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डा श्याम गुप्त का ब्लोग...

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Lucknow, UP, India
एक चिकित्सक, शल्य-चिकित्सक जो हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान व उसकी संस्कृति-सभ्यता के पुनुरुत्थान व समुत्थान को समर्पित है व हिन्दी एवम हिन्दी साहित्य की शुद्धता, सरलता, जन-सम्प्रेषणीयता के साथ कविता को जन-जन के निकट व जन को कविता के निकट लाने को ध्येयबद्ध है क्योंकि साहित्य ही व्यक्ति, समाज, देश राष्ट्र को तथा मानवता को सही राह दिखाने में समर्थ है, आज विश्व के समस्त द्वन्द्वों का मूल कारण मनुष्य का साहित्य से दूर होजाना ही है.... मेरी तेरह पुस्तकें प्रकाशित हैं... काव्य-दूत,काव्य-मुक्तामृत,;काव्य-निर्झरिणी, सृष्टि ( on creation of earth, life and god),प्रेम-महाकाव्य ,on various forms of love as whole. शूर्पणखा काव्य उपन्यास, इन्द्रधनुष उपन्यास एवं अगीत साहित्य दर्पण (-अगीत विधा का छंद-विधान ), ब्रज बांसुरी ( ब्रज भाषा काव्य संग्रह), कुछ शायरी की बात होजाए ( ग़ज़ल, नज़्म, कतए , रुबाई, शेर का संग्रह), अगीत त्रयी ( अगीत विधा के तीन महारथी ), तुम तुम और तुम ( श्रृगार व प्रेम गीत संग्रह ), ईशोपनिषद का काव्यभावानुवाद .. my blogs-- 1.the world of my thoughts श्याम स्मृति... 2.drsbg.wordpres.com, 3.साहित्य श्याम 4.विजानाति-विजानाति-विज्ञान ५ हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान ६ अगीतायन ७ छिद्रान्वेषी ---फेसबुक -डाश्याम गुप्त
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रविवार, 25 मार्च 2018

रामनवमी पर विशेष --- -----राम की राजनीति--- डा श्याम गुप्त...

                         ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ... 

