ब्लॉग आर्काइव

डा श्याम गुप्त का ब्लोग...

मेरी फ़ोटो
Lucknow, UP, India
एक चिकित्सक, शल्य-चिकित्सक जो हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान व उसकी संस्कृति-सभ्यता के पुनुरुत्थान व समुत्थान को समर्पित है व हिन्दी एवम हिन्दी साहित्य की शुद्धता, सरलता, जन-सम्प्रेषणीयता के साथ कविता को जन-जन के निकट व जन को कविता के निकट लाने को ध्येयबद्ध है क्योंकि साहित्य ही व्यक्ति, समाज, देश राष्ट्र को तथा मानवता को सही राह दिखाने में समर्थ है, आज विश्व के समस्त द्वन्द्वों का मूल कारण मनुष्य का साहित्य से दूर होजाना ही है.... मेरी तेरह पुस्तकें प्रकाशित हैं... काव्य-दूत,काव्य-मुक्तामृत,;काव्य-निर्झरिणी, सृष्टि ( on creation of earth, life and god),प्रेम-महाकाव्य ,on various forms of love as whole. शूर्पणखा काव्य उपन्यास, इन्द्रधनुष उपन्यास एवं अगीत साहित्य दर्पण (-अगीत विधा का छंद-विधान ), ब्रज बांसुरी ( ब्रज भाषा काव्य संग्रह), कुछ शायरी की बात होजाए ( ग़ज़ल, नज़्म, कतए , रुबाई, शेर का संग्रह), अगीत त्रयी ( अगीत विधा के तीन महारथी ), तुम तुम और तुम ( श्रृगार व प्रेम गीत संग्रह ), ईशोपनिषद का काव्यभावानुवाद .. my blogs-- 1.the world of my thoughts श्याम स्मृति... 2.drsbg.wordpres.com, 3.साहित्य श्याम 4.विजानाति-विजानाति-विज्ञान ५ हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान ६ अगीतायन ७ छिद्रान्वेषी ---फेसबुक -डाश्याम गुप्त
भ्रष्टाचार लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
भ्रष्टाचार लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

रविवार, 5 जनवरी 2014

बुराई की जड़ –कविता-- डा श्याम गुप्त ....

                               ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...



             आज  विश्व में हर क्षेत्र में भ्रष्टाचार का बोलबाला है...साथ ही  देश की राजनीति एवं   प्रत्येक क्षेत्र में उसके विरुद्धआवाजें भी उठ रही हैं जो एक अच्छा प्रतीक है ...मानवता के लिए ....परन्तु प्रत्येक बुराई का  ..अनीतिशास्त्र का वास्तविक मूल कहाँ है ...असीमित सुख की अभिलाषा....प्रस्तुत है एक कविता......

बुराई की जड़

प्रत्येक बुराई की जड़ है,
अति सुखाभिलाषा ;
जो ढूंढ ही लेती है
अर्थशास्त्र की नई परिभाषा;
ढूंढ ही लेती है
अर्थ शास्त्रं के नए आयाम ,
और धन आगम-व्यय के
नए नए व्यायाम |
और प्रारम्भ होता है
एक दुश्चक्र, एक कुचक्र -
एक माया बंधन -क्रम उपक्रम द्वारा
समाज के पतन का पयाम |
 
समन्वय वादी, तथा-
प्राचीन व अर्वाचीन से
नवीन को जोड़े रखकर,बुने गए-
नए नए तथ्यों, आविष्कारों, विचारों से होता है,
समाज-उन्नंत... अग्रसर |
पर, सिर्फ सुख अभिलाषा, अति सुखाभिलाषा-
उत्पन्न करती है, दोहन-भयादोहन,
प्रकृति का,समाज का, व्यक्ति का;
समष्टि होने लगती है, उन्मुख
व्यष्टि की ओर;
समाज की मन रूपी पतंग में बंध जाती है-
माया की डोर |
ऊंची, और ऊंची, और ऊंची
उड़ने को विभोर ;
पर अंत में  कटती है ,
गिरती है, लुटती है वह डोर-
क्योंकि , अभिलाषा का नहीं है, कोई-
ओर व छोर |

