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Lucknow, UP, India
एक चिकित्सक, शल्य-चिकित्सक जो हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान व उसकी संस्कृति-सभ्यता के पुनुरुत्थान व समुत्थान को समर्पित है व हिन्दी एवम हिन्दी साहित्य की शुद्धता, सरलता, जन-सम्प्रेषणीयता के साथ कविता को जन-जन के निकट व जन को कविता के निकट लाने को ध्येयबद्ध है क्योंकि साहित्य ही व्यक्ति, समाज, देश राष्ट्र को तथा मानवता को सही राह दिखाने में समर्थ है, आज विश्व के समस्त द्वन्द्वों का मूल कारण मनुष्य का साहित्य से दूर होजाना ही है.... मेरी तेरह पुस्तकें प्रकाशित हैं... काव्य-दूत,काव्य-मुक्तामृत,;काव्य-निर्झरिणी, सृष्टि ( on creation of earth, life and god),प्रेम-महाकाव्य ,on various forms of love as whole. शूर्पणखा काव्य उपन्यास, इन्द्रधनुष उपन्यास एवं अगीत साहित्य दर्पण (-अगीत विधा का छंद-विधान ), ब्रज बांसुरी ( ब्रज भाषा काव्य संग्रह), कुछ शायरी की बात होजाए ( ग़ज़ल, नज़्म, कतए , रुबाई, शेर का संग्रह), अगीत त्रयी ( अगीत विधा के तीन महारथी ), तुम तुम और तुम ( श्रृगार व प्रेम गीत संग्रह ), ईशोपनिषद का काव्यभावानुवाद .. my blogs-- 1.the world of my thoughts श्याम स्मृति... 2.drsbg.wordpres.com, 3.साहित्य श्याम 4.विजानाति-विजानाति-विज्ञान ५ हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान ६ अगीतायन ७ छिद्रान्वेषी ---फेसबुक -डाश्याम गुप्त
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सोमवार, 9 मई 2016

विवाह व सहजीवन-- डा श्याम गुप्त ...

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                                     विवाह व सहजीवन-- डा श्याम गुप्त
                           जीव मात्र की मूल प्रवृत्ति है स्व-जाति के जैविक सातत्य-क्रमिकता को बनाये रखना, ताकि उस प्रजाति का मूलोच्छेद न हो | मानव श्रेष्ठतम जीव होने के कारण जैविक के साथ साथ सांस्कृतिक–सामाजिक क्रमिकता को भी बनाए रखता है और उसका मूल है समाज-राष्ट्र-संस्कृति की सबसे छोटी इकाई परिवार | विवाह उसी इकाई की मूल संस्था या प्रथा है|
                        जहां तक सहजीवन, अर्थात बिना विवाह के साथ-साथ रहने की बात है, क्या इन तथाकथित अति-आधुनिक अल्ट्रा-माडर्न लोगों को अपनी पुत्रियों और बहनों और पुत्रों के अविवाहित कामाचार स्वीकार हैं ? क्या वे अपनी पत्नियों और अन्य पुरुष का सहजीवन स्वागत योग्य मानेंगे?
                      भारत में विवाह संस्था का अनुशासनात्मक विकास हुआ। यहां विवाह-संस्था स्थाई है। लेकिन अमरीका में विवाह संस्था समाप्त प्रायः है, वहां स्वाद की भाँति पत्नियां व पति बदले जाते हैं। अमरीका-यूरोप, भारत में आया, उस संस्कृति-प्रभावित कन्याएं अपना शरीर दिखाती हैं, देह सुंदर है, इसे दिखाने में गलत क्या है? इसी से अविवाहित सहजीवन का चलन बढ़ा। कई देशों में हाल ही में यौन सम्बंधों को वैध ठहराने वाला वक्तव्य दिया गया है। वह उनकी जीडीपी का महत्वपूर्ण भाग है | परन्तु ऐसा भोगवादी सहजीवन अंतत: विषादका कारण है।
                          ऐसे लोगों की दृष्टि में काम-सुख की सामाजिक मर्यादा रूढ़िवाद है और मुक्त यौन-सुख, आधुनिकता। स्वयं "कामसूत्र" के रचयिता आचार्य वात्स्यायन ने भी परस्त्री सहजीवन को गलत ठहराया है, उनका कथन है कि, "राजाओं, मंत्रियों, वरिष्ठों को उचित है कि वे परस्त्री गमन जैसे निन्दनीय कार्य में प्रवृत्त न हों।" तथा "पराई स्त्रियों से संबंध दोनों लोकों को नष्ट करता है।
                         सारी दुनिया के आदिम समाज स्वच्छंद थे। विवाह संस्था का विकास बाद में हुआ, तथापि भारत में ऋग्वैदिक काल में ही स्त्री-पुरुषों के लिए नियम थे | ऋग्वेद का यम-यमी प्रकरण सूक्त (10.10.1 से 14) इस सम्बन्ध में निश्चित नियम प्रस्तुत करता है---यम और यमी भाई-बहन थे। किसी विशिष्ट परिस्थिति में यमी ने यम से प्रेम सम्बंध की याचना की। यम ने ऐसी मित्रता से साफ इनकार किया –“न ते सखा सख्यम् वष्टि एतत् सऽलक्ष्मा यत् विषऽरूपा भवति।“ यम ने ऐसे सम्पर्क को अधम बताया। यही यम अनुशासक व आचरण मर्यादा के नीति-नियम निधारक हुए और ऐसे नियम-अनुशासन को यमानुशासन कहा गया|
भारत में श्वेतकेतु ने सर्वप्रथम विवाह की मर्यादा स्थापित की। पश्चिम में कोई ऋग्वेद नहीं उदित हुआ। कोई श्वेतकेतु नहीं हुआ। ऋग्वेदिक समाज स्त्री-पुरुष, संबंधों को लेकर सतर्क था | पत्नी रूपवती है पर अपना सौन्दर्य सिर्फ पति को दिखाती है। दूसरे लोग केवल वस्त्र देखते हैं या केवल वाणी सुनते हैं | ऋग्वेद 10.71.4 के सरस्वती सूक्त का मन्त्र है --
. उत त्वः पश्यन् न ददर्श वाचं, उत त्वः श्रृण्वन् न श्रृणोत्येनम् ।
उतो त्वस्मै तन्वं विसस्रे जायेव पत्य उषति सुवासाः ||

--- अर्थात-कोइ व्यक्ति सरस्वती ( विद्या या ज्ञान) को केवल शब्द से जानता है परन्तु देख (समझ) नहीं पाता, कोइ सुनता है परन्तु श्रोतस्थ( आत्मस्थ ) नहीं कर पाता| वह किसी विशिष्ट को ही अपने सौन्दर्य का वास्तविक ज्ञान-दर्शन कराती है जैसे रूपवती पत्नी अपना सौन्दर्य केवल अपने पति को दिखाती है| 

