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डा श्याम गुप्त का ब्लोग...

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Lucknow, UP, India
एक चिकित्सक, शल्य-चिकित्सक जो हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान व उसकी संस्कृति-सभ्यता के पुनुरुत्थान व समुत्थान को समर्पित है व हिन्दी एवम हिन्दी साहित्य की शुद्धता, सरलता, जन-सम्प्रेषणीयता के साथ कविता को जन-जन के निकट व जन को कविता के निकट लाने को ध्येयबद्ध है क्योंकि साहित्य ही व्यक्ति, समाज, देश राष्ट्र को तथा मानवता को सही राह दिखाने में समर्थ है, आज विश्व के समस्त द्वन्द्वों का मूल कारण मनुष्य का साहित्य से दूर होजाना ही है.... मेरी तेरह पुस्तकें प्रकाशित हैं... काव्य-दूत,काव्य-मुक्तामृत,;काव्य-निर्झरिणी, सृष्टि ( on creation of earth, life and god),प्रेम-महाकाव्य ,on various forms of love as whole. शूर्पणखा काव्य उपन्यास, इन्द्रधनुष उपन्यास एवं अगीत साहित्य दर्पण (-अगीत विधा का छंद-विधान ), ब्रज बांसुरी ( ब्रज भाषा काव्य संग्रह), कुछ शायरी की बात होजाए ( ग़ज़ल, नज़्म, कतए , रुबाई, शेर का संग्रह), अगीत त्रयी ( अगीत विधा के तीन महारथी ), तुम तुम और तुम ( श्रृगार व प्रेम गीत संग्रह ), ईशोपनिषद का काव्यभावानुवाद .. my blogs-- 1.the world of my thoughts श्याम स्मृति... 2.drsbg.wordpres.com, 3.साहित्य श्याम 4.विजानाति-विजानाति-विज्ञान ५ हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान ६ अगीतायन ७ छिद्रान्वेषी ---फेसबुक -डाश्याम गुप्त
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रविवार, 9 फ़रवरी 2020

हिन्दू इतिहास ----एक लाख वर्षों का हिन्दू धर्म का संक्षिप्त इतिहास ---भाग चार----वानर साम्राज्य , माया सभ्यता, दक्षिणी अमेरिका-चिली , पेरू, वियतनाम, इस्लामी देश ----डा श्याम गुप्त

....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...

हिन्दू इतिहास  ----एक लाख वर्षों का हिन्दू धर्म का संक्षिप्त इतिहास -----




भाग चार----वानर साम्राज्य , माया सभ्यता, दक्षिणी अमेरिका-चिली , पेरू, वियतनाम, इस्लामी देश --
=============================================
 १.बानर सामराज्य--होंडूरास --द.अमेरिका

२. नाजका रेखाए---पेरू ---शिव का त्रिशूल- Nazca Lines in. 
 ३.वियतनाम में शिवलिंग 

४.अफगान शासक की विष्णु पूजा  
                
  
५.अफगा निस्तान से शिव मूर्ति


६.ये हंसवाहिनी सरस्वती माँ की मूर्त्ति है जो अभी लंदन संग्रहालय में है.यह सऊदी अर्बस्थान से ही प्राप्त हुआ था

७.अष्टधातु से बना दिया ये दीप अरब से प्राप्त हुआ है जो इस्लाम-पूर्व है.इसी तरह का दीप काबा के अंदर भी अखण्ड दीप्तमान रहता है .


८.मक्का स्थित शिवलिंग ---

 ९. शिव लिंग का भाग –काला पत्थर जिसे चूमा जाता था              


---- १०.विक्रमादित्य के काल बने में काले ग्रेनाईट के अंतरिक्ष गिरे टुकडे का शिव लिंग ७००० बी सी जो    काबा  के शिव मंदिर का का मूल शिव लिंग था |


                                        ११.-----६००० वर्ष प्राचीन राम व हनुमान का चित्र ----ईराक 

८.वानर साम्राज्य का रहस्य : वानर का शाब्दिक अर्थ होता है 'वन में रहने वाला नर।' वन में ऐसे भी नर रहते थे जिनको पूछ निकली हुई थी।
------शोधकर्ता कहते हैं कि आज से 9 लाख वर्ष पूर्व एक ऐसी विलक्षण वानर जाति भारतवर्ष में विद्यमान थी, जो आज से 15 से 12 हजार वर्ष पूर्व लुप्त होने लगी थी और अंतत: लुप्त हो गई। इस जाति का नाम कपि था। हनुमान का जन्म कपि नामक वानर जाति में हुआ था....कापी –विशालकाय वानरों की प्रजाति ..
-----यह मानवों की एक ऐसी जाति थी, जो मुख और पूंछ से वानर समान नजर आती थी, लेकिन उस जाति की बुद्धिमत्ता और शक्ति मानवों से कहीं ज्यादा थी। अब वह जाति भारत में तो दुर्भाग्यवश विनष्ट हो गई, परंतु बाली द्वीप में अब भी पुच्छधारी जंगली मनुष्यों का अस्तित्व विद्यमान है जिनकी पूछ प्राय: 6 इंच के लगभग अवशिष्ट रह गई है।
--भारत के बाहर वानर साम्राज्य --- सेंट्रल अमेरिका के मोस्कुइटीए (Mosquitia) में शोधकर्ता चार्ल्स लिन्द्बेर्ग ने एक ऐसी जगह की खोज की है जिसका नाम उन्होंने ला स्यूदाद ब्लैंका (La Ciudad Blanca) दिया है जिसका स्पेनिश में मतलब व्हाइट सिटी (The White City) होता है, जहां के स्थानीय लोग बंदरों की मूर्तियों की पूजा करते हैं। कि यह वही खो चुकी जगह है जहां कभी हनुमान का साम्राज्य हुआ करता था।
------एक अमेरिकन एडवेंचरर ने लिम्बर्ग की खोज के आधार पर गुम हो चुके Lost City Of Monkey God’ की तलाश की
 