नायकों, महानायकों द्वारा-
बगैर सोचे समझे 
सिर्फ पैसे के लिए कार्य करना;
चाहे फिल्म हो या विज्ञापन ;
कर देता है-
जन आचार संहिता का समापन |
क्योंकि इससे उत्पन्न होता है
असत्य का अम्बार,
झूठे सपनों का संसार ;
और उत्पन्न होता है ,
भ्रम, कुतर्क, छल, फरेब, पाखण्ड का
विज्ञापन किरदार ,
एक अवास्तविक, असामाजिक संसार |

साहित्य, मनोरंजन व कला-
जब धनाश्रित होजाते हैं;
रोजी रोटी का श्रोत , व-
आजीविका बन जाते हैं ;
यहीं से प्रारम्भ होता है-
लाभ का अर्थ शास्त्र,
लोभ व धन आश्रित अनैतिकता की जड़ का ,
नवीन लोभ-कर्म नीति शास्त्र , या--
अनीति शास्त्र ||



गुरुवार, 10 जनवरी 2013

दोष मेरा है...कविता ...... डा श्याम गुप्त


                                ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...



                                

आज जब मैं हर जगह ,
छल द्वंद्व द्वेष पाखण्ड झूठ ,
 अत्याचार व अन्याय -अनाचार
को देखता हूँ ;
उनके कारण और निवारण पर ,
विचार करता हूँ ,
तो मुझे लगता है कि -
दोषी मैं ही हूँ ,
सिर्फ़ मैं ही हूँ ।

क्यों मैं आज़ादी के पचास वर्ष बाद भी
अंग्रेज़ी में बोलता हूँ ,
राशन की दुकान पर बैठ कर ,
झूठ बोलता हूँ , कम तोलता हूँ |

क्यों मैंबैंक के लाइन में लगना
अपनी हेठी समझता हूँ ,
यन केन  प्रकारेण  ,
पीछे से काम कराने को तरसताहूँ |

क्यों मैं 'ग्रेपवाइन' व 'ब्लोइंग मिस्ट'
 के ही पेंटिंग्स बनाता हूँ ,
'प्रसाद' और 'कालिदास' को भूलकर
शेक्सपीयर के ही नाटक दिखाता हूँ

क्यों मैं सरकारी गाडी में ,
भतीजे की शादी में जाता हूँ,
प्राइवेट यात्रा का भी ,
टीऐ पास कराता हूँ |

क्यों मैं किसी को जन सम्पत्ति -
नष्ट करते देखकर नहीं टोकता हूँ ,
स्वयं भला रहने हेतु
जन-धन की हानि नहीं रोकता हूँ |

क्यों मैं रास्ते रोक कर
शामियाने लगवाता हूँ ,
झूठी शान के लिए
अच्छे खासे सड़क को बर्वाद कराता हूँ |

क्यों मैं किसी सत्यनिष्ठ व्यक्ति को देखकर,
नाक-मुंह सिकोड़ लेता हूँ ,
सामने ही अपराध, भ्रष्टाचार ,लूट-खसोट , बलात्कार
होते देख कर भी मुंह मोड़ लेता हूँ

क्यों मैं कलेवा की जगह ब्रेकफास्ट व
खाने की जगह लंच उडाता हूँ ,
राम नवमी की वजाय , धूम धाम से
वेलेंटाइन डे मनाता हूँ |

क्यों मैं रिश्वत के पहिये को
और आगे बढाता हूँ,
एक जगह लेता हूँ
छत्तीस जगह देता हूँ |

क्यों मैं भ्रष्ट लोगों को वोट देकर
भ्रष्ट सरकार बनाता हूँ ,
अपने कष्टों की गठरी
अपने हाथों उठाता हूँ |

क्यों मैंने अपना संविधान
अन्ग्रेजी में बनाया ,
जो अधिकांश जन समूह की
समझ में ही न  आया |

आप लड़िये या झगडिये ,
दोष चाहे एक दूसरे पर मढिये ,
दोष इसका है न उसका है न तेरा है ,
मुझे शूली पर चढादो ,
दोष मेरा है।

मंगलवार, 5 जुलाई 2011

श्याम दोहा एकादश .....डा श्याम गुप्त....

                                                                     ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...