रामनवमी पर विशेष ---
-------------------------
राम की राजनीति---

===============
---- आज राम राजनीति के केंद्र तो हैं परन्तु राम की राजनीति राजनैतिक केंद्र से दूर है | राम का चरित्र, उनकी कार्यशैली व कृतित्व, चाहे वे राजमहल में हों या वनवास में, ही उनकी राजनीति है |
------दृढ़ निश्चय, गुरुजनों से मंत्रणा, समाज के जन जन ..बड़े से लेकर छोटे से छोटे तक का दुःख हरण, उचित क्रियाशैली व नीति निर्धारण , सभी का उचित सहयोग ,कठोर परिश्रम जन जन का उत्थान व शिक्षा ही रामराज्य की नींव है---
--------मेरे काव्य उपन्यास, शूर्पणखा खंडकाव्य से राम की राजनीति के कुछ दृश्य प्रस्तुत हैं ----
सर्ग-४.मंत्रणा
===========
९-
ऋषि-मुनि गण एवं वनचारी,
सबको प्रभु ने आश्वस्त किया|
अत्याचार न होगा कोई,
जो अब तक होता आया है |
कोई मख विध्वंस न होगा,
कुटिया का भी ध्वंस न होगा३ ||
१०-
धनुष वाण है हाथ राम के,
परम वीर सौमित्र यहाँ हैं |
आ न सकेंगे इधर ,निशाचर,
करें सभी निर्भय होकर के;
यज्ञादिक शुभ कर्म सभी फिर,
उठे सुवासित धूम गगन में४ ||
११-
ऋषि-प्रणीत जीवन धारा की५ ,
सुरसरि फिर से बहे, धरा पर |
निशाचरी माया नगरी की,
हवा नहीं इस ओर बढ़ेगी |
मर्यादा की मलयज शीतल ,
बहे समीर पुनः हर ओर ||
सर्ग ५...पंचवटी
===============
३-
मुनि अगस्त्य से बोले रघुवर,
तात ! आपका ज्ञान व अनुभव;
एवं कठिन कर्म और ब्रत का,
सारे जग में यश फैला है |
यह भूभाग आपके कारण,
ज्ञान-वान, समृद्ध हुआ है ||
४-
उचित मन्त्र दें, वही करूँ में ,
जिससे प्रिय हो आप सभी का |
हो उद्देश्य पूर्ण, मेरा भी,
नाश करूँ सब दैत्य वंश का |
लक्ष्मण समझ रहे थे अब कुछ,
नमन किया प्रभु की लीला को ||
५-
ऋषिवर, इस दक्षिण अंचल के,
कण कण का है ज्ञान आपको;
रहना उचित कहाँ पर होगा ?
पाप घड़ा भर चुका दैत्य का,
अब विलम्ब का काम नहीं है;
यह संधान कहाँ से होगा ||
६-
१२-
पंचवटी अति सुन्दर पावन,
धाम है, 'दंडक-वन'३ में रघुवर |
रहें वहां पर पर्णकुटी४ कर,
मिट जाएँ कलुष-दोष वन के |
दंडक वन होजाए पावन ,
ऋषि-मुनि विचरें निर्भय होकर ||
१३-
अधिग्रहण किया जो दैत्यों ने,
वह जनस्थान५ भी निकट रहे |
आते-जाते निशिचर, दुष्टों,
की बातों का भी पता चले |
उस रावण के अधिकृत प्रदेश-
से, दुष्ट-दैत्य, आते रहते ||
१४-
सूचना व अवसर पाने का,
है उचित क्षेत्र यह दंडक वन |
थर्राया है जो, असुरों के -
अति अत्याचारी कृत्यों से |
रह पंचवटी६ में राम, करो-
तुम दुष्टों का अब शीघ्र दलन ||
१५-
दिव्यास्त्र अनेक दिए ऋषि ने,
फिर बोले-तुम तो राम स्वयं ,
हो संचालन संधान कुशल |
जाने कितने ही दिव्य अस्त्र,
प्रभु तरकश में शोभायमान ;
है शस्त्रों की शोभा तुमसे ||
१६-
अस्त्रों से सिर्फ नहीं कोइ,
मानव शोभा पाजाता है |
शस्त्रों को रख निज साथ नहीं,
वह परमवीर बन जाता है |
मिल जाएँ यदि अपात्र को तो,
इन की महिमा घट जाती है ||
१७-
दृढ -इच्छा, साहस, कर्मठता,
नैतिक बल, अस्त्र है बीरों का|
तुम ग्रहण करो हे राम! बढे,
इन शस्त्रों की शोभा तुमसे |