                          चित्र१.     बानर सामराज्य--होंडूरास --द.अमेरिका ..
----अमेरिका की प्राचीन माया सभ्यता ---ग्वाटेमाला, मैक्सिको, पेरू, होंडुरास तथा यूकाटन प्रायद्वीप में स्थापित थी। यह एक कृषि पर आधारित सभ्यता थी। 250 ईस्वी से 900 ईस्वी के बीच माया सभ्यता अपने चरम पर थी। इस सभ्यता में खगोल शास्त्र, गणित और कालचक्र को काफी महत्व दिया जाता था। मैक्सिको इस सभ्यता का गढ़ था। आज भी यहां इस सभ्यता के अनुयायी रहते हैं। यह मय दानव द्वारा बसाई हुई सभ्यता ही थी

-------अमेरिकन इतिहासकार मानते हैं‍ कि भारतीय आर्यों ने ही अमेरिका महाद्वीप पर सबसे पहले बस्तियां बनाई थीं। अमेरिका के रेड इंडियन वहां के आदि निवासी माने जाते हैं और हिन्दू संस्कृति वहां पर आज से हजारों साल पहले पहुंच गई थी। माना जाता है कि यह बसाहट महाभारतकाल में हुई थी।
९.चिली, पेरू और बोलीविया में हिन्दू धर्म : अमेरिकन महाद्वीप के बोलीविया (वर्तमान में पेरू और चिली) में हिन्दुओं ने प्राचीनकाल में अपनी बस्तियां बनाईं और कृषि का भी विकास किया। यहां के प्राचीन मंदिरों के द्वार पर विरोचन, सूर्य द्वार, चन्द्र द्वार, नाग आदि सब कुछ हिन्दू धर्म समान हैं।
दक्षिण अमेरिका ---Peru
   चित्र२.नाजका रेखाए---पेरू ---शिव का त्रिशूल Nazca Lines in. http://www.unmuseum.org/nazca.htm
----सुग्रीव, रामायण में अपनी सेना को सीताजी की खोज के लिए उस क्षेत्र की खोज के लिए कहता है जहां शिव का त्रिशूल पाया गया  है |

१०.वियतनाम : पुराना चम्पा था। चम्पा के लोग और चाम कहलाते थे और उनके राजा शैव थे। दूसरी शताब्दी में स्थापित चंपा भारतीय संस्कृति का प्रमुख केंद्र था। यहां के चम लोगों ने भारतीय धर्म, भाषा, सभ्यता ग्रहण की थी। 1825 में चंपा के महान हिन्दू राज्य का अंत हुआ।
------वर्तमान समय में चाम लोग वियतनाम और कम्बोडिया के सबसे बड़े अल्पसंख्यक हैं। आरम्भ में चम्पा के लोग और राजा शैव थे लेकिन कुछ सौ साल पहले इस्लाम यहां फैलना शुरु हुआ। अब अधिक चाम लोग
मुसलमान हैं पर हिन्दू और बौद्ध चाम भी हैं।
==चित्र  ३.यतनाम में शिवलिंग

 ११.इस्लाम - हिन्दू धर्म का विरूपण ---आज जिसे काबाकहते है, वह वस्तुतः काव्य शुक्र’ (शुक्राचार्य) के सम्मान में निर्मित उनके आराध्य भगवान शिव का ही मन्दिर है। अरबी भाषा में शुक्रका अर्थ बड़ाअर्थात जुम्मा इसी कारण किया गया और इसी सेजुम्मा’ (शुक्रवार) को मुसलमान पवित्र दिन मानते है।
---अरब   शिव व पार्वती स्थान का इलावर्त राज्य का –स्त्री राज्य था जो वृहस्पति पत्नी तारा व चन्द्र के पुत्र बुध पुत्र महाराज इल का राज्य था , इल से  इल इलाह --- अल्लाह ... |
                
चित्र-४  शासक की विष्णु पूजा                 चित्र ५. अफगानिस्तान से शिव मूर्ति

चित्र-६.------ये हंसवाहिनी सरस्वती माँ की मूर्त्ति है जो अभी लंदन संग्रहालय में है.यह सऊदी अर्बस्थान से ही प्राप्त हुआ था..  चित्र-७.अष्टधातु से बना दिया ये दीप अरब से प्राप्त हुआ है जो इस्लाम-पूर्व है.इसी तरह का दीप काबा के अंदर भी अखण्ड दीप्तमान रहता है .

 चित्र८.मक्का स्थित शिवलिंग ---              चित्र ९. शिव लिंग का भाग –काला पत्थर जिसे चूमा जाता था

चित्र-१०.---- विक्रमादित्य के काल बने में काले ग्रेनाईट के अंतरिक्ष गिरे टुकडे का शिव लिंग ७००० बी सी जो    काबा  के शिव मंदिर का का मूल शिव लिंग था |
                                                                  

 चित्र ११.-----६००० वर्ष प्राचीन राम व हनुमान का चित्र ----ईराक




-----क्रमश भाग पांच----- योरोप ...