                       ऋग्वेदिक समाज पति-पत्नी के बीच प्रेम को लेकर भी सतर्क था। ऋग्वेद के सर्वप्रथम पूज्य देवता अग्नि, विवाह में पति-पत्नी का मन मिलाते हैं- दंपति समनसा कृणोपि अग्नि: (ऋग्वेद 5.3.2) विवाह संस्कार में अग्नि के सात फेरे की परम्परा इसी वजह से आयी।
 
                         संसार में दांपत्य जीवन में प्राय: एकपत्नीत्व ही सबसे अधिक प्रचलित है तथा अधिकांश समाजों में पुरुष की प्रधानता पाई जाती है। यूं परिवार के विभिन्न रूप, पुरुषप्रधान-पितृवंशीय, स्त्रीप्रधान-मातृ-वंशीय, बहुपत्नीत्वसमाज, बहुपतित्व समाज आदि भी पाए जाते हैं|
                     विवाह शब्द का प्रयोग मुख्य रूप से दो अर्थों में होता है। पहला अर्थ वह क्रिया, संस्कार, विधि या पद्धति है जिससे पति-पत्नी के स्थायी संबंध का निर्माण होता है। समाज द्वारा स्वीकार की गई- 'परिवार की स्थापना करने वाली कोई भी पद्धति' |
                      विवाह का दूसरा अर्थ समाज में प्रचलित एवं स्वीकृत विधियों द्वारा स्थापित किया जाने वाला दांपत्य संबंध और पारिवारिक जीवन, जहाँ एक ओर समाज स्त्री-पुरुष (पति-पत्नी) को कामसुख के उपभोग का अधिकार देता है, वहीं दूसरी ओर पति को पत्नी तथा संतान के पालन एवं भरणपोषण के लिए बाध्य करता है। 'पति' का अर्थ है पालन करने वाला-भरतार तथा 'भार्या' का अर्थ है भरणपोषण की जाने योग्य नारी। विवाह समाज में नवजात प्राणियों--संतान की स्थिति का निर्धारण करता है|
                      विवाह का उद्गम- मानव समाज की आदिम अवस्था में विवाह का कोई बंधन नहीं था, सब नर-नारियों को यथेच्छ कामसुख का अधिकार था। विवाह की कोई प्रथा न थी, स्त्री पुरुषों को यौन संबंध की पूरी स्वतंत्रता थी। चीन, मिस्र और यूनान के प्राचीन साहित्य में कुछ ऐसे उल्लेख मिलते हैं जिनके आधार पर पश्चिमी विद्वान विवाह की आदिम दशा कामचार की अवस्था मानते हैं जो बाद में बहुपत्नी प्रथा में विकसित हुई और अंत में एक ही नारी के साथ पाणिग्रहण करने का नियम प्रचलित हुआ। परन्तु भारत में बहुभार्यता सदैव नारी की स्वयं की इच्छा, नारी के भरणपोषण की सदिच्छा, राजनीतिक आवश्यकता एवं विशिष्ट स्थितियों से जुड़ा रहा है |
                  विवाह की संस्था मानव समाज में जैवशास्त्रीय आवश्यकताओं से उत्पन्न हुई है। इसका मूल कारण अपनी जाति को सुरक्षित बनाए रखने की चिंता है। यदि पुरुष यौन संबंध के बाद पृथक हो जाए, गर्भावस्था में पत्नी की देखभाल न की जाए, संतान उत्पन्न होने पर उसके समर्थ एवं बड़ा होने तक उसका पोषण न किया जाए तो मानव जाति का अवश्यमेव उन्मूलन हो जाएगा। अत: आत्मसंरक्षण की दृष्टि से विवाह की संस्था की उत्पत्ति हुई है। यह संस्था मनुष्य के पूर्वज समझे जाने वाले गोरिल्ला, चिंपाजी आदि में भी पाई जाती हैं वे प्रायः एक ही नर/मादा के साथ सारा जीवन व्यतीत करते हैं।
                        मानव समाज के विकास के एक स्थल पर, जब संतान की आवश्यकता के साथ उसकी सुरक्षा की आवश्यकता हुई एवं यौन मर्यादा न होने से आचरणों के बुरे व विपरीत व्यक्तिगत व सामाजिक परिणाम हुए तो श्वेतकेतु ने सर्वप्रथम विवाह संस्था रूपी मर्यादा स्थापित की ताकि प्राकृतिक काम संवेग की व्यक्तिगत संतुष्टि के साथ साथ स्त्री-पुरुष के आपसी सौहार्दिक सम्बन्ध एवं सामाजिक समन्वयता भी बने रहे | यजु.१०/४५ में कथन है—
“एतावानेन पुरुषो यजात्मा प्रतीति।
विप्राः प्राहुस्तथा चैतद्यो भर्ता सांस्म्रतांगना ॥“

--------अर्थात पुरुष भी स्वयं अकेला पुरुष नहीं बनता अपितु पत्नी व संतान मिलकर ही पूर्ण पुरुष बनता है। स्त्री के लिए भी यही सत्य है | अतः दाम्पत्य-भाव ही पुरुष को भी संपूर्ण करता है, स्त्री को भी |


                  विवाह संस्था का सतत् विकास हुआ है। श्वेतकेतु ऋग्वैदिककाल की विवाह संस्था को मजबूत करने वाले सामाजिक कार्यकर्ता थे। श्वेतकेतु के पिता उद्दालक प्रख्यात दर्शनशास्त्री ऋषि थे। श्वेतकेतु ने नियम बनाया कि जो स्त्री पति को छोड़ दूसरे से मिलेगी उसे भ्रूणहत्या का पाप लगेगा और जो पुरुष अपनी स्त्री को छोड़ दूसरी से सम्पर्क करेगा उस पर भी वैसा ही कठोर पाप होगा। भारत में यही परम्परा है।
विवाह सामाजिक अनुष्ठान है। सिर्फ कन्या के पिता ही कन्या का हाथ वर को नहीं सौंपते, बल्कि संपूर्ण समाज भी कन्यादान में हिस्सा लेता है। वर कहता है, "हे वधु, सौभाग्यवृद्धि के लिए मैं तेरा हाथ ग्रहण करता हूं। भग, अर्यमा, सविता और पूषन देवों ने गृहस्थ धर्म के लिए तुझे प्रदान किया। तुम वृद्धावस्था तक मेरे साथ रहो।" फिर अग्नि से प्रार्थना है- "हे अग्नि आप सुसन्तति प्रदान करें।" फिर इन्द्र से प्रार्थना है- "हे इन्द्र, इसे सौभाग्यशाली बनायें।
              ऋग्वेद के एक मंत्र का आशीष बड़ा प्यारा है- हे वधु ! तुम सास, ससुर, ननद, देवर समस्त परिवार की साम्राज्ञी बनो ----
"सम्राज्ञी श्वसुरे भव, सम्राज्ञी श्वसुरामं भव।
सम्राज्ञी ननन्दारिं ,सम्राज्ञी अधिदेव्रषु ॥ "