क्यों घबराये होरही , भ्रष्टाचार की जांच |
भ्रष्टाचारी बन्धु सब, तुझे न आये आंच |1

मेल परस्पर घटि गयो, वाणिज मन हरषाय |
मेल-मिलाप करायं हम, पानी -दूध मिलाय |2

ज्ञान हेतु अब ना पढ़ें , पढ़ें नौकरी हेतु  |
लक्ष्य चाकरी होगया, लक्ष्मी बनी है सेतु |3

धन साधन की रेल में,भीड़ खचाखच जाय |
धक्का -मुक्की धन करै, ज्ञान नहीं चढ़ पाय |4

चाहे पद-पूजन करो, या साष्टांग प्रणाम |
काम तभी बन पायगा, चढे चढ़ावा दाम |5

जन तो तंत्र में फंस गया,तंत्र हुआ परतंत्र |
चोर- लुटेरे  लूटते, घूमें  बने  स्वतंत्र | 6

राजनीति की नीति में,कैसा अनुपम खेल |
ऊपर से दल विरोधी, अन्दर अन्दर मेल | 7

आरक्षण  की  आड़ में,   खुद का रक्षण होय |
नालायक सुत-पौत्र सब, यहि विधि लायक होय | 8

बाढ़  आय सूखा पड़े ,   हो खूनी संघर्ष |
इक दूजे को दोष दे , नेताजी मन हर्ष | 9

भाँति  भाँति  के रूप धरि,  खड़े मचाएं शोर |
किसको जन अच्छा कहे, किसे कहें हम चोर | १०

नेता   वाणी से   करें,  परहित  पर उपकार |
निजी स्वार्थ में होरहा, जन धन का व्यवहार || 11  

बुधवार, 1 जून 2011

भ्रष्टाचार का महाकारण -- डा श्याम गुप्त

                                                                         ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...