 

रविवार, 14 अप्रैल 2019

मर्यादा पुरुषोत्तम राम --- राम नवमी पर विशेष ---डा श्याम गुप्त

                     ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...

मर्यादा पुरुषोत्तम राम --- राम नवमी पर विशेष ---
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प्रायः यह कहा जाता है कि ‘’राम एक अच्छे राजा थे किन्तु बुरे पति” परन्तु उन्हें गहराई से परखा जाय तो ज्ञात होगा कि कि सीता के त्याग के बाद राम कितने दुखी हुए थे और किस तरह आंसू बहा रहे थे। राम में वही मानवीय गुणावगुण मिलते हैं जो उस काल खंड में किसी भी राजपुरुष में हो सकते हैं |
\
जो लोग सीता के परित्याग के लिए राम की आलोचना करते हैं, वे राम का ऐसा स्वरूप पेश करते हैं कि वे एक पत्थर-दिल और सत्ता-लोलुप इंसान थे | उनको अपना सिंहासन इतना प्रिय था कि उसको खोने के भय से सीता को ही वनवास दे दिया जबकि वह जानते थे कि सीता निष्कलंक हैं। वे भूल जाते हैं कि राम को यदि सिंहासन इतना ही प्रिय होता तो वह उसे ठुकराकर 14 वर्ष के लिए वनवास क्यों जाते | 
\
जब लक्ष्मण सीता को वाल्मीकि आश्रम में छोड़कर आए तो वे नीचे मुख किए दुखी मन से सीधे अन्दर चले गए। उन्होंने देखा, श्रीरघुनाथजी दुखी होकर एक सिंहासन पर बैठे हैं और उनके दोनों नेत्र आंसुओं से भरे हैं।
राज्ञस्तु भवनद्वारि सोऽवतीर्य नरोत्तमः ।
अवाङ्‌मुखो दीनमनाः प्रविवेशानिवारितः ॥ ५ ॥
स दृष्ट्‍वा राघवं दीनं आसीनं परमासने ।
नेत्राभ्यामश्रुपूर्णाभ्यां ददर्शाग्रजमग्रतः ॥ ६
(वाल्मीकि रामायण, उत्तरकांड, सर्ग – 52/5-6)
----- इस अवस्था में बड़े भाई को सामने देख दुखी मन से लक्ष्मण ने उनके दोनों पैर पकड़ लिए और हाथ जोड़कर चित्त को एकाग्र करके वे दीन वाणी में बोले – ‘वीर महाराज की आज्ञा शिरोधार्य करके मैं उन शुभ आचारवाली, यशस्विनी जनककिशोरी सीता को गंगातट पर वाल्मीकि के शुभ आश्रम के समीप निर्दिष्ट स्थान में छोड़कर पुनः आपके श्रीचरणों की सेवा के लिए यहां लौट आया हूं। पुरुषसिंह ! आप शोक न करें। काल की ऐसी ही गति है। आप जैसे बुद्धिमान और मनस्वी मनुष्य शोक नहीं करते हैं।
जग्राह चरणौ तस्य लक्ष्मणो दीनचेतनः ।
उवाच दीनया वाचा प्राञ्जलिः सुसमाहितः ॥ ७ ॥
आर्यस्याज्ञां पुरस्कृत्य विसृज्य जनकात्मजाम् ।
गङ्‌गातीरे यथोद्दिष्टे वाल्मीकेराश्रमे शुभे ॥ ८
तत्र तां च शुभाचारां आश्रमान्ते यशस्विनीम् ।
पुनरप्यागतो वीर पादमूलमुपासितुम् ॥ ९ ॥
मा शुचः पुरुषव्याघ्र कालस्य गतिरीदृशी ।
त्वद्विधा न हि शोचन्ति बुद्धिमन्तो मनस्विनः ॥ १
० ॥ (वाल्मीकि रामायण, उत्तरकांड, सर्ग – 52/7-10)
------- ‘संसार में जितने संचय हैं, उन सबका अंत विनाश है, उत्थान का अंत पतन है, संयोग का अंत वियोग है और जीवन का अंत मरण है। अतः स्त्री, पुत्र, मित्र और धन में विशेष आसक्ति नहीं करनी चाहिए क्योंकि उनसे वियोग होना निश्चित है। कुकुत्स्थ कुलभूषण! आप आत्मा से आत्मा को, मन से मन को तथा संपूर्ण लोकों को भी संयत करने में समर्थ हैं, फिर अपने शोक को काबू में रखना आपके लिए कौन बड़ी बात है?
सर्वे क्षयान्ता निचयाः पतनान्ताः समुच्छ्रयाः ।
संयोगा विप्रयोगान्ता मरणान्तं च जीवितम् ॥ ११ ॥
तस्मात् पुत्रेषु दारेषु मित्रेषु च धनेषु च ।
नातिप्रसङ्‌गः कर्तव्यो विप्रयोगो हि तैर्ध्रुवम् ॥ १२ ॥
शक्तस्त्वं आत्मनाऽऽत्मानं विनेतुं मनसा मनः ।
लोकान् सर्वांश्च काकुत्स्थ किं पुनः शोकमात्मनः ॥ १३
॥ (वाल्मीकि रामायण, उत्तरकांड, सर्ग – 52/11-13)
---- ‘आप जैसे श्रेष्ठ पुरुष इस तरह के प्रसंग आने पर मोहित नहीं होते। रघुनंदन! यदि आप दुखी रहेंगे तो वह अपवाद आपके ऊपर फिर आ जाएगा। नरेश्वर! जिस अपवाद के भय से आपने मिथिलेशकुमारी का त्याग किया है, निस्संदेह वह अपवाद इस नगर में फिर होने लगेगा (लोग कहेंगे कि दूसरे के घर में रही हुई स्त्री का त्याग करके ये रातदिन उसी की चिंता से दुखी रहते हैं) अतः पुरषसिंह! आप धैर्य से चित्त को एकाग्र करके इस दुर्बल शोकबुद्धि का त्याग करें — संतप्त न हों।’
नेदृशेषु विमुह्यन्ति त्वद्विधाः पुरुषर्षभाः ।
अपवादः स किल ते पुनरेष्यति राघव ॥ १४ ॥
यदर्थं मैथिली त्यक्ता अपवादभयान्नृप ।
सोऽपवादः पुरे राजन् भविष्यति न संशयः ॥ १५ ॥
स त्वं पुरुषशार्दूल धैर्येण सुसमाहितः ।
त्यजैनां दुर्बलां बुद्धिं सन्तापं मा कुरुष्व ह ॥ १६
॥ (वाल्मीकि रामायण, उत्तरकांड, सर्ग – 52/14-16)
\
महात्मा लक्ष्मण के इस प्रकार कहने पर मित्रवत्सल श्रीरघुनाथजी ने बड़ी प्रसन्नता के साथ उन सुमित्राकुमार से कहा — नरश्रेष्ठ वीर लक्ष्मण! तुम जैसे कहते हो, ठीक ऐसी ही बात है। तुमने मेरे आदेश का पालन कया, इससे मुझे बड़ा संतोष है। सौम्य लक्ष्मण! अब मैं दुख से निवृत्त हो गया। संताप को मैंने हृदय से निकाल दिया और तुम्हारे सुंदर वचनों से मुझे बड़ी शांति मिली है।’
एवमेतन्नरश्रेष्ठ यथा वदसि लक्ष्मण ।
परितोषश्च मे वीर मम कार्यानुशासने ॥ १८ ॥
निवृत्तिश्चागता सौम्य सन्तापश्च निराकृतः ।
भवद्‌वाक्यैः सुरुचिरैः अनुनीतोऽस्मि लक्ष्मण ॥ १९
॥ (वाल्मीकि रामायण, उत्तरकांड, सर्ग – 52/19)
----- यद्यपि सीता को वन में छोड़ते समय ख़ुद लक्ष्मण की क्या स्थिति थी। दोपहर के समय भागीरथी की जलधारा तक पहुंचकर लक्ष्मण उसकी ओर देखते हुए दुखी होकर उच्चस्वर से फूटफूटकर रोने लगे।
अथार्धदिवसे गत्वा भागीरथ्या जलाशयम् ।
निरीक्ष्य लक्ष्मणो दीनः प्ररुरोद महास्वनः ॥ २४
॥ (वाल्मीकि रामायण, उत्तरकांड, सर्ग 46/24)