                       हमारे शास्त्रों ने चयन का अंतिम अधिकार कन्या को ही दिया है। वैदिक रीति के अनुसार आदर्श विवाह में परिजनों के सामने अग्नि को अपना साक्षी मानते हुए सात फेरे लिए जाते हैं। इसे सप्तपदी कहते हैं| प्रारंभ में कन्या आगे और वर पीछे चलता है| विवाह की पूर्णता सप्तपदी के पश्चात तभी मानी जाती है जब वर के साथ सात कदम चलकर कन्या अपनी स्वीकृति दे देती है| वामा बनने से पूर्व कन्या द्वारा वर से यज्ञ, दान में उसकी सहमति, आजीवन भरण-पोषण, धन की सुरक्षा, संपत्ति ख़रीदने में सम्मति, समयानुकूल व्यवस्था तथा सखी-सहेलियों में अपमानित न करने के सात वचन भराए जाते हैं। इसी प्रकार कन्या भी पत्नी के रूप में अपने दायित्वों को पूरा करने के लिए सात वचन भरती है।
                      सप्तपदी में पहला पग भोजन व्यवस्था के लिए, दूसरा शक्ति संचय, आहार तथा संयम के लिए, तीसरा धन की प्रबंध व्यवस्था हेतु, चौथा आत्मिक सुख के लिए, पाँचवाँ पशुधन संपदा हेतु, छटा सभी ऋतुओं में उचित रहन-सहन के लिए तथा अंतिम सातवें पग में कन्या अपने पति का अनुगमन करते हुए सदैव साथ चलने का वचन लेती है तथा सहर्ष जीवन पर्यंत पति के प्रत्येक कार्य में सहयोग देने की प्रतिज्ञा करती है।
सात वचनों के महत्व को यदि समझ लिया जाये तो दाम्पत्य सम्बन्धों में उत्पन अनेक समस्यायों का समाधान स्वत: ही हो जाएगा...
तीर्थव्रतोद्यापन यज्ञकर्म मया सहैव प्रियवयं कुर्या:
वामांगमायामि तदा त्वदीयं ब्रवीति वाक्यं प्रथमं कुमारी!...१...

----कन्या वर से कहती है कि यदि आप कभी तीर्थयात्रा को जाओ तो मुझे भी अपने संग लेकर जाना| कोई व्रत-उपवास अथवा अन्य धर्म कार्य आप करें तो आज की भांति ही मुझे अपने वाम
भाग में अवश्य स्थान दें| यदि आप स्वीकार करते हैं तो मुझे वामांग में आना स्वीकार है |
---- धार्मिक कृ्त्यों की पूर्णता हेतु पति के साथ पत्नि का होना अनिवार्य है| जिस धर्मानुष्ठान को पति-पत्नि मिल कर करते हैं, वही सुखद फलदायक होता है| पत्नि द्वारा इस वचन के माध्यम से धार्मिक कार्यों में पत्नि की सहभागिता, उसके महत्व को स्पष्ट किया गया है|
पुज्यौ यथा स्वौ पितरौ ममापि तथेशभक्तो निजकर्म कुर्या:
वामांगमायामि तदा त्वदीयं ब्रवीति कन्या वचनं द्वितीयम !!...२...

----कन्या वर से दूसरा वचन मांगती है कि जिस प्रकार आप अपने माता-पिता का सम्मान करते हैं, उसी प्रकार मेरे माता-पिता का भी सम्मान करें तथा कुटुम्ब की मर्यादा के अनुसार धर्मानुष्ठान करते हुए ईश्वर भक्त बने रहें तो मैं आपके वामांग में आना स्वीकार करती हूँ |
------इस वचन के द्वारा समाज व कन्या की दूरदृ्ष्टि का आभास होता है| आजकल गृ्हस्थी में किसी भी प्रकार के आपसी वाद-विवाद होने पर पति/पत्नी अपने पत्नि/पति के परिवार से या तो सम्बंध कम कर देता है अथवा समाप्त कर देते हैं|
जीवनम अवस्थात्रये मम पालनां कुर्यात
वामांगंयामि तदा त्वदीयं ब्रवीति कन्या वचनं तृ्तीयं !!...३..

तीसरे बचन में कन्या कहती है कि यदि आप जीवन की तीनों अवस्थाओं (युवावस्था, प्रौढावस्था, वृ्द्धावस्था) में मेरा पालन करते रहेंगें, तो ही मैं आपके वामांग में आने को तैयार हूँ |
कुटुम्बसंपालनसर्वकार्य कर्तु प्रतिज्ञां यदि कातं कुर्या:
वामांगमायामि तदा त्वदीयं ब्रवीति कन्या वचनं चतुर्थं !!...४...

कन्या चौथा वचन ये माँगती है कि अब तक आप घर-परिवार की चिन्ता से पूर्णत: मुक्त थे| अब जबकि आप विवाह बंधन में बँधने जा रहे हैं तो भविष्य में परिवार की समस्त आवश्यकताओं की पूर्ति का दायित्व आपका है| यदि आप इस भार को वहन करने की प्रतिज्ञा करें तो ही मैं आपके वामांग में आ सकती हूँ |
--------इस वचन में कन्या वर को भविष्य में उसके उतरदायित्वों के प्रति ध्यान आकृ्ष्ट करती हैं| विवाह पश्चात कुटुम्ब पोषण हेतु पर्याप्त धन की आवश्यकता होती है| अब यदि पति पूरी तरह से धन के विषय में पिता पर ही आश्रित रहे तो ऎसी स्थिति में गृ्हस्थी कैसे चल पाएगी| इसलिए कन्या चाहती है कि पति पूर्ण रूप से आत्मनिर्भर होकर आर्थिक रूप से परिवारिक आवश्यकताओं की पूर्ती में सक्षम हो सके| यहाँ यह भी स्पष्ट किया गया है कि पुत्र का विवाह तभी करना चाहिए जब वो अपने पैरों पर खडा हो पर्याप्त मात्रा में धनार्जन करने लगे |
स्वसद्यकार्ये व्यवहारकर्मण्ये व्यये मामापि मन्त्रयेथा
वामांगमायामि तदा त्वदीयं ब्रूते वच: पंचमत्र कन्या !!....५...

इस वचन में कन्या जो कहती है वह आज के परिपेक्ष में अत्यंत महत्व रखता है, कि अपने घर के कार्यों में, विवाहादि, लेन-देन अथवा अन्य किसी हेतु खर्च करते समय यदि आप मेरी भी मन्त्रणा लिया करें तो मैं आपके वामांग में आना स्वीकार करती हूँ|
--------यह वचन पूरी तरह से पत्नि के अधिकारों को रेखांकित करता है| बहुत से व्यक्ति किसी भी प्रकार के कार्य में पत्नि से सलाह करना आवश्यक नहीं समझते| यदि किसी भी कार्य को करने से पूर्व पत्नि से मंत्रणा कर ली जाए तो इससे पत्नि का सम्मान तो बढता ही है, साथ साथ अपने अधिकारों के प्रति संतुष्टि का भी आभास होता है|
न मेपमानमं सविधे सखीनां द्यूतं न वा दुर्व्यसनं भंजश्चेत
वामाम्गमायामि तदा त्वदीयं ब्रवीति कन्या वचनं च षष्ठम!!...६...