सह न सकेगा रिपु कोई,
वर्षा अब राम के तीरों की || ----
१९-
दंडक वन में पहुंचे रघुवर,
मिले जटायू गृद्धराज वर |
मित्र, पिता दशरथ के थे,प्रिय,
सादर वंदन किया सभी ने |
कुशलक्षेम कौशलपति की वे,
लगे पूछने,भाव-विह्वल हो ||
२१-
फिर विस्तार सहित घटनाक्रम,
कारण अपने विपिन-वास का;
रघुवर ने उनको बतलाया |
किया निवेदन, तात ! आप भी,
बनें सहायक धर्म कार्य हित;
उचित मंत्रणा दें हम सबको ||
२२-
आशीर्वाद सदा है मेरा,
राम,बनो तुम खलु-दल भंजक|
मेरा मेरे दल-बल१ का भी,
सदा पूर्ण सहयोग रहेगा |
पूरा हो उद्देश्य राम का,
पापमुक्त हो अब यह अंचल ||
२३-
वनचर, बनवासी अरण्य के ,
हैं अति त्रस्त अनाचारों से |
ज्ञान-धर्म,जन-नीति सभी कुछ,
कलुषित हैं; दूषित भावों के -
अति प्रचार एवं प्रसार से २ ,
है प्रमाद ने किया बसेरा ||
२४-
अकर्मण्यता, प्रमाद व लिप्सा,
भोग-भाव औ असत कर्म से ;
ध्वस्त हो गईं रीति-नीति सब,
ध्वस्त हुई है अर्थव्यवस्था |
दीन-हीन हो पिछड़े सबसे,
भोग रहे निज कर्मों का फल ||
२५-
यदि हो साथ राम का पौरुष,
भक्ति-शक्ति सौमित्र के जैसी;
सीता सी प्रभु प्रीति-रीति हो,
सोने में होजाय सुहागा |
बिना भक्ति और ईश कृपा के,
किसको भला विवेक हुआ है ||
२६-
युग-शिक्षा नव ज्ञान-रश्मि से,
नव-प्रकाश फैलाना होगा |
कला शिल्प साहित्य आदि का,
जन मन भाव जगाना होगा |
स्वतंत्रता स्व -भाव आदि भी,
जगें, सभी के अंतर्मन में ||
२७-
हर, प्रमाद अज्ञान अयोग्यता ,
सब विधि योग्य बनाएं सबको |
नहीं योग्यता की कोई भी,
कमी किसी में भी रह जाए |
ज्ञान कुशलता और योग्यता,
से न करें कोई समझौता ३ ||
२८-
स्त्री-शिक्षा पर सब विधि से,
कुछ ध्यान अधिक देना होगा |
शिक्षित नारी ही है राघव!
उन्नायक अगली पीढी की |
सक्षम है वही रोकने में,
जाने से असत मार्ग नर को ||
२९-
विदुषी, शिक्षित और साक्षर,
नारी ही आधार है सदा ;
हर समाज की, नर जीवन की |
वही समय पड़ने पर , नर से-
कदम मिलाकर चल सकती है४ |
जीवन करती सुन्दर -समतल ||
३०-
चाहे जितनी भीड़ साथ हो,
यदि अयोग्य हो, काम न आये |
पूर्ण योग्यता ज्ञान के बिना ,
कोई कार्य पूर्ण कब होता |
तप संयम कठोर अनुशासन,
से ही पूर्ण योग्यता मिलती ||
३१-
पिछड़े दीन-हीन या ज्ञानी,
सबको साथ लिए चलना है |
अस्त्र-शस्त्र निर्माण कर्म और -
लड़ने योग्य बनाएं सबको |
आतातायी के विरोध का,
स्वर, जन जन में उठे ज्वार बन ||
३२-
नए नए अस्त्रों शस्त्रों का,
संचालन भी सिखलाना है |
जन-जन, मन से महायज्ञ में,
दे सहयोग, बताना है यह |
हर घर में हे राम! ज्ञान का,
एक-एक दीपक जल जाए ||
३३-
अक्रियता अज्ञान और भय,
हट जाए जन जन में मन से |
अपनी स्वयं की अर्थव्यवस्था,
से यह वन समृद्ध बन सके |
कर्म-चेतना से यह अंचल,
सक्रिय सबल, संबल बन जाए ||
३४-
जन जन का बल, युद्ध काल में,
सबसे बड़ा शस्त्र५ होता है |
राघव ! सब से बड़ी सुरक्षा-
शक्ति, योग्य जन-बल होता है |
उचित समय पर दंडक वन क्या-
जन स्थान भी साथ खडा हो ||-----सर्ग ५...पंचवटी
१८-
देश की रक्षा, संस्कृति रक्षण ,
तथा प्रजा के व्यापक हित में ;