राजधर्म के बारे में राम का विचार----
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सीता के संताप से मुक्त होकर राम ने लक्ष्मण से तुरंत ही राज्य कार्य करने को कहा।..
------‘सौम्य! सुमित्राकुमार! मुझे पुरवासियों का काम किए बिना चार दिन बीत चुके हैं, यह बात मेरे मर्मस्थल को विदीर्ण कर रही है। पुरुषप्रवर! तुम प्रजा, पुरोहितों और मंत्रियों को बुलाओ। जिन पुरुषों अथवा स्त्रियों को कोई काम हो, उनको उपस्थित करो।
----जो राजा प्रतिदिन पुरवासियों के कार्य नहीं करता, वह निस्संदेह सब ओर से निश्छिद्र अतएव वायुसंचार से रहित घोर नरक में पड़ता है। ‘जिस प्रकार राजा नृग ने प्रजा के विवाद को उचित प्रकार से न सुलझाने पर अत्यंत दारुण शाप फल भोगा |
चत्वारो दिवसाः सौम्य कार्यं पौरजनस्य च ।
अकुर्वाणस्य सौमित्रे तन्मे मर्माणि कृन्तति ॥५३/ ४ ॥
आहूयन्तां प्रकृतयः पुरोधा मन्त्रिणस्तथा ।
कार्यार्थिनश्च पुरुषाः स्त्रियश्च पुरुषर्षभ ॥ ५ ॥
पौरकार्याणि यो राजा न करोति दिने दिने ।
संवृते नरके घोरे पतितो नात्र संशयः ॥ ६ ॥
----- अतः कार्यार्थी पुरुषों का विवाद यदि निर्णीत न हो तो वह राजाओं के लिए महान दोष की प्राप्ति करानेवाला होता है। अतः कार्यार्थी मनुष्य शीघ्र मेरे सामने उपस्थित हों। … तुम जाओ, राजद्वार पर प्रतीक्षा करो कि कौन कार्यार्थी पुरुष आ रहा है।
एवं स राजा तं शापं उपभुङ्‌क्ते सुदारुणम् ॥ २४ ॥
कार्यार्थिनां विमर्दो हि राज्ञां दोषाय कल्पते |
तच्छीघ्रं दर्शनं मह्यं अभिवर्तन्तु कार्यिणः ॥ २५ ॥
सुकृतस्य हि कार्यस्य फलं नावैति पार्थिवः ।
तस्माद् गच्छ प्रतीक्षस्व सौमित्रे कार्यवाञ्जनः ॥ २६
॥ (वाल्मीकि रामायण, उत्तरकांड, सर्ग 53/24-26)
\\
अब हमारे मन में राम की कैसी छवि होनी चाहिए,
-----वह एक ऐसे आदर्श शासक के रूप में प्रतीत होते हैं जो निजी और सार्वजनिक जीवन के कर्तव्यों के आंतरिक संघर्ष में फंसे हुए हैं।
----- जो राजा इस बात से चिंतित हो कि चार दिनों से जनता के काम नहीं हो रहे, उस राजा के लिए यह पद सत्ता का सुख भोगने का साधन नहीं है बल्कि कर्तव्य निभाने का माध्यम है। 
-----इस कर्तव्य को निभाने के दौरान यदि उनको किसी का भी त्याग करना पड़े तो वह उसके लिए तैयार हैं। वह एक ऐसे शासक प्रतीत होते हैं जो अपनी प्रजा के लिए काम करते हैं और उसकी सुख-समृद्धि की चिंता करते हैं।
\
वाल्मीकि रामायण के अनुसार जब राम ने सभी भाइयों को बुलाकर सीता का त्याग करने का अपना फ़ैसला सुनाया था, तब कहा था –‘नरश्रेष्ठ बंधुओ! मैं लोकनिंदा के भय से अपने प्राणों को और तुम सबको भी त्याग सकता हूं। फिर सीता का त्यागना कौन बड़ी बात है? अतः तुमलोग मेरी ओर देखो। मैं शोक के समुद्र में गिर गया हूं। इससे बढ़कर कभी कोई दुख मुझे उठाना पड़ा हो, इसकी मुझे याद नहीं है।’

