उत्सव प्रियः मानवाः --वास्तव में तो सभी भारतीय पर्व, उत्सव , आदि प्राचीन भारतीय समाज के -मनोरंजन केसाथ अर्थशास्त्र - के सैद्दांतिक -व्यवहारिक कृतित्व हैं जो बाज़ार व अर्थशास्त्र की आवश्यकताओं के अनुसार विस्तार भी पाते रहते हैं। । अब करवाचौथ को लीजिये । वास्तव में तो कर्म कांडी व्रतों का वैदिक साहित्य में वर्णन नहीं है , ब्रतों का अर्थ संकल्प होता है और करवा चौथ पर पति-पत्नी दोनों को ही संकल्प लेना होता है कि हम सदा तादाम्य सेरहेंगे, एक दूसरे के प्रति सम्पूर्ण भाव से समर्पित रहेंगे , पाणि ग्रहण के समय लिए हुए बचनों का पालन करेंगे।
------कालान्तर में अर्थशास्त्र व बाज़ार की आवश्यकतानुसार( समय परवर्तन ,युग के अनुसार निष्ठा व ज्ञान ,कर्तव्य व मानवीय विश्वास की कमी से भी ) उसमें करवा, चन्द्रमा, पति की आयु वृद्धि, अर्ध्य , उपवास आदि के भाव जोड़ दिए गए। सामाजिक -पारिवारिक सौहार्द के पहलू हित -सरगी , सास के लिए बायना, बधू से मायके से बधू के घर उपहार आदि भेजना प्रारम्भ किया गया ; जो बाद में कठोर कुप्रथाओं में परिवर्तित होता गया । पहले मिट्टी का करवा अनिवार्य होता था ताकि कुम्भ्कारों का भी काम चलता रहे , और प्रगति होने पर शक्कर - चीनी के, धातु के , चांदी के करवे व अन्य ताम-झाम भी चलने लगे ताकि बाज़ार का अर्थशास्त्र चलता रहे ,हाँ, पीछे दिखावा, अधिक प्राप्ति आदि की मानसिकता भी बढ़ती गयी।
आजकलके वैज्ञानिक युग में भी - समाचार पत्रों, टीवी, आदि में करवा चौथ पर सोना -चांदी के व अन्य सभी के विज्ञापनों , छूट, कैसे करें , क्या पहने, कैसे पूजा करें , किसको किस किस बस्तु से पूजा रानी चाहिए , अपने उन को खुश रखिये आदि की भरमार रहती है क्यों -जबकि वैज्ञानिक युग के नव-युवा,पढेलिखे पुरुष/ महिलाएं इसे आवश्यक/अपरिहार्य नहीं मानते समझते अपितु व्यर्थ की खानापूरी भी मानते हैं |---यह अर्थशास्त्र व बाज़ार के ही लिए तो -चाहे स्त्रियों पर कठोरता होती हो या सामाजिक -मानसिक प्रतारणा व मानवीय शोषण |
-----हाँ इसके साथ साथ चाहे बाज़ार -भाव के कारण ही सही --पुरुषों के लिए भी विज्ञापन आरहे हैं ----
पत्नी करवा चौथ व्रत रख रही है आपकी लम्बी आयु के लिए अब आपकी बारी है --उपहार देने की ---और यह एक अच्छी बात है।
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डा श्याम गुप्त का ब्लोग...