                         शूद्र ( सामान्य जन,प्रजा ) व वैश्य ( व्यापारी वर्ग आदि ) मूलतः कर्म करने वाले वर्ग होते हैं , क्षत्रिय ( राजा व शासक गण) उन पर नियमन के लिए होते हैं , ब्राह्मण  ( विद्वत्जन, विज्ञजन , साहित्यकार , विद्वान, पंडित , विशेषज्ञ वर्ग ) अपने साहित्य, उपदेश, ज्ञान, ग्रंथों , शास्त्रज्ञान आदि द्वारा परामर्श के रूप में राजा व अन्य दोनों पर नियमन के लिए होते हैं |   यद्यपि आधारभूत आदर्श व्यवस्था में किसी भी व्यक्ति को अनाचरण, भ्रष्ट आचरण का अधिकार नहीं है परन्तु व्यवहारिक रूप में मूलत:सामान्य  जन-मानस में स्वलाभ हित भ्रष्ट-आचरण में लिप्त होने की प्रवृत्ति होती है  जो व्यापारी वर्ग व तदाधारित राज्य व शासन कर्मियों में  भ्रष्टाचार लिप्त होने की प्रवृत्ति उत्पन्न करती है | परन्तु विज्ञजनों का ही यह कर्तव्य होता है कि वे अपने शुद्ध आचरण , निडर रूप परामर्श से समाज को भटकाव से बचाएं | परन्तु जब यही वर्ग स्वयं  भय, लालच या अज्ञान वश  असत्याचरण , असत्य संभाषण , उदासीनता, अचिन्त्य-भाव  को ग्रहण कर लेते हैं तो भ्रष्टाचार , भ्रष्ट आचरण व अनैतिक आचरण अनियंत्रित होकर  अपने चरम पर पहुँच जाता है |
              अतःआज  भ्रष्टाचार,व् भ्रष्ट आचरण का एक महा कारण है विद्वत जनों का अपने कर्तव्य के प्रति अचिन्त्यनीय व  उदासीन होजाना | आज समाज के प्रत्येक क्षेत्र में विद्वान् लोग, शीर्षस्थ लोग, साहित्यकार, अनुभवी विज्ञजन सभी अपने स्वलाभ हित असत्याचरण व असत्य-भाषण में संलग्न हैं |  सभी स्वार्थ रत, स्वार्थ-हित हांजी..हांजी वाली स्थिति अपनाए हुए हैं | कोइ भी स्वहानि भय के सामान्य जन, शासन-प्रशासनिक अधिकारियों, राजनेताओं, मंत्रियों से , उनके कार्य- क्रिया-कलाप, गुणावगुण , अपराध, भ्रष्टाचार के बारे में सत्य नहीं कहना चाहता| कोइ बुरा नहीं बनाना चाहता ------सब मीठा-मीठा बोलकर अपना हित साधन करना चाहते है, सामान्य जन व राज्य में यह प्रवृत्ति व्यवहारिक रूप से होती है.... परन्तु ब्राह्मण वर्ग में नहीं -----
 " सचिव,वैद्य, गुरु तीन जब प्रिय बोलहिं भय आस ,
    राज्य , धर्म  और  देह कर,  होइ  शीघ्र  ही नाश |"    ----यही स्थित बनती जारही है | समाज  के प्रत्येक विद्वत-वर्ग में यही उदासीनता है ..हमें क्या , हम क्यों करें, कोइ मानता ही नहीं , व्यवस्था ही ऐसी है--जबकि व्यवस्था स्वयं मनुष्य बनाता है नकि मनुष्य को व्यबस्था बनाती है....हाँ यह एक चक्रीय व्यवस्था हो सकती है परन्तु उसका कारण भी मनुष्य स्वयं ही होता है  ....शिक्षा , चिकित्सा, विज्ञान, राजनीति,न्याय, पत्रकारिता ,अभियांत्रिकी, सांस्कृतिक-क्षेत्र ...सभी में विद्वत्जन सत्य बोलकर बुरा नहीं बनना चाहते अतः जनता को राज्य को शासन को उचित व् सत्य परामर्श प्राप्त न होने से सब उसी ढर्रे पर चलने को मज़बूरपर हैं |  प्रेक्टिस कम होने के डर से चिकित्सक, वकील, कमाई न होने के भय से इंजीनियर व  स्थानान्तरण - कनिष्ठ पद मिलने के भय से सचिव स्तर के लोग , काम व नाम न मिलने के भय से कला क्षेत्र के गुरु ...गलत लोगों का , गलत तथ्यों का, गलत नियमों का , भोंडे-अतार्किक, अश्लील कृतियों व भ्रष्ट लोगों का साथ देते देखे जा सकते हैं | सिनेमा व दूरदर्शन के कृत्यों  को तो सभी जानते हैं
               साहित्य , जो अनुभव व ज्ञान का , इतिहास होता है | विद्व्वत्जनों में शीर्ष स्थान पर  होता है, समाज के प्रत्येक क्षेत्र का नियामक होता है ...वहां भी यही स्थिति है |  मूर्खतापूर्ण, भ्रमात्मक साहित्य, एकांगी व  समाज-साहित्य   को  विषयों के टुकड़ों में बांटता  साहित्य, भोंडे हास्य साहित्य, प्रतिदिन के समाचार दर्शाती काव्य-कृतियाँ जिनमें किसी  समाधान का ज़िक्र नहीं , पैसे चुकाकर खरीदे जाते सम्मान, बड़े बड़े पुरस्कार,  पीत-पत्रकारिता,  सुरा-सुन्दरी के हित साहित्यिक भ्रष्टाचार |  ब्लॉग पर मुफ्त लेखन की सुविधा से तो तमाम चिट्ठों की बाढ़ आगई है , हर एरा-गेरा ..पत्रकार.. लेखक बन गया है...हर कोइ अपने दर्शन -अदर्शन को  विना किसी शास्त्रीय उदाहरण , साहित्यिक उदाहरण झाडं रहा है और अन्य लेखक गण , विज्ञ जन...विना सोचे समझे वाह वाह की .. असत्य .. टिप्पणियाँ झाड रहे हैं |  कोइ कमल को रात में खिलाने लगता है तो कोइ दुःख को ही दुःख का कारण बताने लगता है...और विज्ञ जन ऐसे आलेखों ..कविताओं पर  आलोचना की बजाय बिना सोचे समझे वाह  वाह की टिप्पणियाँ भेजते रहते हैं ...कौन बुरा बने...कौन पचड़े में पड़े....सबसे मीठा -मीठा बोलो , कटु सत्य क्यों बोलो .....,   सिर्फ घटनाओं व् समाचार पत्रों के समाचार ही  आप कई कई ब्लोगों पर देख-पढ़ सकते हैं जो अनावश्यक हैं |  कोइ एक महिला ब्लोगर  कोइ घिसा-पिटा  विषय पर चार पंक्तियाँ लिख देती है तो १०१ कमेंट्स ...यह .....असत्याचरण है--विज्ञ जनों का भ्रष्ट-आचरण है ---जबकि सब को जानना चाहिए क़ि---
सत्यं ब्रूयात , प्रियं ब्रूयात , मा ब्रूयात सत्यमप्रियं |
असत्यं च नान्रतं ब्रूयात , एत  धर्म   सनातनम  ||-----  यह चरम पतन की स्थिति है  और आचरण के भ्रष्ट होने का सबसे बड़ा कारण............