अधर्मियों से विधर्मियों से,
अन्यायी लोलुप जन जो हों ;
कभी नहीं समझौता करता ,
वही नृपति अच्छा शासक है ||
१९-
पर जो शासक निज सुख के हित,
अत्याचार प्रजा पर करता |
अधर्म-मय, अन्याय कर्म से ;
अपराधों को प्रश्रय देता |
अप विचार, अपकर्म भाव में,
जन जन पाप-लिप्त हो जाता ||
२०-
हिंसा चोरी अनृत भावना,
नर-नारी को भाने लगती|
अश्लील कृत्यों से नारी,
अपने को कृत-कृत्य समझती |
लूट अपहरण बलात्कार के,
विविध रूप अपनाए जाते ||
२१-
अति भौतिक सुख लिप्त हुए नर,
मद्यपान आदिक विषयों रत;
कपट झूठ छल और दुष्टता,
के भावों को प्रश्रय देते |
भ्रष्टाचार, आतंकवाद में,
राष्ट्र, समाज लिप्त हो जाता ||
२२-
पाप, अधर्म-नीति कृत्यों से,
प्रकृति माता विचलित होती |
अनावृष्टि अतिवृष्टि आदि से,
धरती की उर्वरता घटती |
कमी धान्य-धन की होने से,
बनती है अकाल की स्थिति ||
२४-
लक्ष्मण,तुम अब जान चुके हो,
मूल उद्देश्य, वनागमन का |
नाश राक्षसों का करना है ,
स्थिर करना है फिर हमको;
शास्त्र धर्म शुचि मर्यादाएं ,
ऋषि प्रणीत जीवन शैली की ||
२५-
इस अंचल के पिछड़े पन को,
हमको दूर हटाना होगा |
शिक्षा देकर के जन जन का,
जीवन सुलभ बनाना होगा |
विविध शिल्प औ शस्त्र कला का,
उन्हें कराना होगा ज्ञान ||
२६-
दुखी असंगठित एवं पिछड़ी,
प्रजा रहे, वह राजा ही क्या |
एसे किसी राज्य का लक्ष्मण,
राजा बन कर भी क्या करना |
शिक्षित सुखी संतुष्ट प्रजा ही,
उन्नत सिर हैं राजाओं के ||
२७-
शिक्षित सज्जन सुकृत संगठित,
बनें क्रान्ति में स्वयं सहायक ;
लक्ष्मण सदा सफल होती वह |
पर असंयमित हो जाती है,
भीड़ अशिक्षित हो, असंगठित;
भय विघटन,प्रति-क्रान्ति का रहता ||
२८-
आताताई के विरोध में,
जन संकुल को लाना होगा |
जन जन ज्वार समर्थन से ही ,
मिल पायेगी विजय युद्ध में |
बड़ी बड़ी सेनाओं से भी,
नहीं कार्य यह सध पाता है ||
२९-
यदि मैं सेना लेकर आता,
प्रतिपग मग पर विरोध होता |
राज्य प्रसार लालसा का भी,
कौशल पर आक्षेप ठहरता |
सतर्क होजाते राक्षस -कुल,
पूरी तैयारी से पहले ||
३०-
लक्ष्मण हमको इसी भूमि की ,
मिट्टी से हैं वीर उगाने |
आतंक और अन्याय भाव से,
लड़ने के हैं भाव जगाने |
ताकि लौटने पर हम सबके,
वे हों स्वयं कुशल निजहित में ||
३१-
शीश नवा कर लक्ष्मण बोले-
राम नाम की महिमा से प्रभु,
मिट्टी भी सोना होजाती |
इच्छा है जब स्वयं राम की,
सोती धरती जाग उठेगी ;
आज्ञा दें अब क्या करना है ||
३२-
सभा, प्रबंधन और निरीक्षण ,
ऋषि-मुनियों संग विविधि गोष्ठियों ;
के आयोजन, कार्यान्वन का,
सारा भार लिया रघुवर ने |
नारी-वालक शिक्षा का और-
जन जागरण१ भार सीता ने ||
३३-
गृह निर्माण व युद्ध कला में-
विशेषग्य ,सौमित्र को मिला ;
भार प्रोद्योगिकी -शिक्षा एवं-
आयुध की निर्माण कला का |
एवं संचालन -कौशल को ,
जन जन में प्रसार करने का ||
३४-
लिखना पढ़ना व सद-आचरण,
महिलाओं बच्चों को, सबको;
अपनी कुटिया के कुंजों की,
छाया में वे जनक-नंदिनी;
आदर प्रेम से सिखलाती थीं,
दीप, दीप से जलता जाता२ ||
३५-
