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डा श्याम गुप्त का ब्लोग...

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Lucknow, UP, India
एक चिकित्सक, शल्य-चिकित्सक जो हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान व उसकी संस्कृति-सभ्यता के पुनुरुत्थान व समुत्थान को समर्पित है व हिन्दी एवम हिन्दी साहित्य की शुद्धता, सरलता, जन-सम्प्रेषणीयता के साथ कविता को जन-जन के निकट व जन को कविता के निकट लाने को ध्येयबद्ध है क्योंकि साहित्य ही व्यक्ति, समाज, देश राष्ट्र को तथा मानवता को सही राह दिखाने में समर्थ है, आज विश्व के समस्त द्वन्द्वों का मूल कारण मनुष्य का साहित्य से दूर होजाना ही है.... मेरी तेरह पुस्तकें प्रकाशित हैं... काव्य-दूत,काव्य-मुक्तामृत,;काव्य-निर्झरिणी, सृष्टि ( on creation of earth, life and god),प्रेम-महाकाव्य ,on various forms of love as whole. शूर्पणखा काव्य उपन्यास, इन्द्रधनुष उपन्यास एवं अगीत साहित्य दर्पण (-अगीत विधा का छंद-विधान ), ब्रज बांसुरी ( ब्रज भाषा काव्य संग्रह), कुछ शायरी की बात होजाए ( ग़ज़ल, नज़्म, कतए , रुबाई, शेर का संग्रह), अगीत त्रयी ( अगीत विधा के तीन महारथी ), तुम तुम और तुम ( श्रृगार व प्रेम गीत संग्रह ), ईशोपनिषद का काव्यभावानुवाद .. my blogs-- 1.the world of my thoughts श्याम स्मृति... 2.drsbg.wordpres.com, 3.साहित्य श्याम 4.विजानाति-विजानाति-विज्ञान ५ हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान ६ अगीतायन ७ छिद्रान्वेषी ---फेसबुक -डाश्याम गुप्त
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रविवार, 20 जून 2010

पितृ दिवस पर एक विचार-भाव यह भी... डा श्याम गुप्त ..

यह सच है कि आज का पिता वह ,सर्वज्ञाता,संतान के लिए धीर गंभीर महान , बच्चों से दूरी बनाकर रखने वाला , सर्वशक्तिमान पिता नहीं रहा। वह आज बच्चों के लिए गधा, घोड़ा, ऊँट बन सकता है, बच्चों के साथ सब तरह के खेल खेल सकता है, उनकी जिद -केरियर के लिए ,नौकरी-केरियर छोड़ कर उन्हें डांसिंग प्रोग्राम या क्रिकेट-टेनिस में ले जासकता है; वह उनके साथ नाचता -ठुमके लगाता है;सिनेमा -खेल-तमाशे देखता है, कुछ लोग साथ साथ शराव भी पीते हुए देखे जा सकते हैं , नंगे नाच भी | वह बच्चे के साथ बच्चा है , एवं साथ ही साथ अपने केरियर में कंपनी का मालिक, जिम्मेदार अफसर, कर्मी भी । कहा जा सकता है कि पूर्व भारतीय प्रामाणिक पिता की अपेक्षा ,वह आज दोहरी भूमिका अच्छी तरह निभारहा है। पिता-पुत्र सम्बन्ध सहज, अधिक घनिष्ठ हैं।
परन्तु फिर क्यों आज का बच्चा , युवा-- स्कूल में गोलियां चलाता है, सहपाठियों का अपहरण-ह्त्या करता दिखाई देता है, अध्यापक, गुरुजनों को चाकू-पिस्तोल दिखाकर नक़ल करता है | डकैती,ह्त्या, लूटपाट , मारपीट, कालेग-स्कूल में दंगे, आतंक में लिप्त होरहा है? बिगडैल ? सोचिये क्यों ??????????
वस्तुतः यह आज का पिता पाश्चात्य भावयुक्त है भारतीय संभ्रांत-भाव नहीं , जहां परिवार -भाव के कारण बच्चे में समष्टि भाव उत्पन्न होता था । मेरा पुत्र, मेरा बच्चा, मेरा बच्चा सबसे अच्छा, वाह बेटा!-- आदि व्यष्टि गत अहं भाव न पिता में न संतान में उत्पन्न होते थे जो उत्तम मानवीय - भाव की पृष्ठभूमि हुआ करते थे | पिता बच्चे का आदर्श हुआ करता था एवं उत्तम पारिवारिक संस्कारगत भाव,क्रियाएं, कर्म बचपन से सीखे जाते थे। आज पिता बच्चे का मित्र है, आदर्श नहीं । तो आदर्श कहाँ से आये--हीरो, हीरोइन( विभिन्न बकवास रोल में ), नेता, गुंडे, उठाईगीरे, नाचने-गाने वाले, लुच्चे- लफंगे , येन केन प्रकारेण पैसा कमाने वाले, पैसे के लिए खेलने वाले, तथा सदकर्मों की कथा-कहानी ,आदर्शों के अभाव में अकर्म व कुकर्म , टीवी-सिनेमा आदि उनके आदर्श बन रहे हैं |
इतिहास में पहले भी पिता के, बच्चा बने बिना--आदर्श पिता व सन्तान मोह से कुलनाशी-समाज़ नाशी, देश घाती पिता होते रहे हैं । आज के दिन हमें यह भी सोचना चाहिये।