----(वाल्मीकि रामायण, सर्ग – 46/15-16) वह स्पष्ट करते हैं कि उनके इस निर्णय में परिवर्तन के लिए कोई ज़ोर न डाले और आदेश देते हैं कि सीता को वन में भेजने की व्यवस्था की जाए।

----इस प्रकार कहते-कहते श्रीरघुनाथजी के दोनों नेत्र आंसुओं से भर गए। फिर वे धर्मात्मा श्रीराम अपने भाइयों के साथ महल में चले गए। उस समय उनका हृदय शोक से व्याकुल था और वे हाथी के समान लंबी सांस खींच रहे थे।
अथार्धदिवसे गत्वा भागीरथ्या जलाशयम् ।
निरीक्ष्य लक्ष्मणो दीनः प्ररुरोद महास्वनः ॥ २४ ॥
सीता तु परमायत्ता दृष्ट्‍वा लक्ष्मणमातुरम् ।
उवाच वाक्यं धर्मज्ञा किमिदं रुद्यते त्वया ॥ २५
॥ (वाल्मीकि रामायण, सर्ग – 46/24-25)
\
सिद्धार्थ गौतम ने भी जब अचानक एक रात पत्नी यशोधरा और बेटे राहुल को सोता छोड़ महाभिनिष्क्रमण किया था और जीवन के सच्चे अर्थ की तलाश में निकल पड़े तो उनका वह कदम परिवार के लिए कठोर कहा जा सकता है। लेकिन सभी को ज्ञात है कि बुद्ध के रूप में उन्होंने विश्व को क्या दिया। 
-----------------समष्टिहित के लिए व्यष्टिहित का बलिदान करना ही पड़ता है और संसार में जितनी भी महान विभूतियां हुई हैं, उन्होंने ऐसा किया है।



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रविवार, 25 मार्च 2018

रामनवमी पर विशेष --- -----राम की राजनीति--- डा श्याम गुप्त...

                         ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ... 