लक्ष्मण लगे सिखाने सब को,
धनुष बनाना, वाण चलाना |
शस्त्रों के निर्माण-ज्ञान सब,
शर-संधान व उचित निशाना |
धनुष-वाण, तरकश सब आयुध,
बनने लगे, हर कुटी वन में ||
३६-
सुन्दर सुद्रिड और सुरक्षित,
कुटिया-गृह निर्माण शिल्प का;
ज्ञान कराते थे रामानुज |
विविध शिल्प व श्रम की महत्ता -
उपयोगिता, दिखाते रहते;
हो स्वतंत्र निज अर्थ-व्यवस्था३ ||
३७-
ईश्वर महिमा, भजन-साधना,
लोक-कला, साहित्य-भावना;
चित्रकला, संगीत ज्ञान, सब-
बाल, वृद्ध, स्त्री-पुरुषों को ,
सिय-रामानुज लगे सिखाने ;
यह अंचल अब जाग रहा था ||
३८-
वन संपदा का रक्षण-वितरण,
विविधि भाँति फल-फूल उगाना |
नव-पद्दतियां, कृषि कर्मों४ की ,
सिखलाई जातीं कुटियों में |
वन व ग्राम की कला-कथाएं ,
सीखते व सुनते सिय-लक्ष्मण ||
३९-
योग भक्ति अध्यात्म ज्ञान का,
विविधि भांति की नीति-कथाओं ;
के ,कहने सुनने समझाने,
का क्रम स्वयं राम करते थे |
प्रातः सायं , प्रार्थना सभा में,
ऋषि-मुनियों का प्रवचन होता ||
४०-
रक्षा में, सौमित्र -गुणाकर,
किये नियोजित थे रघुवर ने |
पंचवटी का आसमान था,
यज्ञ -धूम से हुआ सुवासित |
कर्मठता से रामानुज की,
वन-उपांत५ थे अभय होगये ||
सप्तम सर्ग -संदेश
==============
२८-
नारी, केंद्र-बिंदु है भ्राता !
व्यष्टि,समष्टि,राष्ट्र की,जग की |
इसीलिये तो वह अवध्य है ,
और सदा सम्माननीय भी |
लेकिन वह भी तो मानव है,
नियम-निषेध मानने होंगे ||
२९-
नारी के निषेध-नियमन ही,
पावनता के संचारण की;
उचित निरंतरता समाज में,
सदा बनाए रखते, लक्ष्मण !
अवमानना, रेख-उल्लंघन,
कारण बनते, दुराचरण का ||
३०-
राजा जनता या प्रबुद्ध जन,
जब अपने दायित्व भूलकर;
उचित दंड यदि नहीं देते |
अनाचार को प्रश्रय देकर,
पाप-कर्म में भागी बनते;
नियम से नहीं ऊपर कोई ||
३३-
विविध कारणों से यदि नारी,
मर्यादा उल्लंघन करती |
दुष्ट भाव, स्वच्छंद आचरण,
से समाज दूषित होजाता |
कई पीढ़ियों तक फिर लक्ष्मण,
यह दुष्चक्र चलता रहता है ||
३४-
जब उद्दंड, रूप-ज्वाला युत,
और दुर्दम्य काम-पिपासा-
युक्त ताड़का१ से कौशिक का ;
तेज, तपस्या-बल गलता था ,
अत्याचार, अनीति मिटाने;
उसका भी बध किया गया था ||
३५-
शूर्पणखा का दंड हे अनुज !
सिर्फ व्यक्ति को दंड नहीं है |
चारित्रिक धर्मोपदेश है,
नारी व सम्पूर्ण राष्ट्र को |
चेतावनि है दुष्ट जनों को ,
कुकर्म-रत नारी-पुरुषों को ||
४२-
परम प्रिया राजा दशरथ की,
राज्यकर्म और राजनीति पर;
उचित मंत्रणा देने वाली |
देव कार्य, इस महायज्ञ में,
वही आहुती दे सकती थी ;
अपने प्रेम,त्याग, महिमा की ||
४३-
विश्वामित्र-वशिष्ठ योजना४ ,
निशिचर-हीन मही करने की ;
कैकयि माँ ही केंद्र बिंदु है |
शिव की भाँति, गरल पी डाला,
सहमत कब थे राजा दशरथ ||
४४-
सेना से यह कार्य न होता५ ,
कोइ अन्य उपाय कहाँ था |
राक्षस-अपसंस्कृति विनाश का ,
ध्वजा धर्म की फहराने का |
जन जन हित में,विज्ञ जनों को,
सदा गरल यह पीना होगा || ----सप्तम सर्ग -संदेश
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बुधवार, 1 जनवरी 2014