- shyam gupta
- Lucknow, UP, India
- एक चिकित्सक, शल्य-चिकित्सक जो हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान व उसकी संस्कृति-सभ्यता के पुनुरुत्थान व समुत्थान को समर्पित है व हिन्दी एवम हिन्दी साहित्य की शुद्धता, सरलता, जन-सम्प्रेषणीयता के साथ कविता को जन-जन के निकट व जन को कविता के निकट लाने को ध्येयबद्ध है क्योंकि साहित्य ही व्यक्ति, समाज, देश राष्ट्र को तथा मानवता को सही राह दिखाने में समर्थ है, आज विश्व के समस्त द्वन्द्वों का मूल कारण मनुष्य का साहित्य से दूर होजाना ही है.... मेरी तेरह पुस्तकें प्रकाशित हैं... काव्य-दूत,काव्य-मुक्तामृत,;काव्य-निर्झरिणी, सृष्टि ( on creation of earth, life and god),प्रेम-महाकाव्य ,on various forms of love as whole. शूर्पणखा काव्य उपन्यास, इन्द्रधनुष उपन्यास एवं अगीत साहित्य दर्पण (-अगीत विधा का छंद-विधान ), ब्रज बांसुरी ( ब्रज भाषा काव्य संग्रह), कुछ शायरी की बात होजाए ( ग़ज़ल, नज़्म, कतए , रुबाई, शेर का संग्रह), अगीत त्रयी ( अगीत विधा के तीन महारथी ), तुम तुम और तुम ( श्रृगार व प्रेम गीत संग्रह ), ईशोपनिषद का काव्यभावानुवाद .. my blogs-- 1.the world of my thoughts श्याम स्मृति... 2.drsbg.wordpres.com, 3.साहित्य श्याम 4.विजानाति-विजानाति-विज्ञान ५ हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान ६ अगीतायन ७ छिद्रान्वेषी ---फेसबुक -डाश्याम गुप्त
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मंगलवार, 26 अक्टूबर 2010
रविवार, 17 जनवरी 2010
कार्य रत पति-पत्नी और दाम्पत्य जीवन ...डा श्याम गुप्त का आलेख
यदि पति-पत्नी दोनों ही अपने-अपने व्यबसाय या सर्विस में अति व्यस्त रहते हैं तो दाम्पत्य जीवन में एकरसता न आये एवं परिवार पर दुष्प्रभाव न पड़े, इसके लिए दम्पति को निम्न बातें ध्यान रखना चाहिए |
१- परस्पर विश्वास --एक दूसरे के सहकर्मियों पर संदेह व उनके बारे में अभद्र सोच मन में न लायें। सिर्फ सुनी हुई बातों पर विश्वास न करें,किसी विषय पर संदेह हो तो विवाद की बजाय आपसी बातचीत से हल करें ।
२-संवाद हीनता न रखें - छोटी -छोटी बातों पर परस्पर मतभेद व झगड़े होने पर तुरंत ही एक दूसरे को पहल करके मनाने का प्रयास करें , प्रेमी-प्रेमिका वत व्यवहार करें । अहं को आड़े न आने दें । अधिक समय तक संवाद हीनता गंभीर मतभेद उत्पन्न कर सकती है।
३-एक दूसरे को जानें, ख्याल रखें व हाथ बटाएं -- एक दूसरे की छोटी छोटी रुचियाँ ,तौर तरीकों को अवश्य याद रखें ,एक दूसरे का पूरा ख्याल रखें , समय मिलते ही उसए कार्य में भी हाथ बटाएं, ताकि एक दूसरे की अनुपस्थिति में दूसरे को साथी की कमी अनुभव हो यथा प्रेम बढ़ता ही रहे।
४-चिंता का कारण जानें -यदि साथी चिंतित प्रतीत हो तो उसकी चिंता का कारण पूछ कर यथा संभव सहायता व मानसिक संबल प्रदान करें।
५-उपहार दें -शास्त्रों का कथन है, --देना -लेना, खाना-खिलाना, गुह्य बातें कहना-सुनना ; ये प्रेम के छः लक्षण हैं।
अतः उपहारों का आदान प्रदान का अवसर निकालते रहना भी। छोटा सा उपहार भी कीमती होता है ,उपहार की कीमत नहीं भावना देखी जाती है | समय समय पर एक दूसरे की मनपसंद डिश घर में बनाएं या बाहर लंच-डिनर पर जाएँ । प्रति दिन कम से कम एक बार चाय , लंच , नाश्ता या डिनर या सोने से पहले विविध विषयों पर वार्तालाप अवश्य करें। इससे संवाद हीनता नहीं रहेगी। परयह एक दूसरे के मन पसंद विषय या रुचियों पर समय निकाल कर बात करते रहें।