कन्या कहती है कि यदि मैं अपनी सखियों अथवा अन्य स्त्रियों के बीच बैठी हूँ तब आप वहाँ सबके सम्मुख किसी भी कारण से मेरा अपमान नहीं करेंगें| यदि आप जुआ अथवा अन्य किसी भी प्रकार के दुर्व्यसन से अपने आप को दूर रखें तो ही मैं आपके वामांग में आना स्वीकार करती हूँ|
--------वर्तमान परिपेक्ष्य में इस वचन में गम्भीर अर्थ समाहित हैं| विवाह पश्चात कुछ पुरूषों का व्यवहार बदलने लगता है. वे जरा जरा सी बात पर सबके सामने पत्नि को डाँट-डपट देते हैं| ऎसे
व्यवहार से बेचारी पत्नि का मन कितना आहत होता होगा| यहाँ पत्नि चाहती है कि बेशक एकांत में पति उसे जैसा चाहे डांटे किन्तु सबके सामने उसके सम्मान की रक्षा की जाए, साथ ही वो किन्ही दुर्वसनों में फँसकर अपने गृ्हस्थ जीवन को नष्ट न कर ले|
परस्त्रियं मातृ्समां समीक्ष्य स्नेहं सदा चेन्मयि कान्त कुर्या
वामांगमायामि तदा त्वदीयं ब्रूते वच: सप्तममत्र कन्या !!...७..