रामनवमी पर विशेष ---
-------------------------
राम की राजनीति---

===============
---- आज राम राजनीति के केंद्र तो हैं परन्तु राम की राजनीति राजनैतिक केंद्र से दूर है | राम का चरित्र, उनकी कार्यशैली व कृतित्व, चाहे वे राजमहल में हों या वनवास में, ही उनकी राजनीति है |
------दृढ़ निश्चय, गुरुजनों से मंत्रणा, समाज के जन जन ..बड़े से लेकर छोटे से छोटे तक का दुःख हरण, उचित क्रियाशैली व नीति निर्धारण , सभी का उचित सहयोग ,कठोर परिश्रम जन जन का उत्थान व शिक्षा ही रामराज्य की नींव है---
--------मेरे काव्य उपन्यास, शूर्पणखा खंडकाव्य से राम की राजनीति के कुछ दृश्य प्रस्तुत हैं ----
सर्ग-४.मंत्रणा
===========
९-
ऋषि-मुनि गण एवं वनचारी,
सबको प्रभु ने आश्वस्त किया|
अत्याचार न होगा कोई,
जो अब तक होता आया है |
कोई मख विध्वंस न होगा,
कुटिया का भी ध्वंस न होगा३ ||
१०-
धनुष वाण है हाथ राम के,
परम वीर सौमित्र यहाँ हैं |
आ न सकेंगे इधर ,निशाचर,
करें सभी निर्भय होकर के;
यज्ञादिक शुभ कर्म सभी फिर,
उठे सुवासित धूम गगन में४ ||
११-
ऋषि-प्रणीत जीवन धारा की५ ,
सुरसरि फिर से बहे, धरा पर |
निशाचरी माया नगरी की,
हवा नहीं इस ओर बढ़ेगी |
मर्यादा की मलयज शीतल ,
बहे समीर पुनः हर ओर ||
सर्ग ५...पंचवटी
===============
३-
मुनि अगस्त्य से बोले रघुवर,
तात ! आपका ज्ञान व अनुभव;
एवं कठिन कर्म और ब्रत का,
सारे जग में यश फैला है |
यह भूभाग आपके कारण,
ज्ञान-वान, समृद्ध हुआ है ||
४-
उचित मन्त्र दें, वही करूँ में ,
जिससे प्रिय हो आप सभी का |
हो उद्देश्य पूर्ण, मेरा भी,
नाश करूँ सब दैत्य वंश का |
लक्ष्मण समझ रहे थे अब कुछ,
नमन किया प्रभु की लीला को ||
५-
ऋषिवर, इस दक्षिण अंचल के,
कण कण का है ज्ञान आपको;
रहना उचित कहाँ पर होगा ?
पाप घड़ा भर चुका दैत्य का,
अब विलम्ब का काम नहीं है;
यह संधान कहाँ से होगा ||
६-
१२-
पंचवटी अति सुन्दर पावन,
धाम है, 'दंडक-वन'३ में रघुवर |
रहें वहां पर पर्णकुटी४ कर,
मिट जाएँ कलुष-दोष वन के |
दंडक वन होजाए पावन ,
ऋषि-मुनि विचरें निर्भय होकर ||
१३-
अधिग्रहण किया जो दैत्यों ने,
वह जनस्थान५ भी निकट रहे |
आते-जाते निशिचर, दुष्टों,
की बातों का भी पता चले |
उस रावण के अधिकृत प्रदेश-
से, दुष्ट-दैत्य, आते रहते ||
१४-
सूचना व अवसर पाने का,
है उचित क्षेत्र यह दंडक वन |
थर्राया है जो, असुरों के -
अति अत्याचारी कृत्यों से |
रह पंचवटी६ में राम, करो-
तुम दुष्टों का अब शीघ्र दलन ||
१५-
दिव्यास्त्र अनेक दिए ऋषि ने,
फिर बोले-तुम तो राम स्वयं ,
हो संचालन संधान कुशल |
जाने कितने ही दिव्य अस्त्र,
प्रभु तरकश में शोभायमान ;
है शस्त्रों की शोभा तुमसे ||
१६-
अस्त्रों से सिर्फ नहीं कोइ,
मानव शोभा पाजाता है |
शस्त्रों को रख निज साथ नहीं,
वह परमवीर बन जाता है |
मिल जाएँ यदि अपात्र को तो,
इन की महिमा घट जाती है ||
१७-
दृढ -इच्छा, साहस, कर्मठता,
नैतिक बल, अस्त्र है बीरों का|
तुम ग्रहण करो हे राम! बढे,
इन शस्त्रों की शोभा तुमसे |
सह न सकेगा रिपु कोई,
वर्षा अब राम के तीरों की || ----
१९-
दंडक वन में पहुंचे रघुवर,
मिले जटायू गृद्धराज वर |
मित्र, पिता दशरथ के थे,प्रिय,
सादर वंदन किया सभी ने |
कुशलक्षेम कौशलपति की वे,
लगे पूछने,भाव-विह्वल हो ||
२१-
फिर विस्तार सहित घटनाक्रम,
कारण अपने विपिन-वास का;
रघुवर ने उनको बतलाया |
किया निवेदन, तात ! आप भी,
बनें सहायक धर्म कार्य हित;
उचित मंत्रणा दें हम सबको ||
२२-
आशीर्वाद सदा है मेरा,
राम,बनो तुम खलु-दल भंजक|
मेरा मेरे दल-बल१ का भी,
सदा पूर्ण सहयोग रहेगा |
पूरा हो उद्देश्य राम का,
पापमुक्त हो अब यह अंचल ||
२३-
वनचर, बनवासी अरण्य के ,
हैं अति त्रस्त अनाचारों से |
ज्ञान-धर्म,जन-नीति सभी कुछ,
कलुषित हैं; दूषित भावों के -
अति प्रचार एवं प्रसार से २ ,
है प्रमाद ने किया बसेरा ||
२४-
अकर्मण्यता, प्रमाद व लिप्सा,
भोग-भाव औ असत कर्म से ;
ध्वस्त हो गईं रीति-नीति सब,
ध्वस्त हुई है अर्थव्यवस्था |
दीन-हीन हो पिछड़े सबसे,