६.प्रशंसा करें- समय समय पर एक दूसरे की प्रशंसा अवश्य करें । छोटी-छोटी सफलताओं या कार्यों पर प्रशंसा करें। दिन में एक बार एक दूसरे के रूप गुण की प्रशंसा से कार्य क्षमता व आत्मविश्वास बढ़ता है, ह्रदय प्रसन्न रहने से आपस में प्रेम की वृद्धि होती है।
७। स्पर्श --समय समय पर एक दूसरे को स्पर्श करने का मौक़ा ढूढते रहना चाहिए , इससे प्रेम की भावानुभूति तीब्र होती है।
८.अपने स्वास्थ्य व सौन्दर्य का ध्यान रखें --प्रौढ़ होजाने पर या संतान के दायित्व में प्राय : पति -पत्नी एक दूसरे को कम समय देपाते हैं,इस वज़ह से वे स्वयं की देखरेख व बनने संवरने की आवश्यकता नहीं समझते जो दाम्पत्य जीवन के लिए अत्यंत हानिकारक है। पति-पत्नी दोनों ही एक दूसरे को स्मार्ट देखना चाहते हैं , अतः सलीके से पहनना, ओढ़ना , श्रृंगार व स्वास्थ्य का उचित ध्यान रखना न भूलें।
९- प्रेमी-प्रेमिका बनें --प्राय: दाम्पत्य झगड़ों का कारण एक दूसरे पर अधिकार जताना , आपस की व्यक्तिगत रुचियों को नज़र अंदाज़ करना होता है। सुखी दाम्पत्य के लिए , तानाशाह की तरह' खाना खालो' या 'अभी तक चाय नहीं बनी?' की बजाय प्रेमी प्रेमिका की भांति, ' चलिए खाना खा लेते हैं' तथा ' चलो आज हम चाय पिलाते हैं' कहें तो बहुत सी समस्याएं हल होजातीं हैं । वैसे भी कभी-कभी किचेन में जाकर साथ साथ काम करने से मादक स्पर्श व संवाद के स्थिति व एक दूसरे का काम करने की सुखद अनुभूति के दुर्लभ क्षण प्राप्त होते हैं।
१०- समर्पण भाव --समर्पण व एक दूसरे के प्रति प्रतिवद्धता , दाम्पत्य जीवन की सबसे सुखद अनुभूति है। स्थायित्व के लिए यह भाव अति-महत्व पूर्ण है।
११-निजी स्वतन्त्रता एवं आवश्यक आपसी दूरियां --पति -पत्नी को एक दूसरे की हौबी ,रुचियाँ व इच्छाओं को पूरा करने की पूर्ण स्वतन्त्रता देना चाहिए एवं एक दूसरे के कार्यों में बिना कारण दखल नहीं देना चाहिए । कभी-कभी एक दूसरे से दूरियां भी साथी की अनुपस्थिति से उसकी महत्ता का आभास करातीं हैं। भारत में इसीलिये स्त्रियों को समय समय पर विभिन्न त्योहारों ,पर्वों पर पिता के घर जाने की रीति बनाई गयी है। तीज, सावन,रक्षाबंधन,आदि पर्वों पर प्राय: स्त्रियाँ अकेली पिता के घर, प्रौढा या वृद्धा होने तक भी , रहती हैं । यह आवश्यक व्यक्तिगत दूरी , "पर्सनल स्पेसिंग " ही है। स्पेसिंग का यह अर्थ नहीं कि पति-पत्नी अपने अपने दोस्तों के साथ अकेले घूमते फिरते रहें, या विपरीत लिंगी दोस्तों व सहकर्मियों के साथ देर तक बने रहें.
१- परस्पर विश्वास --एक दूसरे के सहकर्मियों पर संदेह व उनके बारे में अभद्र सोच मन में न लायें। सिर्फ सुनी हुई बातों पर विश्वास न करें,किसी विषय पर संदेह हो तो विवाद की बजाय आपसी बातचीत से हल करें ।
२-संवाद हीनता न रखें - छोटी -छोटी बातों पर परस्पर मतभेद व झगड़े होने पर तुरंत ही एक दूसरे को पहल करके मनाने का प्रयास करें , प्रेमी-प्रेमिका वत व्यवहार करें । अहं को आड़े न आने दें । अधिक समय तक संवाद हीनता गंभीर मतभेद उत्पन्न कर सकती है।
३-एक दूसरे को जानें, ख्याल रखें व हाथ बटाएं -- एक दूसरे की छोटी छोटी रुचियाँ ,तौर तरीकों को अवश्य याद रखें ,एक दूसरे का पूरा ख्याल रखें , समय मिलते ही उसए कार्य में भी हाथ बटाएं, ताकि एक दूसरे की अनुपस्थिति में दूसरे को साथी की कमी अनुभव हो यथा प्रेम बढ़ता ही रहे।