अन्तिम वचन के रूप में कन्या ये वर मांगती है कि आप पराई स्त्रियों को माता के समान समझेंगें और पति-पत्नि के आपसी प्रेम के मध्य अन्य किसी को भागीदार न बनाएंगें | यदि आप यह वचन मुझे दें तो ही मैं आपके वामांग में आना स्वीकार करती हूँ |
--------विवाह पश्चात यदि व्यक्ति किसी बाह्य स्त्री के आकर्षण में बँध पगभ्रष्ट हो जाए तो उसकी परिणिति क्या होती है, ये सभी भली भान्ति जानते हैं, इसलिए इस वचन के माध्यम से कन्या अपने भविष्य को सुरक्षित रखने का प्रयास करती है|
                         इस प्रकार विवाह के इस सर्वश्रेष्ठ रूप में, ईश्वर को साक्षी मानकर किए गए सप्त संकल्प रूपी स्तम्भों पर सुखी गृ्हस्थ जीवन का भार टिका हुआ है, वशर्ते कि आज के निष्ठाहीनता के युग में स्त्री-पुरुष दोनों ही इनका निर्वाह करें तो |
विवाह के विभिन्न पक्ष --- वैयक्तिक दृष्टि से विवाह पति-पत्नी की मैत्री और साझेदारी है। दोनों के सुख, विकास और पूर्णता के लिए आवश्यक सेवा, सहयोग, प्रेम और स्वार्थत्याग के अनेक गुणों की शिक्षा वैवाहिक जीवन से मिलती है। नर-नारी की अनेक आकांक्षाएँ विवाह एवं संतान प्राप्ति द्वारा पूर्ण होती हैं। उन्हें यह संतोष होता है कि उनके न रहने पर भी संतान उनका नाम और कुल की परंपरा अक्षुण्ण रखेगी, उनकी संपत्ति की उत्तराधिकारिणी बनेगी तथा वृद्धावस्था में उन्हें अवलंब देगी। हिंदू समाज में वैदिक युग से यह विश्वास प्रचलित है कि पत्नी मनुष्य का आधा अंश है, मनुष्य तब तक अधूरा रहता है, जब तक वह पत्नी प्राप्त करके संतान नहीं उत्पन्न कर लेता । पुरुष, प्रकृति के बिना और शिव, शक्ति के बिना अधूरा है।
                 धार्मिक दृष्टि से विवाह एक धार्मिक संबंध है। प्राचीन यूनान, रोम, भारत आदि सभी सभ्य देशों में विवाह को धार्मिक बंधन एवं कर्तव्य समझा जाता था। यज्ञ या कोइ भी धार्मिक अनुष्ठान पत्नी के बिना पूर्ण नहीं हो सकता | पितरों की आत्माओं का उद्धार पुत्रों के पिंडदान और तर्पण से ही होता है, इस धार्मिक विश्वास के कारण भी विवाह हिंदू समाज में धार्मिक कर्तव्य है। रोमनों का विश्वास था कि परलोक के मृत पूर्वजों का सुखी रहने हेतु उनका मृतक संस्कार यथाविधि होना तथा अपने वंशजों की प्रार्थनाएँ, भोज और भेंटें यथासमय मिलती रहने चाहिए| यहूदियों के अनुसार विवाह से बचने वाला व्यक्ति हत्यारे जैसा अपराधी माना जाता था। अधिकांश समाजों में विवाह की विधि एक धार्मिक संस्कार मानी जाती रही है। औद्योगिक क्रांति से उत्पन्न होने वाले परिवर्तनों से तथा धार्मिक विश्वासों में आस्था शिथिल होने से विवाह के धार्मिक पक्ष का महत्व कम होने लगा है।
               आर्थिक पक्ष के अनुसार प्रसूति के समय में तथा उसके बाद कुछ काल तक कार्यसक्षम न होने के कारण पत्नी को पति के अवलंब की आवश्यकता होती है, इस कारण दोनों में श्रम-विभाजन होता है, पत्नी बच्चों के लालन पालन और घर के काम को सँभालती है और पति पत्नी तथा संतान के भरणपोषण का दायित्व लेता है। नव-युग, औद्योगिक युग के कारण स्त्रियाँ आर्थिक दृष्टि से स्वावलंबी हो गईं, इससे पति-पत्नी, परिवार की स्थिति में कुछ अंतर आने लगा है। फिर भी, पत्नी और बच्चों के पालनपोषण के आर्थिक व्यय को वहन करने का उत्तरदायित्व अभी तक प्रधान रूप से पति का माना जाता है। पति द्वारा उपार्जित धन पर उसकी पत्नी और वैध पुत्रों का ही अधिकार स्वीकार किया जाता है।
                 विधिक दृष्टि से विवाह का एक क़ानूनी पक्ष भी है। परिणय सहवास मात्र नहीं है। किसी भी मानव समाज में नर-नारी को उस समय तक दांपत्य जीवन बिताने और संतान उत्पन्न करने का अधिकार व स्वीकृति धार्मिक कर्मकांड अथवा क़ानून द्वारा निश्चित विधियों को पूरा करने से तथा विवाह से उत्पन्न होने वाले दायित्वों को स्वीकार करने से प्राप्त होती है। अनेक आधुनिक समाजों में विवाह को वर-वधू की सहमति से होने वाला विशुद्ध क़ानूनी अनुबंध समझा जाता है। किंतु यह अनुबंध अन्य अनुबंधों या संविदाओं से भिन्न है, जिनमें अनुबंध करने वाले व्यक्ति इसकी शर्तें तय करते हैं, किंतु विवाह के कर्तव्य और दायित्व वर-वधू की इच्छा पर अवलंबित नहीं हैं; वे समाज की रूढ़ि, परंपरा और क़ानून द्वारा निश्चित होते हैं।
                सामाजिक दृष्टि के अनुसार विवाह का सामाजिक व नैतिक पक्ष भी महत्त्वपूर्ण है। विवाह से उत्पन्न होने वाली संतति परिवार में रहते हुए ही समुचित विकास और प्रशिक्षण प्राप्त करके समाज का उपयोगी अंग बनती है, बालक को किसी समाज के आदर्शों के अनुरूप ढालने का तथा उसके चरित्र निर्माण का प्रधान साधन परिवार है। यद्यपि आजकल शिशु-शालाएँ, बालोद्यान, स्कूल और राज्य बच्चों के पालन, शिक्षण और सामाजीकरण के कुछ कार्य अपने ऊपर ले रहे हैं, तथापि निश्चय ही बालक का समुचित विकास परिवार में ही संभव है। प्रत्येक समाज विवाह द्वारा मनुष्य की उद्दाम एवं उच्छंखल यौन भावनाओं पर अंकुश लगाकर उसे नियंत्रित करता है और समाज में नैतिकता की रक्षा करता है।
                       विवाह विच्छेद के सम्बन्ध में मानव समाज के विभिन्न भागों में बड़ा वैविध्य है। जिन समाजों में विवाह को धार्मिक संस्कार माना जाता है, उनमें प्राय: विवाह अविच्छेद्य संबंध माना जाता है यथा हिंदू एवं रोमन कैथोलिक ईसाई समाज | किंतु विवाह विच्छेद या तलाक के नियमों के संबंध में अत्यधिक भिन्नता होने पर भी कुछ मौलिक सिद्धांतों में समानता है। विवाह मुख्य रूप से संतानप्राप्ति एवं दांपत्य संबंध के लिए किया जाता है, किंतु यदि किसी विवाह में ये प्राप्त न हों तो दांपत्य जीवन को नारकीय या विफल बनाने की अपेक्षा विवाह विच्छेद की अनुमति दी जानी चाहिए। इस व्यवस्था का दुरुपयोग न हो, इस दृष्टि से तलाक का अधिकार अनेक प्रतिबंधों के साथ विशेष अवस्था में ही दिया जाता है।
                       हिंदू विवाह अधिनियम 1955 में भी इसको इसी रूप में बनाए रखने की चेष्टा की गई है। परन्तु विशेष परिस्थितियों के उत्पन्न होने पर, इस अधिनियम के अंतर्गत वैवाहिक संबंध विघटित किया जा सकता है।
                  विवाह-प्रथा के भविष्य व उस की समाप्ति की तथा राज्य द्वारा बच्चों के पालन की कल्पना समय समय पर होती रही है | वर्तमान में औद्योगिक एवं वैज्ञानिक परिवर्तनों से तथा पश्चिमी देशों में तलाकों की बढ़ती हुई भयावह संख्या के आधार पर विवाह की संस्था के लोप की भविष्यवाणी होरही है | विवाह के परंपरागत स्वरूपों में बड़े परिवर्तन आ रहे हैं। स्त्रियाँ आर्थिक दृष्टि से स्वावलंबी बन रही हैं। पहले उनके सुखमय जीवनयापन का एकमात्र साधन विवाह था, अब ऐसी स्थिति नहीं रही। धर्म के प्रति आस्था में शिथिलता और गर्भनिरोध के साधनों के आविष्कार ने विवाह विषयक पुरानी मान्यताओं को, प्राग्वैवाहिक सतीत्व और पवित्रता को गहरा धक्का पहुंचाया है।
                      किंतु ये सब परिवर्तन होते हुए भी भविष्य में विवाह प्रथा के बने रहने का प्रबल कारण है कि इससे कुछ ऐसे प्रयोजन पूरे होते हैं, जो किसी अन्य साधन या संस्था से नहीं हो सकते अर्थात वंश वृद्धि, संतान का पालन, सच्चे दांपत्य प्रेम और सुख प्राप्ति । यद्यपि विज्ञान ने कृत्रिम गर्भाधान का आविष्कार किया है किंतु कृत्रिम रूप से शिशुओं का प्रयोगशालाओं में उत्पादन और विकास संभव प्रतीत नहीं होता। राज्य और समाज शिशुशालाओं और बालोद्यानों का कितना ही विकास कर ले, उनमें इनके सर्वांगीण समुचित विकास की वैसी व्यवस्था संभव नहीं, जैसी परिवार में होती है। सहजीवन से भी दाम्पत्य प्रेम व सच्चा सुख संभव नहीं है अतः भविष्य में विवाह एक महत्त्वपूर्ण संस्था बनी रहेगी, भले ही उसमें कुछ न कुछ परिवर्तन होते रहें।

•
म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...

गुरुवार, 22 अगस्त 2013

क्या वास्तव में स्त्री, पुरुष सत्ता से आज़ाद होना चाहती है...डा श्याम गुप्त....

                              ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...



           
       बहुत पहले से यह कहा जाता रहा है कि ...
अज्ञान तमिस्रा मिटाकर,
आर्थिक रूप से,
समृद्ध होगी, सुबुद्ध होगी ;
नारी ! तू तभी-
स्वतंत्र होगी,
प्रबुद्ध होगी | "       

            परन्तु आजकल नारी सुबुद्ध भी है, प्रबुद्ध भी और आर्थिक रूप से समृद्ध व स्वतंत्र भी ....परन्तु अब यह भी देखा-सुना व अनुभव किया जारहा है कि ज्यादातर कामकाजी स्त्रियाँ घर और नौकरी की दोहरी जिम्मेदारिओं के बीच पिस कर रह जा रही हैं एवं अब ये स्वर भी उठ रहे हैं कि ...आर्थिक स्वतन्त्रता भी पुरुष सत्ता से आज़ाद नहीं करती ...

प्रश्न यह उठता है कि क्या वास्तव में स्त्री, पुरुष सत्ता से आज़ाद होना चाहती है ...यदि हाँ तो क्यों?.... फिर तो पुरुष भी स्त्री सत्ता से आज़ाद होना चाहेगा...क्यों वह व्यर्थ में ही यह बोझ ढोए.... फिर विवाह का क्या अर्थ रह जाता है ...विवाह संस्था ही अर्थहीन बन कर रह जाती है.... सब जैसा मन आये रहें , स्वतंत्र, स्वच्छंद..... विवाह का ढकोसला क्यों ....