भारतीय राजनीति के आकाश में नारियों का योगदान ....डा श्याम गुप्त

                                  ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...

             भारतीय राजनीति के आकाश में नारियों का योगदान

            यूं तो पुरा-काल, वैदिक काल से लेकर अब तक मानव समाज के अर्धांश भाग- नारी, का समाज के प्रत्येक क्षेत्र में अतुलनीय व असीम योगदान से कोई अनभिज्ञ नहीं है परन्तु इस आलेख का विषय-क्षेत्र मूल रूप से राजनीति की विसात पर नारियों के तपत्याग, बलिदान एवं सक्रिय कर्तत्व पर प्रकाश डालना है|

           पुरा युग जो मानव के विकास व प्रगति का आदिम युग था जिसमें देवों, उपदेव जातियों, दैत्यों व मानवों के विविधि सामाजिक रूप व आपसी सम्बन्ध थे | यहाँ पार्वती एवं सरस्वती ऐसे दो विशिष्ट नाम हैं | संसार की समस्त सभ्यता, नियम, नीति-निर्देश व व्यवहार के प्रदाता वेदों के प्रसार व नियामक एवं अथर्ववेद की रचना कराने वाले भगवान शिव की पत्नी व सलाहकार पार्वती, रणकौशल से युक्त, नीतिज्ञ व शास्त्र-कुशल थीं, जिन्होंने विविध रूपों में युद्धों के सक्रिय संचालन एवं नीति-कुशलता से देवों, दैत्यों व मानवों की प्रगति में सहयोग दिया व प्रत्येक स्तर पर आसुरी शक्तियों का विनाश किया | इसीलिये शिव के ब्रह्म रूप के साथ पार्वती को प्रकृति व आदि-शक्ति कहा गया |

            गन्धर्वों-विद्याधरों द्वारा वेदों के अपहरण पर 'सरस्वती' ने वेदों को पुनर्प्राप्ति हित देवताओं को नीति-कौशल सुझाया कि वे स्त्री लोभी गन्धर्वों-विद्याधरों से उनके बदले वेद प्राप्त करलें तत्पश्चात मैं पुनः देवों के पास लौट आऊँगी | इस प्रकार देवों को धार्मिक एवं राजनैतिक संकट से उबारा गया |

            विश्व की सर्वप्रथम अय्यार,जासूस, डिटेक्टिव, खोजी ...इंद्र की बहन सरमा  ने पणियों द्वारा बृहस्पति की गायों को चुराकर छुपाने के प्रकरण में अपनी कूटनीति व खोजी ज्ञान द्वारा गायों के छुपे होने के स्थान का पता लगाया, तत्पश्चात पणि-समूह का विनाश करके इंद्र द्वारा गायों को पुनः प्राप्त किया गया | 

           तत्कालीन भारत सम्राट महाराज शर्याति की पुत्री, अप्रतिम सौन्दर्य की मलिका सुकन्या ने अपनी भूल व असावधानी से उत्पन्न राजनैतिक संकट से अपने गृह-राज्य व पिता को उबारा | वृद्ध च्यवन ऋषि से विवाह करके एवं जीवन भर उनकी सेवा-श्रुशूषा द्वारा उन्हें पुनः यौवन प्राप्त भी कराया |

           त्रेता युग में कैकेयी, उर्मिला, सीता, मंथरा का राजनैतिक महत्त्व किसी से छुपा नहीं है | शस्त्र-शास्त्र कुशल, नीतिज्ञ कैकेयी ने देवासुर संग्राम में महाराज दशरथ को पराजय से बचाया | वशिष्ठ व राम के साथ कैकेयी की मंत्रणा ही थी जो शक्ति का ध्रुवीकरण करके रावण की पराजय व भारतीय दक्षिणी भूभाग को विजित करने हेतु राम-वनवास का प्रारूप बनी | इस पूरे प्रकरण में प्रत्येक स्तर पर सीता का तप, त्याग, बलिदान की अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका रहीपहले सीता-हरण ( कहीं कहीं रावण का वध भी आदि-शक्ति रूप में सीता द्वारा ही किया गया वर्णित है ) फिर अयोध्या परित्याग प्रकरण में लव-कुश के द्वारा अयोध्या के निकट स्थित सबसे बड़े शक्ति-केंद्र वाल्मीकि -आश्रम की समस्त शक्तियों को अयोध्या के हेतु प्राप्त करके अयोध्या को पूर्ण निरापद बनाने में राम की कूटनीति में सहायक होना | इस सब में उर्मिला का लक्ष्मण के साथ न जाकर उन्हें देश-समाज हेतु पूर्ण रूप से मुक्त रखने में किये गए तप-त्याग, रावण के भारतीय विजित प्रदेश दक्षिणी भूभाग एवं उत्तरीय भूभाग की सीमा पर स्थित रक्षिका व सेनापति रूप ताड़का का राजनैतिक वर्चस्व तथा रावण द्वारा पति-ह्त्या की आग में जलती रावण की बहन शूर्पणखा  का रावण को दंड दिलाने हेतु किये गए कृत्य के राजनैतिक महत्त्व को अनदेखा नहीं किया जा सकता |