गुरुवार, 14 अप्रैल 2011

भ्रष्टाचार के कारण..मीडिया --.३- समाचार......डा श्याम गुप्त.....

                                                                                            ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...
   समाचार गुणात्मक होने चाहिये न कि व्यर्थ के जिनका हम से, हमारे समाज से , देश से , सन्स्क्रिति से कोई मतलब न हो और समाज सन्स्क्रिति के लिये विघटनात्मक हों.... अब देखिये कुछ समाचारों की बानगी....
१-युवा चाहते है कम किराये में बस सेवा....  कौन नहीं चाहेगा ? क्या यह कोई समाचार है? फ़िर क्यों युवाओं से निरर्थक सवाल पूछे जायं, जिन्हें अभी पढने -लिखने में समय लगाना चाहिये न कि इन सवालों में जिसका अभी उन्हें कोई ग्यान ही नहीं, बडों का, शासन का यह कर्तव्य है । क्या हम युवाओं के मन में यह सोच डालना चाह्ते हैं कि आपके बडे नाकारा हैं अब आप ही बताइये हल...
२-पेरेन्ट बनें सपोर्ट सिस्टम... क्या सदा से ही माता-पिता बच्चों के सपोर्ट-सिस्टम नहीं है?...भारत में तो हैं..किसी कानून के बिना भी... अपनी शक्ति भर, यथायोग्य सभी माता-पिता बच्चों के भले ,उनकी तरक्की के लिये प्रयास करते हैं....यह विदेशी विचार है जहां माता-पिता ,कानून के डर से बच्चों का पालन-पोषण करते हैं।......इस प्रकार के समाचार बच्चों में  और असीमित  अपेक्षायें व माता-पिता के विरुद्ध अवग्या भाव उत्पन्न होते हैं ...जो भविष्य के अनाचरण के कारण हैं...
३- विशेष्ग्यता से सम्बन्धित समाचारों का सिर्फ़ वह भाग ही प्र्दर्शित हो जिससे जनता को सीधा मतलब हो----देखिये .... अ-लखनऊ के पानी में नाइट्रेट की मात्रा चिन्ताजानक....क्या इस जानकारी का सामान्य जनता से कोई मतलब है...यह एक विशेषग्य ग्यान है और उन्हीं को जानना व उचित व्यवस्था करनी है....व्यर्थ के समाचार द्वारा  सामान्य जन में घबराहट फ़ैलाने से क्या लाभ...क्या वे पानी पीना बन्द करदें...फ़िर क्या करें....क्या करपायेंगे..?ब सुपर बग से डरिये मत..यदि कोई डर है ही नहीं तो उसे जनता को अखबार में बताने की ही क्या आवश्यकता है---भ्रम, भय व अनास्था फ़ैलाने का जरिया हैं येऔर चिकित्सा-जगत में भ्रष्ट आचरण प्रारम्भ के कारक... स-चिकिन पोक्स से डरिये नहीं हटाइये---सामान्य जनता क्या चिकिन पोक्स को हटा सकती है..यह विशेष्ग्यों का कार्य है तो जानकारे का जनता क्या करे---हां भ्रम व भय अवश्य फ़ैल सकता है ....
४-नया नज़रिया ----
--(अ) शैतान बच्चा या अगला सचिन.... वाह क्या नज़रिया है सभी बच्चे पढाई-लिखाई छोडकर खेलने में लग जायें और बच्चों में...अकर्म, अनास्था, टूटने दो कोई बात नहीं, सचिन बनना है...अर्थात गलतियों का नियमितीकरण की भावना उत्पन्न करता है।
---(ब).. मिस इन्डिया २०१५....वाह क्या नया नज़रिया है...सब लडकियों को बस मिस इन्डिआ बनने के प्रयत्नों में लग जाना चाहिये, न कि महा देवी वर्मा, इन्दिरा गान्धी, सीता, मदालसा, किरन बेदी अदि.....