४-चिंता का कारण जानें -यदि साथी चिंतित प्रतीत हो तो उसकी चिंता का कारण पूछ कर यथा संभव सहायता व मानसिक संबल प्रदान करें।
५-उपहार दें -शास्त्रों का कथन है, --देना -लेना, खाना-खिलाना, गुह्य बातें कहना-सुनना ; ये प्रेम के छः लक्षण हैं।
अतः उपहारों का आदान प्रदान का अवसर निकालते रहना भी। छोटा सा उपहार भी कीमती होता है ,उपहार की कीमत नहीं भावना देखी जाती है | समय समय पर एक दूसरे की मनपसंद डिश घर में बनाएं या बाहर लंच-डिनर पर जाएँ । प्रति दिन कम से कम एक बार चाय , लंच , नाश्ता या डिनर या सोने से पहले विविध विषयों पर वार्तालाप अवश्य करें। इससे संवाद हीनता नहीं रहेगी। परयह एक दूसरे के मन पसंद विषय या रुचियों पर समय निकाल कर बात करते रहें।
६.प्रशंसा करें- समय समय पर एक दूसरे की प्रशंसा अवश्य करें । छोटी-छोटी सफलताओं या कार्यों पर प्रशंसा करें। दिन में एक बार एक दूसरे के रूप गुण की प्रशंसा से कार्य क्षमता व आत्मविश्वास बढ़ता है, ह्रदय प्रसन्न रहने से आपस में प्रेम की वृद्धि होती है।
७। स्पर्श --समय समय पर एक दूसरे को स्पर्श करने का मौक़ा ढूढते रहना चाहिए , इससे प्रेम की भावानुभूति तीब्र होती है।
८.अपने स्वास्थ्य व सौन्दर्य का ध्यान रखें --प्रौढ़ होजाने पर या संतान के दायित्व में प्राय : पति -पत्नी एक दूसरे को कम समय देपाते हैं,इस वज़ह से वे स्वयं की देखरेख व बनने संवरने की आवश्यकता नहीं समझते जो दाम्पत्य जीवन के लिए अत्यंत हानिकारक है। पति-पत्नी दोनों ही एक दूसरे को स्मार्ट देखना चाहते हैं , अतः सलीके से पहनना, ओढ़ना , श्रृंगार व स्वास्थ्य का उचित ध्यान रखना न भूलें।
९- प्रेमी-प्रेमिका बनें --प्राय: दाम्पत्य झगड़ों का कारण एक दूसरे पर अधिकार जताना , आपस की व्यक्तिगत रुचियों को नज़र अंदाज़ करना होता है। सुखी दाम्पत्य के लिए , तानाशाह की तरह' खाना खालो' या 'अभी तक चाय नहीं बनी?' की बजाय प्रेमी प्रेमिका की भांति, ' चलिए खाना खा लेते हैं' तथा ' चलो आज हम चाय पिलाते हैं' कहें तो बहुत सी समस्याएं हल होजातीं हैं । वैसे भी कभी-कभी किचेन में जाकर साथ साथ काम करने से मादक स्पर्श व संवाद के स्थिति व एक दूसरे का काम करने की सुखद अनुभूति के दुर्लभ क्षण प्राप्त होते हैं।
१०- समर्पण भाव --समर्पण व एक दूसरे के प्रति प्रतिवद्धता , दाम्पत्य जीवन की सबसे सुखद अनुभूति है। स्थायित्व के लिए यह भाव अति-महत्व पूर्ण है।
११-निजी स्वतन्त्रता एवं आवश्यक आपसी दूरियां --पति -पत्नी को एक दूसरे की हौबी ,रुचियाँ व इच्छाओं को पूरा करने की पूर्ण स्वतन्त्रता देना चाहिए एवं एक दूसरे के कार्यों में बिना कारण दखल नहीं देना चाहिए । कभी-कभी एक दूसरे से दूरियां भी साथी की अनुपस्थिति से उसकी महत्ता का आभास करातीं हैं। भारत में इसीलिये स्त्रियों को समय समय पर विभिन्न त्योहारों ,पर्वों पर पिता के घर जाने की रीति बनाई गयी है। तीज, सावन,रक्षाबंधन,आदि पर्वों पर प्राय: स्त्रियाँ अकेली पिता के घर, प्रौढा या वृद्धा होने तक भी , रहती हैं । यह आवश्यक व्यक्तिगत दूरी , "पर्सनल स्पेसिंग " ही है। स्पेसिंग का यह अर्थ नहीं कि पति-पत्नी अपने अपने दोस्तों के साथ अकेले घूमते फिरते रहें, या विपरीत लिंगी दोस्तों व सहकर्मियों के साथ देर तक बने रहें.
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