भोग रहे निज कर्मों का फल ||
२५-
यदि हो साथ राम का पौरुष,
भक्ति-शक्ति सौमित्र के जैसी;
सीता सी प्रभु प्रीति-रीति हो,
सोने में होजाय सुहागा |
बिना भक्ति और ईश कृपा के,
किसको भला विवेक हुआ है ||
२६-
युग-शिक्षा नव ज्ञान-रश्मि से,
नव-प्रकाश फैलाना होगा |
कला शिल्प साहित्य आदि का,
जन मन भाव जगाना होगा |
स्वतंत्रता स्व -भाव आदि भी,
जगें, सभी के अंतर्मन में ||
२७-
हर, प्रमाद अज्ञान अयोग्यता ,
सब विधि योग्य बनाएं सबको |
नहीं योग्यता की कोई भी,
कमी किसी में भी रह जाए |
ज्ञान कुशलता और योग्यता,
से न करें कोई समझौता ३ ||
२८-
स्त्री-शिक्षा पर सब विधि से,
कुछ ध्यान अधिक देना होगा |
शिक्षित नारी ही है राघव!
उन्नायक अगली पीढी की |
सक्षम है वही रोकने में,
जाने से असत मार्ग नर को ||
२९-
विदुषी, शिक्षित और साक्षर,
नारी ही आधार है सदा ;
हर समाज की, नर जीवन की |
वही समय पड़ने पर , नर से-
कदम मिलाकर चल सकती है४ |
जीवन करती सुन्दर -समतल ||
३०-
चाहे जितनी भीड़ साथ हो,
यदि अयोग्य हो, काम न आये |
पूर्ण योग्यता ज्ञान के बिना ,
कोई कार्य पूर्ण कब होता |
तप संयम कठोर अनुशासन,
से ही पूर्ण योग्यता मिलती ||
३१-
पिछड़े दीन-हीन या ज्ञानी,
सबको साथ लिए चलना है |
अस्त्र-शस्त्र निर्माण कर्म और -
लड़ने योग्य बनाएं सबको |
आतातायी के विरोध का,
स्वर, जन जन में उठे ज्वार बन ||
३२-
नए नए अस्त्रों शस्त्रों का,
संचालन भी सिखलाना है |
जन-जन, मन से महायज्ञ में,
दे सहयोग, बताना है यह |
हर घर में हे राम! ज्ञान का,
एक-एक दीपक जल जाए ||
३३-
अक्रियता अज्ञान और भय,
हट जाए जन जन में मन से |
अपनी स्वयं की अर्थव्यवस्था,
से यह वन समृद्ध बन सके |
कर्म-चेतना से यह अंचल,
सक्रिय सबल, संबल बन जाए ||
३४-
जन जन का बल, युद्ध काल में,
सबसे बड़ा शस्त्र५ होता है |
राघव ! सब से बड़ी सुरक्षा-
शक्ति, योग्य जन-बल होता है |
उचित समय पर दंडक वन क्या-
जन स्थान भी साथ खडा हो ||-----सर्ग ५...पंचवटी
१८-
देश की रक्षा, संस्कृति रक्षण ,
तथा प्रजा के व्यापक हित में ;
अधर्मियों से विधर्मियों से,
अन्यायी लोलुप जन जो हों ;
कभी नहीं समझौता करता ,
वही नृपति अच्छा शासक है ||
१९-
पर जो शासक निज सुख के हित,
अत्याचार प्रजा पर करता |
अधर्म-मय, अन्याय कर्म से ;
अपराधों को प्रश्रय देता |
अप विचार, अपकर्म भाव में,
जन जन पाप-लिप्त हो जाता ||
२०-
हिंसा चोरी अनृत भावना,
नर-नारी को भाने लगती|
अश्लील कृत्यों से नारी,
अपने को कृत-कृत्य समझती |
लूट अपहरण बलात्कार के,
विविध रूप अपनाए जाते ||
२१-
अति भौतिक सुख लिप्त हुए नर,
मद्यपान आदिक विषयों रत;
कपट झूठ छल और दुष्टता,
के भावों को प्रश्रय देते |
भ्रष्टाचार, आतंकवाद में,
राष्ट्र, समाज लिप्त हो जाता ||
२२-
पाप, अधर्म-नीति कृत्यों से,
प्रकृति माता विचलित होती |
अनावृष्टि अतिवृष्टि आदि से,
धरती की उर्वरता घटती |
कमी धान्य-धन की होने से,
बनती है अकाल की स्थिति ||
२४-
लक्ष्मण,तुम अब जान चुके हो,
मूल उद्देश्य, वनागमन का |
नाश राक्षसों का करना है ,
स्थिर करना है फिर हमको;
शास्त्र धर्म शुचि मर्यादाएं ,
ऋषि प्रणीत जीवन शैली की ||
२५-
इस अंचल के पिछड़े पन को,
हमको दूर हटाना होगा |
शिक्षा देकर के जन जन का,
जीवन सुलभ बनाना होगा |
विविध शिल्प औ शस्त्र कला का,
उन्हें कराना होगा ज्ञान ||
२६-
दुखी असंगठित एवं पिछड़ी,
प्रजा रहे, वह राजा ही क्या |
एसे किसी राज्य का लक्ष्मण,
राजा बन कर भी क्या करना |
शिक्षित सुखी संतुष्ट प्रजा ही,
उन्नत सिर हैं राजाओं के ||
२७-
शिक्षित सज्जन सुकृत संगठित,
बनें क्रान्ति में स्वयं सहायक ;
लक्ष्मण सदा सफल होती वह |
पर असंयमित हो जाती है,
भीड़ अशिक्षित हो, असंगठित;
भय विघटन,प्रति-क्रान्ति का रहता ||
२८-
आताताई के विरोध में,
जन संकुल को लाना होगा |
जन जन ज्वार समर्थन से ही ,
मिल पायेगी विजय युद्ध में |
बड़ी बड़ी सेनाओं से भी,
नहीं कार्य यह सध पाता है ||
२९-
यदि मैं सेना लेकर आता,
प्रतिपग मग पर विरोध होता |
राज्य प्रसार लालसा का भी,
कौशल पर आक्षेप ठहरता |