          द्वापर में भीष्म की शक्ति व कुरुवंश की राजनैतिक शक्ति के बल पर गांधारी की बलि, जिसने महाभारत के युद्ध की पृष्ठभूमि तैयार की | अम्बा, अम्बालिका व अम्बिका के बलपूर्वक हरण पर अम्बा द्वारा भीष्म से बदली का संकल्प भी राजनीति की बसात पर नारी के बलिदान की कहानी हैद्रौपदी द्वारा दुर्योधन का उपहास एवं चीरहरण के पश्चात उसका संकल्प महाभारत युद्ध एवं पांडवों को श्रीकृष्ण के सहयोग का मूल कारण ही बना जिसने देश के साथ-साथ विश्व राजनीति एवं इतिहास की दिशा ही बदल दी|

          राधा  के महान त्याग जिसने असीम विरह वेदना सहकर भी प्रेम को बंधन न बनाकरकृष्ण को प्रेम-बंधन में न बांधकर अपितु अपने प्रेम को उनकी शक्ति बनाकर मथुरा जाने के लिए प्रेरित किया एवं कर्म से विरत न होने का सन्देश दिया | जिसका ब्रज, पूरे भारत एवं विश्व की राजनीति पर दूरगामी प्रभाव हुआ| जिसे युगों-युगों तक याद किया जाता रहेगा| जिसके कारण कृष्ण, श्रीकृष्ण व भगवान् श्रीकृष्ण हुए एवं गीता के कर्म-योग का ज्ञान विश्व को प्राप्त हुआइसी प्रेम व कर्म के कर्तत्व के कारण राधा, श्रीकृष्ण के साथ युगल रूप में पूज्या बनीं, जो विश्व सभ्यता व संस्कृति के इतिहास में एक अनुपम व अतुलनीय उदाहरण है|

       अर्वाचीन काल में शिवाजी की माता जीजाबाई का राजनैतिक प्रभाव व महत्त्व किससे छुपा है| अहल्याबाई होल्कर, महारानी लक्ष्मीबाई, रानी चेनम्मा के शस्त्रों की झनकार, जोधाबाई का वलिदान, पन्ना धाय का त्याग की राजनैतिक बिसात का कम महत्त्व नहीं है |

         आधुनिक युग में नेताजी सुभाष बोस की झांसी रानी रेजीमेंट की केप्टन लक्ष्मी सहगल, स्वतंत्रता संग्राम की राजनीति में श्रीमती सरोजिनी नायडू, विजय लक्ष्मी पंडित, सुचेता कृपलानी आदि का नाम कौन नहीं जानता |

        स्वतन्त्रता पश्चात काल में प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी की राजनैतिक शक्ति का पूरे विश्व में डंका बजा | आज न जाने कितनी महिलायें मुख्यमंत्री, मंत्री, सांसद, विधायक, राजनयिक, ग्राम-प्रधान आदि बनाकर देश की राजनीति में अपना वर्चस्व कायम किये हुए हैं, इसे सम्पूर्ण विश्व देख व जान  रहा है |

सोमवार, 25 नवंबर 2013

नीति, राजनीति व कूटनीति ....डा श्याम गुप्त ....

                                   ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...

                                              




