोस्तों व सहकर्मियों के साथ देर तक बने रहें.