....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ....
अनृत अकृत अप भावों की आंधी थी आयी ,
.तृणावर्त ,धर रूपभाव, चहुँ दिशि थी छाई |चहुँ दिशि छाई, भाव राक्षसी था अपनाया ,
कृष्ण कन्हैया ने क्या उसको नाच नचाया |
आसमान में ले कान्हा को हुआ नृत्यरत ,
नष्ट किया वह असुर, रहा जो अकृत अनृत रत ||