                                               नीति, राजनीति व कूटनीति .....
        देश की जनता के लिए, व्यवहार के लिए अपनी आतंरिक व दैनिक समस्याओं, प्रगति के लिए ...नीति आवश्यक है या राजनीति अथवा कूटनीति |
           एक समाचार पत्र आलेख में एक सम्पादकीय देखिये जिसमें कुछ बिंदु इस प्रकार हैं....
१    1.      भ्रष्टाचार का सही हल शासन में सुधार करना और आम लोगों व सरकार के बीच दूरी कम करना .....तो आम आदमी पार्टी और क्या करना चाह रही है, अन्ना का और क्या अर्थ था...जब मौजूदा शासन स्वयं में सुधार करने को तैयार न हो तो क्या करना चाहिए......यही तो आज की परिस्थिति है |
२    2..      लोकतंत्र में लोकप्रिय आन्दोलनों का ईंधन विचारधारा है आदर्शवाद नहीं ..... क्या लेखक आदर्शवादी होना एक अनुचित तथ्य मानते हैं, क्या लोकतंत्र आदर्श को आदर्श नहीं मानता ? जो आदर्श नहीं उसे किसी भी तंत्र में होने की क्या आवश्यकता है?  विचारधारा ही तो आदर्शवादी होनी चाहिए....सारे भ्रष्टाचार अपने आप मिट जायेंगे |
३   3.      आपको बड़े लोकतांत्रिक और राजनैतिक तम्बू में आना होगा और परम्परागत राजनेताओं को विचारधारा के आधारपर पराजित करना होगा .......राजनीति समावेशी, समझौतापरक, समायोजन करने वाली निर्दयी व निर्मम होती है .....यही तो आम आदमी पार्टी कर रही है चुनाव में भाग लेकर .....  क्या निर्मम व निर्दयी नीति को राजनीति कहा जायगा वह कूटनीति, खलनीति होती है देश के शत्रु से अपनाने वाली बाह्य-नीति, स्वदेश वासियों के लिए नहीं.....
४   4.      अपनी राजनीति का खंडन न करें, मेले में शामिल होजाएं और गलत लोगों को बाहर करें ... अर्थात भ्रष्टाचार के दल में शामिल होना होगा, यह तो न जाने अब तक कितने पार्टियां कर चुकीं हैं.... फिर यही तो आम आदमी पार्टी कर रही है, राजनैतिक दल बनाकर ......अपनी और पराई राजनीति क्या होती है ...नीति..नीति होती है ..यदि गलत हैं तो खंडन अवश्य होना चाहिए चाहे अपना करे या पराया |  अन्यथा यह तो ढाक के वही तीन पातरहेंगे जो पिछले ६० वर्षों से होता आया है यथास्थिति ....
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५    5.      उन्हें तेजी से राजनीति सीखनी होगी ...... अर्थात वही खलनीति सीखने की सलाह देरहे हैं  पत्रकार महोदय ....अपने देशवासियों के हित के लिए राजनीति क्या व क्यों सीधी सीधी नीति आदर्शनीति क्यों नहीं ....
६   6. अन्ना का जोर था .... सिस्टम को बदलने की आवश्यकता है, गैर राजनैतिक पृष्ठभूमि वाले लोगों को लाइए फिर फैसला वाली प्रक्रिया जनता के हाथों सौंप दीजिये .... लोकतंत्र का ताना-बाना इससे उलटा है | बहुमत सरकार चुनता है सरकार हर मुद्दे पर फैसला लेती है यह सोचकर कि हर पांच वर्ष बाद उसके फैसलों का हिसाब होगा .....
----- यही तो नहीं होरहा ...नेता सिर्फ अपने लाभ के फैसले ले रहे हैं, कौन पांच वर्ष बाद याद रखता है, सामान्यजन की स्मृति बहुत अल्प होती है ...उसे अपने स्वयं के खाने-पीने की कठिनाइयों से फुर्सत मिले इसे व्यवस्था राजनीति को करनी चाहिए और यह आदर्शनीति से ही हो सकता है...कथित राजनीति से नहीं ....
7.आम आ पार्टी एक रोचक विचार....परन्तु जैसे ही राजनीति के सन्दर्भ में अपने खास दृष्टिकोण अपनाती प्रतीत होती है गलत दिशा में मुड जाती है..... 
   ----- विचार से ही तो दृष्टिकोण बनता है यदि विचार रोचक है तो दृष्टिकोण भी वही होगा.. नए विचार तो आने व परखने ही चाहिए खासकर जब पुराने विचार साथ नहीं दे रहे हों तो..... 
---राजनीति वर्षों की कड़ी मेहनत होती है, आप पुराने धुरंधर नेता से सीख सकते हैं और वह है राजनीति...  
  .... फिर तो वंशवाद वाली या राजतंत्र वाली प्रणाली  ही उपयुक्त है शासन के लिए....  चलने दीजिये पुराने घिसे-पिटे नेता जो कर रहे हैं करने दीजिये  इस सारी कहानी की क्या आवश्यकता है |
         तथाकथित स्वनामधन्य पत्रकार, सम्पादक महोदय वास्तव में राजनीति व कूटनीति का अंतर भूल गए हैं वे यह जो सब बता रहे हैं वह कूटनीति है एवं शत्रु-देशों से बाह्य संबंधों के लिए होनी चाहिए न कि स्वयं अपने देश की जनता के लिए .....वोट के लिए ...उसके लिए आदर्श नीति ही अपनाई जानी चाहिए न कि राजनीति व वोटनीति ......