४-इन पर भी नज़र डालिये ---
-----मस्त केटरीना कैफ़.....
-----पूनम अवस्थी कपडे उतारने को तैयार....
-----नायर अब भी दिल के करीब --हर्ले.....
-----छ: करोड की डायमन्ड बस्टर...चोली...
-----बर्लुस्कोनी( इटली के पी एम ) को सेक्स के बदले पैसा देने की क्या जरूरत-- रूसी महिला मित्र......अखिर इन व्यर्थ के समाचारों का क्या महत्व है?...उत्तेजना, भ्रम, असान्स्क्रितिकता  फ़ैलाना...
५-  कुछ अन्य व्यर्थ के समाचार... जो व्यर्थ के पेज बढाकर अखबार का मूल्य व जनता का पैसा व समय बर्बाद करते हैं, जिसकी भरपाई के लिये वही...भ्रष्टाचार का छोटा सा रूप.....
 ---सऊदी अरब में बनेगी सबसे ऊंची इमारत---तो हम क्या करें, जब बनेगी देखा जायगा...
----आज का भविष्य---क्या अन्धविश्वास फ़ैलाना लक्ष्य है...
----सुडोकू..व्यर्थ के लतीफ़े अदि......क्या कोई औचित्य है ...?
---चेर्नोबल सन्कट में जापान...सामान्य जन क्या करे ...जब सरकारी स्तर पर कुछ होगा देखा जायगा...
---उपवास  से कमजोर होता है शरीर----कौन कब से नहीं जानता.....क्या आवश्यकता है इस समाचार की..

 --------और क्या कहाजाय आप तो सभी प्रतिदिन ही झेलते हैं...या सिर्फ़ हेडिन्ग पढकर कुड कुडाते हुए अपने काम में लग जाते हैं.....

गुरुवार, 7 अप्रैल 2011

भ्रष्टाचार व अन्ना हज़ारे का अनशन.....

                                  ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...       
          ६१ वर्ष में न जाने कितनी सरकारें आईं व गईं ...परन्तु भ्रष्टाचार बढ्ता ही गया व बढ्ता जारहा है...अतः भ्रष्टाचार कोई राजनैतिक मामला नहीं है, अपितु मानवीय आचरण का मामला है। जिस प्रकार से  कान्ग्रेस व मनमोहन सिन्ह सरकार पर आक्षेप लगाये जारहे हैं ( क्योंकि संयोग से इस सरकार के विरुद्ध ही तमाम मामले उजागर हुए हैं एवं  अधिकान्श समय कान्ग्रेस सरकार ही सत्ता में रही है, इससे क्या अन्य सरकारें क्या कर रहीं थीं ), एवं लोकपाल को सर्व-समर्थ बनाने की बात की जारही है, इससे लगता है कि इसे एक राजनैतिक मामला माना जा रहा है । क्या गारन्टी है कि लोकपाल स्वयं भ्रष्टाचार में लिप्त नहीं हो जायगा । क्या आज कोई एसा व्यक्ति है सरकार, शासन, प्रशासन,जनता कहीं भी जिसे माना जाय कि वह भ्रष्ट नहीं हो जायगा।....साफ़-सुथरे पूर्व राष्ट्रपति कलाम/ प्रधान मन्त्री अटल बिहारी बाजपेयी-- क्यों नहीं इस मसले पर आगे आये ? 
         यद्यपि पहल को अच्छा ही कहा जायगा, कहीं से  तो  पहल हो । हां जब तक राजनैतिक इच्छाशक्ति के साथ ,आमूल चूल रूप में  मानवीय आचरण सुधारने के , सांस्कृतिक सुधार के, स्वयं जन जन स्वयं को सुधारने के  उपाय नहीं किये जाते ..भ्रष्टाचार समाप्त नहीं हो सकता |  

गुरुवार, 2 दिसंबर 2010

छिद्रान्वेषी -२ ---डा श्याम गुप्त ....'इंडिया अगेंस्ट करप्शन '...