सतर्क होजाते राक्षस -कुल,
पूरी तैयारी से पहले ||
३०-
लक्ष्मण हमको इसी भूमि की ,
मिट्टी से हैं वीर उगाने |
आतंक और अन्याय भाव से,
लड़ने के हैं भाव जगाने |
ताकि लौटने पर हम सबके,
वे हों स्वयं कुशल निजहित में ||
३१-
शीश नवा कर लक्ष्मण बोले-
राम नाम की महिमा से प्रभु,
मिट्टी भी सोना होजाती |
इच्छा है जब स्वयं राम की,
सोती धरती जाग उठेगी ;
आज्ञा दें अब क्या करना है ||
३२-
सभा, प्रबंधन और निरीक्षण ,
ऋषि-मुनियों संग विविधि गोष्ठियों ;
के आयोजन, कार्यान्वन का,
सारा भार लिया रघुवर ने |
नारी-वालक शिक्षा का और-
जन जागरण१ भार सीता ने ||
३३-
गृह निर्माण व युद्ध कला में-
विशेषग्य ,सौमित्र को मिला ;
भार प्रोद्योगिकी -शिक्षा एवं-
आयुध की निर्माण कला का |
एवं संचालन -कौशल को ,
जन जन में प्रसार करने का ||
३४-
लिखना पढ़ना व सद-आचरण,
महिलाओं बच्चों को, सबको;
अपनी कुटिया के कुंजों की,
छाया में वे जनक-नंदिनी;
आदर प्रेम से सिखलाती थीं,
दीप, दीप से जलता जाता२ ||
३५-
लक्ष्मण लगे सिखाने सब को,
धनुष बनाना, वाण चलाना |
शस्त्रों के निर्माण-ज्ञान सब,
शर-संधान व उचित निशाना |
धनुष-वाण, तरकश सब आयुध,
बनने लगे, हर कुटी वन में ||
३६-
सुन्दर सुद्रिड और सुरक्षित,
कुटिया-गृह निर्माण शिल्प का;
ज्ञान कराते थे रामानुज |
विविध शिल्प व श्रम की महत्ता -
उपयोगिता, दिखाते रहते;
हो स्वतंत्र निज अर्थ-व्यवस्था३ ||
३७-
ईश्वर महिमा, भजन-साधना,
लोक-कला, साहित्य-भावना;
चित्रकला, संगीत ज्ञान, सब-
बाल, वृद्ध, स्त्री-पुरुषों को ,
सिय-रामानुज लगे सिखाने ;
यह अंचल अब जाग रहा था ||
३८-
वन संपदा का रक्षण-वितरण,
विविधि भाँति फल-फूल उगाना |
नव-पद्दतियां, कृषि कर्मों४ की ,
सिखलाई जातीं कुटियों में |
वन व ग्राम की कला-कथाएं ,
सीखते व सुनते सिय-लक्ष्मण ||
३९-
योग भक्ति अध्यात्म ज्ञान का,
विविधि भांति की नीति-कथाओं ;
के ,कहने सुनने समझाने,
का क्रम स्वयं राम करते थे |
प्रातः सायं , प्रार्थना सभा में,
ऋषि-मुनियों का प्रवचन होता ||
४०-
रक्षा में, सौमित्र -गुणाकर,
किये नियोजित थे रघुवर ने |
पंचवटी का आसमान था,
यज्ञ -धूम से हुआ सुवासित |
कर्मठता से रामानुज की,
वन-उपांत५ थे अभय होगये ||
सप्तम सर्ग -संदेश
==============
२८-
नारी, केंद्र-बिंदु है भ्राता !
व्यष्टि,समष्टि,राष्ट्र की,जग की |
इसीलिये तो वह अवध्य है ,
और सदा सम्माननीय भी |
लेकिन वह भी तो मानव है,
नियम-निषेध मानने होंगे ||
२९-
नारी के निषेध-नियमन ही,
पावनता के संचारण की;
उचित निरंतरता समाज में,
सदा बनाए रखते, लक्ष्मण !
अवमानना, रेख-उल्लंघन,
कारण बनते, दुराचरण का ||
३०-
राजा जनता या प्रबुद्ध जन,
जब अपने दायित्व भूलकर;
उचित दंड यदि नहीं देते |
अनाचार को प्रश्रय देकर,
पाप-कर्म में भागी बनते;
नियम से नहीं ऊपर कोई ||
३३-
विविध कारणों से यदि नारी,
मर्यादा उल्लंघन करती |
दुष्ट भाव, स्वच्छंद आचरण,
से समाज दूषित होजाता |
कई पीढ़ियों तक फिर लक्ष्मण,
यह दुष्चक्र चलता रहता है ||
३४-
जब उद्दंड, रूप-ज्वाला युत,
और दुर्दम्य काम-पिपासा-
युक्त ताड़का१ से कौशिक का ;
तेज, तपस्या-बल गलता था ,
अत्याचार, अनीति मिटाने;
उसका भी बध किया गया था ||
३५-
शूर्पणखा का दंड हे अनुज !
सिर्फ व्यक्ति को दंड नहीं है |
चारित्रिक धर्मोपदेश है,
नारी व सम्पूर्ण राष्ट्र को |
चेतावनि है दुष्ट जनों को ,
कुकर्म-रत नारी-पुरुषों को ||
४२-
परम प्रिया राजा दशरथ की,
राज्यकर्म और राजनीति पर;
उचित मंत्रणा देने वाली |
देव कार्य, इस महायज्ञ में,
वही आहुती दे सकती थी ;
अपने प्रेम,त्याग, महिमा की ||
४३-
विश्वामित्र-वशिष्ठ योजना४ ,
निशिचर-हीन मही करने की ;
कैकयि माँ ही केंद्र बिंदु है |
शिव की भाँति, गरल पी डाला,
सहमत कब थे राजा दशरथ ||
४४-
सेना से यह कार्य न होता५ ,
कोइ अन्य उपाय कहाँ था |
राक्षस-अपसंस्कृति विनाश का ,
ध्वजा धर्म की फहराने का |
जन जन हित में,विज्ञ जनों को,
सदा गरल यह पीना होगा || ----सप्तम सर्ग -संदेश
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