       कहा जा रहा है कि सेल्फ ऐक्चुअलाइज़ेशन और फुलफिलमेंट अर्थात अपनी  स्वयं की एकल पहचान एवं इच्छाओं की पूर्ति ... नहीं कर पा रही हैं महिलायें ....एवं उसमें पुरुष/पति की इच्छाएं, आज्ञाएँ, अड़ंगेबाजी आज भी बाधा बनती हैं|

       साथ ही साथ यह भी देखा जारहा है कि स्त्रियाँ/पत्नियां भी पुरुष के  मानसिक उत्प्रीणन में पीछे नहीं हैं और न्यायालयों को निर्णय देने पड रहे हैं कि पति को भी इस आधार पर तलाक का अधिकार है | 

         हमें यह सोचना होगा कि ..... यह सेल्फ क्या है ?...सेल्फ यदि स्त्री का है तो पुरुष का भी होगा .....विवाह क्या है..क्या व क्यों विवाह आवश्यक है ? सभी जानते हैं कि विवाह दो पृथक-पृथक पृष्ठभूमि से आये हुए व्यक्तित्वों का मिलन होता है, एक गठबंधन है, अपनी अपनी जैविक एवं सामाजिक आवश्यकता पूर्ति हित एक समझौता  ...प्रेम विवाह हो या परिवार द्वारा नियत विवाह | समझौते में अपने अपने सेल्फ को अपने दोनों के सेल्फ में समन्वित, विलय करना होता है, अपना एकल सेल्फ कुछ नहीं होता, उसे भुलाकर समन्वित सेल्फ को उभारना होता है | यह एक दूसरे के मान व इच्छा को सम्मान देने से एक दूसरे के सेल्फ को समझने व उसे सम्मान देने से ही हो सकता है | तभी दोनों अपने अपने सेल्फ को जी सकते हैं| अन्यथा वह सेल्फ ..अहं में परिवर्तित होजाता है और समस्या, कठिनाई व द्वंद्व की स्थिति वहीं आती है | और इस स्थिति में समन्वय से काम लेने की अपेक्षा कोई भी एक पक्ष अपने अहं पर अड जाता है और उसकी पूर्ति हित बल प्रयोग, हठधर्मिता, अत्याचार पर उतर आता है | निश्चय ही  पुरुष का अहं प्रधान होता है, पर उस अहं को पिघलाना ही तो नारीत्व की जीत है, और नारीत्व के मान की रक्षा पुरुषत्व की जीत है...दोनों के जीत ही विवाह संस्था की, परिवार संस्था की जीत है..अर्थात कोई किसी की सत्ता से छुटकारा नहीं पा सकता समन्वय करना ही एक मात्र रास्ता है | यदि कुछ युगलों में समन्वय नहीं होपाता तो हज़ारों युगल सदैव साथ-साथ जीते भी तो हैं..हंसी-खुशी ...जीवन भर साथ निभाकर | निश्चय ही यह समस्या न पुरुष सत्ता की बात है न स्त्री-सत्ता की अपितु मानव आचरण की बात है |
       यह नर-नारी आचार-द्वंद्व तो सदा से आदिम युग से ही चला आया है परन्तु इसी चाबी से ही तो मानव आचरण व व्यवहार का ताला खुलता है|
      यदि यह समन्वय नहीं हो सकता तो फिर दोनों का अलग हो जाना ही उचित है |


       
 

मंगलवार, 30 अगस्त 2011

स्त्री-विमर्श गाथा-भाग-५...पुरुष अधिकारत्व समाज....ड़ा श्याम गुप्त....

                                       ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...


                पुरुष  सत्तात्मक समाज में भी नारी की स्थिति कोई दासी की नहीं रही, अपितु सलाहकार की आदरणीय स्थिति थी | देखा जाय तो  प्रारंभ से ही मूलतः समाज व्यवस्था की तीन धाराएं दिखाई पडती हैं----आदम को फल देने वाली व भटकाकर स्वर्ग से च्युत कराने वाली घटना पाश्चात्य देशों व अरब देशों में है जबकि भारत में यह घटना मनु , इडा व श्रृद्धा की आदरणीय  भाव की कथा है | अतः मूलतः पाश्चात्य समाज में नारी को अपराधी, शैतान की कृति आदि माना जाता रहा वहीं भारत में वह सदा  आदरणीय  रही |  इस प्रकार ....

 ----प्रथम धारा --जिसमें योरोप, अमेरिका, द अमेरिका, चीन, अफ्रीका, मध्य एशिया आदि भाग थे ...जिनमें मूलतः स्त्री सतात्त्मक समाज होने पर भी, अडम्स व ईव की कथा के कारण स्त्री को गर्हित समझा जाता रहा व युद्धों में उन्हें लूट, उपयोग व उपभोग की सामग्री व वलात्कार व अत्याचार के योग्य समझा जाता रहा|
----द्वितीय धारा----जिसमें मूलतः भूमध्य सागर के समीपवर्ती  देश, अरब भूमिखंड , उत्तरी अफ्रीकी  देश आदि थे , जिनमें मूलतः पुरुष सत्तात्मक समाज होने पर भी आदम व हव्वा --कथा के कारण ..स्त्री को उपभोग, लूट व वलात्कार की सामग्री समझा जाता रहा और   अत्याचारों का सिलसिला रहा |
---तृतीय धारा.....जो सिर्फ भारतीय उप महादीपीय भूखंड में रही....जहां आदि कथा आदम -हब्बा की न होकर मनु-इडा-श्रृद्धा की है ...जो अनुशासन, विद्वता व श्रृद्धा भावना की प्रतीक हैं.....अतः भारत में  पुरुष प्रधान  समाज होने पर भी  सदैव से ही  नारी विद्वता, कला की प्रतीक व आदर का पात्र  रही |  भारत में भी -द.भारत  में स्त्री- सत्तात्मक व्यवस्था -स्त्री  व्यवस्थात्मक  परिवार में परिवर्तित  होकर आज भी चल रही है वहीं अधिक उन्नत होने पर  उत्तर भारत  में पुरुष परिवार नियामक व्यवस्था बनी ---परन्तु दोनों व्यवस्थाओं में ही स्त्री आदर का पात्र रही |  उसे कभी भी पाश्चात्य देशों की भाँति शैतान की कृति नहीं समझा गया......यह इस बात का द्योतक है की मनुष्य अपनी प्राचीन व्यवस्थाओं के साथ उत्तर भारत से पहले समस्त उत्तर- पश्चिम व पूर्व की दुनिया में फैला एवं आगे प्रगति से दूर रहने के कारण पुरा-युग में रहा  (इसी  प्रकार  दक्षिण भारत में ) परन्तु अपने मूल स्थान  उत्तर भारतीय भूखंड में नए नए उन्नत  व्यवस्थाओं की स्थापना करता रहा....  | इसीलिये आज भी भौतिकता व उससे सम्बंधित भोग पूर्ण उन्नति पाश्चात्य व्यवस्था का भाव रहा जबकि धर्म, अध्यात्म, मानवता  के  भाव के साथ साथ उन्नति भारतीय भूभाग का मूल चरित्र रहा  |
               ------- यूं तो पुरुष सत्तात्मक समाज में मानव सर्वाधिक उन्नति की और अग्रसर हुआ|  परन्तु फिर भी  प्रारम्भ से ही ईश्वर सत्ता को चुनौती  के साथ साथ, आसुरी-भाव व दैवीय-भावों के द्वंद्व प्रारम्भ होने से अनाचार , अत्याचार , द्वंद्व आदि प्रारम्भ होगये थे |  परन्तु नारी मूलतः स्वतंत्र व आदरणीय थी |   हाँ स्त्रियों द्वारा प्रेम भक्ति के कारण  स्वयं की ओढी हुई --त्याग, श्रृद्धा, भक्ति, पति पारायणता की सतीत्व भावना  ( यह सामंती- युग की सती प्रथा नहीं थी ) की नींव पड़ने लगी थी |  साथ ही साथ आसुरी-भाव समाज में स्त्री स्वच्छंदता भी  चलती रही |  राम की शबरी, अहल्या प्रसंग  व कृष्ण-राधा  का प्रेम प्रसंग और कुब्जा प्रसंग व द्रौपदी का सखा भाव इसी प्रेम भक्ति स्वतन्त्रता व आदर भाव  के उदारहरण माने जा सकते हैं | स्वयंवर आदि प्रथाएं भी इसी  का प्रतीक हैं |  यद्यपि.राजनैतिक कारणों से या प्रेम -प्रसंगों के कारण स्वयंबर प्रथा व आठ प्रकार के विवाह अस्तित्व में आये परन्तु  स्त्रियों  के अधिकार सीमित होने प्रारम्भ होगये थे....स्त्रियों के सदैव पिता, पति व पुत्र की सुरक्षा में रहने के उपक्रम भी उपस्थित हुए | शर्तों पर स्वयंवर----सीताके लिए धनुष-यज्ञ , द्रौपदी के लिए मछली की आँख भेदन आदि  शर्तें मूलतः स्त्री की स्वायत्तता पर अंकुश का ही प्रतीक हैं  |