" छिद्रान्वेषण " को प्रायः एक अवगुण की भांति देखा जाता है , इसे पर दोष खोजना भी कहा जाता है...(faultfinding). परन्तु यदि सभी कुछ ,सभी गुणावगुण भी ईश्वर - प्रकृति द्वारा कृत/ प्रदत्त हैं तो अवगुणों का भी कोई तो महत्त्व होता होगा मानवीय जीवन को उचित रूप से परिभाषित करने में ? जैसे-- न कहना भी एक कला है, हम उनसे अधिक सीखते हैं जो हमारी हाँ में हाँ नहीं मिलाते , 'निंदक नियरे राखिये....' नकारात्मक भावों से ..... आदि आदि ... । मेरे विचार से यदि हम वस्तुओं/ विचारों/उद्घोषणाओं आदि का छिद्रान्वेषण के व्याख्यातत्व द्वारा उन के अन्दर निहित उत्तम व हानिकारक मूल तत्वों का उदघाटन नहीं करते तो उत्तरोत्तर, उपरिगामी प्रगति के पथ प्रशस्त नहीं करते । आलोचनाओं / समीक्षाओं के मूल में भी यही भाव होता है जो छिद्रान्वेषण से कुछ कम धार वाली शब्द शक्तियां हैं। प्रस्तुत है आज का छिद्रान्वेषण -----
-----समाचार के अनुसार आर्ट ऑफ़ लिविंग के श्री रविशंकर, अन्ना हजारे, किरण बेदी , स्वामी अग्निवेश आदि विभिन्न महानुभावों ने मिलकर एक भ्रष्टाचार निरोधी संस्था बनाई है जो जन -जन में भ्रष्टाचार के विरुद्ध ' जन आन्दोलन ' चलाने का कार्य करेगी । सभी जानते हैं कि भ्रष्टाचार किस तरह देश-समाज -विश्व को खा रहा है और उसे हटाने की महती आवश्यकता है । यह पुनीत कार्य अवश्य ही एक अत्यावश्यक कार्य है | इन सभी महानुभावों ने मिल कर एक संस्था बनाई है --- " इंडिया अगेंस्ट करप्शन "....
---अब इतने महत्वपूर्ण व महान कृतित्व में क्या छिद्रान्वेषण की बात हो सकती है ?---हो सकती है , देखिये इतने अच्छे कार्य का किस तरह महत्त्व नष्ट हो सकता है, ----
...जिस जन जन के लिए यह अभियान चलाया जारहा है वह जन-जन क्या सिर्फ अंग्रेज़ी समझता है जो संस्था का नाम अंग्रेज़ी में रखा गया है .
......हमें करप्शन तो इंडिया से हटाना है तो वही करप्शन के अगेंस्ट कैसे हो सकता है ? क्या यह नाम हिन्दी -राष्ट्र भाषा में -भ्रष्टाचार निरोधी संस्था, हम भ्रष्टाचार नहीं करेंगे , जन जन को जगायेंगे-भ्रष्टाचार हटायेंगे ....आदि क्यों नहीं हो सकते थे ?
-------यह हिन्दी,हिन्दुस्तान व भारतीय भाव की कमी व कम समझ का परिणाम होता है क्योंकि इस के मूल में अधिकतर शासन व्यवस्था द्वारा सताए , प्रशानिक लोग हैं...पर किसी अच्छे कार्य के लिए उन्हें भारतीय भाव का अनुसरण तो करना ही चाहिए , सम्पूर्ण प्रभाव व भाव सम्प्रेषण के निमित्त.... ।

मंगलवार, 30 जून 2009

भ्रष्टाचार से मुक्ति के उपाय----

कोई पनंदीकर ,जो अर्थ विद भी हैं और किसी संस्था के अध्यक्ष भी ,कहरहे हैं किचुस्त उपाय ही भ्रष्टाचार से मुक्ति का रास्ता है । तो अब तक आप क्या कर रहे थे ? उस संस्था के लोग,सरकार क्या कर रही थी ? आप इसका उपाय अमेरिकी प्रणाली से कराने की सलाह दे रहे हैं। ये अमेरिकी भाव में पढ़े लिखे लोग हर बात का उपाय अमेरिका में ढूढते है। तो क्यों न भारत का राष्ट्राध्यक्ष ओबामा को ही बना दिया जाय , भारत को अमेरिका का उपनिवेश बनादिया जाय,सब झंझट से मुक्ति !!
ये लोग नहीं समझ पाते कि उपायों के बदलते रहने से कुछ नहीं होता ,भ्रष्टाचार करने -कराने वाले स्वयं आदमी ,मनुष्य, हम होते है। जब तक मनुष्य को मनुष्यता भाव ,ईश्वर का डर ,सामाजिकता भाव नहीं सिखाया जायगा ,कोई प्रणाली कार्य नहीं कर पायेगी ।