          वहीं  दूसरी ओर  स्त्री -पुरुष स्वच्छंदता के अनुचित परिणाम आने लगे...तो नैतिकता के प्रश्न उठे एवं स्त्री-पुरुष दोनों के लिए ही नैतिकता , शुचिता के नियम बने |  धर्म, अध्यात्म , योग, ब्रह्मचर्य आदि भाव पुरुषों के लिए बने, ताकि स्त्रियों की अमर्यादा भाव व यौवन-काम की उद्दाम भावनाओं को पुरुष- निर्लिप्तता द्वारा  भी  मर्यादित किया जा सके..... गंगा अवतरण  व शिव का उसे अपनी जटाओं में बाँध लेना सिर्फ नदी कथा नहीं अपितु नारी के उद्दाम वेग को योग द्वारा नियंत्रण  की कथा भी है.... क्योंकि अनुभव में स्त्रियाँ अधिक हानि उठाने वाली स्थिति में होती थीं अतः मर्यादा, आचरण, शुचिता के बंधन   अधिक कठोर होने लगे  कुलीन, शिक्षित व सदाचारी स्त्रियों ने स्वयं ही त्याग, भक्ति, सतीत्व आदि के उदात्त भाव स्वीकार किये व राजनैतिक और परिस्थितियों वश वे पुरुष की परमुखापेक्षी व बंधन में होती गयीं, और समाज पूर्ण रूप से पुरुष अधिकारत्व समाज में परिवर्तित  होता गया. |


             फिर भी  भारत में  स्त्रियों की अवस्था दासी की भांति नहीं थी,  यह सीता व राधा के चरित्र से समझा जा सकता है कि उनमें विरोध के स्वर तो हैं पर  असामाजिकता के तत्व नहीं अपितु स्वयं ओढी हुई  प्रेम-दास्य भावना  है, जबकि विश्व के अन्य सभी समाजों में  स्त्रियों को मानवी मानने में भी शक था, उन्हें शैतान की कृति, पापी समझा जाता था एवं हर प्रकार से तिरस्कार व अत्याचार के योग्य |  मिश्र, बेबीलोन आदि की संस्कृतियाँ व  नेफ्रेतीती आदि की कथाओं के प्रसंगों, से यह समझा जा सकता है  |       

                                                                                ---चित्र साभार....
-----क्रमश ...भाग --६ 
               

शनिवार, 28 अगस्त 2010

गोत्र के बारे में पढ़ें -सुबोध कुमार की व्याख्या------


Aryasamaj

कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

By--subodhkumar

--सगोत्र विवाह भारतीय वैदिक परम्परा मे निषिद्ध माना जाता है.गोत्र शब्द का प्रयोग वैदिक ग्रंथों मे कहीं दिखायी नही देता. सपिण्ड (सगे बहन भाइ) के विवाह निषेध के बारे में ऋग्वेद 10वें मण्डल के 10वें सूक्त मे यम यमि जुडवा बहन भाइ के सम्वाद के रूप में आख्यान द्वारा उपदेश मिलता है.
यमी अपने सगे भाई यम से विवाह द्वारा संतान उत्पन्न करने की प्रबल इच्छा प्रकट करती है.परन्तु यम उसे यह अच्छे तरह से समझाता है ,कि ऐसा विवाह प्रकृति के नियमों के विरुद्ध होता है,और जो इस प्रकार संतान उत्पन्न करते हैं वे घोर पाप करते है, “सलक्षमा यद्विषुरुषा भवाति” ऋ10/10/2 (“सलक्ष्मा सहोदर बहन से पीडाप्रद संतान उत्पन्न होने की सम्भावना होती है”)‌
“
पापमाहुर्य: सस्वारं निगच्छात” ऋ10/10/12 ( “जो अपने सगे बहन भाई से संतानोत्पत्ति करते हैं, भद्र जन उन्हें पापी कहते हैं)
इस विषय पर स्पष्ट जानकारी पाणिनी कालीन भारत से भी मिलती है.
अष्टाध्यायी के अनुसार “ अपत्यं पौत्र प्रभृति यद गोत्रम् “, एक पुरखा के पोते,पडपोते आदि जितनी संतान होगी वह एक गोत्र की कही जायेगी.
यहां पर सपिण्ड का उद्धरण करना आवश्यक हो जाता है.
“
सपिण्डता तु पुरुषे सप्तमे विनिवर्तते !
समानोदकभावस्तु जन्मनाम्नोरवेदन!! “—मनु-५/६०.

“सगापन तो सातवीं पीढी में समाप्त हो जाता है. और घनिष्टपन जन्म और नाम के ज्ञात ना रहने पर छूट जाता है.”
आधुनिक जेनेटिक अनुवांशिक विज्ञान के अनुसार inbreeding multiplier अंत:प्रजनन से उत्पन्न विकारों की सम्भावना का वर्धक गुणांक इकाई से यानी एक से कम सातवीं पीढी मे जा कर ही होता है, गणित के समीकरण के अनुसार,
अंत:प्रजनन विकार गुणांक= (0.5)raised to the power N x100, ( N पीढी का सूचक है,)
पहली पीढी मे N=1,से यह गुणांक 50 होगा, छटी पीढी मे N=6 से यह गुणांक 1.58 हो कर भी इकाई से बडा रहता है. सातवी पीढी मे जा कर N=7 होने पर ही यह अंत:पजनन गुणांक 0.78 हो कर इकाई यानी एक से कम हो जाता है, मतलब साफ है कि सातवी पीढी के बाद ही अनुवांशिक रोगों की सम्भावना समाप्त होती है.
यह एक अत्यंत विस्मयकारी आधुनिक विज्ञान के अनुरूप सत्य है जिसे हमारे ऋषियो ने सपिण्ड विवाह निषेध कर के बताया था; सगोत्र विवाह से शारीरिक रोग , अल्पायु , कम बुद्धि, रोग निरोधक क्षमता की कमी, अपंगता, विकलांगता सामान्य विकार होते हैं. भारतीय परम्परा मे सगोत्र विवाह न होने का यह भी एक परिणाम है कि सम्पूर्ण विश्व मे भारतीय सब से अधिक बुद्धिमान माने जाते हैं.सपिण्ड विवाह निषेध भारतीय वैदिक परम्परा की विश्व भर मे एक अत्यन्त आधुनिक विज्ञान से अनुमोदित व्यवस्था है. पुरानी सभ्यता चीन, कोरिया, इत्यादि मे भी गोत्र /सपिण्ड विवाह अमान्य है. परन्तु मुस्लिम और दूसरे पश्चिमी सभ्यताओं मे यह विषय आधुनिक विज्ञान के द्वारा ही लाया जाने के प्रयास चल रहे हैं. एक जानकारी भारत वर्ष के कुछ मुस्लिम समुदायों के बारे मे भी पता चली है. ये मुसलमान भाई मुस्लिम धर्म मे जाने से पहले के अपने हिंदु गोत्रों को अब भी याद रखते हैं, और विवाह सम्बंध बनाने समय पर सगोत्र विवाह नही करते.

आधुनिक अनुसंधान और सर्वेक्षणों के अनुसार फिनलेंड मे कई शताब्दियों से चले आ रहे शादियों के रिवाज मे अंत:प्रजनन के कारण ढेर सारी ऐसी बीमारियां सामने आंयी हैं जिन के बारे वैज्ञानिक अभी तक कुछ भी नही जान पाए हैं.
मेडिकल अनुसंधानो द्वारा , कोरोनरी हृदय रोग, स्ट्रोक, कैंसर , गठिया, द्विध्रुवी अवसाद (डिप्रेशन), दमा, पेप्टिक अल्सर, और हड्डियों की कमजोरी. मानसिक दुर्बलता यानी कम बुद्धि का होना भी ऐसे विकार हैं जो अंत:प्रजनन से जुडे पाए गए हैं
बीबीसी की पाकिस्तानियों पर ब्रिटेन की एक रिपोर्ट के अनुसार, उन के बच्चों मे 13 गुना आनुवंशिक विकारों के होने की संभावना अधिक मिली, बर्मिंघम में पहली चचेरे भाई से विवाह के दस बच्चों में एक या तो बचपन में मर जाता है या एक गंभीर विकलांगता विकसित करता है. बीबीसी ने यह भी कहा कि, पाकिस्तान में ब्रिटेन, के पाकिस्तानी समुदाय में प्रसवकालीन मृत्यु दर काफी अधिक है. इस का मतलब यह है कि ब्रिटेन में अन्य सभी जातीय समूहों. के मुकाबले मे जन्मजात सभी ब्रिटिश पाकिस्तानी शिशु मौते 41 प्रतिशत अधिक पाई गयी. इसी प्रकार Epidermolysis bullosa अत्यधिक शारीरिक कष्ट का जीवन, सीमित मानवीय और संपर्क शायद त्वचा कैंसर से एक जल्दी मौत भीआनुवंशिक स्थितियों की संभावना बताती है.

माना जाता है, कि मूल पुरुष ब्रह्मा के चार पुत्र हुए, भृगु, अंगिरा, मरीचि और अत्रि. भृगु के कुल मे जमदग्नि, अंगिरा के गौतम और भरद्वाज,मरीचि के कश्यप,वसिष्ट, एवं अत्रि के विश्वामित्र हुए; ----
इस प्रकार जमदग्नि, गौतम, भरद्वाज, कश्यप, वसिष्ट, अगस्त्य और विश्वामित्र ये सात ऋषि आगे चल कर गोत्रकर्ता या वंश चलाने वाले हुए. अत्रि के विश्वामित्र के साथ एक और भी गोत्र चला बताते हैं. इस प्रकार के विवरण से प्राप्त होती है कि--आदि ऋषियों के
आश्रम के नाम ,अपने नाम के साथ गुरु शिष्य परम्परा, पिता पुत्र परम्परा आदि के साथ, अपने नगर, क्षेत्र, व्यवसाय समुदाय के नाम भी जोड कर बताने की प्रथा चल पडी थीं. परन्तु वैवाहिक सम्बंध के लिए सपिंड की सावधानी सदैव वांछित रहती है. आधुनिक काल मे जनसंख्या वृद्धि से उत्तरोत्तर समाज, आज इतना बडा हो गया है कि सगोत्र होने पर भी सपिंड न होंने की सम्भावना होती है. इस लिए विवाह सम्बंध के लिए आधुनिक काल मे अपना गोत्र छोड देना आवश्यक नही रह गया है. परंतु सगोत्र होने पर सपिण्ड की परीक्षा आवश्यक हो जाती है.यह इतनी सुगम नही होती. सात पीढी पहले के पूर्वजों की जानकारी साधारणत: उपलब्ध नही रह्ती. इसी लिए सगोत्र विवाह न करना ही ठीक माना जाता है.
इसी लिए 1955 के हिंदु विवाह सम्बंधित कानून मे सगोत्र विवाह को भारतीय न्याय व्यवस्था मे अनुचित नही माना गया. परंतु अंत:प्रजनन की रोक के लिए कुछ मार्ग निर्देशन भी किया गया है.
वैदिक सभ्यता मे हर जन को उचित है के अपनी बुद्धि का विकास अवश्य करे. इसी लिए गायत्री मंत्र सब से अधिक महत्वपूर्ण माना और पाया जाता है.
निष्कर्ष यह निकलता है कि सपिण्ड विवाह नही करना चाहिये. गोत्र या दूसरे प्रचलित नामों, उपाधियों को बिना विवेक के सपिण्ड निरोधक नही समझना चाहिये.